Editor

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फरवरी का महीना था ।बात शिवरात्रि की है ,उस दिन सुबह से ही बारिश हो रही थी ।तभी गली में मुझे बीन की आवाज सुनाई दी।किसी ने दरवाजा खटखटाया और आवाज लगाई ,ओम नमः शिवाय ।
शिव जी का नाम कानों में सुनाई दिया तो खिड़की खोल कर देखा गली में।
दो सपेरे हाथ मे बीन और सांप की पिटारी लिए हुए बीन बजा रहे थे और उन के साथ ही कुछ बच्चे सभी का दरवाजा खटखटा रहे थे। तभी किसी बच्चे ने आवाज लगाई ,ओ माई नीचे आ कर कुछ दान करो।आज शिव रात्री का दिन है।
ओह माँ इतनी तो ठंड है आज इन को ठंड में भी चैन नही ।मन ही मन मे बुद बुदाते हुए मैने कहा ,
आती हूँ रुको तो जरा और कदम बढ़ाते हुए मै नीचे की ओर चल दी।
दरवाजा खोला तो देखा ,वो बच्चा नंगे पैर था।मुझे देखते ही दया आ गयी।
क्या चाहिए,मैने पूछा तो बच्चे ने उत्तर दिया।कुछ भी दे दो माई।
इतनी ठंड में तुम लोगो को ठण्डी नही लगती क्या??
लगती तो हैं, पर पेट की आग ज्यादा गर्म होती है और ठंड कम।
इतना कह कर वो व्याकुल सी आँखो से मुझे देखने लगा।
मेरे अंदर का ममता भाव जाग्रत हो चुका था।अपने बच्चे के पुराने जूते उसे दिए।
देखो तो जरा पहन कर,उस ने खुशी खुशी पहन लिए।
फिर अंदर से कुछ गर्म कपड़े और चप्पल भी बच्चों को दी।
सभी बच्चों के चेहरे पर खुशी थी।तभी एक छोटा सा बच्चा बोला कुछ मीठाई खाने को दो ना,बहुत दिन से कुछ मीठा नही खाया।
शायद वो बच्चे भी समझ गए थे कि उन को निराश नहीं होना पड़ेगा।
फरवरी का महीना था।शादियों का सीजन चल रहा था, तो घर मे मिठाइयां भी रखी थी।
मैने एक मिठाई का डिब्बा जिसमे मठरी और लड्डू थे ।उन को दिए और बोला लड्डू खा लो अभी।
डिब्बा लेते ही वो सब खुशी खुशी चले गए।
बच्चों के चेहरे पर लड्डू खा कर जो मुस्कान आयी।
उस से बड़ा सुकून शायद ही कुछ हो।
गरीब को भीख में रुपए बेशक ना दे,पर इतना जरूर करें कि जो कपड़े या जूते,आप के किसी काम के नही ।शायद किसी दूसरे की जरूरत पूरी कर सकते है।।
गरीब को दुत्कारें नही।गरीबी कोई बीमारी नही उस की लाचारी है।

 

 

संध्या चतुर्वेदी
मथुरा उप

*महिला क्रिकेट में नए कीर्तिमान गढ़ती मिताली राज

 

- योगेश कुमार गोयल

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) द्वारा जारी महिला वनडे बल्लेबाजी रैंकिंग में भारतीय कप्तान मिताली दोराई राज एक स्थान के नुकसान के साथ पांचवें स्थान पर पहुंच गई हैं। इस रैंकिंग में उनसे ऊपर न्यूजीलैंड की एमी सैटरवेट, ऑस्ट्रेलिया की मेग लैनिंग्स तथा एलिस पैरी और भारत की स्मृति मंधाना हैं। इसके बावजूद मिताली महिला क्रिकेट में नित नए कीर्तिमान रच रही हैं। 25 जून 1999 को इंग्लैंड के खिलाफ वनडे क्रिकेट में पदार्पण करने वाली मिताली ऐसा ही एक और कीर्तिमान स्थापित करते हुए गत एक फरवरी को 200 वनडे अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच खेलने वाली पहली महिला क्रिकेटर बन गई हैं। पिछले दिनों महिला टीम के तत्कालीन कोच रमेश पोवार के साथ चले विवादों के चलते सुर्खियों में रही मिताली ने न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए एक मैच में 50 ओवरों के प्रारूप में अंतर्राष्ट्रीय मैचों का दोहरा शतक जमाने वाली पहली महिला बनने का कीर्तिमान भी स्थापित किया।
महिला क्रिकेट में पैदा हुए गंभीर विवादों पर भी विराम लगाते हुए महिला टीम एक बार फिर जिस प्रकार बुलंदियों को छूने लगी है, वह भारतीय महिला क्रिकेट के लिए शुभ संकेत है। दरअसल जिस प्रकार एकाएक महिला क्रिकेट का विवाद गहरा गया था और टीम दो गुटों में बंटी नजर आने लगी थी, उससे महिला क्रिकेट के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग गया था किन्तु न्यूजीलैंड के खिलाफ खेले गए मैचों में सभी खिलाडि़यों ने जिस एकजुटता और सामंजस्य का परिचय देते हुए यह सीरिज अपने नाम की, उसके लिए मिताली, हरमनप्रीत और स्मृति मंधाना सहित टीम की तमाम खिलाड़ी बधाई की पात्र हैं। मिताली ने महिला टीम को नया कोच मिल जाने पर कहा भी था कि वह पिछले दिनों उपजे तमाम विवादों को पीछे छोड़कर फिर नई शुरूआत करने जा रही हैं। मिताली का कहना है कि जब उन्होंने अपना कैरियर शुरू किया था तो कभी सोचा तक नहीं था कि वो इतनी दूर तक पहुंच पाएंगी।
हालांकि भारतीय टीम के न्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरे और आखिरी वनडे में पूरी टीम 149 रन पर ही ढ़ेर हो गई और अपने इस 200वें वनडे मैच में मिताली भी 28 गेंदों में सिर्फ 9 रन ही बना सकी लेकिन यह मैच खेलकर उन्होंने सर्वाधिक वनडे मैच खेलने का रिकॉर्ड बना डाला। वैसे मिताली ने न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे वनडे में नाबाद 63 रनों की शानदार पारी खेली थी। मिताली का 200 वनडे खेलने का रिकॉर्ड कितना अहम है, इसका अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि भारतीय टीम अब तक कुल 263 वनडे मैच खेली थी, जिनमें से 200 में मिताली टीम का हिस्सा रही हैं और इनमें से 123 मैचों में वनडे में सबसे ज्यादा बार टीम की कप्तानी करने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम है। मिताली के बाद सर्वाधिक वनडे खेलने वाली खिलाडि़यों में 191 मैचों के साथ इंग्लैंड की चार्लोट एडवर्ड्स दूसरे, 174 मैचों के साथ भारत की झूलन गोस्वामी तीसरे, 144 मैचों के साथ आस्ट्रेलिया की ए. ब्लैकवेल चौथे तथा 143 मैचों के साथ इंग्लैंड की जैनी गन पांचवें स्थान पर हैं। मिताली 10 टेस्ट तथा 85 टी-20 मैच भी खेल चुकी हैं। अपने 19 वर्ष 219 दिन के वनडे कैरियर में 36 वर्षीया मिताली ने 7 शतक और 52 अर्द्धशतकों के साथ 51.33 की औसत से सर्वाधिक 6622 रन बनाए हैं। 100 से ज्यादा मैच खेलने वालों में मिताली का औसत सर्वाधिक है जबकि 150 से ज्यादा मैच खेलने वालों में वह दूसरे पायदान पर हैं।
महिला क्रिकेटरों में जहां मिताली के नाम सबसे ज्यादा दिनों तक खेलने का रिकॉर्ड है, वहीं पुरूष क्रिकेटरों की तुलना में वह सचिन तेंदुलकर, सनत जयसूर्या और जावेद मियांदाद के बाद सबसे लंबे समय तक खेलने वाली चौथी खिलाड़ी है। उनकी कुछ उपलब्धियां तो ऐसी हैं कि कुछ रिकॉर्डों के मामले में उन्होंने विराट कोहली सहित दूसरे पुरूष खिलाडि़यों को भी पीछे छोड़ दिया है। वह अंतर्राष्ट्रीय टी-20 मैचों में रन बनाने के मामले में रोहित शर्मा और विराट कोहली को भी पीछे छोड़ चुकी हैं। गत वर्ष जून माह में मिताली ने कुआलालंपुर में टीम इंडिया और श्रीलंका के बीच खेले गए टी-20 महिला एशिया कप में 2000 रन बनाकर भी एक नया इतिहास रचा था क्योंकि उस कीर्तिमान के साथ ही वह इतने रन बनाने वाली पहली भारतीय बल्लेबाज बन गईं थी। यह रिकॉर्ड भारत के लिए ऐतिहासिक इसलिए भी था क्योंकि उस समय तक विराट हों या रोहित शर्मा अथवा सुरेश रैना या धोनी, कोई भी पुरुष क्रिकेटर इस रिकॉर्ड की बराबरी नहीं कर सका था। मिताली अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने वाली और एकदिवसीय मैचों में 6000 रनों से अधिक रन बनाने वाली विश्व की पहली महिला क्रिकेटर भी हैं। इसके अलावा वनडे मैचों में सर्वाधिक हॉफ सेंचुरी और लगातार कई अर्द्धशतक ठोकने का रिकॉर्ड भी मिताली के ही नाम है। वह टेस्ट क्रिकेट में दोहरा शतक बनाने वाली पहली महिला खिलाड़ी भी हैं। आईसीसी वर्ल्ड रैंकिंग में वह 2010, 2011 तथा 2012 में प्रथम स्थान पर रही हैं। मिताली के शानदार खेल प्रदर्शन के कारण ही उन्हें भारत की ‘लेडी सचिन’ भी कहा जाता है।
मूल रूप से तमिल परिवार से संबंध रखने वाली हैदराबाद की मिताली का जन्म 3 दिसम्बर 1982 को राजस्थान के जोधपुर में हुआ था और 10 साल की उम्र में ही उन्होंने क्रिकेट को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया तथा 17 साल की उम्र में वह भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बन गई थी। 26 जून 1999 को आयरलैंड के साथ हुए मैच से वनडे में मिताली के कैरियर का शानदार आगाज हुआ था, जब उन्होंने 114 रनों की नाबाद पारी खेली थी और तब से लेकर अभी तक उन्होंने कई कीर्तिमान भारत की झोली में डाले हैं। 14 जनवरी 2002 को इंग्लैंड के साथ खेले गए मैच से मिताली के टेस्ट कैरियर की शुरूआत हुई थी, जिसमें वह बिना खाता खोले पैवेलियन लौट गई थीं। 2005 में दक्षिण अफ्रीका में हुए विश्व कप में मिताली की कप्तानी में भारतीय टीम फाइनल तक पहुंची थी लेकिन ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ टीम को हार का सामना करना पड़ा था लेकिन अगले ही साल 2006 में मिताली की ही कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड को उसी की जमीन पर धूल चटाते हुए एशिया कप अपने नाम किया था। कुल 85 टी-20 मैचों में उन्होंने 37.42 की औसत से 2283 रन बनाए हैं, टी-20 में उनका बेहतरीन स्कोर 97 है और इस दौरान उन्होंने 17 अर्धशतक बनाए।
सितम्बर माह में ही मिताली की कप्तानी में भारतीय महिला क्रिकेट टीम ने वनडे मैच में सीरीज 2-1 से अपने नाम कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की थी, जिसमें मिताली ने श्रीलंका के खिलाफ 125 रनों की नाबाद पारी खेलते हुए अपने वनडे कैरियर का सबसे बड़ा स्कोर बनाने में सफलता हासिल की। उन्होंने 143 गेंदों पर न केवल 125 रनों की बड़ी पारी खेली बल्कि 14 चौके और एक छक्का भी लगाया था। गत वर्ष विश्व कप में खेले तीन मैचों में 103 रनों के स्ट्राइक रेट तथा 53.5 की औसत से मिताली ने दो अर्धशतक के साथ 127 रन बनाने का भी रिकॉर्ड बनाया था।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

