नई दिल्ली। अब नहीं रहा बेटियों का यह देश, अच्छा ही है रहें घर के अंदर। पढ़-लिखकर क्या होगा? क्या बेटियों से जुड़े स्लोगन केवल नारे बनकर रह जाएंगे? यदि आप भी ऐसे जुमलों से दो-चार होकर सिर पकड़कर बैठ जाएंगे, सोशल साइट पर आक्रोश और गुस्से में समाज को मरा हुआ मानकर, उसे कोसकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं तो शायद आप हैदराबाद या उन्नाव या दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं को देखकर अपनी बेटियों को लेकर भावुक हैं।कहीं इस भावुकता में यह तो नहीं भूल रहे हैं कि एक लंबी लड़ाई के बाद स्त्रियों ने इस ऊंचाई को छुआ है। वे लगातार आगे बढ़ रही हैं तो उनका यह कदम कोकून में तितली निकलने जैसा है यानी सैकड़ों सालों के जतन और संघर्ष के बाद बेटियों को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला है, पर आप खुद हताश होकर कहीं उनके साहस व बहादुरी पर सवाल तो नहीं उठा रहे? अपने घरों में बढ़ती बिटिया का साहस कम तो नहीं कर रहे?इस बारे में सामाजिक न्याय कार्यकर्ता और एंटी सेक्स ट्रैफिकिंग ऑर्गनाइजेशन, ‘अपने आप वर्ल्ड वाइड’ की संस्थापक रुचिरा गुप्ता कहती हैं, लड़कियां आगे बढ़ती हैं तो इसके साथ-साथ एक प्रतिक्रियावादी अप्रोच भी साथ चलती है। अपराध होंगे, पर इनसे घबराने के बजाय इस मुद्दे पर गंभीरता से काम करना होगा। क्या हम रुचिरा जैसी तमाम महिलाओं की तरह स्त्रियों के खिलाफ होने वाली आपराधिक मानसिकता के खिलाफ सार्थक पहल कर रहे हैं? पूछिए खुद से यह सवाल।
बढ़ती जा रही दरिंदगी;-निर्भया कांड के बाद चौतरफा विरोध के बाद आशा की गई थी कि अब लड़कियां जागरूक होंगी और अपराधियों में भी डर व्याप्त होगा। लड़कियां भले ही दरिंदगी के खिलाफ आवाज उठा रही हैं, लेकिन अपराध कम होने के बजाय और बढ़े ही नहीं, बल्कि नए रूप में सामने आ रहे हैं, जैसे रेप के बाद पीड़िता को जान से मार दिया जाना। आंकड़ों की कहें तो 2016 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक 2007 से 2016 तक महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध 83 प्रतिशत बढ़े हैं।महाराष्ट्र महिला आयोग की लीगल एडवाइजर, वकील और जेंडर मामलों पर कई सालों से सक्रिय वर्षा देशपांडे कहती हैं, मैं हैरान हूं, कुछ साल पहले तक ऐसी दरिंदगी के मामले उत्तर भारत में ज्यादा नजर आते थे, पर अब तेलंगाना जैसे प्रदेश में भी देखने को मिले हैं यानी यह बर्बरता अब देश भर में फैल रही है। यह एक चेतावनी है कि एक समाज के तौर पर हम भी अपनी जिम्मेदारी को न केवल समझें, बल्कि कठोरता से पालन करें।
क्यों है ऐसा;-वर्षा मानती हैं कि आर्थिक विकास के बाद माइग्रेशन का बढ़ना भी दुष्कर्म का अहम कारण है। प्राकृतिक आपदाओं और कई अन्य कारणों के कारण खेती कमजोर होने पर लड़के शहर की ओर भागे। वे नशा करते हैं, इकट्ठे रहते हैं। वहां उन पर न तो सामाजिक दबाव है और न ही परिवार का डर। उस पर से मोबाइल पर आसानी से पोर्न सामग्रियां मिल रही हैं, जो उन्हें ऐसे बर्बर अपराध को अंजाम देने के लिए उकसाती रहती हैं, पर थोड़ा और गहराई में जाएं तो कारण और जटिल हैं। जब कोई कुछ चुराता है तो उसे कुछ चाहिए। हत्या करता है तो प्रतिशोध में, पर आखिर कोई इतना पाशविक कैसे हो सकता है?इस पर जानी मानी क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर कहती हैं, केवल लैंगिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि दूसरे के प्रति हीनता और नफरत की वजह से होता है दुष्कर्म। यह एक जहरीली मर्दानगी है, जिसकी समझ अभी समाज में कम है। अनुजा के अनुसार, दुष्कर्म करने वाला समझता है कि यह उसकी मर्दानगी है, जबकि यह एक मनोरोगी सोच है।
