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बोस्टन - चंद्रमा से धरती पर गिरा एक दुर्लभ पिंड अमेरिका में एक नीलामी में छह लाख 12 हजार 500 डॉलर (करीब 4.5 करोड़ रुपये) में बिका। 5.5 किलोग्राम वजन का यह पिंड या पत्थर छह टुकड़ों से मिलकर बना है, जिन्हें किसी रहस्यमय पहेली की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रखा गया है। 'बुआग्बा' या 'मून पजल' के नाम से चर्चित इस उल्कापिंड को वैज्ञानिकों ने एनडब्ल्यूए 11789 नाम दिया है।
इसे पिछले सा अफ्रीका के रेगिस्तान में खोजा गया था। माना जाता है कि बहुत पहले किसी उल्कापिंड की टक्कर के कारण यह चंद्रमा से अलग हो गया होगा। इसके बाद यह 3,84,400 किलोमीटर की दूरी और पृथ्वी के वायुमंडलीय घर्षण को पार करते हुए उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका के रेगिस्तान में आ गिरा। यह खगोलीय पिंड अभी तक का सबसे बड़ा चांद का टुकड़ा है। नीलामी संस्था आरआर ऑक्सन के अनुसार, इस अद्भुत पिंड को वियतनाम के टैम चुक पैगोडा कॉम्प्लेक्स ने सबसे ज्यादा बोली लगाकर खरीदा।

 


वाशिंगटन - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने करीब तीन दशक पहले रूस के साथ हुए परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते को जल्द खत्म करने का एलान किया है। ट्रंप ने कहा कि इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज समझौते का रूस लगातार उल्लंघन कर रहा है। ऐसे में अमेरिका अकेले इसका भार नहीं ढो सकता।
1987 में हुआ था समझौता
दोनों देशों के बीच 1987 में हुआ यह समझौता अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इस पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और उनके रूसी समकक्ष मिखाइल गोर्बाच्योव ने दस्तखत किए थे।
क्‍या है संधि
इस समझौते के तहत दोनों देश सतह से दागी जाने वाली 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों का निर्माण या परीक्षण नहीं कर सकते। लेकिन, कुछ वर्ष पहले रूस ने नोवाटर मिसाइल लांच की थी। अमेरिका का मानना है कि यह मिसाइल प्रतिबंधित रेंज वाली है।
अमेरिका ने जताया विरोध
इस मिसाइल को लेकर रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) के अधिकारियों को आगाह करते हुए कहा था कि यदि रूस नोवाटर मिसाइल वापस नहीं लेता है तो इस समझौते को बरकरार नहीं रखा जा सकेगा।
बराक ओबामा पर भी निशाना
ट्रंप ने शनिवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा, 'हम इस समझौते को खत्म करने जा रहे हैं। सभी देश हथियार बना रहे हैं तो हमें भी उस रेंज के हथियार बनाने होंगे।' ट्रंप ने समझौते के उल्लंघन पर चुप्पी साधने के लिए पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि बराक ने समझौता क्यों नहीं तोड़ा? यदि चीन और रूस समझदारी दिखाकर ऐसे हथियार नहीं बनाने का समझौता करें तो मुझे खुशी होगी, लेकिन जब तक इसका उल्लंघन हो रहा है अमेरिका इसका अकेले पालन नहीं करेगा।'

 