*114, गली नं. 6, वेस्ट गोपाल नगर, एम. डी. मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-110043.
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*रेट्रो गानों को रीमिक्स के चलन पर टोटल धमाल के निर्माता
मुंबई (HH)- बॉलीवुड फिल्में लगातार क्लासिक्स और हिट चार्टबस्टर्स से गुलजार रही है. इसी ट्रेंड को आगे बढ़ाते हुए, निर्माताओं ने कल्ट बॉलीवुड नंबर मुंगडा के नए संस्करण को आगामी कॉमेडी टोटल धमाल में रिलीज़ किया है. आनंद पंडित, जो टोटल धमाल ’के निर्माताओं में से एक हैं और सिनेमा के व्यवसाय की सूक्ष्म समझ के साथ बॉलीवुड के दिग्गज भी हैं, कहते है कि रीमिक्स नंबर का जबरदस्त असर होता है.
आनंद पंडित कहते हैं, “रेट्रो गीत हमेशा श्रोताओं के बीच याद रखे जाते है. एक रीमिक्स नंबर के पीछे का विचार पहले के लोकप्रिय गीत को याद करना और उसमें एक नया एलीमेंट जोड़ना है ताकि यह नए जमाने के लोगों को भी अपील करे. मुझे लगता है कि 'मुंगडा' पूरी तरह से इसी विचार को सार्थक करता है.”
मुंगडा गीत, जिसमें सोनाक्षी सिन्हा और अजय देवगन हैं, एक शानदार डांस नंबर है, जिसे ज्योतिका तांगरी, शान और सुभ्रो गांगुली ने गाया है और कुंवर जुनेजा के अतिरिक्त गीत के साथ गौरव-रोशिन द्वारा री-अरेंज किया गया है.
'टोटल धमाल' में अजय देवगन, माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर, अरशद वारसी, रितेश देशमुख, जावेद जाफरी, जॉनी लीवर और संजय मिश्रा हैं.
आनंद पंडित एक सफल निर्माता और वितरक हैं. प्यार का पंचनामा 2, सत्यमेव जयते, बत्ती गुल मीटर चालू और हाल ही में सैफ अली खान अभिनीत बाजार जैसी फिल्मों को अपने बैनर आनंद पंडित मोशन पिक्चर्स के तहत वितरित करने के बाद, फिल्म निर्माता ने सरकार 3 और मिसिंग जैसी फिल्मों का निर्माण किया है.
फॉक्स स्टार स्टूडियोज द्वारा अजय देवगन फिल्म्स, मारुति इंटरनेशनल और आनंद पंडित मोशन पिक्चर्स के सहयोग से निर्मित और इंद्र कुमार द्वारा निर्देशित और सह-निर्मित, टोटल धमाल 22 फरवरी, 2019 को रिलीज़ होगी.

 

