हथकरघा को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की पहल, गिरिराज सिंह ने लॉन्च की नई पुस्तक

केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने आज बुधवार को “भारतीय हथकरघा क्षेत्र में कार्बन फुटप्रिंट मूल्यांकन : पद्धतियां और केस स्टडीज” नामक पुस्तक का विमोचन किया। वस्त्र मंत्रालय के तहत हथकरघा विकास आयुक्त कार्यालय और IIT दिल्ली के टेक्सटाइल्स एंड फाइबर इंजीनियरिंग विभाग ने इस पुस्तक को संयुक्त रूप से तैयार किया है। इसका उद्देश्य भारत के हथकरघा उद्योग को पर्यावरण के प्रति अधिक जागरूक और टिकाऊ बनाना है।
यह पुस्तक हथकरघा क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को मापने और कम करने की व्यावहारिक और सरल विधियां प्रदान करती है। इसमें भारत के विभिन्न हिस्सों में तैयार की गई वास्तविक केस स्टडीज शामिल हैं, जैसे कि कॉटन बेडशीट्स, फ्लोर मैट्स, इकत साड़ी, बनारसी साड़ी और अन्य पारंपरिक हथकरघा उत्पाद। यह पुस्तक हथकरघा उद्योग के लिए कम लागत वाले डेटा संग्रह और उत्सर्जन माप विधियों को शामिल करती है, जो हथकरघा को अधिक पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन अपनाने में मदद करेगी।
गौरतलब है कि भारतीय हथकरघा क्षेत्र ग्रामीण और अर्ध-शहरी आजीविका का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो 35 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है। इनमें से 25 लाख से अधिक महिलाएं बुनकर और सहायक कार्यों में संलग्न हैं, जिससे यह क्षेत्र महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण का एक सशक्त माध्यम बनता है। यह क्षेत्र कम पूंजी-निवेश, न्यूनतम बिजली उपयोग, नवाचार के प्रति खुलापन और बाजार की मांगों के अनुसार अनुकूलता जैसे कई फायदे प्रदान करता है।
पुस्तक में बताया गया है कि कैसे हथकरघा उत्पाद अपनी अनूठी पहचान, लघु उत्पादन क्षमता और पर्यावरणीय मित्रता के कारण देश और विदेश में अत्यधिक लोकप्रिय है। यह अध्ययन वैश्विक जलवायु रिपोर्टिंग मानकों को भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार ढालते हुए तैयार किया गया है, जिससे हथकरघा उद्योग को सतत विकास की दिशा में सक्षम बनाया जा सके।
इस पुस्तक को तैयार करने में भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान (IIHT), वीवर्स सर्विस सेंटर, स्थानीय बुनकर समूहों, ग्रीनस्टिच प्राइवेट लिमिटेड और अन्य सरकारी एजेंसियों की भी मदद ली गई है। वस्त्र मंत्रालय ने सभी हितधारकों, मीडिया प्रतिनिधियों और आम जनता से आग्रह किया है कि वे इस महत्वपूर्ण पुस्तक के निष्कर्षों का अध्ययन करें और इसे अपनाएं, ताकि भारतीय वस्त्र उद्योग को अधिक हरित और टिकाऊ बनाया जा सके।
