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भारतीय भाषाओं से ही भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

भारतीय भाषाओं से ही भारत की आत्मा की अभिव्यक्ति: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु
  • PublishedApril 17, 2026

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने महाराष्ट्र के वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के छठे दीक्षांत समारोह में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने भारतीय भाषाओं के महत्व और उनकी सांस्कृतिक भूमिका पर जोर दिया।

भारतीय भाषाएं संस्कृति और चेतना की वाहक

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही भारत की आत्मा अभिव्यक्त होती है। उन्होंने कहा कि देश की विभिन्न भाषाओं में संस्कृति, संवेदनशीलता और चेतना की एक समान धारा प्रवाहित होती है। उन्होंने यह भी खुशी जताई कि पूर्वोत्तर सहित देश के विभिन्न राज्यों के विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।

अंतरभाषाई संवाद से होगा विकास

उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाओं के बीच संवाद की परंपरा हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं के विकास में सहायक बनेगी। यह देश की एकता और सांस्कृतिक समृद्धि को भी मजबूत करेगा।

विद्यार्थियों को विरासत पर गर्व करने की सलाह

द्रौपदी मुर्मु ने छात्रों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उन्हें दो महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्देश्यों पर ध्यान देना चाहिए—औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों को समाप्त करना और भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्स्थापित करना।

सभी भाषाओं का सम्मान जरूरी

उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी भी भाषा का विरोध नहीं करना चाहिए, बल्कि सभी भारतीय भाषाओं पर समान रूप से गर्व करना चाहिए। यही दृष्टिकोण देश को मजबूत बनाएगा।

गांधी जी के नाम पर विश्वविद्यालय का महत्व

राष्ट्रपति ने कहा कि महात्मा गांधी के नाम पर विश्वविद्यालय का नामकरण पूरी तरह उचित है। उन्होंने विश्वविद्यालय से जुड़े सभी लोगों से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के विकास के लिए समर्पित भाव से कार्य करने की अपेक्षा जताई।

शिक्षा का उद्देश्य समाज से जुड़ाव

उन्होंने कहा कि गांधी जी शिक्षा को स्वावलंबन का आधार मानते थे। ऐसी शिक्षा ही सार्थक है जो लोगों की वास्तविक जरूरतों से जुड़ी हो और समाज के लिए उपयोगी हो। राष्ट्रहित में काम न आने वाली शिक्षा को उन्होंने अहितकारी बताया।

मौलिकता और नवाचार पर जोर

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि अपनी भाषा ही सृजन, शोध और मौलिक चिंतन की सबसे सशक्त माध्यम होती है। उन्होंने छात्रों से नकल के बजाय नवाचार और मौलिक रचनात्मकता को अपनाने का आह्वान किया।

विकसित भारत में युवाओं की भूमिका अहम

उन्होंने कहा कि भारत एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जिसमें भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने विश्वास जताया कि विश्वविद्यालय के छात्र राष्ट्र निर्माण में योगदान देंगे और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाएंगे।