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दुनिया (5113)

नई दिल्‍ली। क्‍या आपने आसमान में कभी उल्‍का पिंडों की बारिश होते हुए देखी है। यह हमेशा से ही आम आदमी से लेकर वैज्ञानिकों तक को अपनी तरफ आकर्षित करती रही है। आम आदमी की यदि बात करें तो खगौलिए घटनाओं में दिलचस्‍पी रखने वाले लोगों को इस दिन का बेसर्बी से इंतजार रहता है। कई बार तो जानकारी मिलने के बाद पूरी-पूरी रात ऐसे जुनूनी लोग अंतरिक्ष को निहारते गुजार देते हैं लेकिन ज्‍यादा कुछ हाथ नहीं लगता। लेकिन जरा सोचिए यदि इस तरह की खगौलिए घटनाएं आपके मनचाहे तरीके और आपके मनचाहे समय पर हों तो कैसा रहे। सुनकर भले ही ये अजीब लगे लेकिन यह अब सच होने वाला है। दरअसल, जापान इस योजना को आज हकीकत का जामा पहनाने वाला है।
एएलई ने उठाया जिम्‍मा:-दरअसल टोक्यो स्थित एक स्टार्टअप एस्‍‍‍‍‍‍ट्रो लाइव एक्‍सपीरियंस (एएलई) ने कृत्रिम तरीके से उल्का पिंड की बरसात कराने का जिम्मा उठाया है। एएलई दुनिया की पहली शूटिंग स्टार क्रिएशन तकनीक विकसित कर रहा है। इस दिशा में कामयाबी पाने से वह कुछ कदम ही दूर है। इसके तहत पहली माइक्रोसेटेलाइट 17 जनवरी को जापान एयरोस्पस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (जाक्सा) के एप्सिलॉन-4 रॉकेट से लॉन्च की जाएगी। यह प्रोग्राम अंतरिक्ष में अपनी कार्यक्षमता प्रदर्शित करने के एक अवसर के रूप में बनाया गया है। अपनी योजना के तहत एएलई बाहरी अंतरिक्ष में दो माइक्रोसेटलाइट से शूटिंग स्टार कणों को रिलीज करके कृत्रिम ढंग से उल्का पिंड की बारिश करवाने की योजना बना रहा है। जापान की योजना के तहत अंतरिक्ष से पहली कृत्रिम बारिश अगले वर्ष 2020 में होगी। आपको बता दें कि यह पहल स्काई कैनवास प्रोजेक्ट का हिस्सा है। यह दुनिया का पहला आर्टिफिशियल शूटिंग स्टार प्रोजेक्ट है। इसकी घोषणा मार्च 2016 में की गई थी। आपको यहां पर ये भी बता दें कि जापान की यह तकनीक केवल मनोरंजन के लिए ही नहीं होगी बल्कि इस प्रोजेक्ट की कुछ वैज्ञानिक वजह भी हैं। सेटेलाइट से पृथ्वी के ऊपरी वातावरण से घनत्व, हवा की दिशा, संरचना से जुड़े अहम डाटा भी जुटाया जा सकेगा।
बेहद अहम सवाल;-हम सभी के लिए यह सवाल बेहद अहम है कि आखिर जापान इसको कैसे अंजाम तक पहुंचाएगा। दरअसल, माइक्रोसेटलाइट से एक सेंटीमीटर के आकार के कण रिलीज होंगे जो कि गैर विषैले पदार्थों से बनें हैं। पिछले कुछ सालों में एएलई ने एक सुरक्षित उल्का बरसात को सुनिश्चित करने के लिए तमाम मैटेरियल परीक्षण किए हैं। यह स्टार कण जब पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करेंगे, तो प्लाज्मा उत्सर्जन प्रक्रिया के जरिये यह जल उठेंगे। इसके बाद धरती पर उल्का पिंडों की बारिश शुरू हो जाएगी। धरती के वातावरण में आने वाले इन कणों की चमक इतनी होगी कि इंसान इन्हें आसानी से देख सकेगा। योजना के मुताबिक इसके लिए हिरोशिमा और सेटो आइलैंड सी के आसपास का क्षेत्र चुना गया है। 200 किलोमीटर तक के क्षेत्र में 60 लाख से अधिक लोग इस नजारे का दीदार कर सकेंगे। उल्‍का पिंडों की यह बरसात पूरी तरह से पूरी तरह से सुरक्षित हो इसके लिए भी टेस्‍ट किए गए हैं। आपको यहां पर ये भी बताना जरूरी होगा कि जिस तरह से जापान अंतरिक्ष में इस योजना को अंजाम ने रहा है उसी तरह से चीन ने आर्टिफिशियल मून को तैयार किया है।

नई दिल्ली। मेक्सिको वॉल (Mexico Wall) को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Donald Trump) की जिद की वजह से अमेरिका (America) में काफी समय से शटडाउन चल रहा है। ऐसे में बुधवार को अचानक से एक खबर सामने आयी कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्तीफा दे दिया है। इस खबर ने अमेरिका समेत दुनिया भर में राजनीतिक भूचाल मचा दिया था। आइये जानते हैं क्या है डोनाल्ड ट्रंप के इस्तीफे का पूरा मामला।बुधवार को अमेरिका के प्रतिष्ठित समाचार पत्र वाशिंगटन पोस्ट (Washington Post) में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस्तीफे की खबर छपी थी। कुछ लोगों ने इस पेपर को विशेष रूप से राष्ट्रपति भवन व्हाइट हाउस के आसपास और वॉशिंगटन के कुछ अन्य व्यस्त इलाकों में बांटा गया था। वाशिंगटन पोस्ट में छपि ये खबर कुछ देर में ही अमेरिका समेत पूरी दुनिया में फैल गई। खबर फैलते ही अमेरिका समेत विश्वभर में ट्रंप के विरोधी खेमे में खुशियां मनाई जाने लगीं।हालांकि, थोड़ी देर में ही स्पष्ट हो गया कि डोनाल्ड ट्रंप के इस्तीफे की खबर फर्जी है। इतना ही नहीं, ये खबर जिस वॉशिंगटन पोस्ट के संस्करण में छपी थी, वह भी फर्जी था। हालांकि, फर्जी समाचार पत्र छापने वालों ने इसकी कॉपी हूबहू असली समाचार पत्र से मिलती-जुलती तैयार की थी। इसमें अखबार का नाम और लोगो भी वैसा ही प्रयोग किया गया था।
ऐसे प्रकाशित की गई थी न्यूज:-इस फर्जी अखबार में छह कॉलम में बोल्ड अक्षरों में शीर्षक दिया गया था ‘UNPRESIDENTED Trump hastily departs White House, ending crisis’ (अप्रत्याशित : ट्रंप व्हाइट हाउस से विदा, संकट खत्म)। साथ में चार कॉलम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तस्वीर भी लगाई गई थी। इस फोटो में ट्रंप सिर झुकाए नजर आ रहे थे। खास बात ये है कि समाचार पत्र में प्रकाशन की तिथि एक मई 2019 लिखी हुई थी।
एक महिला ने बांटे थे फर्जी समाचार पत्र:-न्यूज एजेंसी भाषा के अनुसार अमेरिका के पेनसिलवेनिया एवेंन्यू और व्हाइट हाउस के आसपास एक महिला फर्जी समाचार पत्र की प्रति लोगों को बांट रही थी। इसे साथ ही वह लोगों से कह रही थी कि ये वॉशिंगटन पोस्ट का विशेष संस्करण है। बाद में ये संस्करण कभी नहीं मिलेगा। महिला ये समाचार पत्र मुफ्त में बांट रही थी। उसके पास प्लास्टिक बैग में इस फर्जी समाचार पत्र का पूरा बंडल रखा था।
वाशिंगटन पोस्ट ने किया खंडन;-इस मामले में व्हाइट हाउस से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की फर्जी खबर पर वाशिंगटन पोस्ट ने भी इसका खंडन किया है। ट्वीट के जरिए वाशिंगटन पोस्ट ने स्पष्ट किया कि ये फर्जी खबर जिस समाचार पत्र में छपी है, वह नकली है। इस संस्करण से वाशिंगटन पोस्ट का कोई लेना-देना नहीं है। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार उनके नाम से फर्जी संस्करण प्रकाशित करने के मामले में जांच की जा रही है।