इस लोकप्रिय एडुटेनमेंट शो की शुरुवात एक विशेष सन्देश के साथ हुई

नई दिल्ली (HH)- पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया का लोकप्रिय एडूटैनमेंट शो 'मैं कुछ भी कर सकती हूँ', तीसरे सीजन के साथ राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन पर लौट आया है। देश में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की अपनी भूमिका के लिए सराहे गए शो ने अपने नए सीजन में नए विचारों को पेश किया है। उनमें से एक 'लाडली दिन’ की संकल्पना है, जो लोगों को प्रतिगामी मानदंडोंपर सवाल उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन पर रोक लगाने की कोशिश करता है जबकि अधिकांश लोकप्रिय कार्यक्रम आज भी इन मानदण्डों को बढ़ावा देते है.
पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुटरेजा कहती हैं, “हम लंबे समय से भारत में लड़कियों की खराब स्थिति के बारे में जानते हैं. २०१७-१८ के आर्थिक सर्वेक्षण में सामने आये आकड़े भी यही दर्शाते है. इस आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक लड़कों के लिए बढ़ती हुई चाहत के कारण भारत में आज २१ मिलियन अवांछित लड़कियाँ हैं. हम इस पितृसत्तात्मक मानसिकता को सकारात्मक संदेशों के माध्यम से बदलना चाहते हैं. हम 'लाड़ली दिन' के ज़रिये लड़की के जन्म को एक उत्सव की तरह मानाने की भावना लोगों में जगाना चाहते हैं.”
'मैं देश का चेहरा बदल दूँगी' इस नए स्लोगन के साथ शो की नायिका डॉ. स्नेहा माथुर नयी समस्याओं का मुकाबला करते हुए नज़र आएंगी. इन मुद्दों में स्वछता और स्वास्थय- रक्षा जैसे मुद्दे भी शामिल हैं. कई बार दोबारा प्रसारित किया जाने वाला यह कार्यक्रम राष्ट्रीय प्रसारक दूरदर्शन के प्रमुख कार्यक्रमों में से एक है. यह कार्यक्रम १३ भिन्न भाषाओँ में डब किया गया है व देश भर में आल इंडिया रेडियो के २१६ स्टेशन पर प्रसारित किया जाता है.
मैं कुछ भी कर सकती हूँ की प्रमुख अभिनेत्री मीनल वैष्णव जो डॉ. स्नेहा माथुर का किरदार निभाती है कहती हैं , "एक विचार तथा अभियान के रूप में, लाड़ली दिन बदलाव लाने की क्षमता रखता है. देश के विभिन्न हिस्सों को भेंट देने के बाद मुझे यह एहसास हुआ की आज भी एक बच्ची के जन्म को उत्सव के रूप में नहीं देखा जाता. इस भावना को हमे बदलना होगा. और लाड़ली दिन उसी बदलाव की दिशा में उठाया गया एक कदम हैं".
'मैं कुछ भी कर सकती हूं' एक युवा डॉक्टर, डॉ. स्नेहा माथुर की प्रेरक यात्रा है, जो मुंबई में अपने आकर्षक करियर को छोड़ देती है और अपने गांव में काम करने का फैसला करती है. यह शो सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा की बेहतरीन गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए डॉ. स्नेहा के प्रयास पर केंद्रित है. उनके नेतृत्व में, गाँव की महिलाएँ सामूहिक एक्शन के ज़रिए अपनी आवाज़ उठा रही हैं. दूसरे सीज़न में महिलाओं के साथ युवाओं पर विशेष ध्यान दिया गया था. नए स्लोगन,मैं देश का चेहरा बदल दूंगी, के साथ, शो की नायक डॉ. स्नेहा माथुर स्वच्छता तक पहुंच सहित नए मुद्दों को सामने लाने की योजना बना रही है. यह शो प्रसिद्ध फिल्म और थिएटर निर्देशक फिरोज अब्बास खान द्वारा बनाया गया है.
इस बार, पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन द्वारा समर्थित है. इनके द्वारा ही इस लोकप्रिय एडूट्नमेंट शो के बहुप्रतीक्षित तीसरे सीजन का प्रोड्क्शन किया जा रहा है.


--बाल मुकुन्द ओझा, वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार


देश में इंटरनेट के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल में बचपन खोता जारहा है जिसकी परवाह न सरकार को है और न ही समाज इससे चिंतित है। ऐसा लगता है जैसे गैर जरुरी मुद्दे हम पर हावी होते जारहे है और वास्तविक समस्याओं से हम अपना मुंह मोड़ रहे है। यदि यह यूँ ही चलता रहा तो हम बचपन को बर्बादी की कगार पर पहुंचा देंगे। देश के साथ यह एक बड़ी नाइंसाफी होगी जिसकी कल्पना भी हमें नहीं है। जब से इंटरनेट हमारे जीवन में आया है तबसे बच्चे से बुजुर्ग तक आभासी दुनियां में खो गए है। हम यहाँ बचपन की बात करना चाहते है। देखा जाता है पांच साल का बच्चा भी आँख खोलते ही मोबाइल पर लपकता है। पहले बड़े इसे अपने काम के लिए करते थे। अब बच्चे भी इंटरनेट के शौकीन होते जा रहे हैं। बाजार ने उनके लिए भी इंटरनेट पर इतना कुछ दे दिया है कि वह पढ़ने के अलावा बहुत कुछ इंटरनेट पर करते रहे हैं। आजकल के बच्चे इंटरनेट लवर हो गए हैं। इनका बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह डेटा के जंगल में गुम हो रहा है। पिछले कई सालों में सूचना तकनीक ने जिस तरह से तरक्की की है, इसने मानव जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है बल्कि एक तरह से इसने जीवनशैली को ही बदल डाला है। बच्चे और युवा एक पल भी स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गंवारा नहीं समझते। इनमें हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर कहा गया है।
पिछले कुछ अरसे से रिलायंस जियो जैसी मोबाइल कंपनियों ने डेटा के क्षेत्र में जिस तरह की जंग छेड़ी है, उसने इस समस्या को और विकराल कर दिया है। लगभग सभी कंपनियां बेहद कम पैसों में असीमित डेटा ऑफर कर रही हैं, जिसका खासकर बच्चे व युवा खुलकर लुत्फ उठा रहे हैं। चिंता की बात यह है कि इसका इस्तेमाल वे अपने लिए रचनात्मक कार्यों में न के बराबर कर रहे हैं। सारा दिन फेसबुक, ट्विटर, स्काइप और सबसे गंभीर मुद्दा पॉर्नोग्राफिक साइटों को ब्राउज करने में लगे रहते हैं। खेलकूद अब कागजों तक सीमित हो कर रह गया है। मेट्रो सिटी में खेल के मैदान वैसे भी देखने को नहीं मिल रहे है। रही सही कसर इंटरनेट ने पूरी करदी है। खेलने कूदने के दिनों में बच्चों के हाथ में मोबाइल लग गया है जिसके प्रभाव से अन्य गतिविधियों पर विराम सा लग गया है। अभिभावक बच्चों से पीछा छुड़ाने के लिए उनके हाथ में मोबाइल थमा देते है जिसके कारण बच्चे चिड़चिड़े हो गए है और वे किसी की बात सुनना पसंद नहीं करते। घर के रोजमर्रा के काम से भी जी चुराने लगते है। मांगलिक और सामाजिक कार्यों में जाना उन्हें पसंद नहीं है। घरवालों के दवाब से जाते भी है तो मोबाइल से चिपके रहते है। यहाँ तक की वहां भी एकाकी रहना चाहते है। सच में इंटरनेट ने बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास अवरुद्ध कर दिया है।
एक सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है की कच्ची उम्र के बच्चे सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते। वे पॉर्नोग्राफी के कुचक्र में आसानी से फंस जाते हैं। पढ़ने-लिखने व अन्य रचनात्मक कार्यो में अपना समय देने के बदले वे अश्लीलता के दलदल में फंस रहे हैं और अपना कीमती वक्त मोबाइल पर खर्च कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है बहुत से बच्चे अपना अधिकांश समय ऑनलाइन गेम खेलने और इंटरनेट ब्राउज करने में बिताते है। सड़क पर चलते समय भी मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त रहते है। ऐसे बच्चे कई बार अनचाही दुर्घटना की शिकार भी हो जाते है।
हाल ही फ्रांस की संसद ने कानून बनाकर देश के प्राथमिक और जूनियर हायर सेकंडरी स्कूलों में बच्चों द्वारा मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। यह कानून सितंबर 2018 से लागू हो गया है। बचपन बचाने के फ्रांस जैसे विकसित देश के इस कदम की भारत में भी अनुकूल प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। हमारे बच्चे भी इंटरनेट के गुलाम बनते जा रहे है। खराब साइटों के कारण बच्चों के बिगड़ने का डर लगातार बढ़ता जा रहा है। कानून बनने से इस डिजिटल लत से छुटकारा मिलेगा। महानगरों में यह मोबाइल की यह बीमारी इस कदर बढ़ चुकी है कि कई युवाओं को तो स्वास्थ्य सुधार केंद्र में भर्ती कराना पड़ रहा है। समय रहते यदि इस पर काबू नहीं पाया गया, तो समाज में एक नई विकृति पैदा हो सकती है। इंटरनेट एडिक्शन डिस्ऑर्डर के लक्षण हर शहर के बच्चो और युवाओं में उभरने लगी हैं। बचपन को बचाने का एकमात्र उपाय यही है की उनके हाथों में मोबाइल न देवे। इसके लिए यदि सख्ती भी करनी पड़े तो करें।

डी . 32 माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218


.प्रमोद दीक्षित ‘मलय’


