2030 तक भारत में कोयले की मांग 1.6 अरब टन पहुंचने का अनुमान: कोयला सचिव

कोयला सचिव विक्रम देव दत्त ने शुक्रवार को कहा कि 2030 तक भारत में कोयले की मांग लगभग 1.6 अरब टन तक पहुंचने का अनुमान है। देश अब कोयले की कमी वाली स्थिति से सरप्लस (अतिरिक्त आपूर्ति) की ओर बढ़ चुका है, इसलिए कोयले के व्यापार के लिए ज्यादा कुशल, पारदर्शी और मार्केट-बेस्ड तरीकों की जरूरत बढ़ गई है।
‘ग्लोबल कमोडिटी कॉन्क्लेव 2026’ में दत्त ने बताया कि कोयला एक्सचेंज खरीदारों और विक्रेताओं के लिए एक पारदर्शी बाजार तैयार करेगा। इससे आगे चलकर कोयला डेरिवेटिव्स मार्केट की नींव भी पड़ेगी। उन्होंने कहा, “2030 तक कोयले की मांग बढ़कर 1.6 अरब टन होने का अनुमान है। ऐसे में जब देश सरप्लस स्थिति में आ गया है, तो ज्यादा कुशल और मार्केट-बेस्ड ट्रेडिंग की जरूरत है।”
सचिव ने जानकारी दी कि 2024-25 में घरेलू कोयला उत्पादन पहली बार एक अरब टन के पार पहुंच गया और 2025-26 में भी लगातार दूसरे साल इसी स्तर से ऊपर बना रहा। यह उपलब्धि ऊर्जा क्षेत्र में भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता और निर्बाध ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित करने की क्षमता को दर्शाती है।
सरकार मौजूदा ‘वन-टू-मेनी’ (एक से कई) सेल्स मॉडल से आगे बढ़कर ‘मेनी-टू-मेनी’ (कई से कई) ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ना चाहती है। कोयला एक्सचेंज के जरिए खरीदार और विक्रेता एक साथ बोली लगा सकेंगे, जिससे प्रतिस्पर्धी कीमतें तय होंगी और कोयला बिक्री के कई चैनल एक स्टैंडर्ड फ्रेमवर्क के तहत आ जाएंगे। इससे कमर्शियल और कैप्टिव कोयला माइनर्स को बड़े बाजार तक पहुंच मिलेगी। उपभोक्ता कई घरेलू उत्पादकों से कोयला खरीद सकेंगे, जिससे किसी एक सप्लायर पर निर्भरता कम होगी।
एक्सचेंज क्लियरिंग और सेटलमेंट के लिए सेंट्रल काउंटर पार्टी के रूप में भी काम करेगा, जिससे दोनों पक्षों के लिए रिस्क मैनेजमेंट बेहतर होगा। साथ ही, अचानक या कम समय की जरूरतों को पूरा करना आसान हो जाएगा।
दत्त ने कहा कि आगे चलकर यह प्लेटफॉर्म डेरिवेटिव्स मार्केट के विकास में भी मदद करेगा, जिससे उत्पादक और उपभोक्ता कीमतों से जुड़े जोखिमों को मैनेज कर सकेंगे। आने वाले महीनों में जब कोयला एक्सचेंज का ढांचा काम करना शुरू करेगा, तो सरकार एक्सचेंज, रेगुलेटर, मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर संस्थानों, वित्तीय मध्यस्थों और उद्योग से जुड़े लोगों के साथ मिलकर काम करेगी। इस बड़े सुधार का मकसद ज्यादा पारदर्शिता, तेज प्रोजेक्ट पूरा होना, प्राइवेट सेक्टर की अधिक भागीदारी और एक कुशल व आत्मनिर्भर कोयला इकोसिस्टम तैयार करना है।