मेक्सिको वॉल को लेकर ये है विवाद:-मालूम हो कि मेक्सिको वॉल को लेकर अमेरिका में काफी दिनों से विवाद चल रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप चाहते हैं कि मेक्सिको वॉल के लिए संसद फंड को मंजूरी दे। वहीं, डेमोक्रेट्स सांसद मेक्सिको वॉल का विरोध कर रहे हैं। अमेरिकी संसद के निचले सदन में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी रिपब्लिकन अल्पमत में है। इसलिए उन्हें मेक्सिको वॉल पर बहुमत नहीं मिल रहा है। इसे लेकर डोनाल्ड ट्रंप ने शटडाउन की घोषणा की है। इससे पूरे अमेरिका में कामकाज लगभग बंद है।
ट्रंप के प्रति गुस्से की ये है वजह:-बताया जा रहा है कि यूएस शटडाउन की वजह से अमेरिका में करीब आठ लाख कर्मचारी छुट्टी पर चले गए हैं। जो काम कर रहे हैं, उन्हें भी तनख्वाह नहीं मिल रही है। यूएस का संकट यहीं खत्म होने वाला नहीं है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर संसद ने मेक्सिको वॉल के लिए फंड जारी नहीं किया तो वह आपातकाल लागू करेंगे। इस वजह से ट्रंप का अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में विरोध हो रहा है। इससे पहले भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार अपने कई फैसलों को लेकर विवादों में रह चुके हैं। इसलिए उनके इस्तीफे की फर्जी खबर ने कुछ देर के लिए अमेरिका समेत दुनिया भर में उनके विरोधियों को खुश होने का मौका दे दिया था।

वाशिंगटन। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बनने के बाद ही डोनाल्‍ड ट्रंप पर रूस से सांठगांठ करने का आरोप लगता रहा है। दोनों नेताओं की अकेले में हुई पिछली पांच मुलाकातों के यह शक और गहरा गया है। एक बार फ‍िर रूसी राष्‍ट्रपति ब्‍लादिमीर पुतिन के साथ ट्रंप के संबंधों को लेकर सवालों के घेरे में हैं। भले ही इन दोनों नेताओं की मुलाकात पर अमेरिका में सियासत गरमा गई है। अमेरिकी राष्‍ट्रपति की पुतिन से मुलाकात को शक की नजरों से देखा जा रहा है। लेकिन इन मुलाकातों का एक उजला पक्ष भी है। आइए हम आपको बताते हैं उन अनछुए पहलुओं के बारे में।
गोपनीय मुलाकात से विपक्ष ने ट्रंप को घेरा;-ट्रंप ने सबसे पहले जर्मनी में पुतिन से मुलाकात की थी। वार्ता के बाद उन्‍होंने अनुवादक को कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं करने को कहा था। उसी दिन दोनों नेता डिनर भी मिले थे। यहां कोई भी अन्‍य अमेरिकी अधिकारी मौजूद नहीं था। इसके बाद वियतनाम व फ‍िनलैंड में हुई बैठक में भी यही स्थिति थी। दोनों नेता यहां एक दूसरे से मिले, लेकिन यहां कोई भी अमेरिकी अधिकारी मौजूद नहीं रहा। इसके बाद ट्रंप अर्जेंटीना में पुतिन से मिले थे। तब रूस को आक्रामक बताते हुए उन्‍होंने पुतिन से दुबारा ना मिलने की बात कही थी।दोनों नेताओं की इन गोपनिय मुलाकातों ने 2016 के राष्‍ट्रपति चुनाव में रूस व ट्रंप के बीच गठजोड़ के अारोपों की जांच कर रहे राबर्ट मूलर का ध्‍यान खींचा है। ट्रंप प्रशासन व पार्टी के भी कई लोग उन पर शक कर रहे हैं। पूर्व राष्‍ट्रपति बिल क्लिंटन के सलाहकार रह चुके एंड्रयू एस वीस ने कहा, पुतिन के साथ मुलाकात के दौरान ट्रंप किसी भी मंत्रालय या ह्वाइट हाउस के अधिकारियों की उपस्थिति नहीं चाहते थे। उन्‍होंने कहा कि इसका मतलब है कि वह देशहित की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि बहुत कुछ गड़बड़ चल रहा था। हाल ही में सामने आया था कि ट्रंप और रूस के संबंधों को लेकर संघीय जांच एजेंसी (एफबीआइ) भी जांच कर रही है। हालांकि ट्रंप हमेशा से ही इन आरोपों को बेबुनियाद और इनकार करते आए हैं।