सुनहरी और खट्टी-मिट्ठी स्मृतियों को सहेजे रेडियो अपनी जीवन-यात्रा का शतक पूरा करने को है। पूरी दुनिया में रेडियो ने श्रोता वर्ग से जो सम्मान और प्यार हासिल किया वह अन्य किसी माध्यम को न मिला और न कभी मिल सकेगा। विविध इंद्रधनुषी कार्यक्रमों के द्वारा रेडियो ने न केवल मनोरंजन, जागरूकता और शिक्षा संस्कार के वितान को समुज्ज्वल किया बल्कि राष्ट्रीय एकता-अखण्डता के ध्वज को भी थामे रखा। सुदूर दक्षिण के तमिल, कन्नड, मलयालम भाषी जन हों या उत्तर का कश्मीरी-डोंगरी, हिमाचली समुदाय। हरियाणवी, राजस्थानी भाषा के चित्ताकर्षक रंग हो या ब्रज, बुंदेली, बघेली और अवधी बोलियों की मधुमय मृदुल रसधार। पूर्वोत्तर की मिजो, नागा, त्रिपुरा, असम की क्षेत्रीय भाषायी समुद्धि हो या मराठी, गुजराती, पंजाबी की मधुर वाणी। सभी को रेडियो ने स्वर दिए और विस्तार एवं संरक्षण का रेशमी फलक भी। हिन्दी के राष्ट्रीय प्रसारणों को सम्पूर्ण देश ने सुना और गुना तथा सृजन के सुवासित सुमन पोषित किए। रेडियो ने जन-जन का बाहें फैलाकर स्वागत किया। भारत में तो रेडियो परिवार के सदस्य की तरह रहा और है। आज की पीढ़ी के पास भले ही इलेक्ट्रनिक गैजैट के रूप में मनोरंजन, ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा के तमाम संसाधन एवं विकल्प मौजूद हों पर वह संतुष्ट नहीं है। लेकिन पूर्व पीढ़ी के पास केवल रेडियो था और आत्मीय संतुष्टि भी। रेडियो ने भी कभी निराश नहीं किया।
खेत की मेड़ पर विराजे रेडियो अपने कृषि कार्यक्रमों से खेत जोतते और फसल काटते किसान को निरन्तर खेती के नवीन तौर-तरीके सिखाते रहे। पनघट पर गगरियों में जल भरतीं युवतियां और कुएं की जगत पर मधुर गीत बिखेरता रेडियो अपना सा ही जान पड़ता। विरह की अग्नि में जलती कामिनी को रेडियो के गीत मिलन की आस बंधाते। नीम तले चबूतरे पर बैठी पचायतों के बीच भी वह रस बरसाता रहा। विद्यार्थियों का तो संगी ऐसा कि मेज पर रेडियो बजता रहता और उधर कागज पर कलम चलती रहती। बूढ़े-बुजुर्ग के समाचार सुनते समय किसी की क्या हिम्मत की स्टेशन बदल दें। रेडियो एकाकीपन का साथी था तो ज्ञान का खजाना भी। कला, साहित्य, संगीत का प्रसारक था तो कृषि, ज्ञान-विज्ञान के नित नवीन शोधों का संचारक भी। रेडियो पर संकट के बादल छाये पर उसने अपनी प्रकृति और जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। श्रोता कभी बहका पर कहीं टिक न सका, संतुष्टि ना पा सका और लौट कर रेडियो की शरण ली; ज्यों जहाज को पंछी उड़ि जहाज पर आयो।
वैश्विक स्तर पर जन जागरूकता के लिए दिवस मनाने की परम्परा रही है जिस पर लक्ष्य और विषय निर्धारित कर आयोजन किये जाते हैं। पर रेडियो के पास अपना कोई दिवस न था। तो इस कमी को पूरा करने की दुष्टि से 20 अक्टूबर 2010 को स्पेनिश रेडियो अकादमी के अनुरोध पर स्पेन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में रेडियो को समर्पित विश्व दिवस मनाने हेतु सदस्य देशों का ध्यानाकर्षण किया। जिसे स्वीकार कर संयुक्त राष्ट्र संध के शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने पेरिस में आयोजित 36वीं आम सभा में 3 नवम्बर 2011 को घोषित किया कि प्रत्येक वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जायेगा। उल्लेखनीय है कि 13 फरवरी को ही संयुक्त राष्ट्र की ‘रेडियो यूएनओ’ की वर्षगांठ भी होती है क्योंकि 1946 को इसी दिन वहां रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ था। और तब पहली बार 13 फरवरी 2012 को यह विश्व रेडियो दिवस उमंग-उत्साह पूर्वक पूरी दुनिया में मनाते हुए रेडियो के सफरनामे को याद किया गया। इस आयोजन में विश्व की प्रमुख प्रसारक कंपनियों को बुलाया गया था जिसमें 44 भाषाओं में कार्यक्रम प्रसारित करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी एवं पुरानी कंपनी रेडियो रूस भी शामिल हुई। वर्ष 2012 और 13 में कार्यक्रम की कोई थीम नहीं रही पर उसके बाद प्रत्येक वर्ष कोई एक मुख्य विषय तय कर उसी थीम पर विश्व में कार्यक्रम सम्पन्न किए जाते रहे हंै। लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण (2014), युवा और रेडियो (2015), संघर्ष और आपातकाल के समय रेडियो (2016), रेडियो इज यू (2017), रेडियो और खेल (2018) के वैश्विक आयोजन के चर्चा-विषय निश्चित थे। वर्तमान वर्ष का विषय है ‘संवाद, सहिष्णुता और शांति’ जो सामयिक है और आवश्यक भी। विश्व के सभी देशों के रेडियो प्रसारकों और श्रोताओं को एक मंच पर लाने के उद्देश्य से शुरू की गई यह पहल अपने उद्देश्यों में सफल रही है।
भारत में रेडियो प्रसारण के शुरुआती प्रयास बहुत सफल नहीं रहे। कुछ उत्साही आपरेटरों ने 20 अगस्त 1921 को अनधिकृत रूप से बम्बई, कलकत्ता, मद्रास और लाहौर से प्रसारण किया पर वे उसे आगे न ले जा सके। निजी ट्रासमीटरों के द्वारा 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने प्रसारण आरम्भ किया गया पर उसने तीन वर्ष में ही दम तोड़ दिया। 1927 में स्थापित रेडियो क्लब बाम्बे भी 1930 में आखिरी सांस ले कर मौन हो गया। 1936 में ‘इम्पीरियल रेडियो आफ इंडिया’ की शुरुआत हुई जो आजादी के बाद ‘आल इंडिया रेडियो’ के नाम से विख्यात हुआ। 1957 को आल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर ‘आकाशवाणी’ कर दिया गया। ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ के अपने ध्येय वाक्य के साथ आकाशवाणी 27 भाषाओं में शैक्षिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक, खेलकूद, युवा, बाल एवं महिला तथा कृषि एवं पर्यावरण सम्बंधी प्रस्तुतियों से सम्पूर्ण देश को एकता के सूत्र में पिरोते हुए सुवासित परिवेश निर्मित कर रही है। साथ ही शेष विश्व को भारतीय संस्कृति और साहित्य से परिचित भी करा रही है। 2 अक्टूबर 1957 को स्थापित ‘विविध भारती’ ने 1967 से व्यावसायिक रेडियो प्रसारण शुरु कर नये युग में प्रवेश किया। आजादी के समय भारत में केवल 6 रेडियो स्टेशन थे जिनके कार्यक्रमों की पहुच केवल 11 प्रतिशत आबादी तक ही थी। पर आज भारत में 250 से अधिक रेडियो स्टेशन 99 प्रतिशत आबादी से आत्मीय रिश्ता जोड़े हुए हैं। रेडियो ने विभिन्न तरंग आवृत्तियों पर प्रसारण किया जिसे श्रोता मीडियम वेब, शार्ट वेब के रूप में जानते हैं। बड़ी इमारतों, पहाड़ों के अवरोधों से मुक्त मीडियम वेव देशी प्रसारण है जो पूरे भारत के अलावा पड़ोसी देशों में भी सुना जा सकता है। पर शार्ट वेब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक क्षेत्रफल पर ध्वनि की उच्च गुणवत्ता के साथ भारतीय प्रस्तुतियों को सुन आनन्द लिया जा सकता है। सत्तर के दशक में टेलीविजन के आने से लगा कि रेडियो की असमय मौत हो जायेगी पर सभी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हुई और रेडियो कहीं अधिक प्रखर एवं प्रभावी होकर प्रकट हुआ। रेडियो का श्रोता वर्ग बजाय छिटकने के और अधिक जुड़ा। इसी बीच एएम चैनल आया पर प्रभावित नहीं कर पाया और काल के गाल में समा गया। लेकिन 23 जुलाई 1977 को चेन्नै में एफएम चैनल ने आते ही ध्वनि की उच्च गुणवत्ता एवं कार्यक्रमों की विविधता के बल पर धूम मचा दी और देश भर में छा गया। 1993 में निजी एफएम चैनल आने से श्रोताओं की पौ बारह हो गई। और अब तो जमाना है डिजिटल रेडियों का। मोबाइल पर सवार होकर रेडियो श्रोताओं की जेब में समा गया। बड़े आकार और नाब घुमाने वाले रेडियो तो अतीत के चित्र हो गये। रेडियो ने उद्घोषकों एवं समाचार वाचकों मैल्वेल डिमैलो, देवकीनंदन पांडे, अमीन सयानी, सुरेश सरैया और जसदेव सिंह को नायक बना दिया। उनकी आवाज ही पहचान बन गई। रेडियो ने अपनी यात्रा के प्रारम्भ से ही समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार, जन-जागरूकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वजनिक बहस को अपने सोच के केंद्र में रखा था। पूर्व महासचिव वान की मून का कथन आज भी प्रासंगिक है,,‘‘रेडियो हमारा मनोरंजन करता है, हमें शिक्षित करता है, हमें सूचनाओं और जानकारियों से लैस करता है और सारी दुनिया में लोकतांत्रिक बदलावों को प्रोत्साहित करता है।’’ रेडियो और आदमी का यह प्रेम पगा रिश्ता नित नवल आयाम स्थापित करते हुए सरस यात्रा पर सतत् गतिमान रहेगा, ऐसा ही विश्वास है।