नई दिल्ली - अफगानिस्तान में निम्न सदन के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जल्द ही इसके नतीजे भी आ जाएंगे। लेकिन अफगानिस्तान में नवोदित लोकतंत्र के लिए तालिबान हमेशा खतरों के बादल की तरह मंडराता रहा है। ऐसे में यहां सत्ता के लिए निर्वाचित सरकार बनाम तालिबान का संघर्ष चलता रहा है। हालांकि, यह दावा किया जाता रहा है कि अफगानिस्तान को तालिबान के नियंत्रण से मुक्त करा लिया गया है, लेकिन तालिबान अभी भी अफगानिस्ताान में सक्रिय है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि भारत में अफगानिस्तान की लाेकतांत्रिक सरकार और लोकतंत्र कितना उपयोगी है। यहां तालिबान हुकूमत से भारत को क्या नुकसान है। इसके साथ यह भी जानेंगे कि पाकिस्ता्न की सियासत पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
अफगानिस्तान के लोकतंत्र में छिपा है भारत का हित
भारत के लिए लोकतांत्रिक अफगानिस्तांन ज्यादा मुफीद है। यही वजह है कि लोकतंत्र की बहाली के बाद भारत ने यहां बड़े पैमाने पर निवेश किया है। यहां के मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ ग़नी का भी जोरदार समर्थन किया है। दरअसल, यहां के पुनर्निमाण में भारत ने लगभग ढाई अरब डॉलर का निवेश किया है। इसलिए भारत कभी नहीं चाहेगा कि वहां पर तालिबान मज़बूत हो या वह सत्ता में आए। यही वजह है कि भारत प्रत्येक मंच से अफ़गानिस्तान में लोकतंत्र का पुरजोर हिमायत करता रहा है। भारत ने खुलकर यहां की लोकतांत्रिक सरकार का समर्थन किया है, ऐसे में यह भी आशंका प्रकट की जाती रही है कि भारत के तालिबान विरोध में वह कश्मीर को निशाना बना सकता है। लेकिन इस आशंका को भारत ने नजरअंदाज करते हुए निर्वाचित सरकार का समर्थन व उसकी मदद की है।
तालिबान को लेकर पाकिस्तानन की दुविधा
तालिबान को लेकर पाकिस्तान हुकूमत शुरू से दुविधा में रही है। इसलिए पाकिस्तान सरकार का यहां की लोकतांत्रिक सरकार को लेकर स्टैंड बहुत साफ नहीं है। पाकिस्तान पर आरोप लगते रहे हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का समर्थन करता है। लेकिन यह सत्य है कि यदि काबुल में तालिबान मजबूत हुआ तो पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसा माना जाता रहा है कि अगर यहां तालिबान मजबूत हुआ तो पाकिस्तान में स्थिरता नहीं आएगी। पाक में आतंकियों का हस्तक्षेप बढ़ेगा। पेशावर आर्मी स्कूल हमले के बाद पाकिस्तान में तालिबान को लेकर और नफरत बढ़ी है। ऐसे में नई पाकिस्तानी सरकार के सामने तालिबान से संबंधों को लेकर दुविधा बढ़ेगी।
बेअसर रही तालिबान की धमकी
तालिबान के तमाम अवरोधों, धमकियों और हिंसा के बीच अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव संपन्न हुए। चुनाव के दौरान हुई हिंसा में 28 से अधिक लोगों की मौत हुई, लेकिन हिंसा के बीच यहां की जनता ने चुनाव में बढ़-चढ़कर‍ हिस्सा लिया। करीब 30 लाख लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। मतदान प्रतिशत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यहां तालिबानी व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हुआ है। अफगानिस्तान की जनता की लोकतंत्र के प्रति आस्था बढ़ रही है। अफगानिस्तान में 2001 में पहली बार चुनाव हुआ और एक लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ।
यहां तालिबान ने लोगों को चुनाव में भाग नहीं लेने की चेतावनी दी थी, इसके बावजूद लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्साा लिया। खास बात यह है कि यहां के ऐसे प्रांतों में जहां तालिबान का दखल ज्यादा है और सुरक्षा की स्थिति बेहतर नहीं है, वहां बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। उधर, संयुक्त राष्ट्र ने चुनाव में बड़ी संख्या में लोगों के वोट डालने की सराहना की है।
हिंदू और सिख के लिए सीट आरक्षित
बता दें कि अफगानिस्तान के निचले सदन की 250 सीटों के लिए हुए चुनाव में 2,566 उम्मीदवार मैदान में थे। अफगानिस्तान में सिख और हिंदू समुदाय की तादाद को देखते हुए सदन में उनको प्रतिनिधित्व देने की पहल की गई। इस चुनाव में पहली बार अफ़ग़ानिस्तान के सिख और हिंदू समुदाय के लिए भी सीट आरक्षित की गई। सिख और हिंदू समुदाय के लोगों को एक-एक सीट आरक्षित है।
महिलाओं के लिए 40 से ज़्यादा सीटें आरक्षित
राजनीतिक रूप से अफगानिस्ताान में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर हुई है। यहां के निम्न सदन में महिलाओं के लिए 40 से ज़्यादा सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा जिन महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा वोट मिलेंगे वो भी संसद के लिए चुनी जाएंगी यानी महिलाओं की संख्या 40 से ज़्यादा भी हो सकती है। इस लिहाज से अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पाकिस्तान और कजाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा बेहतर है। इतनी महिला सांसद न तो पाकिस्तान में हैं और न ही कज़ाकिस्तान में हैं। अफ़गानिस्तान में महिलाअों की हिस्सेदारी सर्वत्र है। सरकार में कई महिलाएं मंत्री और उपमंत्री हैं व कई राजदूत हैं।