शक्ति संतुलन साधने की रणनीति में जुटे ट्रंप
पुतिन के बढ़ते प्रभाव का असर : नाटो के सबसे शक्तिसाली देश जर्मनी से पुतिन की नजदकियां अमेरिका को कभी रास नहीं आईं। नाटो में आर्थिक रूप से सबसे मजबूत देश जर्मनी पर पुतिन का खासा प्रभाव है। इसके साथ ही यूरोपियन यूनियन में मौजूद अमेरिका के पुराने सहयोगियों पर भी पुतिन का वर्चस्‍व बढ़ रहा है। नाटो के आर्थिक रूप से सबसे ताकतवर देश जर्मनी पर पुतिन का खासा प्रभाव है। इसलिए ट्रंप बड़ी चतुराई से पुतिन को साधने में लगे हैं। इसके अलावा अगर अमेरिकी राष्‍ट्रपति, पुतिन को साथ लेकर नहीं चलते, तो इससे अंतरराष्‍ट्रीय शक्ति संतुलन रूस के पास चला जाएगा।
भारत-रूस-चीन फैक्‍टर पर अमेरिकी नजर : अप्रैल, 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शी जिनपिंग और पुतिन से अनौपचारिक मुलाकात हुई थी। इससे मॉस्को, बीजिंग और नई दिल्ली का ट्राइएंगल कुछ मजबूत हुआ था। इससे अमेरिका परेशान है। ट्रंप किसी भी हाल में रूस से टकराव नहीं चाहते, क्योंकि पुतिन ने उन्हें चुनाव जिताने में मदद की थी। उनका मकसद ट्राइएंगल से रूस को अलग करना है। ट्रंप का मानना है कि अगर इन तीन देशों का गुट मजबूत हुआ तो उनके लिए चुनौती बन जाएगा और यूरेशिया से दक्षिण एशिया तक उनके लिए दीवार खड़ी हो जाएगी।
पूर्वी देशों बढ़ता रूसी दखल : पुतिन का पूर्वी देशों में दिलचस्‍पी और उनके मामलों में दखल से अमेरिका चिंतित है। पुतिन की पिवट टू एशिया (एशिया की ओर) नाम की नीति बनाई। इस नीति के जरिए रूस, जापान के पक्ष वाले पूर्वी एशिया के देशों की ओर अपने संबंधों को और प्रगाढ़ करना चाहता है ताकि वह चीन से संतुलन कायम कर सके। हाल ही में चीन और रूस ने रणनीति बनाकर अमेरिका-उत्तर कोरिया की वार्ता कराई। यहां भी रूसी प्रभावी नजर आ रहा है। ऐसे में अमेरिका उसे अपने पाले में करना चाहता है

वॉशिंगटन।H-1B Visa Holder Indians, अगर आप भी एच-1बी वीजा (H-1B Visa) के जरिए अमेरिका (America) में नौकरी करने के बारे में सोच रहे हैं, तो सावधान हो जाइए। क्या पता आपको बाद में पछताना पड़े। एक रिपोर्ट के मुताबिक, एच-1बी वीजाधारकों (H-1B Visa Holders) को अक्सर खराब स्थितियों में काम कराया जाता है और इन लोगों के साथ शोषण की आशंका बनी रहती है। साउथ एशिया सेंटर ऑफ द अटलांटिक काउंसिल ने इस बारे में अपनी रिर्पोट दी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन लोगों के पास एच-1बी वीजा है, उन्‍हें तुलना में कम सैलरी मिलती है। यह रिपोर्ट भारतीयों के लिए इसलिए और भी ज्‍यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, क्‍योंकि इस वीजा के धारकों में भारतीयों की संख्‍या सबसे ज्‍यादा है। एच-1B वीजा पर भारत से बड़ी संख्या में युवा हर साल अमेरिका जाते हैं।