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भारत की बाघ संरक्षण नीति बनी दुनिया के लिए प्रेरणा

भारत की बाघ संरक्षण नीति बनी दुनिया के लिए प्रेरणा
  • PublishedJuly 30, 2026

कभी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके बाघों को बचाने से लेकर आज दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघों का आश्रय बनने तक भारत ने संरक्षण के क्षेत्र में एक असाधारण उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिक नीतियों, आधुनिक तकनीक और मजबूत संस्थागत ढांचे के बल पर भारत ने बाघ संरक्षण को केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे सतत विकास और पर्यावरणीय सुरक्षा का वैश्विक मॉडल बना दिया है।

हर वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस दुनिया को बाघों के संरक्षण की आवश्यकता का संदेश देता है। भारत के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह उन दशकों लंबे प्रयासों का प्रतीक है, जिनके परिणामस्वरूप देश ने बाघों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि के साथ-साथ अपने वन पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूत किया है।

अखिल भारतीय बाघ आकलन-2022 के अनुसार भारत में अब 3,682 जंगली बाघ हैं, जो विश्व की कुल जंगली बाघ की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत हैं। वर्ष 2010 में पूरी दुनिया में जहां केवल लगभग 3,200 बाघ बचे थे, वहीं आज उनकी वैश्विक संख्या बढ़कर लगभग 5,711 हो चुकी है। इस उपलब्धि में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है।

भारत की बाघ संरक्षण नीति का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं है। बाघ पारिस्थितिकी तंत्र के शीर्ष शिकारी और ‘अम्ब्रेला प्रजाति’ माने जाते हैं। इनका संरक्षण जंगलों, नदियों, जैव विविधता, जल स्रोतों और जलवायु संतुलन की रक्षा सुनिश्चित करता है। स्वस्थ वन न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखते हैं, बल्कि ग्रामीण आजीविका, जल संरक्षण और प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत की इस सफलता की आधारशिला 1973 में शुरू की गई ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ है। समय के साथ यह दुनिया की सबसे व्यापक वन्यजीव संरक्षण पहलों में विकसित हो चुकी है। वर्तमान में देश के 18 राज्यों में फैले 58 टाइगर रिजर्व लगभग 84,500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की रक्षा कर रहे हैं, जो भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 2.56 प्रतिशत है।

इस अभियान को और सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) वैज्ञानिक मार्गदर्शन, टाइगर संरक्षण योजनाओं की स्वीकृति और रिजर्वों के प्रभावी प्रबंधन की जिम्मेदारी निभा रहा है। वर्ष 2006 में टाइगर टास्क फोर्स की सिफारिशों के बाद हुए कानूनी सुधारों ने संरक्षण व्यवस्था को और मजबूत बनाया तथा वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो जैसी संस्थाओं की स्थापना की गई।

भारत की संरक्षण रणनीति की सबसे बड़ी विशेषता आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग है। प्रत्येक चार वर्ष में होने वाला अखिल भारतीय बाघ आकलन दुनिया का सबसे बड़ा जैव विविधता सर्वेक्षण माना जाता है। वर्ष 2022 के सर्वेक्षण में 20 राज्यों में 6.41 लाख किलोमीटर से अधिक क्षेत्र का अध्ययन किया गया, जो वन्यजीव निगरानी का एक अभूतपूर्व उदाहरण है।

एम-STRiPES जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, जीपीएस और रिमोट सेंसिंग तकनीक के माध्यम से निगरानी को मजबूत बना रहे हैं, जबकि CaTRAT और ExtractCompare जैसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियां कैमरा ट्रैप से प्राप्त लाखों तस्वीरों का विश्लेषण कर प्रत्येक बाघ की पहचान उसकी विशिष्ट धारियों के आधार पर करती हैं। इससे बाघों की सटीक गणना और उनके आवास की बेहतर निगरानी संभव हो सकी है।

संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी भारत की सफलता का महत्वपूर्ण आधार रही है। आज संरक्षण योजनाएं वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आजीविका, इको-टूरिज्म और सामुदायिक सहभागिता को भी बढ़ावा देती हैं। कोर और बफर क्षेत्रों के साथ विकसित वन्यजीव गलियारे (Wildlife Corridors) बाघों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करते हुए विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हैं।

भारत अब वैश्विक स्तर पर भी बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। नेपाल, भूटान, म्यांमार, रूस, चीन और अफ्रीकी देशों के साथ सहयोग के अलावा भारत ग्लोबल टाइगर फोरम की मेजबानी करता है, जो बाघ संरक्षण के लिए समर्पित दुनिया का एकमात्र अंतर-सरकारी संगठन है। वहीं, इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (IBCA) की स्थापना भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को और मजबूत करती है, जिसके माध्यम से 95 देश सात प्रमुख बड़ी बिल्ली प्रजातियों के संरक्षण के लिए मिलकर कार्य कर रहे हैं।

हालांकि जलवायु परिवर्तन, आवासों का विखंडन, मानव-वन्यजीव संघर्ष और अवैध वन्यजीव व्यापार जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं, लेकिन भारत की वैज्ञानिक नीति, आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी पर आधारित संरक्षण रणनीति इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

बाघ संरक्षण की भारत की यह यात्रा केवल वन्यजीव संरक्षण की सफलता नहीं, बल्कि यह प्रमाण है कि दूरदर्शी नीतियां, वैज्ञानिक योजना और जनसहभागिता के माध्यम से विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। आज भारत न केवल अपने बाघों की रक्षा कर रहा है, बल्कि पूरी दुनिया को प्रकृति संरक्षण का एक सफल और प्रेरक मॉडल भी प्रदान कर रहा है।