लेखक पर्यावरण, महिला, लोक संस्कृति, इतिहास एवं शिक्षा के मुद्दों पर दो दशक से शोध एवं काम कर रहे हैं।
सम्पर्क: शास्त्री नगर , अतर्रा-210201, बाँदा, उ0 प्र0। मोबा - 09452085234


-प्रमोद दीक्षित ‘मलय‘


विज्ञान का अध्ययन बच्चों को तर्कशील एवं विवेकवान बनाता है। वे अवलोकन, प्रेक्षण, परिकल्पना, प्रयोग, निरीक्षण एवं निष्कर्ष के सोपानों से गुजरकर किसी तथ्य का अन्वेषण करते हुए एक सैद्धान्तिक फलक की रचना करते हैं जिसमें सच की इबारत लिखी होती है। फलतः बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टि एवं सोच विकसित होती है और वह किसी घटना के निहितार्थ को विज्ञान की कसौटी पर कस कर ही आगे बढ़ते हैं न कि आंख मूंद स्वीकार कर अंधविश्वास के गहन अंधेरे पथ पर फिसलतेे हैं। अवैज्ञानिक सोच का ही परिणाम है कि कभी गणेश मूर्तियां दूध पीने लगती है तो कभी क्रास से रक्त की धारा फूट बहने लगती है। आस्था, कर्मकाण्ड या अंधविश्वास का रास्ता विज्ञान के प्रासाद के द्वार पर आकर ठहर जाता है। विज्ञान के उपवन में अंदर वही प्रवेश कर सकता है जिसकी चेतना विज्ञानमय हो और दृष्टि एवं सोच दर्पण की मानिंद निर्मल। पर दुर्भाग्य से देश में ऐसा है नहीं। उपग्रह प्रक्षेपण के पूर्व विध्नहरण के लिए वैज्ञानिकों द्वारा किये जाने वाले हवन-पूजन के दृश्य उनके स्वयं के प्रयोग के विश्वास प्रति सवाल खड़ा करते हैं। यदि विज्ञान के शिक्षक बिल्ली के रास्ता काट जाने पर अपनी यात्रा स्थगित कर दें, सिर पर कौवा बैठ जाने को मृत्यु की सूचना समझ लें, रास्ते पर पानी से भरी बाल्टी और बछड़े को दूध पिलाती गाय मिलना शुभ और सफलता की गारंटी मान लिया जाये तो सोचना पडेगा कि वह विद्यार्थियों को कैसा विज्ञान बोध करा रहे होंगे। उल्लेखनीय है कि बच्चों में इसका बीजवपन समाज एवं घर-परिवार द्वारा पहले ही कर दिया गया होता है और हमारी प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र उसके निर्मूलन की बजाय खाद-पानी दे पोषण का काम करते हैं। कालेज तक आते आते उसके अन्तर्मन में अंधविश्वास और ठकोसलों की जड़ें इतनी गहरी और पुष्ट हो जाती हैं कि उन्हें उखाड़ फेंकना असम्भव सा हो जाता है। रही सही कसर शिक्षकों का अतार्किक अवैज्ञानिक आचरण पूरी कर देता है।
आजादी के सत्तर सालों के बाद भी हम देश में एक वैज्ञानिक वातावरण क्यों नहीं बना पाये। क्यों हमने अपनी प्राथमिक शिक्षा को विज्ञान का दृढ़ आधार नहीं दे सके। क्यों किसी भी प्राथमिक स्कूल में विज्ञान का कोई छोटा-सा भी उपकरण बच्चों के हाथ में नहीं पहुंच पा रहा। क्यों विज्ञान को किताबांे से लिखाया और रटाया जाता रहेगा। प्रयोग के लिए जगह और अवसर कब-कहां मिलेगा। क्यों विज्ञान के शोधों में हम वैश्विक स्तर पर कहीं दिखाई नहीं देतें। कब तक हम विश्वगुरु होने का थोथा गान गाते फिरते रहेंगे। उत्तर कौन देगा, सर्वत्र मौन पसरा है। जाति, धर्म एवं भाषा के नाम पर तो आये दिन आंदोलन होते हैं पर प्राथमिक विद्यालयों में वैज्ञानिक उपकरणों एवं प्रयोगशालाओं की व्यवस्था के लिए क्यों नहीं कोई आंदोलन होता। प्राथमिक विद्यालयों से उभर रहे दृश्य निराश करतेे हैं क्योंकि उनमें विज्ञानमय जीवन की धड़कन सुनाई नहीं देती बल्कि अंधविश्वास की जड़ता का कर्कश स्वर गूंजता है।
हमारे स्कूलों में सभी विषयों को एक ढर्रे या सांचे पर ही पढ़ाया जा रहा है। मेरा मानना है कि हर विषय का अपना एक स्वभाव और प्रकृति होती है और उसे उसी अनुरूप पढ़ाया जाना चाहिए। एक शिक्षक भाषा और विज्ञान को या गणित और सामाजिक विषय को एक तौर-तरीके से नहीं पढ़ा सकता पर दुर्भाग्य से हमारे स्कूलों में यही हो रहा है। दूसरी बात, बच्चों में विज्ञान शिक्षा के प्रति एक अज्ञात भय, कि विज्ञान बहुत कठिन विषय होता है, भर दिया गया है जो नितांत गलत और अव्यावहारिक है जोकि बच्चों में विज्ञान शिक्षा के प्रति अरुचि और अलगाव पैदा करता है। कोई विषय कठिन या सरल नहीं होता, यह शिक्षक की दृष्टि ही है जो उसे कठिन और सरल के रूप में बच्चों के सम्मुख प्रस्तुत करती है। वहीं शिक्षकों का रुदन रहता है कि विज्ञान शिक्षण के लिए आवश्यक संसाधन नहीं हैं। प्रयोगशालाएं नहीं हैं। मुझे लगता है कि यदि सरकारें प्रत्येक वर्ष थोड़ी ही सही पर निश्चित धनराशि मुहैया करा मूलभूत सुविधाएं जुटाये और शिक्षक पाठों के आधार पर अधिकांश शिक्षण अधिगम सामग्री बच्चों के परिवेश से एवं बच्चों के सहयोग से जुटाते हुए ‘कबाड़ से जुगाड़’ सूत्र को थाम आगे बढ़ें तो बच्चों में विज्ञान के प्रति न केवल रुचि जाग्रत होगी बल्कि उनमें यह विज्ञान बोध भी उत्पन्न होगा कि विज्ञान उनके आसपास बिखरा हुआ है, उनके जीवन से, घर-परिवार-परिवेश से जुड़ा हुआ है। इससे बच्चों में आत्मविश्वास तो पैदा ही होगा साथ ही उनमें चीजों को अवलोकन-निरीक्षण करने, तुलना एवं कल्पना करने, तर्क करने, निष्कर्ष निकालने की क्षमता का विकास होगा और विज्ञान उन्हें सरल, सुबोध एवं रुचिकर लगने लगेगा। हालांकि कुछ स्वप्रेरित शिक्षकों ने निजी पहल से अपने स्कूलों में छोटी प्रयोगशालाएं बनाई हैं, पर वह समाधान नहीं है। विज्ञान शिक्षा एवं शिक्षण के तरीकों, विज्ञान विषय के प्रति शिक्षकों की मानसिकता, शिक्षण की चुनौतियों और विज्ञान शिक्षण को रुचिपूर्ण बनाने के क्रियाकलापों पर एन0सी0एफ0-2005 का स्पष्ट मत है कि विज्ञान को बच्चों के परिवेशीय ज्ञान और समझ से जोड़कर पढ़ाया जाये। पर ऐसा होता कहीं दिखाई नहीं देता। शिक्षक द्वारा ब्लैकबोर्ड पर लिखे गये प्रश्नोत्तर बच्चे काॅपियों में अच्छी तरह से याद करने के शिक्षकीय निर्देश के साथ चुपचाप उतार रहे हैं। बस, किताब में जो छपा है उसे हूबहू ब्लैकबोर्ड पर अंकित कर रटवा देना ही विज्ञान शिक्षण हों गया है। यह पूरी प्रक्रिया अवैज्ञानिक, नीरस, उबाऊ और बच्चों की सोचने-समझने की शक्ति को कुंद करने वाली है।
आखिर, शिक्षक कब समझेंगे कि चुप रहना अनुशासन नही, डर एवं भय है जो सीखने में बाधक है। शिक्षक रटवाने की बजाय बच्चों को उनके परिवेशीय ज्ञान से जोड़ते हुए चर्चा कर समझ विकसित करते हुए अधिकाधिक प्रश्न पूछने और अभिव्यक्ति के सहज अवसर कब उपलब्ध करायेंगे। शिक्षक के रूप में बच्चों में अभिव्यक्ति की खुशी की खिलखिलाहट और समझ के आत्मविश्वास को पनपते हुए महसूस करना होगा। उन्हें खोजने और नया रचने-गढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा और इसके लिए जरूरी शर्त है कि हमें उन पर विश्वास करना सीखना होगा। उपकरणों से खेलने की निर्भय आजादी देनी होगी। इन्हीं रास्तों से बाल वैज्ञानिक प्रतिभाएं निकल कर विज्ञान के फलक को रोशन करेंगी। पर दुर्भाग्य से विद्यालयों में ऐसा नहीं हो रहा है। आने वाली हर सुबह डराती है क्योंकि शिक्षक के हाथ में फिर वही छड़ी होगी, ब्लैकबोर्ड में प्रश्नोत्तर होंगे, और होगा रटने का दबाव। प्रश्न पूछने पर प्रोत्साहन नहीं बल्कि हताशा और झिड़की होगी। कक्षा में अभिव्यक्ति की खुशी की खिलखिलाहट और समझ के आत्मविश्वास की जगह होगी चुप्पी और उस चुप्पी में दम तोड़ती बाल वैज्ञानिक प्रतिभाएं।