दरअसल अमेरिका के साउथ एशिया सेंटर ऑफ द अटलांटिक काउंसिल की ओर से एच-1बी वीजा पर एक नई रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। थिंक टैंक ने इस रिपोर्ट में तीन प्रमुख सुधारों का सुझाव भी दिया और कहा कि ये सभी नियोक्ताओं पर लागू होने चाहिए। इनमें एच-1बी वीजाधारकों का वेतन बढ़ाना और एक प्रभावी एवं उचित क्रियावली को लागू करने जैसे उपाय शामिल हैं। इस रिपोर्ट को हॉवर्ड यूनिवर्सिटी की रॉन हिरा ने तैयार किया है। इसके अलावा साउथ एशिया सेंटर ऑफ द एटलांटिक काउंसिल के हेड भारत गोपालस्‍वामी ने भी उनकी मदद की है।
वीजा धारको को मिलती है बहुत कम सैलरी:-बता दें कि रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में जो वीजा सिस्‍टम है, वह न सिर्फ अमेरिकियों को नुकसान पहुंचा रहा है बल्कि उससे एच-1बी वीजा धारकों का शोषण भी हो रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है, 'एच-1बी वीजाधारकों को बहुत कम सैलरी मिलती है, शोषण का खतरा भी बढ़ जाता है और उन्‍हें बहुत ही खराब स्थितियों में काम करना पड़ता है।' अगर सुरक्षा के नियमों को अपनाया जाए, तो वीजा धारकों के रहन-सहन के स्‍तर में सुधार आ सकता है। साथ ही साथ इससे अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की भी रक्षा हो सकती है।
थिंक टैंक ने दिए ये सुझाव:-थिंक टैंक की ओर से जिन सुधारों की सलाह दी गई है उसमें तीन सुझाव सबसे अहम हैं। इन सुझावों में सबसे पहला सुधार वीजा धारकों की सैलरी बढ़ाया जाना शामिल है। इसमें कहा गया है कि अगर अमेरिका अच्‍छे और सबसे बुद्धिमान कर्मचारियों को आकर्षित करना चाहता है, तो उन्‍हें अच्‍छी सैलरी ऑफर की जानी चाहिए। रिपोर्ट में दूसरी सलाह यह दी गई है कि इंप्‍लॉयर्स को हर बार इस बात का प्रदर्शन करना चाहिए कि उन्‍होंने अमेरिकी कर्मचारियों को सक्रियता से शामिल किया है। इसके अलावा योग्‍य लोगों को सही पोस्‍ट की पेशकश की गई है। जो तीसरा सुझाव रिपोर्ट में दिया गया है उसमें कहा गया है कि एच-1बी वीजा प्रोग्राम को एक प्रभावशाली और योग्‍य तंत्र की जरूरत है।
ट्रंप कर सकते हैं वीजा में नए बदलाव:-गौरतलब है कि यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब राष्‍ट्रपति ट्रंप जल्‍द ही एच-1बी वीजा में नए बदलावों की घोषणा करने वाले हैं। पिछले दिनों ट्रंप ने अपनी एक ट्वीट में इस बात की तरफ इशारा किया था। उन्‍होंने इस ट्वीट में लिखा था, 'अमेरिका में एच-1बी धारकों को सुनिश्चित किया जा सकता है कि अगले कुछ दिनों में बदलाव होंगे, जिनके जरिए आपके निवास में निश्चितता आ सकती है और साथ ही संभावित नागरिकता का रास्‍ता भी खुल सकता है।'

वाशिंगटन। चीन की 'वन बेल्‍ट वन रोड' परियोजना की आंच अमेरिका तक पहुंच गई है। पेंटागन ने ड्रैगन के बढ़ते प्रभाव पर एक रिपोर्ट जारी की है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की इस रिपोर्ट ( Pentagon Report) में चीन की बढ़ती सैन्‍य ताकत और सामरिक महत्‍व वाले स्‍थानों पर प्रभुत्‍व जमाने की कोशिश से चिंता जाहिर की गई है। चीन की इस परियोजना पर भारत शुरू से अपनी आपत्ति जताया है। अंतरराष्‍ट्रीय समुदाय के समक्ष भारत ने इसका जोरदार ढ़ंग से विरोध किया था। आइए जानते हैं कि आखिर ये 'वन बेल्‍ट वन रोड' परियोजना क्‍या है। क्‍या है चीन की मंशा, इससे क्‍यों चिंतित है अमेरिका। पाकिस्‍तान के ग्‍वादर बंदरगाह से क्‍या है भारत को खतरा। आदि-अादि।