समाज बदलने को आतुर हम;-कुछ गलत होता देख हममें समाज को बदलने की ऐसी आतुरता क्यों रहती है? सोशल मीडिया पर ‘हैशटेगआरआइपी समाज’ का समर्थन कर लोग क्या कहना चाहते हैं? जेंडर मामलों की एक्सपर्ट और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर दीपिका नारायण भारद्वाज कहती हैं, यह आतुरता दरअसल, यह दिखाती है कि हम खुद बदलना नहीं चाहते, बल्कि सारा ठीकरा समाज पर फोड़ना चाहते हैं।वहीं समाजशास्त्री रितु सारस्वत कहती हैं, हमें नहीं भूलना चाहिए कि सकारात्मकता फैलने में बहुत समय लगता है और नकारात्मक चीज बहुत तेजी से फैलती है, जैसे अभी के माहौल में अधिकतर वे लोग जो लड़कियों के घरों में बैठने के समर्थक हैं, खुद को सही ठहराने की पैरवी करते हैं। आपको वे कहते मिलेंगे कि देखा मैंने यही कहा था कि बेटियां घर पर ही ठीक थीं, पर लोग नहीं मानते। रितु के अनुसार, यदि आपको लगता है समाज में कुछ बुरा हो रहा है तो हाय-तौबा मचाने के बजाय अपनी ओर से क्या कर सकते हैं यह सोचें। यह समाज बदलेगा तभी, जब आप पहल करें।
समझिए यह शिक्षा का अर्थ नहीं;-अच्छे स्कूल से पढ़ाई, प्रतिष्ठित कॉलेज या संस्थान से डिग्री और इसके बाद नौकरी वही जो मोटा पैसा दिलाए। इसी सोच के इर्द-गिर्द यदि आप भी बच्चों को शिक्षा देने की शुरुआत करते हैं तो आप भी उसी व्यवस्था के हिमायती हैं, जहां बच्चों को एक संतुलित समझदार इंसान बनाना ‘आउट ऑफ फैशन’ होता जा रहा है। यहां हुमा मसूद कहती हैं, आजादी के बाद से तुलना करें तो काफी बदला हुआ लगता है सब। लड़कियों को संविधान में अधिकार मिला है बराबरी का। एक अलग मंत्रालय है, एक अलग फंड है। फिर भी हमारी व्यवस्था ऐसी क्यों है, दरिंदगी क्यों है?हुमा उस खास खबर का भी जिक्र करती हैं, जो इस असंवदेनहीन होते समाज का नया चेहरा है। वह उस तथ्य का जिक्र करती हैं जब हैदराबाद की घटना के बाद उस बलात्कार का वीडियो लाखों लोगों द्वारा एक पोर्न साइट पर खोजा गया। हुमा के मुताबिक, यह एक डरावना चेहरा है समाज का, जिसका हल सार्थक शिक्षा व्यवस्था में ही छुपा है। ऐसी शिक्षा जहां वैल्यू एजुकेशन अनिवार्य हो। साथ ही मां-बाप एक संवेदनशील नागरिक तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका को अच्छी तरह समझें।
छोटी-छोटी सावधानियां:-बेटा घर देर से लौटे तो फर्क नहीं पड़ता। यह सोचकर निश्चिंत न रहें। अवयस्क उम्र में गलतियां होने की संभावना अधिक होती है। मोबाइल पर बच्चा क्या देख रहा है, यह पता होना चाहिए। इंटरनेट पर पोर्न साइट का खतरा बच्चों पर लगातार मंडराता रहता है। हिंसा से भरे वीडियो गेम भी बच्चों के मस्तिष्क को नकारात्मक ऊर्जा से भर सकते हैं। टीवी या थिएटर देखते हुए भी आप उन्हें अच्छे-बुरे की समझ दे सकते हैं, मसलन यदि लड़कियों के साथ कोई बुरा व्यवहार कर रहा है तो आप उससे कड़ी असहमति दिखाकर बता सकते हैं कि वह गलत है तो क्यों।
कुछ जरूरी बातें
-घर पर बच्चों के बीच सजग रहें और उनके व्यवहार पर पैनी नजर रखें।
-बच्चों को आसपास के परिवेश के बारे में बताएं। किसी घटना का उदाहरण देते हुए उचित-अनुचित का फर्क समझाएं।
-लड़कों को स्त्रियों का सम्मान करना सिखाने का सबसे अच्छा तरीका है आप खुद इसकी नजीर पेश करें।
-लड़कियों को आत्मरक्षा का प्रशिक्षण जरूर दें ताकि उनका खुद पर भरोसा और मजबूत हो।
-कामकाजी माता-पिता बच्चों के साथ भले ही कम समय बिताएं, पर जितना समय हो, वह गुणवत्तापूर्ण हो।
-बच्चों को सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय करें। पढ़ाई से इतर भी उनकी रुचियों को प्रोत्साहन दें।
-बेटियों के साथ बुरा होने पर चुप न बैठें, आवाज उठाएं साथ ही जरूरी कार्रवाई करें।
