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नई दिल्ली। चीन के साथ जारी झड़प के बीच भारत और अमेरिका के रक्षा और विदेश मंत्रियों की वार्ता के दौरान BECA ( Basic Exchange and Cooperation Agreement, BECA) डील पर हस्ताक्षर को लेकर काफी उम्मीदें हैं।  नई दिल्ली में 26-27 अक्टूबर को होने वाली वार्ता के दौरान दोनों  देशों के विदेश व रक्षा मंत्रियों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर किया जाएगा। बता दें कि भारत और अमेरिका के रक्षा व विदेश मंत्रियों के बीच होने वाली इस वार्ता की तैयारियां जोरों पर हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से ठीक एक हफ्ते पहले होने वाली इस वार्ता का दायरा सीमित होगा। यदि दोनों देशों के बीच BECA डील पर  हस्ताक्षर करने की सहमति बन जाती है तो यह इस वार्ता की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। दोनों तरफ से बातचीत के प्रारूप को अगले दो दिनों के भीतर अंतिम रूप दिए जाने के आसार हैं। यह भारत और अमेरिका के बीच तीसरा समझौता होगा।  इससे पहले 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट और 2018 में कम्युनिकेशंस कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट हुआ था।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व विदेश मंत्री एस जयशंकर और अमेरिकी समकक्ष मार्क एस्पर व माइक पोंपियो के बीच मीटिंग के दौरान BECA डील पर हस्ताक्षर की उम्मीद है। इस समझौते से दोनों देशों की सशस्त्र सेनाओं के बीच भूस्थानिक (geospatial)  सहयोग के मुद्दे पर बातचीत शुरू हो जाएगी। भारत और अमेरिका रक्षा के क्षेत्र में मिलकर काम कर रहे हैं। पिछले 15 सालों में भारत ने अमेरिका से 20 बिलियन डॉलर की लागत वाले हथियारों का अधिग्रहण कर लिया है।  इनमें C-17 ग्लोबमास्टर्स और C-130J सुपर हरक्यूलस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट शामिल है। इस वार्ता का फैसला जून,2017 में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंंप के बीच हुई मुलाकात में लिया गया था। अभी तक दो बार यह बातचीत हो चुकी है। इसके तहत तीन बैठकों का दौर चलता है। पहले दोनों देशों के विदेश व रक्षा मंत्रियों की अलग-अलग बैठक होती है। इसके बाद एक संयुक्त बैठक होती है।

प्योंगयोंग। बीते सप्ताह नॉर्थ कोरिया में सैन्य परेड के दौरान तानाशाह किम जोंग उन के रोने की तस्वीर में भी एक राज छिपा था। किम जोंग उन ने मंच पर रोने का ये नाटक जनता की सहानुभूति हासिल करने के लिए किया था जिससे जनता उनके साथ खड़ी रहे और इस मुसीबत की घड़ी में सभी उनका साथ दें, जनता के मन में शासन को लेकर किसी तरह की दुभार्वना न आने पाएं। 

मिसाइल बनाने पर खर्च कर दी रकम :-दरअसल अमेरिका के नॉर्थ कोरिया पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर लगाई गई रोक के बाद से बड़े पैमाने पर असर पड़ा है। उसके बाद भी तानाशाह अपनी जिद पर कायम रहा, वो परमाणु कार्यक्रम के लिए पैसे खर्च करता रहा और सारा फोकस हथियारों के विकास पर लगाए रखा, अब आलम ये हुआ है कि सरकारी खजाना पूरी तरह से खाली हो चुका है। मगर उसके बाद भी तानाशाह किसी तरह से अमेरिकी सरकार के सामने झुकने और उसके नियम मानने को तैयार नहीं है। 