जानें क्‍या है अमेरिका की चिंता
-चीन जिस तरह से एक सुनियोजित ढ़ंग से अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाना चाहता है, उससे अमेरिका की चिंताएं बढ़ गईं हैं। अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी में व्‍यापार की आड़ में ड्रैगन अपने सामरिक स्थिति को भी मजबूत करने में जुटा है।
-दूसरे, इससे अमेरिकी बाजार को भी खतरा उत्‍पन्‍न हो गया है। ऐसे में अमेरिका ने चीन की इस परियोजना पर अपनी आपत्ति जताई है।
-अमेरिकी रक्षा मंत्रालय पेंटागन ने चीन के विश्‍व में बढ़ रहे प्रभाव और उससे अमेरिका के लिए पैदा हो रही सैन्‍य चुनौतियों पर एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सुरक्षा को खतरा पैदा किया जा रहा है।
-इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ओबीओआर परियोजना के तहत चीन सैन्‍य लाभ के लिए कई बंदरगाह और सामरिक रूप से कई महत्‍वपूर्ण देशों में निवेश कर रहा है।
-यह हिंद महासागर, भुमध्‍य सागर अौर अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाता जा रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन इसके जरिए कई देशों के निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता हासिल कर लेगा।
-इस रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन सामरिक दृष्टि प्रमुख बंदरगाहों और अन्‍य सैन्‍य ठिकानों को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले रहा है। इस सिलसिले में पाकिस्‍तान के ग्‍वादर और श्रीलंका हंबनटोटा बंदरगाह का उदाहरण दिया गया है। इसमें अफ्रीका और मध्‍य पूर्व में स्थित बंदरगाहों पर उसके कब्‍जे का है। जिबूती में सैन्‍य ठिकाना बनाने की चीन की योजना उसकी सैन्‍य महात्‍वाकांक्षा का सुबूत है।
पाक का ग्वादर बंदरगाह और भारत:-गहरे समुद्र में स्थित और भारतीय सीमा से नजदीक होने के कारण ग्‍वादर बंदरगाह चीन की कंपनी को सौंपे जाने का समझौता भारत के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। भारत सीमा से केवल 460 किमी दूर स्थित इस पोर्ट से भारत पर निगरानी रखी जाना बेहद आसान है। चीन यहां अपनी नौसेना तैनात कर सकता है। चीन पहले ही भारत के दक्षिणी पड़ोसी श्रीलंका के हंबनटोटा और पूर्वी पड़ोसी बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाहों पर भी आर्थिक मदद देकर अपना प्रभाव स्थापित कर चुका है। दरअसल, चीन भारत को समुद्र में तीनों तरफ से घेरने की रणनीति बना रहा है। तीन तरफ से भारत को घेरने की तैयारी कर चौथी तरफ खुद चीन ही स्थित है। दरअसल, ग्वादर बंदरगाह ईरान से लगा हुआ है, जो कि भारत को कच्चे तेल का निर्यात करने वाला प्रमुख देश है। ग्वादर पर नियंत्रण बनाते ही चीन ईरान से भारत आने वाले कच्चे तेल की आपूर्ति में जब चाहे अड़ंगे डाल सकता है।