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आतंकियों से कम नहीं हैं पत्थरबाज

 

- योगेश कुमार गोयल*
14 फरवरी को घाटी में हुए सबसे बड़े फिदायीन हमले के बाद जब यह तथ्य सामने आया कि 20 वर्षीय आत्मघाती आतंकी आदिल अहमदडार मार्च 2018 में जैश-ए-मोहम्म्द में शामिल होने से पहले घाटी में एक पत्थरबाज के रूप में सक्रिय था तो यह बात भी आईने की तरह साफ हो गई है कि सुरक्षाबलों के लिए घाटी में मुसीबत का सबब बनते रहे ऐसे ही पत्थरबाज आने वाले समय में देश की सुरक्षा के लिए कितना बड़ा खतरा बन सकते हैं। ऐसे में पुलवामा आतंकी हमले के बाद समय की मांग अब यही है कि घाटी में पत्थरबाजों के साथ भी उतनी ही सख्ती से निपटा जाए, जितना आतंकियों से निपटा जाता है क्योंकि ये किसी भी लिहाज से आतंकियों से कम नहीं हैं। 18 फरवरी को पुलवामाएनकाउंटर के दौरान भी जिस प्रकार पत्थरबाजों की भीड़ ने तमाम चेतावनियों के बावजूद सेना के ऑपरेशन में बाधा डालने की कोशिश की, उससे साफ है कि पत्थरबाजों को आतंकियों की ही भांति कुचलने के लिए अब तत्पर होना ही होगा।
आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2015 से 2017 के बीच घाटी में पत्थरबाजी की 4736 घटनाएं हुई और 11566 सुरक्षाकर्मी पत्थरबाजों की निमर्मता के शिकार होकर घायल हुए थे। 2018 में भी पत्थरबाजी के 759 मामले सामने आए, जिनमें सुरक्षाबलों सहित हजारों लोग गंभीर रूप से घायल हुए। हमें अब भली-भांति समझ लेना होगा कि जिन पत्थरबाजों को हमारे कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी या नेतागण अपने ही भटके हुए बच्चे बताकर उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त करते रहे हैं, वे कोई भटके हुए बच्चे नहीं हैं बल्कि उन्हीं की बदौलत आतंकी घाटी में अपना खूनी खेल खेलने में सफल होते रहे हैं। यही कारण है कि अब देशभर में पत्थरबाजों के खिलाफ भी एक ही स्वर में आवाज उठने लगी है कि इन्हें भी सरकार द्वारा आतंकी घोषित करते हुए इनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाए, जैसा आतंकियों के साथ किया जाता है। आज जरूरत तो इस बात की भी है कि पत्थरबाजों के पक्ष में आवाज बुलंद करने वालों के साथ भी सख्ती बरती जाए। दरअसल पत्थरबाजोंकी पैरोकारी के चलते सुरक्षा बलों के हौंसले पस्त करने की घृणित कोशिशें लंबे अरसे से होती रही हैं। घाटी में गश्त करते सुरक्षा बलों पर जब-तब पत्थरबाजी शुरू कर पत्थरबाज सुरक्षा बलों के लिए बेहद मुश्किल हालात पैदा करते रहे हैं और आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा बलों के किसी भी ऑपरेशन के दौरान तो अक्सर सेना को पत्थरबाजी के चलते बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
पाक परस्तपत्थरबाज घाटी में आतंक फैलाने वाले आतंकवादियों के लिए कवर का काम करते हैं। जब भी सुरक्षा बल आतंकियों के खिलाफ कोई ऑपरेशन चलाते हैं तो पत्थरबाज सेना की गाडि़यों और जवानों पर डंडों व पत्थरों से ताबड़तोड़ हमले कर आतंकियों को बचकर भाग निकलने में मददगार बनते हैं। घाटी में आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए गश्त करते समय भी सेना के जवान प्रतिदिन पत्थरबाजों की निर्दयता के शिकार होते हैं। इन निर्दयी युवाओं को घाटी में जहां भी सेना के वाहन या जवान दिखते हैं, वहीं इनके हमले शुरू हो जाते हैं। ऐसे शातिर पत्थरबाज ‘भटके हुए बच्चों’ के नाम पर किसी भी प्रकार की सहानुभूति, दया या रहम के हकदार नहीं हो सकते। कुछ समय पहले पैलेट गन की मार ने पत्थरबाजों की कमर बुरी तरह तोड़ दी थी किन्तु इनसे सहानुभूति रखने वालों ने पैलेट गन के इस्तेमाल पर बवाल मचाकर इस प्रतिबंध लगवा दिया और पत्थरबाजों के हौंसले फिर बुलंद हो गए।
कितनी हैरत की बात है कि जब 9 अप्रैल 2017 को श्रीनगर के बडगाम में चुनाव ड्यूटी के दौरान पत्थरबाजों की निर्ममता से बचने के लिए मेजर लीतुलगोगोई ने एक पत्थरबाज को अपनी जीप के आगे बांधकर मानव कवच के रूप में इस्तेमाल किया था तो पत्थरबाजों के प्रति सहानुभूति रखने वालों ने देशभर में हंगामा मचा दिया था लेकिन जब सेना के जांबाज जवान इन्हीं पत्थरबाजों की निर्दयता के शिकार होते हैं तो पत्थरबाजों के पैरोकारों द्वारा खामोशी का शर्मनाक लबादा ओढ़ लिया जाता है। दरअसल पीडीपी हो या नेशनल कांफ्रैंस या अन्य कोई क्षेत्रीय दल, इनकी राजनीति का यथार्थ ही आतंकियों और पत्थरबाजों के प्रति इनकी हमदर्दी रहा है। यही वजह है कि फारूकअब्दुल्ला हों या उनके बेटे उमर अब्दुल्ला अथवा महूबबा मुफ्ती, ये सभी सदैव पत्थरबाजों के पैरोकार बनकर सामने आए हैं और यही कारण है कि राज्य में सेना और सुरक्षाबलों की तैनाती सदैव ऐसे स्थानीय नेताओं की आंखों में खटकती रही है। फारूकअब्दुल्ला ने अभी भी बड़ा ही शर्मनाक बयान देते हुए कहा है कि जब तक कश्मीर मसला नहीं सुलझ जाता, पुलवामा जैसे अटैक होते रहेंगे। ऐसे बयानों के मद्देनजर आज दरकार इस बात की भी है कि फारूक जैसे ऐसे गद्दरों पर भी शिकंजा कसा जाए।