लेखक पर्यावरण, महिला, लोक संस्कृति, इतिहास एवं शिक्षा के मुद्दों पर दो दशक से शोध एवं काम कर रहे हैं। सम्पर्क: शास्त्री नगर, अतर्रा-210201, बाँदा, उ0 प्र0। मोबा - 09452085234


-बाल मुकुन्द ओझा
राजस्थान में नशे का अवैध कारोबार लगातार बढ रहा है। गांजा, चरस, हीरोइन, ब्राउन शुगर, अफीम और स्मैक का धंधा मंदा नहीं पड़ रहा है। नशे के तस्करों की धरपकड़ के बावजूद प्रतिदिन लाखों का प्रतिबंधित माल पकड़ में आने से यह पुख्ता हो रहा है की कारोबारियों के साथ नशेडियों को भी किसी बात का डर नहीं है। आंकड़ों की बात करें तो राजस्थान में पिछले वर्ष 1800 से अधिक् मामले दर्ज कर लगभग साढ़े पांच सौ करोड़ रूपये की धनराशि के अवैध मादक पदार्थ जब्त किये गए। यह तो वह आंकड़ा है जो पकड़ में आया है। सही तो यह है प्रदेश नशे की मंडी के रूप में विकसित हो रहा है। प्रदेश के नगरों और महानगरों में सरकारी मिलीभगत से नशे का धंधा बेखौफ चल रहा है। राजधानी जयपुर सहित राज्य के महानगरों में अवैध हुक्का बार चल रहे हैं और यह किसी से छिपा नहीं है की यहां युवाओं को नशे की सप्लाई की जा रही है। अजमेर-जयपुर हाइवे, नसीराबाद हाइवे पर धड़ल्ले से डोडा पोस्त अवैध रूप से बिक रहा है। रोजाना शाम होते ही ट्रक चालकों, खलासियों, डोडा पोस्त का सेवन करने वालों की भीड़ दुकानों ढ़ाबों पर लग जाती है। यहाँ दुकान की आड़ में डोडा पोस्त बेचा जाता है।
नशा एक ऐसी बुराई हैं जो हमारे समूल जीवन को नष्ट कर देता हैं। नशे की लत से पीड़ित व्यक्ति परिवार के साथ समाज पर बोझ बन जाता हैं। युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा नशे की लत से पीड़ित हैं। हिंसा ,बलात्कार, चोरी ,आत्महत्या आदि अनेक अपराधों के पीछे नशा एक बहुत बड़ी वजह है। शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करना, शादीशुदा व्यक्तियों द्वारा नशे में अपनी पत्नी से मारपीट करना आम बात है। मुँह ,गले व फेफड़ों का कैंसर, ब्लड प्रैशर ,अल्सर ,यकृत रोग,अवसाद एवं अन्य अनेक रोगों का मुख्य कारण विभिन्न प्रकार का नशा है।
आखिर ये नशा है क्या ? व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति को बदल देनेवाले रसायन, जो प्रयोग करने वाले को नींद या नशे की हालत में ला दे, उन्हें नशा कहा जाता है। ये आदमी के दिमाग और आसपास के टिशू को उत्तेजित करते हैं। लोग इसे मजे के लिए इस्तेमाल करते हैं, जो लत का रूप ले लेता है। नशा करने के लिए लोग आमतौर पर शुरुआत में कफ सिरप और भांग आदि का इस्तेमाल करते हैं और फिर धीरे-धीरे चरस, गांजा, अफीम, ब्राउन शुगर आदि लेने लगते हैं। नशा एक ऐसी बुराई है ,जिसमे मानव का जीवन समय से पहले ही अंधकार और मौत की राह पर चला जाता है। नशाखोरी एक खतरनाक बीमारी है जिसके क्षणिक सुख के चलते इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता है। यह केवल एक बीमारी नहीं है बल्कि यह अनेक रोगों की जननी भी है।
ंनशे के रूप में लोग शराब, गाँजा, जर्दा ,ब्राउन.शुगर, कोकीन ,स्मैक आदि मादक पदार्थों का प्रयोग करते हैं ,जो स्वास्थ्य के साथ सामाजिक और आर्थिक दोनों लिहाज से ठीक नहीं हैं। नशे का आदी व्यक्ति समाज की दृष्टी से हेय हो जाता हैं, और उसकी सामाजिक क्रियाशीलता जीरो हो जाती हैं ,फिर भी वह व्यसन को नहीं छोड़ता हैं। धूम्रपान से फेफड़े में कैंसर होता हैं, वहीँ कोकीन ,चरस ,अफीम लोगों में उत्तेजना बढ़ाने का काम करती हैं, जिससे समाज में अपराध और गैरकानूनी हरकतों को बढ़ावा मिलता हैं। इन नशीली वस्तुओं के उपयोग से व्यक्ति पागल और सुप्तावस्था में चला जाता हैं। तम्बाकू के सेवन से तपेदिक ,निमोनिया ,साँस की बीमारियों का सामना करना पड़ता हैं। इसके सेवन से जन और धन दोनों की हानि होती हैं।