दुबई - सऊदी अरब मध्य एशिया में लंबे समय से अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी रहा है। इस सहयोग का बड़ा कारण सुरक्षा संबंधी चिंताएं और तेल है, लेकिन एक तथ्य यह भी है कि उनके कूटनीतिक रिश्ते इतने सहज-सरल नहीं रहे हैं। दोनों देशों ने 1940 में अपने कूटनीतिक रिश्ते कायम किए थे। यह द्वितीय विश्व युद्ध का शुरुआती दौर था। 14 फरवरी 1945 को अमेरिका और सऊदी अरब ने अपने सहयोग को एक समझौते के जरिये नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। तब सऊदी अरब के किंग अब्देल अजीज बिन सऊद और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट के बीच स्वेज नहर में क्रूजर यूएसएस क्विंसी के बोर्ड पर ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी।
अमेरिका ने दी सुरक्षा की गारंटी
उस दौरान हुए समझौते के तहत अमेरिका ने सऊदी किंगडम को सुरक्षा की गारंटी दी और इसके बदले में अमेरिका को सऊदी अरब में तेल भंडारों तक विशेष पहुंच हासिल हुई। इन विशाल तेल भंडारों की खोज पिछली सदी के तीसरे दशक में हुई थी। तभी से अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्ते स्थिर तरीके से आगे बढ़ते रहे। जब अगस्त 1990 में इराकी शासक सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया तब रियाद ने लाखों अमेरिकी सैनिकों को सऊदी अरब में तैनात होने की इजाजत दी।
सद्दाम को सत्ता से हटाने के लिए लड़ा युद्ध
अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने सद्दाम को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए 1991 में खाड़ी युद्ध शुरू किया तो सऊदी अरब ही साझा सेना का सैन्य बेस था। इराक युद्ध के बाद भी गठबंधन सेना ने सऊदी अरब में लड़ाकू विमानों की तैनाती जारी रखी। यह सब दक्षिणी इराक में नो फ्लाई जोन बनाए रखने के लिए किया गया। इससे सऊदी अरब के कट्टरपंथी तत्व अमेरिका से नाराज हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि इन तत्वों ने नौवें दशक के मध्य में सऊदी अरब की धरती पर दो अमेरिका विरोधी हमले किए।
सऊदी पर चोरी-छिपे पैसे उपलब्ध कराने के आरोप
11 सितंबर 2001 की आतंकी घटना ने अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को तगड़ा झटका दिया। इस हमले में 19 विमान अपहर्ता शामिल थे। इनमें से 15 सऊदी अरब के नागरिक थे। सऊदी अरब ने इन हमलों की निंदा की, लेकिन उस पर यह आरोप भी लगे कि वह इस्लामिक चरमपंथी तत्वों को चोरी-छिपे पैसे उपलब्ध करा रहा है। 2001 के अंतिम दिनों में रियाद ने अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिकी हमलों में शामिल होने से भी इन्कार कर दिया। इसके बाद उसने 2003 के इराक युद्ध में भी भाग नहीं लिया। हालांकि इसके बावजूद अमेरिका ने एक बार फिर सद्दाम के खिलाफ हवाई हमलों के लिए सऊदी अरब की धरती का इस्तेमाल किया। इराक युद्ध के बाद अमेरिका ने ज्यादातर अपने सैनिकों को सऊदी अरब से निकाल कर कतर में तैनात कर दिया। कतर ही खाड़ी में अमेरिका के एयर ऑपरेशन का मुख्यालय है। इस फैसले के बावजूद का सहयोग कायम रहा।
असद के खिलाफ सीरिया में विद्रोह का भी समर्थन
रियाद ने राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ सीरिया में विद्रोह का भी समर्थन किया और उस समय अपनी नाराजगी भी नहीं छिपाई जब सितंबर 2013 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बशर की सत्ता के खिलाफ हवाई हमले के अपने संकल्प से पीछे हट गए। उसी साल अक्टूबर में सऊदी अरब ने सीरियाई संकट को लेकर अमेरिका और कुछ अन्य देशों के रुख के विरोध में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता स्वीकार करने से भी मना कर दिया। 2015 में ईरान के साथ अमेरिका ने जो नाभिकीय समझौता किया वह भी सऊदी अरब को रास नहीं आया। यह ओबामा प्रशासन में सऊदी अरब के घटते विश्वास का एक और प्रमाण था।
ईरान को लेकर भी बदला है ट्रंप का रुख
ओबामा प्रशासन के साथ रिश्तों में खटास के वातावरण को बदलने के लिए ही सऊदी अरब के नेताओं ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत का स्वागत किया। मई 2017 में ट्रंप ने जब सऊदी अरब का दौरा किया तो वहां के सुन्नी शासकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। ट्रंप का रुख ईरान को लेकर भी बदला है और यह सऊदी अरब के अनुकूल है। तेहरान और इस्लामिक कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब ने एक बड़ा सैन्य समझौता भी हाल में किया है। इस सबके बीच सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की गुमशुदगी के मामले ने अमेरिका और सऊदी अरब के बीच तनाव को बहुत बढ़ा दिया है। हालांकि सऊदी अरब ने माना है खाशोगी की हत्‍या उनके दूतावास में ही हुई है।
पांच सऊदी अधिकारी बर्खास्त
इस बीच, सऊदी किंग सलमान ने इस घटना के सिलसिले में पांच अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है। इनमें शाही दरबार के सलाहकार और क्राउन प्रिंस के बेहद विश्वस्त माने जाने वाले सौद अल कहतनी और उप-खुफिया प्रमुख अहमद असीरी शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने खुफिया एजेंसी के पुनर्गठन के लिए प्रिंस मोहम्मद की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समिति भी गठित की है। इससे साफ है कि क्राउन प्रिंस के पास व्यापक अधिकार बने रहेंगे।
सहयोग के बाद भी इसको स्‍‍‍‍वीकार नहीं किया जा सकता
ऐरीजोना में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ‘सऊदी अरब अच्छा सहयोगी रहा है, लेकिन जो कुछ हुआ है वह अस्वीकार्य है।’ उन्होंने कहा कि इस संबंध में वह क्राउन प्रिंस से बात करेंगे। साथ ही उन्होंने ईरान से निपटने में और सऊदी अरब को बड़ी मात्र में हथियार बिक्री से पैदा होने वाले रोजगार को लेकर उसकी महत्ता का उल्लेख भी किया। हालांकि सऊदी घोषणा से पहले उन्होंने कहा था कि अगर खशोगी की हत्या में सऊदी अरब का हाथ हुआ तो उस पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