कोरोना वायरस से आर्थिक मामलों पर पड़ा असर:-कोरोना वायरस की वजह से भी नॉर्थ कोरिया के आर्थिक मामलों पर काफी असर पड़ा है। देश की सीमाएं सील कर दिए जाने की वजह से पर्यटकों का आना-जाना बंद हो गया। देश को पर्यटकों से जो आमदनी होती थी वो पूरी तरह से बंद हो गई। मार्च से लेकर अब तक स्थितियां सामान्य नहीं हो पाई हैं और अगले साल तक इनके ऐसे ही रहने के आसार भी दिख रहे हैं। इस घाटे की भरपाई अगले साल भी होनी मुश्किल दिख रही है। विश्लेषक भी ये कह रहे हैं कि कई मामलों में किम की नीतियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। 

निर्यात में आई भारी गिरावट:-इसके अलावा, अन्य देशों द्वारा नॉर्थ पर लगाए गए प्रतिबंधों ने पिछले कुछ वर्षों में इसके निर्यात में नाटकीय रूप से गिरावट देखी है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि 2016 में निर्यात 2.63 बिलियन डॉलर से गिरकर 2018 में सिर्फ 200 मिलियन डॉलर हो गया। इसके अलावा किम के भाषण के बावजूद विश्लेषक देश में मानवाधिकार की स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त कर रहे हैं।नॉर्थ और साउथ कोरिया पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देश एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए रणनीति बनाते रहते हैं। अब आलम ये है कि दोनों देश ये सोचते हैं कि उनके पास बड़ा और आधुनिक हथियार हो जाए जिससे वो अधिक वजन वाले हो सके। इस वजह से किम जोंग अपने देश की जनता का समर्थन हासिल करने के लिए इस तरह के मगरमच्छ के आंसू बहाने से भी बाज नहीं आते हैं। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में निदेशक ने चेतावनी दी कि नॉर्थ कोरिया की स्थिति कोरोनोवायरस महामारी से खराब हो गई है। 

मौसम की भी पड़ी मार:-इस साल नॉर्थ कोरिया पर मौसम की भी मार पड़ी है। एक तो देश कोरोना वायरस से पहले ही परेशान है, उसके बाद अब देश के कुछ हिस्सों में बाढ़ ने तबाही मचा दी है। बाढ़ की वजह से लाखों का नुकसान हुआ है। बाढ़ से यहां के हालात इतने अधिक खराब हो गए थे कि खुद तानाशाह किम जोंग ने अपने खास समर्थकों के साथ यहां का दौरा किया था। दौरा करने के बाद तानाशाह ने कहा था कि वो मौसम से प्रभावित हुए लोगों की मदद करेंगे मगर मदद कुछ नहीं हुई।

नई दिल्ली। आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच दो सप्ताह से अधिक समय से नागोर्नो काराबाख इलाके को लेकर लड़ाई जारी थी। इसी बीच एक खबर ये भी आई कि पाकिस्तान की स्पेशल फोर्स अजरबैजान की सेना के साथ मिलकर आर्मेनिया के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा ले रही है। अब पाकिस्तान की ओर से अपने ऊपर लगाए गए इस आरोप को खारिज किया गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस मामले में स्पष्टीकरण दिया है। विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल पाशिन्यान की टिप्पणी को पूरी तरह से आधारहीन और अनुचित बताया है। 

पाक स्पेशल फौज का नाम आया था सामने;-दरअसल इस विवाद को हवा आर्मीनिया के प्रधानमंत्री निकोल के एक बयान के बाद मिली थी। उन्होंने 15 अक्टूबर को रूसी समाचार एजेंसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि तुर्की की सेना के साथ मिलकर पाकिस्तान की स्पेशल फोर्स आर्मीनिया के खिलाफ नागोर्नो-काराबाख में जारी लड़ाई में शामिल है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके पास इस बात का कोई प्रमाण है कि अजरबैजान की सेना को विदेशी सैन्यबलों का भी साथ मिल रहा है? तब उन्होंने जवाब दिया कि कुछ रिपोर्ट्स यह बताती हैं कि जंग में पाकिस्तानी फौज का विशेष दस्ता भी शामिल है। फिर उन्होंने कहा कि मेरा मानना है कि तुर्की के सैनिक इस लड़ाई में शामिल हैं। 