आज हर कोई बखूबी जानता है कि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में आतंकवाद को जीवित रखने के लिए करोड़ों रुपये का फंड रखा जाता है और इसी फंड से इन पत्थरबाजों तथा आतंकी हमले करने वालों के दैनिक मेहनताने का भुगतान किया जाता रहा है। यही पत्थरबाजआतंकियों के लिए सबसे बड़ी ढ़ाल बनते हैं और इन्हीं की आड़ में आतंकियों को बचाया जाता रहा है लेकिन जब इन्हीं निरंकुश पत्थरबाजों के हमलों का जवाब देने के दौरान किसी पत्थरबाज की मौत हो जाती है तो आसमान सिर पर उठा लिया जाता है और जब सेना पर इन पत्थरबाजों के हमले होते हैं तो पत्थरबाजों के विरोध में उठे यही स्वर खामोश हो जाते हैं। यह कश्मीर के राजनेताओं का दोहरा चरित्र ही तो है और पत्थरबाजों को लेकर स्थानीय दलों का हमदर्दी भरा यही रवैया सैन्य बलों के लिए मुसीबत बनता रहा है। तत्कालीन महबूबा सरकार द्वारा तो गत वर्ष न केवल पत्थरबाजी के 1745 मामलों में 9730 युवाओं पर से पत्थरबाजी के केस वापस ले लिए गए थे बल्कि पत्थरबाजों पर कार्रवाई करने पर समय-समय पर सुरक्षा बलों पर ही कार्रवाई करने के घृणित प्रयास भी किए गए। अगर हम दूसरे देशों में पत्थबाजी के ऐसे ही मामलों में बने कानूनों पर नजर डालें तो कई देश ऐसे हैं, जहां पत्थरबाजी के लिए कड़े कानून बने हैं। अमेरिका में ऐसे मामलों के लिए उम्रकैद, इजरायल में 20 साल, न्यूजीलैंड में 14 साल, आस्ट्रेलिया में 5 साल और यूके में 3-5 साल की सजा का प्रावधान है।
घाटी में पत्थरबाजों को कई बार सुधरने का अवसर दिया गया और सेना ने उनके प्रति अनेक अवसरों पर नरमी भी दिखाई किन्तु गत वर्ष मई-जून माह में पूरे रमजान माह के दौरान, उसके बाद ईद की नमाज के पश्चात्, फिर बकरीद की नमाज के बाद और उसके बाद भी अनेक अवसरों पर पत्थरबाजों ने बार-बार अपना हिंसक और उपद्रवी रूप दिखाकर साबित किया है कि वे किसी भी तरह सुधरने वाले नहीं हैं। दरअसल ऐसे उपद्रवी युवाओं को आतंकी संगठन कुछ पैसों का लालच देकर सनसनी, डर और उत्पात का माहौल पैदा करने के लिए इस्तेमाल करते हैं और धीरे-धीरे ऐसे ही उपद्रवी तत्व पत्थरबाजी करते-करते आदिल अहमदडार जैसे कुख्यात आतंकी बनकर देश की सुरक्षा के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनकर सामने आते हैं। इसलिए घाटी में आतंकियों की कमर तोड़ने के लिए अब पत्थरबाजों को भी जमींदोज करना ही एकमात्र विकल्प है। अगर पत्थरबाजों के हौंसले पस्त होंगे तो आतंकियों की कमर अपने आप टूट जाएगी।
एनआईए की एक रिपोर्ट में गत वर्ष खुलासा हो चुका है कि पाकिस्तान ने 2016-17 में 200 करोड़ की टेररफंडिंग की थी। इसी फंडिंग का एक बड़ा हिस्सा पत्थरबाजों के लिए मुकर्रर होता है। घाटी में कई जगहों पर तो बाकायदा लाउडस्पीकरों पर घोषणा करके सेना के शिकंजे में फंसे आतंकियों की मदद के लिए युवाओं को उनकी मदद के लिए इकट्ठा किया जाता है। पत्थरबाजों के साथ हमदर्दी रखने वालों को भली-भांति समझ लेना होगा कि आतंकियों के लिए सहानुभूति रखने वाले कट्टर, निरंकुश और निर्दयी पत्थरबाजों का ‘गांधीगिरी’ सरीखी कोशिशों के जरिये हृदय परिवर्तन कदापि संभव नहीं। चूंकि घाटी में अलगाववादी तत्वों और पत्थरबाजों की तादाद लगातार बढ़ रही है और उनमें कट्टरता भी बढ़ रही है और ऐसे लोगों के समर्थन से ही आतंकियों के हौंसले बुलंद रहे हैं। इसलिए ऐसे राष्ट्र विरोधी तत्वों से निपटने का एकमात्र तरीका अब यही है कि आतंकियों के साथ-साथ उनके साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों के साथ भी बेहद कड़ाई से निपटा जाए। हालांकि उम्मीद की जानी चाहिए कि पुलवामा हमले के बाद जिस प्रकार सरकार द्वारा सेना को अपने हिसाब से अपने अभियान चलाने की छूट प्रदान की गई है, उससे आतंकियों और उनके समर्थकों पर लगाम कसने में मदद मिलेगी और घाटी में हालात सुधरेंगे।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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DR NEELAM MAHENDRA
(Best editorial writing award winner)


यह सेना की बहुत बड़ी सफलता है कि उसने पुलवामा हमले के मास्टरमाइंड अब्दुल रशीद गाज़ी को आखिरकार मार गिराया हालांकि इस ऑपरेशन में एक मेजर समेत हमारे चार जांबांज सिपाही वीरगति को प्राप्त हुए। देश इस समय बेहद कठिन दौर से गुज़र रहा है क्योंकि हमारे सैनिकों की शहादत का सिलसिला लगातार जारी है। अभी भारत अपने 40 वीर सपूतों को धधकते दिल और नाम आँखों से अंतिम विदाई दे भी नहीं पाया था, सेना अभी अपने इन वीरों के बलिदान को ठीक से नमन भी नहीं कर पाई थी, राष्ट्र अपने भीतर के घुटन भरे आक्रोश से उबर भी नहीं पाया था, कि 18 फरवरी की सुबह फिर हमारे पांच जवानों की शहादत की एक और मनहूस खबर आई।