 


काबुल - अफगानिस्तान में चुनावी हिंसा के कारण करीब 65 लोग मारे गए हैं और 125 अन्य घायल हुए हैं। शनिवार को देश में हुए चुनाव के दौरान तालीबान द्वारा 193 मतदान केंद्रों पर गए गए हमलों में 27 नागरिक, 9 सुरक्षाबलों और 31 विद्रोहियों की मौत हो गई।
कई मतदान केंद्र घंटों देरी से खुले जिससे अफरा-तफरी पैदा हो गई। तकनीकी गड़बड़ी और कर्मचारियों की कमी के कारण मतदान देरी से शुरू हुआ।
खबरों के अनुसार काबुल के एक मतदान केंद्र पर एक आत्मघाती हमलावर ने खुद को उड़ा लिया। इस घटना में कम से कम 15 लोग मारे गए और 20 अन्य घायल हो गए। पुलिस ने कहा कि अफगानिस्तान की राजधानी में हिंसा की विभिन्न घटनाओं में मरने वालों की संख्या 19 हो गई है और करीब 100 लोग घायल हुए हैं। इस हमले की जिम्मेवारी अभी तक किसी ने नहीं ली है, लेकिन तालिबान पहले ही दावा कर चुका है कि चुनाव के दौरान उसने देश भर में 300 हमले किए हैं।
उत्तरी शहर कुंदुज में हिंसा के कारण मतदान बाधित हुआ। स्वास्थ्य अधिकारियों ने बताया कि यहां तीन लोग मारे गए और 39 अन्य घायल हुए हैं। प्रांत की राजधानी पर राकेट से 20 हमले हुए हैं। स्वतंत्र चुनाव आयोग (आइईसी) के निदेशक मोहम्मद रसूल उमर ने बताया कि कुंदुज से कई किलोमीटर दूर एक मतदान केंद्र पर तालिबान के हमले में आइईसी का एक कर्मचारी मारा गया और कई अन्य लापता हैं। हमले में बैलेट बॉक्स तबाह हो गए। नानगरहार प्रांत में आठ धमाके हुए। प्रांत के गवर्नर के प्रवक्ता ने बताया कि दो लोग मारे गए हैं और पांच अन्य घायल हुए हैं।
तालिबान के पतन के बाद तीसरा चुनाव
प्रारंभिक आंकड़ों में बताया गया है कि 27 प्रांतों के चुनाव में मतदान केंद्रों पर 15 लाख मतदाता जुटे। चुनाव आयोजकों ने बताया कि कई मतदाता घंटों तक प्रतीक्षा करते रहे। अधिकांश मतदान केंद्र प्रक्रिया की देखरेख करने के लिए नियुक्त शिक्षकों के विफल रहने के कारण देरी से खुले। चुनाव आयोग ने कहा है कि 371 मतदान केंद्रों पर रविवार तक मतदान बढ़ाया जा सकता है। प्रारंभिक चुनाव तीन वर्ष देरी से हो रहा है। 2001 में तालिबान के पतन के बाद यह तीसरा चुनाव है।
पुलिस प्रमुख के मारे जाने से पड़ा असर
कंधार में गुरुवार को हुए हमले में पुलिस प्रमुख के मारे जाने से सुरक्षा बलों का आत्मविश्वास डगमगा गया था। चुनाव से पहले सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। हमले के कारण कंधार में मतदान एक सप्ताह के लिए टाल दिया गया है। चुनाव लड़ रहे 2500 से ज्यादा प्रत्याशियों में से 10 की हत्या हो चुकी है। प्रारंभिक परिणाम 10 नवंबर को जारी किए जाएंगे।