पाकिस्तान ने जारी किया खंडन:-उधर जब इस बात का पता पाकिस्तान के उच्च अधिकारियों को लगा तो उन्होंने इस बात का खंडन करते हुए बयान दिया है कि आर्मीनिया इस तरह के गैर-जिम्मेदाराना प्रोपेगैंडा के माध्यम से अजरबैजान के खिलाफ अपनी गैर-कानूनी कार्रवाई को छिपाने की कोशिश कर रहा है, उसकी इस तरह की बयानबाजी को तुरंत रोका जाना चाहिए। पाकिस्तान ने अपने बयान में कहा है कि अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव ने इस मसले पर साफ तौर पर कहा कि उनके देश की सेना अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए पर्याप्त मजबूत है और उसे किसी बाहरी सेना की जरूरत नहीं है। साथ ही पाकिस्तान ने अपने बयान में यह भी साफ किया है कि वो अजरबैजान को कूटनीतिक और राजनीतिक समर्थन देता रहेगा। इससे पहले पाकिस्तान और तुर्की ने अजरबैजान को नैतिक समर्थन देने की बात कही थी। वहीं, रूस दोनों देशों के बीच मध्यस्थता कर शांति कायम करने की कोशिशों में लगा हुआ है। दो बार वो प्रयास भी कर चुका है। एक प्रयास के कुछ घंटे बाद ही दोनों देशों में युद्ध विराम खत्म हो गया था, अब दूसरी बार फिर ऐसी कोशिश की गई है। 

पाकिस्तान के अजरबैजान और तुर्की के साथ खास रिश्ते;-अजरबैजान और तुर्की के साथ पाकिस्तान से खास रिश्ते हैं। चूंकि अजरबैजान और आर्मीनिया के रिश्ते ठीक नहीं है इस वजह से पाकिस्तान सिर्फ अजरबैजान के साथ रह पाता है। नागोर्नो काराबाख में जारी विवाद को लेकर पाकिस्तान मानता है कि आर्मीनिया ने अज़रबैजान के इलाके में कब्जा किया है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के अनुसार इस विवाद का निपटारा होना चाहिए। 

तुर्की की मदद को लेकर भी उठे सवाल:-पाकिस्तान के अलावा एक देश तुर्की को लेकर भी सवाल उठे हैं। आर्मीनिया ने ही कहा था कि इस लड़ाई में तुर्की केवल कूटनीतिक समर्थन नहीं कर रहा बल्कि सैन्य सहायता भी दे रहा है। प्रधानमंत्री निकोल ने एक साक्षात्कार के दौरान कहा था कि तुर्की के सैनिक अफसर काराबाख में अजरबैजान की सेना को सलाह दे रहे हैं, तुर्की ने अपने लड़ाकू विमान भी उसकी मदद के लिए भेजे हैं। तुर्की अजरबैजान की सैन्य मदद कर रहा है। इस तरह की बात सामने आने पर तुर्की ने भी इसे नकार दिया था, तुर्की की ओर से कहा गया था कि वो केवल नैतिक समर्थन दे रहे हैं किसी तरह का सैन्य समर्थन नहीं। 