गौरतलब है कि चीन का 60 फीसदी कच्चा तेल खाड़ी देशों से आता है। ग्वादर पोर्ट पर चीनी नियंत्रण से अब तेल का आवागमन बेहद आसान हो जाएगा। इतना ही नहीं पोर्ट की रक्षा और पोतों की सुरक्षा के लिए चीनी नौसेना अब इसे इस्तेमाल करेगी। युद्ध की स्थिति में ग्वादर पोर्ट भारत के भारी मुसीबत खड़ी कर सकता है। उल्लेखनीय है कि 1971 के युद्ध में कराची बंदरगाह को भारतीय नौसेना के भारी नुकसान पहुंचाया था, जिसके बाद पाकिस्तानी सेना की कमर टूट गई थी।इसके अलावा हिंद महासागर के देशों में चीन बंदरगाह, नौसेना बेस और निगरानी पोस्ट बनाना चाहता है। इससे एक तरह से भारत घिर जाएगा। इसे स्ट्रिंग ऑफ पल्स नाम दिया जा रहा है। परियोजना के तहत चीन दक्षिण एशिया के मुल्‍काें में श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश में पोर्ट बना रहा है। इसके जरिए वह बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में प्रभाव एवं प्रभुत्‍व बढ़ाएगा। इससे भारत के सामरिक हितों के साथ व्यापार पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
आर्थिक रूप से देशों पर कब्जा कर रहा चीन:-चीन ओबीओआर के तहत श्रीलंका, म्यांमार, फिलीपींस, पाकिस्तान, थाईलैंड, बांग्लादेश और म्यांमार को बड़े लोन दे रहा है, लेकिन ये देश उसका कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। चीन उनकी इक्विटी खरीदकर अपनी कंपनियों को बेच रहा है। चीनी कंपनियां इन देशों पर आर्थिक रूप से कब्जा कर रही हैं। चीन के वन बेल्ट वन रोड परियोजना में 78 देश शामिल हैं। पूरी दुनिया में अपने प्रभुत्‍व को कायम करने के लिए चीन ने यूरोप और अफ्रीका के 65 देशों को जोड़ने की योजना है।
चीन ने कहा- 'प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी';-उधर, इस परियोजना को लेकर चीन काफी उत्‍साहित है। भारत, अमेरिका की तमाम चिंताओं से बेखबर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना को 'प्रोजेक्ट ऑफ द सेंचुरी' कहा है। उन्होंने कहा था कि इससे वैश्वीकरण का स्वर्ण युग आएगा।

बीजिंग। होमवर्क पूरा न करने पर स्‍कूल में बच्‍चों को सजा के तौर पर मुर्गा बनाए जाने या फिर हाथ ऊपर करके खड़े करने के बारे में आपने जरूर सुना होगा। लेकिन सोचिए कि यदि आप ऑफिस में दिया गया टारगेट पूरा न कर पाएं और इसके लिए आपको सजा के दौरान पर ऐसी कोई सजा दी जाए! चीन में कुछ ऐसा ही देखने को मिला है, जहां टारगेट पूरा न करने पर कर्मचारियों को सड़क पर रेंगेने की सजा दी गई।साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्‍ट की खबर के मुताबिक, एक चीनी कंपनी ने टारगेट पूरा न होने पर कर्मचारियों को सड़क पर रेंगने के लिए मजबूर कर दिया। इन कर्मचारियों को बीच सड़क पर रेंगने के लिए कहा गया, इस दौरान इनके आसपास से गाडि़यां गुजर रही थी। सड़क पर रेंग रहे कर्मचारियों को देखने के लिए लोग रुक गए। लोग कंपनी की इस हरकत से काफी हैरान हैं और खूब आलोचना कर रहे हैं।अब सवाल ये खड़ा हो रहा है कि क्‍या कर्मचारी साल का टारगेट पूरा नहीं कर पाए तो सजा के तौर पर कंपनी कर्मचारियों को बीच सड़क पर रेंगने पर मजबूर कर सकती है? जब कर्मचारी सड़क पर रेंग रहे थे, तब एक शख्स झंडा लेकर आगे चल रहा था। ये सभी कर्मचारी सूट-बूट में थे। ऐसा नजारा शायद ही कभी देखा गया होगा। इन पुरुष और महिला दोनों कर्मचारी शामिल थे।