टोक्यो - एक यूरोपीय-जापानी अंतरिक्ष यान को सौर मंडल के सबसे छोटे ग्रह बुध पर भेजा गया है। सात साल की यात्रा के बाद यह यान सूर्य के सबसे करीबी ग्रह तक पहुंचेगा। यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईएसए) और जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जेएएक्सए) ने कहा कि मानवरहित बेपीकोलंबो अंतरिक्ष यान को फ्रेंच गुएना से कक्षा में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। दोनों एजेंसियों ने कहा कि इस यान का नाम इटली के वैज्ञानिक गिसेपे बेपी कोलंबो के नाम पर रखा गया है। एरिआने 5 रॉकेट से शुक्रवार को स्थानीय समय के अनुसार रात 10:45 पर अंतरिक्ष यान को रवाना किया गया।
एक बयान में ईएसए के महानिदेशक जान वोएर्नर कहा, 'ईएसए और जेएक्सए के लिए बेपीकोलंबो एक बड़ा मील का पत्थर है। इससे कई बड़ी सफलताएं सामने आएंगी। चुनौतीपूर्ण यात्रा पूरी करने के अलावा यह अभियान बदले में विज्ञान को कई बड़ी उपलब्धियां सौंपेगा।'
सूर्य के सबसे करीबी ग्रह होने के कारण बुध पर कुछ ही अंतरिक्ष यान भेजे जा सके हैं। सूर्य से यह ग्रह छह करोड़ किलोमीटर से कम दूरी पर जबकि धरती से करीब 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित है। यही दूरी इस ग्रह तक की यात्रा को चुनौतीपूर्ण बनाती है। दिन में जो हिस्सा सूर्य के सामने होता है वहां का तापमान 400 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचता है जबकि रात वाले हिस्से का तापमान माइनस 170 डिग्री सेल्सियस होता है।

बीजिंग - दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था चीन लगातान अपनी ताकत में इजाफा कर रहा है। फाइटर जेट से लेकर पनडुब्‍बी और युद्धपोत बनाने के बाद अब चीन ने एक ऐसा विमान बनाया है जो पानी और जमीन दोनों पर उतर सकता है और दोनों ही जगहों से उड़ान भी भर सकता है। इस तरह के विमानों को उभयचर विमान या एंफीबियस प्‍लेन कहा जाता है।इस विमान का कोड…
कराची - पाकिस्तान की एक सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत महिला को फरमान सुनाया गया कि वो वर्कप्लेस पर हिजाब पहनकर आना छोड़ दे। अगर वह ऐसा नहीं कर सकती तो नौकरी छोड़ सकती है। किसी मुस्लिम बहुल देश में हिजाब को लेकर आपत्ति का यह शायद पहला मामला है।इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा खड़ा हो गया। इसके बाद क्रिएटिव किओस कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जावेद कादिर…
काबुल - अफगानिस्तान में लंबे समय बाद हो रहे संसदीय चुनाव दहशतगर्दों के निशाने पर हैं। इस दौरान काबुल के कई मतदान केंद्रों से बम विस्फोट की खबरें आ रही हैं। मतदान केंद्र पर मौजूद एएफपी संवाददाता ने बताया कि एक स्कूल में हो रहे मतदान के दौरान विस्फोट के बाद मतदाता भागने लगे। एक आदमी ने एएफपी को बताया कि वह मतदान के लिए गया था, लेकिन विस्फोट के…
वाशिंगटन - अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अगले साल की शुरू में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन से दूसरी बार मुलाकात हो सकती है। यह बैठक कोरियाई प्रायद्वीप में परमाणु निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को हासिल करने को लेकर होगी।अमेरिका के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने व्हाइट हाउस में पत्रकारों को शुक्रवार को बताया कि अगले साल के शुरुआत में किसी भी समय बैठक होने की संभावना है। अधिकारी…
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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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