संयुक्‍त राष्‍ट्र। दुनिया भर में वर्ष 2020 के दौरान करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनको पेट भर भोजन भी नहीं मिल पा रहा है। इसकी दो बड़ी वजह हैं। पहली बड़ी वजह है जलवायु परिवर्तन और दूसरी बड़ी वजह है आर्थिक समस्‍या। इन दो समस्‍याओं ने विश्व में भुखमरी का स्तर बढ़ा दिया है। इसके अलावा तीसरी बड़ी परेशानी पूरी दुनिया में फैली कोविड-19 भी बना है। इसकी वजह से पहले की दो समस्‍याएं और अधिक बढ़ गई हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) की एक ताजा रिपोर्ट में इनको लेकर गहरी चिंता जताई गई है। इसके अलावा International Day for the Eradication of Poverty के मौके पर दिए एक दूसरे वीडियो संदेश में कहा कि कोविड-19 की वजह से विश्‍व के 11 अरब से ज्‍यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे आ गए हैं।डब्‍ल्‍यूईपी की इस रिपोर्ट को Cost of a Plate of Food 2020 का नाम दिया गया है। इस रिपोर्ट में उन देशों का उल्लेख किया गया है जहां चावल और फलियों वाली मामूली खुराक भी लोगों की आमदनी की तुलना में बहुत महंगी है। बीते दिनों विश्‍व खाद्य दिवस के मौके पर संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुटेरेश ने अपने जारी वीडियो संदेश में बेहद तीखे शब्दों का इस्तेमाल कर इस समस्‍या के प्रति दुनिया का ध्‍यान आकर्षित किया है। उन्‍होंने अपने संदेश में कहा कि बहुतायत वाली इस दुनिया में,बेहद दुख की बात है कि आज भी विश्‍व के करोड़ों लोग हर रात भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि यदि कोविड-19 का मुकाबला करने के लिये समय रहते कुछ ठोस उपाय नहीं किए गए तो वर्ष 2020 के दौरान भी लगभग 27 करोड़ लोगों की जिंदगियां और आजीविका बेहद गंभीर जोखिम का सामना करेंगी।अपने संबोधन में उन्‍होंने एक बेहतर भविष्य हासिल करने के संयुक्त राष्ट्र के सपने और लक्ष्य को हासिल करने के लिये और अधिक प्रयास करने का आह्वान किया है। उनका हना है कि हमें एक ऐसा विश्‍व तैयार करना है जहां हर किसी को पर्याप्‍त भोजन मिल सके और किसी को भूखे पेट न सोना पड़े। इसके लिए खाद्य प्रणालियों को और बेहतर बनाना होगा। साथ ही भोजन की बर्बादी को भी रोकने के लिए ठोस उपाय करने होंगे। उन्होंने ये सुनिश्चित किये जाने पर भी खास जोर भी दिया है कि हर इंसान को टिकाऊ और स्वस्थ भोजन खुराक उपलब्ध हो।ऐसे देशों की सूची में जहां भोजन की मामूली खुराक की कीमत लोगों की दैनिक आमदनी की तुलना में 186 प्रतिशत होती है दक्षिण सूडान सबसे ऊपर है। यहां हिंसा के कारण 60 हजार से ज्‍यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। इस सूची में बुर्किना फासो का नाम भी पहली बार शामिल हुआ है जहाँ हिंसा, संघर्ष और जलवायु परिवर्तन भुखमरी के मुख्य कारण रहे हैं। भुखमरी के संकट का सामना करने वाले लोगों की संख्या लगभग 34 लाख तक पहुंच गई है, जबकि उत्तरी प्रांतों में लगभग 11 हजार लोगों को अकाल जैसे हालात का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ही बुरुंडी के भी हालात हैं जहां पर जहां राजनीतिक अस्थिरता और लोगों की गिरती आर्थिक हालत ने भुखमरी के हालात और गम्भीर बना दिए हैं। ऐसे 20 देशों की सूची में से 17 देश सब सहारा अफ्रीका क्षेत्र में स्थित हैं।विश्व खाद्य कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक डेविड बीजली के मुताबिक इस ताजा रिपोर्ट ने संघर्षों, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक संकटों के विनाशकारी प्रभावों को उजागर किया है जिन्‍हें मौजूदा वैश्विक संकट कोविड-19 ने और अधिक गंभीर बना दिया है। इसका दंश आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को अधिक भुगतना पड़ रहा है। इस महामारी ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भीषणतम मानवीय संकट पैदा कर दिया है। रिपोर्ट में अनेक देशों में संघर्षों को भुखमरी का प्रमुख कारण बताया गया है। इसमें कहा गया है कि इसकी वजह से लोग अपनी जमीन और घरों से दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में उन्‍हें अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनके रोजगार खत्‍म हो जाते हैं और उनकी आय के स्रोत भी लगातार कम या खत्‍म होते जाते हैं। इसका असर उनकी खरीद क्षमता पर भी पड़ता है। अनेक देशों में शहरी इलाक़ों में रहने वाले इलाकों में भी बहुत से लोक कोविड-19 के कारण नाज़ुक हालात का सामना कर रहे हैं। इसकी वजह से करोड़ों लोग बेरोजगार हुए हैं। आपको बता दें कि कुछ दिन पहले ही विश्व खाद्य कार्यक्रम को भुखमरी के खिलाफ किए गए इसके असाधारण काम के लिये नोबेल शांति पुरस्‍कार दिया गया है।