पुलवामा की इस हृदयविदारक घटना में सबसे अधिक पीड़ादायक बात यह है कि वो 40 सीआरपीएफ के जवान किसी युद्ध के लिए नहीं गए थे। वे तो छुट्टियों के बाद अपनी अपनी डयूटी पर लौट रहे थे। "जिहाद" की खातिर एक आत्मघाती हमलावर ने सेना के काफिले पर इस फियादीन हमले को अंजाम दिया। हैवानियत की पराकाष्ठा देखिए कि पाक पोषित आतंकवादी संगठन जैश ए मोहम्मद न सिर्फ हमले की जिम्मेदारी लेता है बल्कि उस सुसाइड बॉम्बर का हमले के लिए जाने से पहले का एक वीडियो भी रिलीज़ करता है। इंसानियत का इससे घिनौना चेहरा क्या हो सकता है। इससे किसे क्या हासिल हुआ कहना मुश्किल है लेकिन इस घटना ने इतना तो साबित कर ही दिया कि बिना स्थानीय मदद के ऐसी किसी वारदात को अंजाम देना संभव नहीं था। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस वीभत्सता में कश्मीरियत जम्हूरियत और इंसानियत ने कब का दम तोड़ दिया है। वो घाटी जो जन्नत हुआ करती थी आज केसर से नहीं लहू से लाल है। वो कश्मीर जो अपनी सूफी संस्कृति के लिए जाना जाता था आज आतंक का पर्याय बन चुका है।
घाटी में आतंक का ये सिलसिला जो 1987 से शुरू हुआ था वो अब निर्णायक दौर में है। देश के प्रधानमंत्री ने कहा है कि जवानों के खून की एक एक बूंद और हर आंख से गिरने वाले एक एक आँसू का ऐसा बदला लिया जायेगा कि विश्व इस न्यू इंडिया को महसूस करेगा।
वर्तमान सरकार के प्रयासों से स्पष्ट है कि वो इस बार आरपार की लड़ाई के पक्ष में है और यह सही भी है। क्योंकि देश में हुए आतंकवादी हमले के बाद इस समय जो देश का माहौल बना हुआ है, वो शायद इससे पहले कभी देखने को नहीं मिला। आज देश की हर आंख नम है, हर दिल शहीदों के परिवार के दर्द को समझ रहा है, हर शीष उस माता पिता के आगे नतमस्तक है जिसने अपना जिगर का टुकड़ा भारत माँ के चरणों में समर्पित किया। हर हृदय कृतज्ञ है उस वीरांगना का जिसने अपनी मांग का सिंदूर देश को सौंप दिया और हर भारत वासी ऋणी है उस बालक का जो पिता के कंधों पर बैठने की उम्र में अपने पिता को कंधा दे रहा है।
ये वाकई में एक नया भारत है जिसमें आज हर दिल में देशभक्ति की ज्वाला धधक रही है। यह एक अघोषित युद्ध का वो दौर है जिसमें हर व्यक्ति देश हित में अपना योगदान देने के लिए बेचैन है। कोई शहीदों के बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी ले रहा है तो कोई अपनी एक महीने की तनख्वाह दे रहा है। स्थिति यह है कि "भारत के वीर" में मात्र दो दिन में 6 करोड़ से ज्यादा की राशि जमा हो गई। आज देश की मनःस्थिति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश का बच्चा बच्चा और महिलाएं तक कह रही हैं कि हमें सीमा पर जाने दो हम पाकिस्तान से बदला लेने को बेताब हैं। पूरा देश अब पाकिस्तान से बातचीत नहीं बदला चाहता है। हालात यह हैं कि पाक से बातचीत करने जैसा बयान देने पर सिद्धू को एक टीवी शो से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है तो कहीं पाकिस्तान से हमदर्दी जताने वाले को नौकरी से बाहर कर दिया जाता है। जिस देश में कुछ समय पहले तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश विरोधी नारे लगाने वालों के पक्ष में कई राजनैतिक दलों के नेता और मानववादी संगठन इकट्ठा हो जाते थे, आज वो देश भारत माता की जय और वंदे मातरम जैसे नारों से गूंज रहा है। टीवी चैनल और सोशल मीडिया देश भक्ति और वीररस की कविताओं से ओतप्रोत हैं। यह नए भारत की गूंज ही है कि अपने भाषणों में हरदम आग उगलने वाले ओवैसी जैसे नेता पहली बार आतंकवाद के खिलाफ बोलते हैं। यह नए भारत की ताकत ही है कि कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को मिलने वाली सुरक्षा और सुविधाओं के छीने जाने पर फारूख अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ्ती जैसे घाटी के नेता शांत हैं। और नए भारत की यह ताकत सिर्फ देश में ही नहीं दुनिया में भी दिखाई दी जब आतंकवाद की इस घटना पर विश्व के 48 देशों ने भारत को समर्थन दिया। अमेरिका से लेकर रूस ने कहा कि भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है और वे भारत के साथ हैं।
और यह नए भारत की शक्ति ही है कि आज पाकिस्तान बैकफुट पर है। आज वो अपने परमाणु हथियार सम्पन्न होने के दम पर युद्ध की धमकी नहीं दे रहा बल्कि इस हमले में अपना हाथ न होने की सफाई दे रहा है। यह नए भारत का दम है कि यह हरकत उसपर उल्टी पड़ गई। दरअसल अमरीका की ट्रम्प सरकार द्वारा अफगानिस्तान से अपनी फौज वापस बुलाने के फैसले से आतंकी संगठनों और पाक दोनों के हौसले फिर से बुलंद होने लगे थे। इस समय को उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी ताकत दिखाने के मौके के रूप में देखा। क्योंकि सेना की मुस्तैदी और ऑपरेशन ऑल आउट के चलते वे काफी समय से देश या घाटी में कोई वारदात नहीं कर पा रहे थे जिससे उन्हें अपने अस्तित्व पर ही खतरा दिखने लगा था और वो जबरदस्त दबाव में थे। उन्होंने सोचा था कि भारत में चुनाव से पहले "कुछ बड़ा" करके वो भारत पर दबाव बनाने में कामयाब हो जाएंगे जबकि हुआ उल्टा। क्योकि आज आर्थिक रूप से जर्जर पाकिस्तान सामाजिक रूप से भी पूरी दुनिया में अलग थलग पड़ चुका है। और रही सही कसर भारत के प्रधानमंत्री के बदला लेने के संकल्प के बाद 14 तारिख से लगातार भारत के हर गली कूचे में गूंजने वाले पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारों ने उसको मनोवैज्ञानिक पराजय दे कर पूरी कर दी। वो पाक अपनी नापाक हरकतों से विश्व में आर्थिक सामाजिक कूटनीतिक और राजनैतिक मोर्चे पर आज बेहद बुरे दौर से गुज़र रहा है।