एक सर्वे के अनुसार देश में पचास लाख से ज्यादा लोग हेरोइन का सेवन कर रहे हैं, जिनमें ज्यादातर युवा हैं। नशीले पदार्थों के सेवन के कारण, देश में लाइलाज बीमारियों में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। सर्वे के अनुसार भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। देश में नशाखोरी में युवावर्ग सर्वाधिक शामिल है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि युवाओं में नशे के बढ़ते चलन के पीछे बदलती जीवन शैली, परिवार का दबाब, परिवार के झगड़े, इन्टरनेट का अत्यधिक उपयोग, एकाकी जीवन, परिवार से दूर रहने, पारिवारिक कलह जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।
नशे के अवैध कारोबार को रोकने के लिए जरूरी है की सरकार के साथ समाज जागरूक हो। यह अनेक सामाजिक,शारीरिक और आर्थिक बुराइयों और बीमारियों की जड़ है। इससे दूर रहना समाज और देश के हित में है। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरुरत है। हमारा समाज तभी स्वस्थ होगा जब हम इन बुराइयों से अपने को दूर कर लेंगे।

डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

-रिकॉर्डों के सरताज हिटमैन रोहित शर्मा

 

- योगेश कुमार गोयल
न्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरे टी-20 मैच में गत 10 फरवरी को टीम इंडिया भले ही 210 रन बनाकर महज4 रनों से सीरिज गंवा बैठी और कप्तान रोहित शर्मा भी तीन चौकों के साथ सिर्फ 38 रनों की पारी खेलकर पैवेलियन लौट गए किन्तु रोहित शर्मा के नाम कई रिकॉर्ड ऐसे हैं, जिनकी बदौलत क्रिकेट के छोटे प्रारूपों में बड़ी पारियां खेलने के लिए विख्यात इस भारतीय ओपनर को टीम इंडिया का हिटमैन कहा जाता है। 8 फरवरी को टी-20 के दूसरे मैच में रोहित ने चार छक्के जड़कर 50 रनों की धुआंधार पारी खेलते हुए कुछ रिकॉर्ड अपने नाम किए थे और उनके फैंस को उम्मीद थी कि वोन्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरे टी-20 मैच में भी ऐसी ही धुआंधार पारी खेलकर टी-20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सर्वाधिक छक्के जड़ने का एक और रिकॉर्ड अपने नाम करने में सफल होंगे किन्तु रोहित इससे चूक गए। इस रिकॉर्ड के लिए रोहित को सिर्फ दो छक्केे जड़ने थे किन्तु इसमें वो असफल रहे। भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेली गई तीन मैचों की इस श्रृंखला में न्यूजीलैंड ने पहला मैच 80 रनों से जीता था लेकिन दूसरे मैच में भारतीय टीम ने 7विकेट से शानदार जीत दर्ज की थी। ऐसे में भारत अगर तीसरा मैच जीतकर यह सीरिज अपने नाम करने में सफल हो जाता तो रोहित शर्मा पहले ऐसे भारतीय कप्तान भी बन जाते, जिसकी अगुवाई में भारत न्यूजीलैंड में टी-20 की कोई सीरिज जीतता लेकिन रोहित इस रिकॉर्ड से भी चूक गए।
न्यूजीलैंड के खिलाफ खेली गई सीरीज में हार के बाद अब 24 फरवरी से विजाग में विश्वकप से पहले भारत आस्ट्रेलिया के खिलाफ दो टी-20 और पांच एकदिवसीय मैच खेलेगा और इन मैचों में रोहित के प्रदर्शन पर सभी नजरें केन्द्रित रहेंगी। उम्मीद है कि इन मैचों में वह टी-20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सर्वाधिक छक्के जड़ने का रिकॉर्ड बनाने में अवश्य सफल होंगे। फिलहाल यह रिकॉर्डवेस्टइंडीज के क्रिस गेल के नाम है, जिन्होंने 56 मैचों में 103 छक्के लगाए हैं। इसके अलावा न्यूजीलैंड के मार्टिनगुप्टिल76 मैचों में 103 छक्कों के ही स्थान दूसरे स्थान पर हैं जबकि रोहित अब तक 92 मैचों में 102 छक्के लगा चुके हैं। रोहित के बाद न्यूजीलैंड के ब्रैंडनमैकुलम ने 71 मैचों में 91 और न्यूजीलैंड के कॉलिनमुनरो ने 51 मैचों में 90 छक्के लगाए हैं।
न्यूजीलैंड के साथ टी-20सीरिज के दूसरे मैच में रोहित ने 50 रन बनाने के साथ ही गप्टिल का टी-20 में सर्वाधिक रन बनाने का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। तब गप्टिल के 76 मैचों में 2272 रन थे जबकि रोहित 2288 रन बनाकर टी-20 में सर्वाधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बन गए थे। रोहित के अब टी-20 में 2326 रन हो चुके हैं। वह टेस्ट, वनडे और टी-20 तीनों फॉर्मेट में 320 मैचों में 349 छक्के लगा चुके हैं। उन्होंने 27टेस्ट में 32, 201वनडे में 215 और 92टी-20 में 102 छक्के लगाए हैं। महेन्द्र सिंह धोनी ने इन फॉर्मेट के कुल 523 मैचों में अब तक 348 छक्के जड़े हैं। धोनी ने 90टेस्ट में 78 छक्के, 338वनडे में 222 छक्के और 95टी-20 में 48 छक्के मारे हैं। इनके अलावा पाकिस्तान के शाहिदआफरीदी के नाम 524 मैचों में 476 छक्के, गेल का 443 मैचों में 476 छक्के, न्यूजीलैंड के ब्रैंडनमैक्कुलम का 432 मैचों में 398 छक्के और श्रीलंका के सनथजयसूर्या का 586 मैचों में 352 छक्के मारने का रिकॉर्ड है।
रोहित शर्मा के बारे में अक्सर कहा जाता है कि जब उनका बल्ला चलता है तो दुनिया के अच्छे से अच्छे गेंदबाज का पसीना छूटने लगता है। वनडे क्रिकेट में अभी तक तीन दोहरे शतक लगा चुके रोहित को आईपीएल के सफलतमखिलाडि़यों में से एक माना जाता है और कहा जाता है कि उनमें अंतिम गेंद पर छक्के से टीम को मैच जिताने की विलक्षण क्षमता है। धोनी और गौतम गंभीर के बाद अपनी टीम को आईपीएल खिताब दिलाने वाले रोहित तीसरे कप्तान हैं। वह टेस्ट क्रिकेट, वनडे और 20-20 के अलावा आईपीएल में भी खेल रहे हैं तथा मुम्बईइंडियंस टीम के कप्तान और भारतीय वनडे टीम के उपकप्तान भी हैं। दीवाली से एक दिन पहले रोहित वेस्टइंडीज के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय टी-20 में 4 शतक लगाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज भी बने थे। उनसे पहले यह रिकॉर्ड संयुक्त रूप से तीन-तीन शतकों के साथ रोहित शर्मा और न्यूजीलैंड के कॉलिनमुनरो के नाम था। 2015 में उन्हें ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है।
रोहित की कप्तानी में भारत ने अब तक 15टी-20 खेले हैं, जिनमें से टीम इंडिया 12 मैच जीतने में सफल भी रही है। उन्होंने गत वर्ष वनडे क्रिकेट में 73.57 की औसत से 1030 रन तथा टी-20 में 36.87 की औसत से कुल 590 रन बनाए. जिनमें दो शतक भी शामिल थे। वनडे क्रिकेट में उनका सर्वाधिक स्कोर का कीर्तिमान 264 रनों का है, जो उन्होंने 13 नवम्बर 2014 को कोलकाता के ईडनगार्डन्स मैदान पर श्रीलंकाई टीम के खिलाफ बल्लेबाजी करते हुए कायम किया था और समूचे क्रिकेट जगत को अपने इस प्रदर्शन से दंग कर दिया था। वह एकदिवसीय क्रिकेट के इतिहास में सर्वाधिक दोहरे शतक लगाने वाले पहले बल्लेबाज है और क्रिकेट के इतिहास में पहले ऐसे बल्लेबाज भी हैं, जो वनडे क्रिकेट में तीन दोहरे शतक और अंतर्राष्ट्रीय 20-20 में चार शतक लगा चुके हैं। 2 अक्तूबर 2015 को रोहित टी-20 में 66 गेंदों में 106 रनों की विशाल पारी खेलकर सर्वाधिक रन बनाने खिलाड़ी बन गए थे। हालांकि बाद में उनका यह रिकॉर्ड टूट गया।
रोहित एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में एक मैच में सर्वाधिक 33 चौके लगाने वाले पहले खिलाड़ी हैं। इसके अलावा एक वनडे में सर्वाधिक 16 छक्के लगाने का रिकॉर्ड भी उन्हीं के नाम है। वह तेज गेंदबाजी और स्पिन दोनों को शानदार तरीके से खेलते हैं। हालांकि बाएं हाथ के गेंदबाजों के खिलाफ चूक करना रोहित की सबसे बड़ी कमजोरी माना जाता है। आस्ट्रेलिया के विस्फोटक बल्लेबाज ग्लेनमैक्सवेल रोहित को दुनिया का बेहतरीन बल्लेबाज बताते हुए कहते हैं कि रोहित को खेलते देखना बेहद शानदार होता है। वह गेंद को बेहद आसानी से खेलते हैं और दूसरे बल्लेबाजों की तुलना में उनके पास शॉट खेलने के लिए बहुत ज्यादा समय रहता है तथा वो गेंदों को आसानी से बाउंड्री के बाहर भेजते हैं।
महाराष्ट्र के नागपुर जिले के बंसोड़ क्षेत्र में 30 अप्रैल 1987 को जन्मे रोहित ने अपने एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कैरियर की शुरूआत 23 जून 2007 को आयरलैंड क्रिकेट टीम के खिलाफ की थी जबकि 20-20 में अपना पहला मैच इंग्लैंड क्रिकेट टीम के खिलाफ 19 सितम्बर 2007 को खेला था। उन्होंने 108वनडे मैचों के बाद टेस्ट मैच खेला था और अपने टेस्टकैरियर की शुरूआत वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के खिलाफ 9 नवम्बर 2013 को कोलकाता के ईडनगार्डन्स मैदान पर खेलकर की थी, जहां रोहित ने 177 रनों की एक बड़ी पारी खेलकर हर किसी को अपने खेल से मंत्रमुग्ध किया था। रोहित ने 20 सितम्बर 2007 को आईसीसी20-20 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करते हुए 40 गेंदों पर 50 रन बनाए थे और उस मैच में उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया था। दिसम्बर 2009 में रोहित ने रणजी ट्रॉफी के एक मैच में तिहरा शतक लगाकर हर किसी को दांतों तले उंगलियां दबाने को विवश कर दिया था। 28 मई 2010 को जिम्बाब्वे क्रिकेट टीम के खिलाफ रोहित ने 114 रनों की पारी खेलते हुए अपना पहला वनडे शतक बनाया था और दो ही दिन बाद 30 मई को भी त्रिकोणीय श्रृंखला में श्रीलंका के खिलाफ एक और शतक ठोंककर नाबाद110 रन बनाए थे।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