लाहौर। पाकिस्तान की एक अदालत ने पंजाब प्रांत में संघीय यानी केंद्र सरकार की ओर से करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण किए जाने पर सवाल उठाया है। अदालत ने अधिकारियों से पूछा है कि क्या यह प्रांतीय सरकार के मामले में हस्तक्षेप नहीं है? अदालत ने पूछा कि यदि सड़क निर्माण का काम प्रांत का विषय है तो संघीय सरकार ने करतारपुर कॉरिडोर की परियोजना बनाई कैसे और इसे किस आधार पर नियंत्रित किया।दरअसल, लाहौर-नारोवाल रोड के निर्माण में अनावश्यक देरी के खिलाफ लाहौर हाई कोर्ट सुनवाई कर रही थी। अदालत के मुख्य न्यायाधीश मुहम्मद कासिम खान ने संघीय कानून अधिकारी से पूछा कि बताईये सड़क निर्माण के लिए कौन जवाबदेह है- संघ या प्रांतीय सरकार। कानून अधिकारी ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण के लिए कोष जारी करने का विषय संघीय सरकार के दायरे में नहीं आता है।मुख्य न्यायाधीश खान ने पूछा, 'यदि सड़क निर्माण प्रांत का विषय है तो संघीय सरकार ने करतारपुर कॉरिडोर की परियोजना कैसे तैयार और नियंत्रित की। सरकारें अपनी मर्जी से काम करती हैं या कानून के तहत?' न्यायाधीश ने कहा कि यदि प्रांतीय मामलों में संघीय सरकार से हस्तक्षेप स्थापित होता है तो कोर्ट प्रधानमंत्री को नोटिस जारी कर सकता है। उन्होंने कहा, 'यदि जरूरी हुआ तो हम प्रधानमंत्री को नोटिस भेज सकते हैं।'मुख्य न्यायाधीश ने दो सप्ताह के लिए सुनवाई स्थगित कर दी। कोर्ट ने अतिरिक्त अटार्नी जनरल इश्तियाक ए. खान को मामले में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। बता दें कि पाकिस्तान सरकार ने बीते दिनों करतारपुर कॉरिडोर को फिर से खोल दिया था। पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच 2019 में किए गए द्विपक्षीय समझौते के अनुसार, भारतीय आगंतुकों को सुबह से शाम तक आने की अनुमति है।