अपने दुश्मन की इस आधी पराजय को अपनी सम्पूर्ण विजय में बदलने का इससे श्रेष्ठ समय हो नहीं सकता जब देश के हर बच्चे में सैनिक, हर युवा में एक योध्दा और हर नारी में दुर्गा का रूप उतर आया हो।


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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विभिन्न राज्य सरकार की वर्षो की उदासीनता के कारण एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है कि अधीनस्थ न्यायपालिका भारी दबाव में काम कर रही है। न्यायाधीशों की संख्या अपर्याप्त है और बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ है।मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, 'न्यायपालिका के प्रति वर्षो से उदासीनता बरती गई है। उपयुक्त माहौल मुहैया नहीं कराया गया लेकिन यह काम कर रही है।'
न्यायाधीशों की संख्या अपर्याप्त और बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ है:-अधीनस्थ न्यायपालिका में बुनियादी ढांचा के विकास के लिए उठाए गए कदमों और न्यायिक अधिकारियों एवं सहयोगी कर्मचारियों की नियुक्ति की शीर्ष कोर्ट निगरानी कर रहा है। मंगलवार को कोर्ट ने कर्नाटक, केरल, राजस्थान, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा और उत्तराखंड में हुई प्रगति की जांच की। इस पीठ में जस्टिस एलएन राव और जस्टिस संजीव खन्ना भी शामिल हैं। राजस्थान सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर पीठ ने टिप्पणी की।राजस्थान के बारे में पीठ ने कहा कि बुनियादी ढांचा की हालत संतोष जनक नहीं है। पीठ ने राजस्थान सरकार से तीन महीने के भीतर न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति और अदालतों के बुनियादी ढांचा के विकास के मुद्दे पर जानकारी देने को कहा।उत्तराखंड के मुद्दे पर पीठ ने हैरत जताई कि राज्य सरकार केंद्र से मिले कोष के इस्तेमाल के बारे में सूचना देने से आनाकानी कर रही है। कोर्ट में मौजूद उप मुख्य सचिव से पीठ ने सक्षम अधिकारी को केंद्रीय कोष का इस्तेमाल प्रमाण पत्र पेश करने को कहा ताकि उद्देश्य के लिए अतिरिक्त केंद्रीय कोष जारी हो सके।

नई दिल्ली। अब से एक दशक बाद भारतीय वायुसेना (IAF) के लड़ाकू विमान पाकिस्तान और चीन की काफी नजदीक से निगरानी कर सकेंगे। कहा जा रहा है कि वायुसेना के लड़ाकू विमान पाकिस्तानी और चीनी सीमा क्षेत्र के नजदीक तैनात किए जा सकेंगे। IAF के फाइटर प्लेन के साथ ही मानव रहित 'विंगमैन' भी रहेगा, जोकि सशस्त्र गुप्त ड्रोन है। ये ड्रोन वायुसेना के फाइटर प्लेन के साथ मिलकर दुश्मनों के लक्ष्य पर पैनी नजर रखेंगे। फाइटर प्लेन के साथ करीब तीन या उससे अधिक ड्रोन मौजूद रहेंगे।हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स की अगुवाई में बनाई जा रही परियोजना में शामिल प्रमुख डिजाइनरों में से एक का कहना है, 'ये प्लेटफॉर्म भारी रक्षा,एकीकृत वायु रक्षा नेटवर्क के खिलाफ उठाया गया पहला कदम होगा।' एक भारतीय रक्षा स्टार्टअप भी इस मिशन टीम का हिस्सा है। शुरुआत में प्रत्येक ड्रोन सटीक-निर्देशित हथियार से लैस होगा, जैसे कि हवा से सतह पर मार करने वाली मिसाइल या लेजर-गाइडेड बम। प्लेटफॉर्म के भविष्य के संस्करण दुश्मन के लड़ाकू विमानों को निशाना बनाने के लिए हवा से हवा में मिसाइल दागने में भी सक्षम होंगे।आसान शब्दों में कहें तो, मानवरहित विंगमैन एक भारी-उन्नत IAF जगुआर फाइटर बॉम्बर (जगुआर मैक्स कहा जाता है) से जुड़ा होगा। विमान उड़ा रहे पायलट प्रत्येक मानव रहित ड्रोन को खास निर्देश देंगे, जोकि फाइटर प्लेन के साथ उड़ान भरेंगे। डिजाइन टीम के प्रमुख डिजाइनर का कहना है, 'मानव रहित विंगमैन दुश्मन के हवाई क्षेत्र, रडार साइटों और दुश्मन की सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल लॉन्चर को निशाना बना सकता है।'ड्रोन की खासियत बताते हुए डिजाइन टीम के सदस्य ने कहा, 'न केवल वे (ड्रोन) प्रत्येक मिशन में आक्रामक गोलाबारी का प्रसार बढ़ाते हैं,बल्कि वे संभावित दुर्घटना को भी कम करते हैं, क्योंकि वे मानव रहित विमान हैं।' उन्होंने बताया, 'प्रत्येक ड्रोन अपने स्वयं के रेडार और सेंसर से भी सुसज्जित है। इसकी मदद से डाटा-लिंक के माध्यम से जगुआर फाइटर तक सीमा क्षेत्रों की सूचना मिलेगी और यह क्षेत्र में सभी लक्ष्यों और खतरों की सिजुएशनल फोटो पायलट तक पहुंचेगी।'मानव रहित विंगमैन'' ड्रोन की अवधारणा एक ऐसे समय में सामने आई है जब भारतीय वायु सेना अपने भीतर की कमी से (लड़ाकू स्क्वाड्रन) जूझ रही है। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि भारतीय वायुसेना को कम से कम 200 और अधिक लड़ाकू जेटों की आवश्यकता है ताकि चीन के खतरे का मुकाबला किया जा सके। एचएएल द्वारा डिजाइन प्रत्येक मानव रहित विंगमैन को 5 मिलियन डॉलर की लागत से तैयार होने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह राफेल जैसे आधुनिक लड़ाकू विमानों की लागत का एक अंश है