दरअसल, सुबह ऑफिस पहुंचने के बाद जब कर्मचारियों को पता चला कि टारगेट पूरा न होने पर उन्हें सजा दी जाएगी तो वे भी हैरान रह गए। ऐसे में जब उनको बाहर बुलाकर रेंगने को कहा गया तो वे रेंगने पर मजबूर हो गए। हालांकि कुछ देर बाद पुलिस ने हस्तक्षेप किया और इसे रोका गया। लेकिन उससे पहले वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका था। इस वीडियो को साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्‍ट ने ट्विटर पर पोस्ट किया है।खबरों के मुताबिक, मामले के तूल पकड़ने के बाद कंपनी को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। कंपनी के इस व्यवहार की वजह से लोगों में काफी गुस्सा है। ट्विटर पर कुछ लोगों ने कंपनी को हमेशा के लिए बंद करने को कहा तो कुछ लोगों ने कर्मचारियों पर सवाल उठाए। हालांकि कंपनी या कर्मचारियों की ओर से अभी तक पूरी घटना को लेकर कोई बयान सामने नहीं आया है।

टोक्यो। रोबोट (Robot) हमारी आधुनिक जीवन शैली का हिस्सा बन चुके हैं। कभी वॉइस असिस्टेंस के नाम पर तो कभी रोबोट गैजेट्स के रूप में और कभी पारंपरिक रोबोट की शक्ल में। हमारे आसपास तमाम सेवाओं में रोबोट का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। यह दखल कदर है कि इंसान को इससे अपने लिए खतरा महसूस होने लगा है। तमाम नौकरियों में ऑटोमेशन के नाम पर रोबोट इंसानों की…
नई दिल्‍ली। ब्रक्जिट डील पर हार के बाद अब ब्रिटेन की थेरेसा मे की प्रधानमंत्री की कुर्सी जाने का खतरा मंडरा रहा है। डील पर मिली ऐतिहासिक हार के बाद विपक्षी लेबर पार्टी ने सरकार के खिलाफ अविश्वास मत का प्रस्ताव दिया है, इस पर बुधवार को बहस होगी। लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कोर्बिन ने कहा कि संसद ने जिस तरह से प्रधानमंत्री के ब्रक्जिट डील को खारिज किया…
संयुक्त राष्ट्र। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न जैसे अपराध से संयुक्त राष्ट्र (यूएन) भी अछूता नहीं रह पाया। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो साल में यूएन के एक तिहाई कर्मचारियों को किसी ना किसी तरह के उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा। इनमें आधे से अधिक के साथ यूएन के कार्यालयों में यौन दु‌र्व्यवहार किया गया। आश्चर्यजनक रूप से तीन में से एक पीड़ित ने ही इस अपराध के खिलाफ कोई…
नई दिल्ली। बीयर की बोतल पर देवी-देवताओं की फोटो के प्रयोग का एक मामला सामने आया है, जिससे भारत ही नहीं दुनिया भर में रह रहे हिंदू आहत हैं। सोशल मीडिया पर दुनिया भर के हिंदू इसे लेकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। भारतीयों ने इस संबंध में भारत सरकार से हस्तक्षेप करने की मांग की है। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुषमा स्वराज को टैग करते हुए…
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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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