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विश्व एड्स दिवस : केंद्र सरकार के प्रयास से एचआईवी केस में आई गिरावट, जानें क्या है स्थिति

विश्व एड्स दिवस : केंद्र सरकार के प्रयास से एचआईवी केस में आई गिरावट, जानें क्या है स्थिति
  • PublishedDecember 1, 2023

राष्ट्रीय स्तर पर वयस्क (15-49 वर्ष ) में एचआईवी प्रसार में कोरोना महामारी के चरम के बाद से गिरावट आई है, जहां 2000 में प्रसार 0.55%, 2011 में 0.32% और 2021 में 0.21% होने का अनुमान लगाया गया।

एचआईवी संक्रमण स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी बीमारियों में से एक माना जाता है। ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) के कारण होने वाले एक्वायर्ड इम्यून डेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) के बारे में जागरूकता फैलाने और इस बीमारी से पीड़ित लोगों का समर्थन करने के लिए हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। पहला विश्व एड्स दिवस 1 दिसंबर 1988 को मनाया गया था।

जागरूकता जरूरी

WHO और भारत सरकार के सतत प्रयासों के चलते एचआईवी संक्रमण तथा एड्स के संबंध में जागरूकता बढ़ाने के अभियानों का कुछ असर दिखा है और संक्रमण दर घटी है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2010 से अभी तक एचआईवी संक्रमण की दर में करीब 42 फीसदी की कमी आई है। फिर भी भारत में एड्स के प्रसार के कारणों में आज भी सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता एवं जिम्मेदारी का अभाव, अशिक्षा, निर्धनता, अज्ञानता और बेरोजगारी प्रमुख कारण हैं।

वैसे तो किसी को भी हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों में इसका खतरा ज्यादा होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस संक्रमण को मरीज में जब 4-5 साल हो जाते हैं तब कई अलग-अलग लक्षण आने लगते हैं जिनमें दस्त लगना, वजन घटना, बुखार होने लगता है। इसके अलावा खांसी-बलगम आना, कई दूसरे तरह के संक्रमण होना, टीबी की समस्या होना शामिल है। एचआईवी संक्रमण के बाद ऐसी स्थिति बन जाती है कि इससे संक्रमित व्यक्ति की मामूली से मामूली बीमारियों का इलाज भी दूभर हो जाता है और रोगी मृत्यु की ओर चला जाता है। आज भी यह खतरनाक बीमारी दुनियाभर के करोड़ों लोगों के शरीर में पल रही है। एड्स महामारी के कारण अफ्रीका के तो कई गांव के गांव नष्ट हो चुके हैं।

आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक स्तर पर एड्स से अब तक लगभग 40.4 मिलियन लोगों की जान ले ली है। जबकि 2022 के अंत में अनुमानित 39.0 मिलियन लोग एचआईवी के साथ जी रहे थे, जिनमें से दो तिहाई (25.6 मिलियन) अफ्रीकी क्षेत्र में हैं।

एचआईवी को लेकर लोगों में हीनता की भावना
अधिकांशतः लोग एड्स के लक्षण उभरने पर भी बदनामी के डर से न केवल एचआईवी परीक्षण कराने से कतराते हैं बल्कि एचआईवी संक्रमित किसी व्यक्ति की पहचान होने पर उससे होने वाला व्यवहार तो बहुत चिंतनीय एवं निंदनीय होता है। इस दिशा में लोगों में जागरूकता पैदा करने के संबंध में सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा भले ही कितने भी दावे किए जाएं पर एड्स पीडि़तों के साथ भेदभाव के सामने आने वाले मामले विभिन्न राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटियों एवं सरकारी तथा गैर सरकारी प्रयासों की पोल खोलते नजर आते हैं। देशभर में ऐसे बहुत से एचआईवी संक्रमित व्यक्ति और उनके परिवार हैं, जिन्हें एचआईवी संक्रमण का खुलासा होने के बाद समाज और अपने ही लोग हिकारत भरी नजरों से देखते थे।

भारत में पहला केस
भारत में 1986 में एड्स का पहला मामला सामने आया था। उसके बाद से बीते वर्षों में एड्स के ढेरों मामले सामने आए। अगर एड्स के कारणों पर नजर डालें तो मानव शरीर में एचआईवी का वायरस फैलने का मुख्य कारण हालांकि असुरक्षित सेक्स तथा अधिक पार्टनरों के साथ शारीरिक संबंध बनाना है लेकिन कई बार कुछ अन्य कारण भी एचआईवी संक्रमण के लिए जिम्मेदार होते हैं। शारीरिक संबंधों द्वारा 70-80 फीसदी, संक्रमित इंजेक्शन या सुईयों द्वारा 5-10 फीसदी, संक्रमित रक्त उत्पादों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया के जरिये 3-5 फीसदी तथा गर्भवती मां के जरिये बच्चे को 5-10 फीसदी तक एचआईवी संक्रमण की आशंका रहती है।