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में गुरुवार (14-फरवरी-2019) को सीआरपीएफ काफिले पर हुए आतंकी हमले को लेकर पूरे देश में गुस्सा है। इस हमले में देश ने अपने 40 वीर सपूतों को खो दिया, जबकि कई जवान गंभीर रूप से घायल हैं। लोगों की आंखें नम हैं और दिलों में दुश्मन से बदला लेने की आग धधक रही है। गुस्साए लोग जगह-जगह अपने शहीद जांबाजों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। साथ ही आतंकवाद और पाकिस्तान के पुतले फूंक रहे हैं।इन सबके बीच बहुत से लोग शहीदों के परिवार की मदद में भी जुट गए हैं। अगर आप भी शहीदों के परिवार की आर्थिक मदद कर, उनका हौसला और सम्मान बढ़ाना चाहते हैं तो यहां बताए गए तरीकों से आप सीधे उनके परिवार के खातों में दान कर सकते हैं। शहीदों के परिवार को आर्थिक मदद करने से पहले आपके लिए ये भी जान लेना जरूरी है कि आप कहीं गलत जगह पर दान न कर दें। यहां हम आपको जो माध्यम बता रहे हैं, वो केंद्र सरकार द्वारा तैयार किया एक बेहद सुरक्षित जरिया है।भारत सरकार के केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपने शहीद जवानों के परिवार की आर्थिक मदद के लिए 2017 में विशेष तौर पर भारत के वीर (Bharat Ke Veer) नाम से वेबसाइट www.bharatkeveer.gov.in और मोबाइल एप लॉच किया था। इस सरकारी वेबसाइट के जरिए देश की आम जनता शहीदों के परिवारो को आसानी से आर्थिक मदद पहुंचा सकती है।इसके अलावा आप दैनिक जागरण की खास पहल ‘पुलवामा के शहीद’ से जुड़कर भी आप शहीदों के परिजनों की आर्थिक मदद कर सकते हैं।पुलवामा के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए इस पेज को विशेष तौर पर तैयार किया गया है। यहां भी शहीदों के परिजनों की मदद करने और राहत कोष में योगदान देने के लिए एक लिंक दिया गया है। इस लिंक पर क्लिक करके आप सीधे 'bharatkeveer.gov.in' पर पहुंच जाएंगे। क्लिक हेयर टू कंप्ट्रीब्यूट पर क्लिक करके आप जिस भी शहीद के परिजनों की मदद करना चाहें, उनका चुनाव करके सीधे उन्हें मदद पहुंचा सकते हैं।इस पेज पर आप 'मां भारती के अमर्त्य वीर' के अंतर्गत सभी शहीदों की तस्वीर और नाम देख सकते हैं। इन तस्वीरों पर क्लिक करके आपको शहीदों के बारे में संक्षिप्त जानकारी मिल जाएगी। शहीदों के बारे में अधिक जानकारी चाहते हैं तो 'पुलवामा के शहीद' पेज पर ही 'शौर्यगाथा' नाम से हर शहीद के बारे में विस्तृत जानकारी भी है। संबंधित फोटो गैलरी और वीडियो भी आप यहां देख सकते हैं। दैनिक जागरण की इस मुहिम का हिस्सा बनें। देशप्रेम की राह में जान न्यौछावर करने वाले सैनिकों को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।यहां आप दो तरह से दान कर सकते हैं, पहला आप सीधे शहीद के परिवार के खाते में रकम दान कर सकते हैं और दूसरा आप भारत सरकार के वीर कोष में रुपये दान कर सकते हैं। भारत सरकार वीर कोष का इस्तेमाल शहीद और घायल जवानों व उनके परिवारों की मदद के लिए करती है।दान करने के लिए सबसे पहले आपको वेबसाइट www.bharatkeveer.gov.in पर जाना होगा। इसके बाद आपको पुलावामा हमले में शहीद हुए जवानों की फोटो दिखेगी। आप जिस शहीद जवान के परिवार को आर्थिक मदद पहुंचाना चाहते हैं, उसकी फोटो पर क्लिक कर दान कर सकते हैं। शहीदों के फोटो के साथ आपको ये भी जानकारी मिलेगी कि अब तक उसे कितनी आर्थिक मदद मिल चुकी है।
आठ सुरक्षा बलों की कर सकते हैं मदद:-वेबसाइट www.bharatkeveer.gov.in के जरिए आप आठ सुरक्षा बलों के शहीद जवानों की मदद कर सकते हैं। इनमें केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), इंडो-तिब्बत सीमा पुलिस बल (ITBP), सशस्त्र सीमा बल (SSB), असम राइफल्स, राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (NSG) के शहीद जवान शामिल हैं।
अधिकतम दान की सीमा 15 लाख रुपये:-भारत की आन-बान और शान के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले प्रत्येक वीर के परिवार को अधिकतम 15 लाख रुपये ही दान किए जा सकते हैं। इसलिए शहीद की फोटो के साथ उसे दान में मिल चुकी रकम और शेष रकम दोनों दिखाई जाती है। आप शेष रकम की सीमा तक ही उस शहीद के परिवार के खाते में दान कर सकते हैं। इससे ज्यादा रकम दान करने पर आपको दान की रकम कम करने का विकल्प मिलेगा या शेष सीमा से अधिक की रकम वेबसाइट के वीर कोष में ट्रांसफर हो जाएगी, जो अन्य शहीदों के काम आएगी। 15 लाख रुपये की अधिकतम सीमा इसलिए निर्धारित की गई है, ताकि सभी शहीद जवानों को आर्थिक मदद प्राप्त हो सके। दान करने की कोई न्यूनतम सीमा नहीं है। इस वेबसाइट के जरिए शहीद जवानों को अब तक लाखों रुपये दान किए जा चुके हैं।