ग्रीनविले। अमेरिका के रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने चीन और रूस दोनों ही देशों पर अपने हितों के लिएअंतराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। ये दोनों ही अन्य देशों के साथ मनमानी और जबर्दस्ती कर रहे हैं।रक्षा मंत्री ने एक वेबिनार में कहा कि पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की गतिविधियों के संबंध में सतर्कता बरती जा रही है और सेना की सभी सेवाएं इसके लिये तैयार हैं। जहां-जहां हमारी सेना तैनात हैं, वहां भी नए सिरे से समीक्षा की जा रही है। हमें अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए समय पर पर्याप्त और स्थायी बजट की भी आवश्यकता है। नई चुनौतियां, विशेष रूप से चीन की गतिविधियों को देखते हुए इसकी तत्काल आवश्यकता है। इन खतरों को देखते हुए सेना को तीन से पांच प्रतिशत रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी की जरूरत है।रक्षा मंत्री ने कहा, हमने अप्रैल माह में ही एयरफोर्स की बमवर्षक क्षमता को बढ़ाने की प्रकिया शुरू कर दी है। ये सब चीन की क्षमता बढ़ाने की कोशिशों को भी देखते हुए जरूरी है। अगस्त माह में छह बी-52 बमवर्षक विमान और हवा में मार करने वाली टैंक सेना को सभी तीस नाटो देशों में तैनात किया गया है।वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक रैली के दौरान चीन, रूस के साथ-साथ भारत को भी वैश्विक वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दावा किया कि पर्यावरण के मामले में उनके देश का रिकॉर्ड काफी अच्छा है। गुरुवार को नार्थ कैरोलिना में आयोजित एक चुनावी रैली में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ने पर्यावरण की रक्षा करते हुए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल की है।बता दें कि अमेरिका में जल्द राष्ट्रपति के चुनाव होने जा रहे हैं। इसको लेकर ट्रंप से सामने उनके प्रतिद्ंदी जो बिडेन हैं। ट्रंप को हाल ही में कोरोना वायरस ने भी चपेट में ले लिया था, लेकिन उन्होंने इससे जल्द रिकवर होकर चुनावी अभियान शुरू कर दिया। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों का मानना है कि 2020 का चुनाव अच्छी और बुरी नीतियों के बीच चुनाव का मौका देता है। ट्रंप के हजारों समर्थक अपने नेता को देखने और सुनने के लिए गुरुवार को नार्थ कैरोलिना में एकत्र हुए थे। संक्रमण से उबरने के बाद ट्रंप की यह पहली चुनावी रैली थी। रैली में आए लोगों में से कई ने गर्भपात, धाíमक स्वतंत्रता, बंदूक रखने का अधिकार, अवैध आव्रजन और स्वास्थ्य देखभाल जैसे कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखा और कहा कि इन्हीं कुछ प्रमुख मुद्दों को लेकर वे राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप का समर्थन कर रहे हैं।

वाशिंगटन। उपराष्ट्रपति पद की डेमोक्रेटिक प्रत्याशी कमला हैरिस ने ट्रंप पर निशाना साधते हुए कहा, अमेरिका के इतिहास में ट्रंप का कार्यकाल पूरी तरह विफल प्रशासन के रूप में याद किया जाएगा। कोरोना से लड़ने में भी ट्रंप नाकाम रहे हैं।हैरिस ने कहा कि अमेरिका को अब ऐसे राष्ट्रपति की आवश्यकता है जो जनता से सच बोलता हो और वैज्ञानिक आधार पर योजना बनाकर तथ्यों और सच के साथ आगे…
नई दिल्ली। कोरोना वायरस के प्रकोप से कुछ देशों को अभी तक पूरी तरह से छुटकारा नहीं मिल पाया है। एक बार मामले कम होने के बाद अब दुबारा से इनमें बढ़ोतरी हो रही है। कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों को देखकर अब कुछ शहरों ने फिर से बचाव के लिए कदम उठाए हैं।इनमें जर्मनी, फ्रांस और अन्य देशों के नाम शामिल हैं। ये यूरोपीय देश एक बार फिर कोरोना…
वाशिंगटन। राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेट प्रत्याशी जो बिडेन (Joe Biden) ने बड़ा एलान करते हुए कहा है, यदि वह सत्ता में आए तो एक करोड़ दस लाख दूसरे देशों के लोगों को अमेरिका की नागरिकता देंगे। हम इस मामले को गंभीरता से देख रहे हैं और इसके लिए हाउस और सीनेट में एक बिल लाने जा रहे हैं। कोरोना के कारण बिगड़ी अर्थव्यवस्था को सुधारने और दुनियाभर मे अमेरिकी…
ऑस्ट्रेलिया। 11 फरवरी 2005 को एक महिला अपने पुरूष मित्र और उसके दो दोस्तों के साथ टूर के लिए गई थी। महिला का नाम सिमोने श्ट्रोबेल था। वो साल 2005 में बैगपैकिंग टूर करने ऑस्ट्रेलिया गईं थीं, वहां वे लिजमोर शहर के एक कैम्पिंग पार्क में अपने बॉयफ्रेंड के साथ रह रही थीं। उसी दिन उनको उनके दोस्तों के साथ आखिरी बार देखा गया। छह दिन तक उनका कोई अता…
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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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