नई दिल्ली। दुनिया के दो बड़े तेल उत्पादक देशों के बीच यदि किसी तरह से युद्ध हुआ तो तेल के दाम आसमान छुएंगे। अभी सऊदी अरब की अरामको कंपनी (अरबी अमरीकन ऑइल कंपनी) पर ड्रोन हमले के बाद बीते 28 सालों में पहली बार कच्चे तेल की कीमतों में इतना उछाल आया है। अब माना जा रहा है कि यदि सऊदी अरब ने ड्रोन हमले के लिए जिम्मेदार माने जाने देशों पर किसी तरह से कोई सैन्य हमला किया तो तेल की आपूर्ति के हालात और भी अधिक खराब होंगे।कुवैत पर इराक के हमले वाले वक्त के बाद से पहली बार कीमतें इस कदर बढ़ी हैं। दुनिया के सबसे बड़े तेल संयंत्र पर ड्रोन हमले की वजह से आपूर्ति पर असर पड़ा है। उसके बाद तेल की कीमतों में ये उछाल आया है। बीते तीन दशकों में तेल की कीमतों में अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मालूम हो कि बीते शनिवार (14 सितंबर) को दो ड्रोन्स से सऊदी अरब के अबकैक तेल संयंत्र और खुरैस तेल प्लांट पर हमला किया गया, इसमें हुती विद्रोहियों के शामिल होने की बात सामने आई। इस हमले से सऊदी अरब के कुल उत्पादन और दुनिया की 5 प्रतिशत तेल आपूर्ति पर असर पड़ा है।
भारत सबसे बड़ा तेल आयातक देश;-भारत सऊदी अरब से तेल खरीदने वाला सबसे बड़ा देश है। भारत के पास मात्र 17 फीसदी तेल है, बाकी 83 फीसदी तेल आयात करना पड़ता है। भारत में ज्यादातर कच्चा तेल और कुकिंग गैस रान और सऊदी अरब से आता है। अपने तेल का 10 फीसद से अधिक हिस्सा वो ईरान से आयात करता था। साल की शुरुआत में अमरीका ने परमाणु समझौते से अलग होने के बाद भारत पर दबाव बनाया कि वो ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। भारत अमरीका जैसे दूसरे देशों से भी तेल आयात करता है, लेकिन ये तेल अधिक दाम पर आयात किए जाते हैं। सऊदी अरब के प्लांट पर हमला होने के बाद अब भारत की चिंता बढ़ गई है। इसका एक बड़ा कारण ये है कि यदि वहां से तेल मिलने में समय लगा तो समस्या बढ़ जाएगी।
प्लांट की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल:-एक बड़ी चिंता अब इस बात को लेकर भी हो रही है कि क्या सऊदी अरब के प्लांट अब सुरक्षित नहीं रह गए हैं। यदि ये मान भी लिया जाए कि प्लांट सुरक्षित हैं तो क्या विद्रोहियों ने हमला करने के नए तरीके इजाद कर लिए हैं। यदि सुरक्षा में लगे जवान विद्रोहियों के इस हमले के बारे में नहीं जान पाए तो वो अगला हमला किसी नए तरीके से करेंगे जिसके बारे में विचार भी नहीं आ रहा होगा। इस वजह से अब ये माना जा रहा है कि सऊदी के संयंत्र अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रहे हैं। प्लांटों पर हमला होने की वजह से भारत जैसे दूसरे बड़े तेल आयातक देश चिंतित हैं। भारत की अर्थव्यवस्था और यहां के लोग कीमतों को लेकर बहुत संवेदनशील रहते हैं इसलिए आज कीमत को लेकर चिंता ज्यादा है।
भारत पर पड़ेगा नकारात्मक असर:-दरअसल भारत में तेल की दो तिहाई मांग इस क्षेत्र से पूरी होती है। यदि सऊदी अरब, ईरान और कुवैत के बीच किसी तरह से तनाव बढ़ेगा तो उसका असर भारत पर पड़ना तय है। यदि आप तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और बड़े पैमाने पर आयातित तेल पर निर्भर हैं तो बड़े पैमाने पर असर पड़ना तय है। कोई दूसरा देश आयात पर निर्भरता के मामले में भारत जैसी कमजोर स्थिति में नहीं है और ये सारी उथल-पुथल निश्चित तौर पर भारत पर असर डालेगी।