दान के बाद सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे सर्टिफिकेट:-Pulwama Terror Attack में 40 जवानों के शहीद होने की घटना के बाद से https://bharatkeveer.gov.in वेबसाइट पर लोग जमकर दान कर रहे हैं। यहां दान करने के दानकर्ता के नाम से एक प्रमाण पत्र जारी किया जाता है। इस प्रमाण पत्र के जरिए दान की हुई रकम पर आप आयकर में छूट प्राप्त कर सकते हैं।वेबसाइट के जरिए दान करने वाले लोग ट्वीटर समेत अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपने दान प्रमाण पत्र पोस्ट कर और लोगों को दान करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। दान करने वालों में तकरीबन हर राज्य के लोग, बड़े अधिकारी, नेता, खिलाड़ी से लेकर हर वर्ग के लोग शामिल हैं। बहुत से लोगों ने या संगठन ने सामूहिक तौर पर अपनी एक दिन या एक सप्ताह या एक महीने की तनख्वाह दान करने की भी घोषणा की है।

कोण्डागांव। देश की न्याय व्यवस्था में सिविल कोर्ट, जिला अदालत, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की संरचना है। किसी भी मामले में न्याय के लिए देश का हर एक नागरिक इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखता है। इस व्यवस्था से परे छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई गांवों में ऐसी अदालतें लगती हैं, जहां देवी-देवता न्यायाधीश के स्वरूप में विराजमान होते हैं। उनके सामने पक्षकार अपनी बात रखते हैं और देवता के प्रतिनिधि के तौर पर पुजारी मामलों में फैसले सुनाते हैं। यहां देवताओं के भय से लोग झूठ बोलने से डरते हैं और लोगों का भरोसा है कि देवता के इस मंदिर में उन्हें निष्पक्ष न्याय मिलता है।
सदियों से चली आ रही है यह न्याय व्यवस्था;-बस्तर अंचल में निवासरत लोगों का सदियों से चली आ रही देवता की इस न्याय व्यवस्था पर अटूट भरोसा है। लोग यहां न्याय के लिए आते हैं और फैसले को पूरी श्रद्धा के साथ स्वीकार भी करते हैं। यहां के प्रत्येक गांव में यह अदालत स्थित है। जिसे ग्रामीण स्थानीय बोली में माटी कोर्ट, देव कोर्ट, बूढ़ा कोर्ट, भीमा कोर्ट जैसे नाम से पुकारते हैं।न्यायपालिका की तरह इसमें भी अपराधी को सजा और वादी को न्याय मिलता है। यहां न्यायाधीश के रूप में देवी शक्तियां विद्यमान रहती है। गांव के किसी व्यक्ति या परिवार में अनबन, झगड़े या किसी अनहोनी होने पर सर्वप्रथम व्यक्ति या परिवार गांव में स्थित इन्हीं कोर्ट में अपील करता है। पुजारी देवी शक्तियों को साक्षी मानकर न्याय करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की तरह है माटी कोर्ट:-जिले के सामपुर निवासी माटी गायता निर्गत मरकाम (72 वर्ष) ने बताया कि प्रत्येक गांव में अलग-अलग कोर्ट होता है। प्रत्येक कोर्ट का अलग-अलग कार्य होता है। जिनमें से माटी कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट की तरह मुख्य कोर्ट होता है। माटी कोर्ट प्रत्येक गांव में होता है। पुराने समय में जब गांवों की बसाहट यहां शुरू हुई थी उस वक्त जो परिवार गांव में सबसे पहले रहने आए थे उन्होंने गांव की मिट्टी की पूजा की। इस गांव की मिट्टी का नाम उनके गोत्र के नाम पर पड़ा और उस मिट्टी के लिये उस गांव में पुजारी नियुक्त किए गए, जिन्हें गायता कहते हैं। हर गांव में माटी कोर्ट और एक गायता का होते हैं।
माटी कोर्ट के कानून के डर से अपराध करने से बचते हैं ग्रामीण:-माटी कोर्ट गांव के निवासियों में किसी प्रकार की अनबन, झगड़े, अंतर जाति विवाह विवाद से जुड़े मामलों में अमीर-गरीब सबको दैविय शक्तियों द्वारा संचालित माटी कोर्ट में गांव के कानून का सामना करना पड़ता है। गांव के कानून से बचने के लिए अधिकांश लोग अपराध कारित करने से घबराते हैं। गांव के कानून का उल्लंघन करने वालों को कई बार गांव के पवित्र देवी स्थलों में ना जाने की सजा भी भुगतनी पड़ती है।
माटी देवता को साक्षी मानकर होता है न्याय:-ग्रामीण इस तरह की घटनाओं को गांव की मिट्टी के लिए अपवित्र या अशुभ मानते हैं। पीड़ित परिवार द्वारा जानकारी देने पर गांव में बैठक आयोजित होती है। जिसमें ग्राम प्रमुख, माटी गायता, पुजारी व गांव के बुजुर्ग मिलकर इस समस्या के समाधान का रास्ता तलाशते हैं। इसके बाद गांव की माटी कोर्ट में माटी देवता को साक्षी मानकर दोनों पक्ष को आमने-सामने रखकर न्याय होता है।अपराध सिद्ध होने पर अपराधी को दंडित किया जाता है। अपराधी को दंड स्वरूप पूजा हेतु नारियल, पैसे और कहीं-कहीं सुअर की बली चढ़ाने जैसी सजा मिलती है। 'माटी किरीया" को ग्रामीण बहुत ही मुश्किल कसम मानते है। किसी भी कीमत पर वे 'माटी किरीया"कसम खाना नहीं चाहते।