 

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- श्वेतागोयल
वैलेंटाइनडे का अवसर हो और फूलों का कोई जिक्र न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है। अगर आप अपने दिल की बात जुबां से कहने की हिम्मत न जुटा पाएं तो आपका यह काम फूल बेहद आसान कर देते हैं। वैसे भी फूलों के बिना प्यार का इजहार तो अधूरा ही माना जाता है और जब बात फूलों की छिड़े तो फूलों के राजा गुलाब का तो कहना ही क्या! कवियों, शायरों से लेकर प्रेमियों तक की पसंद रहा है गुलाब। कहा जाता है कि गुलाब प्रेम की जड़ी-बूटी है। यह शांति, प्रेम, आदर, वीरता और क्षमा का प्रतीक है। वैलेंटाइनडे तो प्रेमियों द्वारा एक-दूसरे को उपहारों के साथ-साथ गुलाब भेंट करने का भी सबसे अच्छा मौका है।
गुलाब की खासियत यह है कि यह हर रंग, हर शेड में मिलता है और गुलाब के हर रंग का अपना एक अलग अर्थ है अर्थात् गुलाब अपनी भाषा में आपकी भावनाओं को दूसरे तक पहुंचाता है। कहीं ऐसा न हो कि गुलाब के माध्यम से आप अपने प्रेमी अथवा प्रेमिका को जो संदेश देना चाहते हैं, गलत रंग के फूल के चुनाव से वह संदेश गलत अर्थ में आपके साथी तक पहुंचे, इसलिए अगर आप किसी को गुलाब दे रहे हैं तो अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से पहले आपके लिए यह जान लेना बहुत जरूरी है कि आपकी भावनाओं के हिसाब से किस रंग के गुलाब का चयन सबसे बेहतर रहेगा। आइए जानें विभिन्न रंगों के गुलाब के फूलों की भाषा:-
लाल गुलाब:- वैलेंटाइनडे पर लाल गुलाब का ही चलन सर्वाधिक है। सुर्ख लाल गुलाब अजर-अमर प्रेम तथा पैशन का प्रतीक है और इसका उपयोग प्रेम का इजहार करने के लिए ही किया जाता है। किसी के लिए आपके दिल में कितना प्यार है, यह लाल गुलाब से बेहतर भला और कौन व्यक्त कर सकता है। प्रेमी अथवा प्रेमिका द्वारा लाल गुलाब प्रेम पत्र की भांति दिया जाता है। यदि साथी लाल गुलाब को स्वीकार कर लेता है तो इसका अर्थ है कि उसे आपका प्रेम प्रस्ताव स्वीकार है।
गुलाबी गुलाब:- यह सौम्यता, मित्रता और दिल की धड़कन का प्रतीक है। वैलेंटाइनडे पर गुलाबी गुलाब देने का अर्थ है कि दिल की धड़कन अब सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए ही धड़क रही है।
सफेद गुलाब:- यह गोपनीयता, मासूमियत, मौन, पवित्रता तथा सच्चे, निर्मल और आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक है। सफेद गुलाब सच्चे प्रेम और मस्तिष्क की शुद्धता को दर्शाता है।
पीला गुलाब:- यह सामाजिकता और मित्रता का प्रतीक है। मित्रता के प्रतीक के तौर पर इसका उपयोग वैलेंटाइनडे पर होता है लेकिन इसका सर्वाधिक प्रचलन फ्रैंडशिपडे पर ही देखने में आता है। पीला गुलाब देने का अर्थ यह भी है कि मैं तुमसे प्यार करता हूं पर तुम्हारे दिल में मेरे लिए क्या है, मैं नहीं जानता। यह प्रसन्नता और सौभाग्य का भी प्रतीक है।
काला गुलाब:- यह बिछुड़ते दिलों के लिए है और विदाई का प्रतीक है। यदि कोई जबरदस्ती आपके पीछे पड़ा है और आप उससे प्यार नहीं करते या किसी के साथ प्रेम संबंधों को जारी रखना अब आपके लिए संभव नहीं हो पा रहा तो जुबां से कुछ कहने के बजाय प्रेमपूर्वक उसे काला गुलाब दे दें, आपका काम हो जाएगा।
गहरा बरगंडी गुलाब:- यह अचेत सुंदरता का प्रतीक है। यह अपनी भाषा में कहता है, ‘‘यूआर वैरी ब्यूटीफुल।’’
नारंगी गुलाब:- यह भावनाओं, आकर्षण और अनंत प्यार का प्रतीक है।
लाल-सफेद गुलाब:- ये दोनों एक साथ देना एकता का प्रतीक है।
लाल-पीला गुलाब:- खुशी की भावनाओं का इजहार करते हैं।
सफेद गुलाब की बंद कली:- इसका अर्थ है कि अभी आप मेरे प्यार के लिए बहुत छोटे हैं।
गुलाब का एक फूल:- सीधेपन का प्रतीक है।
गुलाब की कलियां:- संदेश देती हैं कि आप युवा और बहुत सुंदर हैं।
खिले गुलाब के साथ रखी दो कलियां:- सुरक्षा के आश्वासन की प्रतीक हैं।
कांटेरहित गुलाब की डंडी:- पहली नजर के प्रेम की प्रतीक है।

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