आंकड़े डराते हैं;-भारत के एक सौ तीस करोड़ लोगों में तकरीबन पचास प्रतिशत यानी 48.5 प्रतिशत महिलाएं हैं, पर वल्र्ड इकोनोमिक फोरम जेंडर गैप रिपोर्ट 2018 में हमारा स्थान 108वां है। यही पूरी कहानी कहता है कि भारतीय समाज स्त्री-पुरुष समानता में कहां है? अब यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ को देखें तो इसमें बताया गया है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 प्रतिशत विवाहित लड़कियां अपने पति या साथी के हाथों यौन हिंसा झेल चुकी हैं।
जिम्मेदारी सबकी है;-राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अनुसार महिला सुरक्षा एक गंभीर विषय है। इस पर बहुत काम हुआ है, पर बहुत से काम होने बाकी हैं। लड़कों में महिलाओं के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करने की जिम्मेदारी हर माता-पिता की, मेरी और आपकी है।
माउंट आबू, राजस्थान, 6 दिसंबर 2019
हमारा समाज, हमारा दायित्व;-नेशनल प्रोग्राम ऑफिसर हुमा मसूद के अनुसार पिछले बीस-तीस साल में हम लंबी लड़ाई के बाद स्त्रियों के लिए अच्छा समाज बना सके हैं। उनके लिए समाज बेहतर हो, यूएन ने कई अभियान चलाए हैं, पर यदि इन सबसे अपराध नहीं थम रहे तो जरूर कुछ बड़ा कारण है। दरअसल, यह एक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या है, जिससे सबको मिलकर लड़ना होगा।
जेंडर एजूकेशन, यूनेस्को
रास्ता ही मंजिल है;-सोशल जस्टिस एक्टिविस्ट रुचिरा गुप्ता के अनुसार हम बलात्कारियों के लिए डेथ पैनल्टी की मांग कर रहे हैं, उससे समस्या थमने वाली नहीं। महात्मा गांधी ने कहा था कि जिस राह को हम अपनाएंगे वही मंजिल बनेगी। हमारी राह अपराधी को खत्म कर देने से आगे की हो। हमारा जोर ऐसी संस्कृति विकसित करने पर हो जहां स्त्री के प्रति मनचाहा रवैया न रहे। हम उस समाज में जी रहे हैं जहां किसी को जींस वाली लड़की पसंद नहीं तो किसी को शाम को देर से आने वाली तो किसी को किसी और तरह की स्त्री चाहिए।
विजिटिंग प्रोफेसर, न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी
कैसे बन जाता है कोई ऐसा दरिंदा;-क्रिमिनल साइकोलॉजिस्ट अनुजा कपूर के अनुसार ऐसा व्यक्ति मनोरोगी ही नहीं, बल्कि समाज में भी खुद को फिट नहीं पाता। वे अपनी बनाई काल्पनिक दुनिया में जीते हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी अक्सर आपराधिक होती है। यदि यह न हो तो कभी-कभी आपराधिक मनोवृत्ति दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स के प्रभावित होने से भी जन्म लेती है। यह किसी चोट या सदमे के कारण हो सकता है।दरअसल, दिमाग का यह हिस्सा ज्ञान, व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और निर्णय क्षमता को संचालित करने में मददगार है। हमारे सामाजिक व्यवहार को भी यही तय करता है। मेरा मानना है कि आपराधिक मानसिकता को शिक्षा से ठीक करना कठिन है।
सजा होते मीडिया में दिखाई जाए;-डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर और और जेंडर मामलों की एक्सपर्ट दीपिका नारायण के अनुसार आप न्याय व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं उठाइए, पर ऐसा नहीं कि कोर्ट चुपचाप बैठी है, वहां भी रोजाना सुनवाई हो रही है। प्रक्रिया बहुत धीमी है, पर सजा भी दी जा रही है। सजा होते दिखाया जाए और यह निश्चित किया जाए कि सजा जरूर होगी तो शायद अपराधियों में खौफ हो।
समाज धीमे से बदलता है:-समाजशास्त्री रितु सारस्वत के अनुसार इतनी प्रगति के बाद भी हम सोच के स्तर पर स्थिर जान पड़ते हैं। दरअसल, समाज अपनी गति से चलता है। समय के साथ समाज में जितनी तीव्र गति से भौतिक चीजें बदलती हैं, अभौतिक चीजें यानी हमारी सोच, रहन-सहन के तौर तरीके नहीं बदलते। उदाहरण के तौर पर डाइनिंग टेबल पर हमने भले ही दशकों पहले से खाना शुरू कर दिया है, लेकिन घर की महिलाएं सबको खिलाकर खाएंगी इसे अभी भी ज्यादातर घरों में देख सकते है।

Share this article

AUTHOR

Editor

हमारे बारे में

नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

ताज़ा ख़बरें