कोर्ट की छत्रछाया में होता है वनों का संरक्षण:-माटी कोर्ट के परिसर में 50 डिसमिल से लेकर 2 एकड़ तक फैले हुए सघन वृक्षों का जंगल होता है। जहां गांव के माटी देवता स्थापित हुए हैं। वर्ष में एक बार धान बुवाई से पूर्व प्रत्येक गांव में 'माटी तिहार" हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन ग्रामीण मिट्टी की पूजा-अर्चना करते हैं। गांव में स्थित अलग-अलग कोर्ट में अलग-अलग देवी देवताऐं स्थापित होने के चलते यहां के वृक्षों को ग्रामीण नहीं काटते जिससे वनों का संरक्षण भी होता है।

नई दिल्ली। जैसे कि आप जानते हैं आज के समय में सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड बहुत जरुरी है। ऐसे में अगर आधार कार्ड खो जाए तो आप क्या करेंगे। अब आपको घबराने की जरुरी नहीं है। यूआईडीएआई की वेबसाइट (www.uidai.gov.in) पर मामूली शुल्क पर लोगों को आधार कार्ड को री-प्रिंट कराने की इजाजत दी गई है। इसका लाभ उन लोगों को मिलेगा जिसका आधार कार्ड खो गया है या वे कभी रखकर इसे भूल गए हैं।
कितनी फीस देकर हो जाएगा रीप्रिंट?:-यूआईडीएआई की वेबसाइट के मुताबिक मात्र 50 रुपये (जीएसटी और स्पीड पोस्ट चार्ज समेत) की फीस का भुगतान करके अपने आधार कार्ड को री-प्रिट करा सकते हैं। इस री-प्रिंटेड आधार कार्ड को पांच वर्किंग डे के भीतर इंडिया पोस्ट स्पीड पोस्ट के माध्यम से आपके रजिस्टर्ड पते पर भेज देगा। आप अपने आधार कार्ड को फिर से मुद्रित (री-प्रिंट) करने का अनुरोध करने के लिए या तो अपना आधार नंबर या वर्चुअल पहचान संख्या (वीआईडी) का उपयोग कर सकते हैं।
रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर होना जरूरी:-बता दें कि आधार की री-प्रिंटिंग के आवेदन से पहले आपका मोबाइल नंबर आधार डेटाबेस में रजिस्टर्ड होना चाहिए, क्योंकि वन टाइम पासवर्ड (ओटीपी) आपके इसी मोबाइल नंबर पर भेजा जाएगा। लेकिन अगर आपका मोबाइल आधार के साथ रजिस्टर्ड नहीं है तो उस सूरत में आप नॉन रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर के माध्यम से अपने आधार को री-प्रिंट करवाने का आवेदन कर सकते हैं। हालांकि तब आप डिटेल को प्रिव्यू करने में सक्षम नहीं होंगे।
ऐसे आधार कार्ड को करें री-प्रिंट
1- यूआईडीएआई की वेबसाइट www.uidai.gov.in पर जाएं।
2- आधार सर्विस के अंतर्गत ऑर्डर आधार री-प्रिंट (पायलट बेस) पर क्लिक करें।
3- इतना करते ही एक नया टैब आपकी कंप्यूटर स्क्रीन पर ओपन होगा। आपको अपने 12 डिजिट के आधार नंबर को एंटर करना होगा या फिर 16 डिजिट वाला वीआईडी नंबर और सिक्योरिटी कोड। अगर आपका मोबाइल नंबर यूआईडीएआई के डेटाबेस में आपके आधार नंबर के साथ रजिस्टर्ड नहीं है, तब इसका इशारा करने वाले बॉक्स को सिलेक्ट करें। अगर आपका नंबर रजिस्टर्ड है तो सेंड ओटीपी ऑप्शन पर क्लिक करें।
4- यह ओटीपी आपके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजा जाएगा। यह ओटीपी सिर्फ 10 मिनट के लए वैलिड रहेगा।
5- ओटीपी एंटर करें और टर्म एंड कंडीशन वाले बॉक्स को सेलेक्ट करें। अब सबमिट पर क्लिक करें।
6- एक बार ओटीपी एंटर करने के बाद आप अपने आधार डिटेल (नंबर रजिस्टर्ड होने की सूरत में) को वेरिफाई करने में सक्षम होंगे।
7- एक बार आधार डिटेल वेरिफाई होने के बाद आपको मेक पेमेंट ऑप्शन पर क्लिक करना होगा। आप सीधे पेमेंट गेटवे पर रीडायरेक्ट हो जाएंगे।
8- आप पेमेंट क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड, नेट बैंकिंग या यूपीआई जैसी भी आपक सहूलियत हो उस हिसाब से कर सकते हैं। आपको आधार कार्ड री-प्रिंट कराने के लिए सिर्फ 50 रुपये देने होंगे। पेमेंट डिटेल को एंटर करें और पे नाउ पर क्लिक करें।
9- एक बार पेमेंट सक्सेसफुल हो जाने के बाद आपकी स्क्रीन पर एक एकनॉलेजमेंट दिखेगा। आप एकनॉलेजमेंट स्लिप को डाउनलोड भी कर सकते हैं। इसका मैसेज आपके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेज दिया जाएगा।

नई दिल्ली। 65 साल से भी अधिक लेखन का विराट अनुभव रखने वाले डॉ. नामवर सिंह को सुनने का अवसर तो हिंदी साहित्‍य के कई अलग-अलग प्रोग्राम में मिला था, अलग-अलग विषयों पर टेलीफोन पर उनके विचार भी अक्‍सर लिया करती थी, लेकिन उनका इंटरव्यू करनेे का अवसर जब अपने किसी सीनियर के सहयोग से मिला तो लगा ही नहीं कि हिंदी के आधार स्‍तंभ से मिल रही हूं। मैं उनसे बातचीत करने के लिए उनके घर पर गई थी। बहुत गर्मी न होने के बावजूद मैं पसीने से तर ब तर हो रही थी। मौसम से अधिक मुझे इस बात का भय लग रहा था कि कहीं अपना इंटरव्यू देने से पहले वे मुझसे ही हिंदी साहित्‍य के बारे में सवाल-जवाब न करने लगें। लेकिन जैसे ही उन्‍होंने दरवाजा खोलकर बड़ी आत्‍मीयता से मुझे अंदर बुलाया, तो मन में सहजता के भाव खुद ब खुद आने लगे।