प्लांट ठीक होने में लगा समय तो तेल की कीमतों पर और पड़ेगा असर:-सऊदी अरब की अरामको कंपनी में हमले के बाद हुए नुकसान को ठीक करने के लिए काम शुरु कर दिया गया है। कंपनी की ओर से इस बारे में जानकारी दी गई है कि अगले कुछ दिनों में वो प्लांट को फिर से शुरु कर पाएंगे। लेकिन यदि यहां उत्पादन शुरु होने में और ज्यादा समय लगता है तो इससे तेल की कीमतों पर और असर पड़ेगा। हो सकता है कि इससे भारत में आयात की कीमत और बढ़ जाए। इन दिनों देश की अर्थव्यवस्था बुरे दौर से गुजर रही है, जीडीपी में गिरावट बताई जा रही है।अगर तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत की मुश्किलें भी बढ़ेंगी। यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ेंगी। ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी तो इससे मैन्युफैक्चरिंग और एविएशन समेत कई उद्योगों पर असर पड़ेगा, इससे महंगाई और बढ़ जाएगी। यदि कच्चे तेल का डॉलर प्राइज बढ़ेगा तो भारत को उतने ही तेल के लिए और डॉलर खरीदने होंगे इससे डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरेगी।
सऊदी के शांत बैठने से दूसरे देशों में बढ़ी है चिंता;-सऊदी अरब ने अब तक अपने यहां प्लांट पर हुए हमले का किसी तरह से जवाब नहीं दिया है, इसलिए अन्य देश चिंतित है। तेल आयात देशों का कहना है कि वो नहीं जानते कि सऊदियों के दिमाग में प्लांट पर हुए हमले का बदला लेने के लिए क्या चल रहा है? वो सैन्य तरीके से जवाब देंगे या बातचीत करके कुछ हल निकालेंगे। यदि सऊदी ने ईरान पर हमला किया तो इससे क्षेत्र में तनाव बढ़ेगा, जिससे इराक और ईरान समेत खाड़ी के पूरे क्षेत्र से तेल आपूर्ति बाधित होगी।
जमीन के अंदर तेल भंडार;-भारत अपनी जरूरत का तीन चौथाई से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में किसी भी कारण के चलते विदेश से आ रहे तेल की आपूर्ति में जरा भी कमी उसके लिए भारी मुश्किल का सबब हो सकती है। यही वजह है कि इस तरह के सामरिक भंडार बनाने की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी। इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (आइएसपीआरएल) अब तक तीन जगहों विशाखापत्तनम में 13.3 लाख टन, मंगलोर (कर्नाटक) में 15 लाख टन और पदुर (कर्नाटक) में 25 लाख टन क्षमता वाले भंडार विकसित कर चुकी है।
ऐसे हुई शुरुआत:-1973-74 में आए तेल संकट के बाद से अमेरिका ने 1975 में भूमिगत तेल भंडार बनाने की शुरुआत की थी। लुइसियाना और टेक्सास राज्य में भूमिगत रूप से बनाए गए तेल भंडार दुनिया की सबसे बड़ी आपातकालीन आपूर्ति है। मौजूदा समय में यहां करीब 8.7 करोड़ टन तेल स्टोर है। 1991 में पहले खाड़ी युद्ध के दौरान यहां से तेल का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद 2005 में कैटरीना तूफान और 2011 में लीबिया के साथ संबंध खराब होने के बाद एसपीआर का इस्तेमाल किया गया था।
सबसे बड़े भूमिगत तेल भंडार वाले देश;-अमेरिका के बाद दुनिया में कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा भूमिगत भंडार चीन के पास है। इस मामले में जापान तीसरे स्थान पर काबिज है।

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