एड्स के लिए जागरूकता और भारत सरकार के प्रयास

–भारत सरकार ने 1992 में एड्स विरोधी अभियान के रूप में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (प्रथम चरण) की शुरुआत की। इसका उद्देश्य देश में एचआईवी संक्रमण के प्रसार एवं एड्स के प्रभाव को कम करना था ताकि एड्स से मरने वाले लोगों की संख्या में कमी लाई जा सके और इसे फैलने से रोका जा सके।

–इस कार्यक्रम को वर्ष 1992 से 1999 के बीच लागू किया गया एवं इसके क्रियान्वयन के लिए 84 मिलियन डॉलर का खर्च निर्धारित किया गया। इस कार्यक्रम के क्रियान्वयन एवं इसके प्रबंधन को और मजबूत करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण बोर्ड का गठन किया गया एवं राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना की गई। तब से अब तक एनएसीपी के चार चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है। एनएसीपी का चौथा चरण (विस्तार) 31 मार्च 2021 को संपन्न हुआ।

–वहीं मौजूदा समय में राष्ट्रीय एड्स एवं एसटीडी नियंत्रण कार्यक्रम को 1 अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2026 तक जारी रखने की मंजूरी दी गई है जो भारत सरकार द्वारा पूरी तरह वित्त पोषित एक केंद्रीय योजना है। इस कार्यक्रम के चरण-V को 1,5471.94 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई है।

–एनएसीपी के तहत राष्ट्रीय एड्स प्रतिक्रिया को वैश्विक स्तर पर एक अत्यंत सफल कार्यक्रम माना जाता है। भारत में वार्षिक नए एचआईवी संक्रमण में गिरावट 31 प्रतिशत वैश्विक औसत (आधार वर्ष 2010) के मुकाबले 48 प्रतिशत दर्ज की गई। इसी प्रकार एड्स के कारण सालाना मृत्यु में 42 प्रतिशत वैश्विक औसत (आधार वर्ष 2010) के मुकाबले 82 प्रतिशत की गिरावट आई है। परिणामस्‍वरूप वयस्‍कों में एचआईवी का 0.22 प्रतिशत प्रसार के साथ भारत में एचआईवी के प्रसार का स्‍तर कम बरकरार है।

एचआईवी के लिए सभी तरह की जांच और दवा नि:शुल्क
साल 2014 के बाद की गई कई महत्‍वपूर्ण पहल ने एनएसीपी की सफलता को आगे बढ़ाया है। इनमें एचआईवी/ एड्स रोकथाम एवं नियंत्रण अधिनियम (2017), टेस्‍ट एंड ट्रीट पॉलिसी, यूनिवर्सल वायरल लोड टेस्टिंग, मिशन संपर्क, समुदाय-आधारित स्क्रीनिंग, डोलटेग्रेविर आधारित उपचार रेजिमेन आदि शामिल हैं। एचआईवी (पीएलएचआईवी) के साथ जीने वाले लगभग 14.20 लाख लोग इस कार्यक्रम के जरिये आजीवन, मुफ्त, उच्च गुणवत्ता वाले एंटी-रेट्रोवायरल उपचार (एआरटी) करा रहे हैं। यह सरकार द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रमों के तहत उपचार हासिल करने वाले विश्‍व का एक सबसे बड़ा पीएलएचआईवी समूह है।

एनएसीपी चरण-V के तहत राष्ट्रीय एड्स एवं एसटीडी प्रतिक्रिया वित्त वर्ष 2025-26 तक जारी रहेगी ताकि व्‍यापक रोकथाम, जांच एवं उपचार सेवाओं के जरिये 2030 तक सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य खतरे के तौर पर एचआईवी/ एड्स वैश्विक महामारीको खत्‍म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 3.3 को हासिल किया जा सके।

योजना का मुख्य उद्देश्य

रोकथाम- पहचान- उपचार सेवाओं के लिए तैयार पैकेज के साथ सालाना लगभग 8 करोड़ लोगों को कवर किया जाएगा।
99.5 प्रतिशत से अधिक वयस्क आबादी को एचआईवी मुक्त रखा जाएगा।
एनएसीपी चरण-V के पांच वर्षों में लगभग 27 करोड़ एचआईवी परीक्षण किए जाएंगे जिसमें लगभग 14 करोड़ गर्भवती महिलाओं को शामिल किया जाएगा।
परियोजना अवधि के अंत तक 21 लाख एचआईवी संक्रमित लोग एंटी-रेट्रोवायरल उपचार (एआरटी) पर होंगे।
वायरल लोड को कम करने की दिशा में उपचार की प्रभावशीलता की निगरानी के लिए ऑन-एआरटी एचआईवी संक्रमित लोगों के बीच लगभग 80 लाख वायरल लोड परीक्षण किए जाएंगे।