बैठते ही उन्‍होंने कहा कि इन दिनों हिंदी में इतने युवा और प्रतिभाशाली साहित्‍यकार हैं, तो मुझ बुड्ढे का इंटरव्‍यू क्‍यों करना चाहती हो। इसके जवाब में जब मैंने कहा कि आपकी बताई बातें मेरे लिए अमूल्‍य निधि होंगी। इस पर उन्‍होंने कहा कि तब तो हम दो-ढाई घंटे से अधिक बतियाएंगे। उम्र के कारण उनकी कमर भले ही थोड़ी झुक गई थी, मानो विशाल अनुभव की गठरी हो पीठ पर, लेकिन आंखों में चमक बरकरार थी।नामवर सिंह पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच की कड़ी थे। उस समय उनके घर के अतिथि कक्ष में न सिर्फ पुरानी पीढ़ी के लेखकों की कृतियां सजी हुई थीं, बल्कि युवा लेखकों की अनगिनत किताबें भी उन्‍होंने संभाल कर रखी हुई थीं। बुक सेल्‍फ पर युवाओं की पुस्‍तकें सजी देखकर मैंने जब पहले ही सवाल में उनसे पूछा कि लगता है युवाओं का लेखन आपको पसंद है, जबकि अन्‍य वरिष्‍ठ साहित्‍कार तो युवाओं के लेखन की केवल कमियां ही गिनाते हैं। इस पर उन्‍होंने तपाक से कहा था कि यह देखा गया है कि जो बीत चुका है वही अच्छा लगता है। वर्तमान अच्छा नहीं लगता है। आज के युवा आत्मचेतस हैं। वे अपनी खूबियों के साथ-साथ कमजोरियों को भी जानते हैं। इन दिनों युवा अलग-अलग विषयों पर समसामयिक लिख रहे हैं। हां वरिष्‍ठ साहित्‍यकारों को बिना मांगे सलाह नहीं देनी चाहिए। सीख ताको दीजिए जाको सीख सुहाय। सीख न दीजे बांदरे बया का घर भी जाए। युवा लेखक खुद समझदार हैं। वे अपना रास्ता खुद तय करते हैं।

ठाणे। महाराष्ट्र के ठाणे स्थित कोरम मॉल में एक तेंदुआ घुमते हुए देखा गया। इसके बाद मॉल में हड़कंप मच गया है। तेंदुए के दिखाई देने के बाद वन विभाग की एक टीम घटना स्थल पर पहुंच चुकी है।जानकारी के मुताबिक मॉल में लगे सीसीटीवी कैमरे में तेंदुए को घूमते देखने के बाद कर्मचारी ने सभी को इसकी जानकारी दी। स्थानीय पुलिस थाने के एक अधिकारी ने बताया, 'बुधवार तड़के करीब 5.30 बजे तेंदुए को यहां घूमते देखा गया। फिलहाल फायर विभाग, वन विभाग और पुलिस की टीम मौके पर है। तेंदुए की तलाश जारी है।'सीसीटीवी फूटेज में तेंदुआ साफ-साफ सीढ़ी चढ़कर मॉल में घुसते हुए दिखाई दे रहा है। तेंदुआ दिखने में काफी बड़ा है। वन विभाग के अधिकारी तेंदुए की तलाश में जुटे हुए है। फुटेज के आधार पर पुलिस इस नतीजे पर पहुंची है कि तेंदुआ मॉल से होकर नजदीक ही स्थित सत्कार होटल के पार्किंग में पहुंच गया है।वीडियो में तेंदुए को पार्किंग में घूमते दिखाई दे रहा है। वन विभाग की टीम वहां तेंदुए की तलाशी में जुटी है। वहीं इसकी जानकारी मिलने के बाद आसपास से बड़ी संख्या में लोग होटल और मॉल के बाहर तेंदुए को देखने की उत्सुकता में खड़े हैं।

नई दिल्ली। आम आदमी के सस्ते घर का सपना साकार करने के लिए सरकार आज एक बड़ा फैसला ले सकती है। आज होने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में निर्माणाधीन फ्लैट्स पर ब्याज दरों को घटाने पर फैसला हो सकता है। वहीं अफोर्डेबल हाउसिंग पर भी दरें घटाईं जा सकती है। अगर ऐसा होता है तो आम आदमी की जेब पर पड़ने वाला बोझ काफी कम हो जाएगा।बता दें कि पिछली बैठक में काउंसिल ने मंत्रियों के समूह को जीएसटी की दरों पर चर्चा करने के लिए कहा था। इसके बाद गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल की अध्यक्षता वाले इस समूह की बैठक में निर्माणाधीन रिहायशी संपत्तियों पर जीएसटी की दर 12 फीसद से घटाकर पांच फीसद करने की वकालत की है।समूह ने अफोर्डेबल हाउसिंग पर भी जीएसटी की दर आठ फीसद से घटाकर तीन फीसद करने को कहा है। हालांकि रियल एस्टेट में जीएसटी की दरें घटने की स्थिति में वर्तमान में मिल रही इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुविधा खत्म हो जाएगी।वर्तमान में निर्माणाधीन फ्लैट और रहने के लिए तैयार वैसे फ्लैट जिन्हें कंप्लीशन सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया है, पर 12 फीसद जीएसटी लगता है। इन पर इनपुट टैक्स क्रेडिट की सुविधा भी मिलती है। हालांकि कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिलने के बाद फ्लैट की बिक्री पर जीएसटी नहीं लगता है।जब से जीएसटी लागू हुआ है, तब से कई ऐसी शिकायतें आ रहीं थीं कि बिल्डर जीएसटी के इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ ग्राहकों को नहीं दे रहे हैं। जीएसटी लागू होने से पूर्व हाउसिंग सेक्टर पर टैक्स का भार 15 से 18 फीसद था।
इन चीजों पर भी हो सकता है फैसला:-रियल एस्टेट के अलावा काउंसिल लॉटरी पर एक समान जीएसटी लगाया जा सकता है। अभी राज्य प्रायोजित लॉटरी पर 12 फीसदी और राज्य की मंजूरी से चलने वाली लॉटरी पर 28 फीसदी जीएसटी है। महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुन्गंतीवार की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह ने लॉटरी पर जीएसटी 18 फीसदी से बढ़ाकर 28 फीसदी करने का सुझाव दिया है। इसके अलावा सीमेंट के दामों को लेकर भी फैसला संभव है।

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