वाशिंगटन। क्‍या आपका महत्‍वपूर्ण डाटा आपके इलेक्‍ट्रानिक्‍स डिवाइस पर सुरक्षित है। यदि आपका जवाब हां में है तो आपको एक बार फिर इस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। असल में आज तकनीक के दौर में डिजिटल प्राइवेसी की गारंटी नहीं है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि वर्तमान में एडवरटाइजमेंट टेक इंडस्ट्री हमारी डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखने के रास्ते खोजने में पूरी तरह से सक्षम है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि यह सब होता कैसे है। इसका जवाब हमारे पास है। एक्‍सपर्ट इस काम को फिंगरप्रिंटिंग के जरिए करते हैं। जानकार इसको नेक्‍सट जनरेशन की टेक्‍नॉलिजी करार देते हैं। इस तकनीक के जरिए आपके फिंगरप्रिंट से आपके मोबाइल डिवाइस या कंप्यूटर के स्क्रीन रिजोल्यूशन, आपरेटिंग सिस्टम और मॉडल की जानकारी जुटाते हैं। डिवाइस की जानकारी होने के बाद आपके डाटा का एक प्रोफाइल तैयार किया जाता है। हैरानी की बात ये है कि यह तकनीक ठीक उसी तरह से काम करती है जैसे फिंगरप्रिंट के जरिए किसी भी इंसान की पहचान की जाती है। इसका इस्‍तेमाल एडवरटाइजर द्वारा कंज्यूमर को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।आपको बता दें कि सुरक्षा से जुड़े शोधकर्ताओं ने फिंगरप्रिंटिंग से ट्रैकिंग के तरीके का पता करीब सात वर्ष पहले लगाया था। इसके बाद भी इसको लेकर चर्चा न के ही बराबर होती आई है। हालांकि वर्तमान की बात करें तेा करीब साढ़े तीन फीसद सबसे पॉपुलर वेबसाइट ट्रैकिंग के लिए इसका उपयोग करती हैं। वहीं मोजिला के मुताबिक वर्ष 2016 में यह आंकड़ा लगभग डेढ़ फीसद से कुछ अधिक था। अब तो मोबाइल एप में इसका इस्‍तेमाल काफी बढ़ गया है।इस तकनीक के काम करने का तरीका बेहद खास है। जब हम वेब ब्राउज करते हैं तब ब्राउजर वेबसाइट्स को आपके हार्डवेयर के बारे में जानकारी देता है। जब आप कोई मोबाइल एप इंस्टाल करते हैं तो ऑपरेटिंग सिस्टम एप के साथ हार्डवेयर की जानकारी शेयर करता है। ऐसा इसलिए भी होता है जिससे एप इंस्‍टॉल करने से पहले यह पता लग सके कि आपके डिवाइस में इसके लिए जरूरी जगह उपलब्‍ध है भी या नहीं। दूसरी वजह ये भी है कि इसके जरिए एप को मालूम होता है कि आप किस तरह के फोन का उपयोग करते हैं। यह इसलिए भी जरूरी होता है जिससे प्रोसेसर की गति और स्क्रीन के आकार के इसके मुताबिक कर सके।आपको यहां पर ये भी बता दें कि बीते कुछ वर्षों में कुछ वेब ब्राउजर ने अपनी प्राइवेसी को और अधिक सिक्‍योर करने के लिए कदम उठाए हैं। इनमें एपल और मोजिला शामिल हैं। इसके अलावा सफारी और फायरफॉक्स ब्राउजर में भी ट्रेकिंग को ब्‍लॉक करने की व्यवस्था दी गई है। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यही है कि इससे एडवरटाइजर वेब ब्राउजर पर पर हमारा पीछा नहीं करना आसान नहीं होता है और विज्ञापन देना भी कठिन हो जाता है। यहां पर ये भी जान लेना बेहद जरूरी है कि सोशल मीडिया बटन में मौजूद कुकीज और पिक्सल्स जैसे ट्रैकिंग के परंपरागत तरीके अब बेअसर हो गए हैं। टेक्नोलॉजी ब्लॉक होने के कारण एडवरटाइजरों ने लोगों को ट्रैक करने के लिए अलग तरीका अपनाया है।हालांकि एप्स और वेबसाइट के डेटा लेने पर कुछ पाबंदियां हैं। आईफोन और एंड्रॉयड फोन पर लोकेशन डेटा, कैमरा, माइक्रोफोन तक पहुंचने के लिए एप की अनुमति अनुमति लेनी पड़ती है। कई ब्राउजर्स को भी अपने कुछ प्रोग्राम्‍स के लिए पहले इजाजत लेनी होती है। पिछले वर्ष फ्रांस में शोधकर्ताओं ने एक स्टडी में पाया कि उनके द्वारा एकत्र एक तिहाई फिंगरप्रिंट एकदम अलग और अनूठे हैं। इसलिए आसानी से पहचाने जा सकते हैं। प्राइवेसी समर्थकों का कहना है, फिंगरप्रिंटिंग का दुरुपयोग होता है क्योंकि कुकीज को पहचानकर लोग उसे डिलीट कर सकते हैं। लेकिन, फिंगरप्रिंटिंग का तो पता ही नहीं लगता है।
बचाव के ये हैं उपाय
-आईफोन और मैकयूजर के लिए एपल ने पिछले वर्ष अपने सफारी ब्राउजर में फिंगरप्रिंटिंग बचाव मैकेनिज्म शुरू किया है। ये दोनों वेबसाइट को न्यूनतम जानकारी देते हैं। इसी तरह से मोजिला ने भी अपने फायरफॉक्स ब्राउजर में ब्लॉक मैकेनिज्म शुरू किया है।
-गूगल ने क्रोम ब्राउजर के लिए फिगरप्रिंट बचाव पेश करने की घोषणा की है।
-फ्री एप्‍स में ट्रैकिंग की संभावना ज्‍यादा होती है, लिहाजा बेहतर होगा कि इन्‍हें डिलीट कर दिया जाए।

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