रोहतास। अगर हम आपको ये कहें कि 101 साल के वयोवृद्ध, जिनका नाम हरिनारायण सिंह है, वो बूढ़े नहीं बिल्कुल जवान हैं, तो आप भी सुनकर हैरान हो जाएंगे। लेकिन ये सच है कि 101 साल की उम्र में हरिनारायण सिंह बिस्तर पर नहीं पड़े रहते बल्कि रोज दस बजे कोर्ट जाते हैं और मुकदमा भी लड़ते हैं। वो बिल्कुल फिट एंड फाइन हैं। साथ ही उनकी पत्नी भी जो 100 बसंत देख चुकी हैं, वो भी बिल्कुल स्वस्थ हैं और एक 63 सदस्यों के बड़े से परिवार की देखभाल करती हैं।
सौ साल के बूढ़े या सौ साल के जवान....;-हम बता रहे हैं आपको सासाराम जिले के गौरक्षणी निवासी देश के वयोवृद्ध अधिवक्ताओं में से एक हरिनारायण सिंह के बारे में जो 101 वर्ष की आयु में वे नियमित कचहरी जाते हैं। अपने मुवक्किलों के लिए जवाब, बहस व अन्य कागजात तैयार करते हैं। न्यायाधीशों के कक्ष में पहुंच न्यायिक प्रक्रिया में भाग लेते हैं।वे न केवल अधिवक्ताओं व न्यायाधीशों के लिए एक नजीर हैं, बल्कि तमाम लोगों के आशा की कड़ी भी हैं, जो बुढ़ापे को बोझ समझ जीवन से निराश होने लगते हैं।
पत्नी भी सौ साल पूरी कर चुकी हैं, पूरी तरह हैं स्वस्थ;-उनकी धर्म पत्नी बबुनी देवी भी सौ वर्ष उम्र पूरी कर पूरी तरह स्वस्थ हैं। उनका दावा है कि केवल बिहार में ही नहीं बल्कि देश भर में उनके उम्र के वकील अभी कोर्ट में कार्यरत नहीं हैं। दो वर्ष पूर्व पटना उच्च न्यायालय के स्वर्ण जयंती समारोह में भी उन्हें सबसे उम्रदराज वकील के रूप में सम्मानित किया जा चुका है।
नहीं की अंग्रेजों की नौकरी, पिता की इच्छा से बने वकील:-21 सितंबर 1918 को नोखा प्रखंड के तिलई गांव में जन्मे हरि नारायण सिंह पुरानी यादों में खोते हुए कहते हैं कि वे अपने पिता डोमन सिंह की इच्छा से ही आज वकील हैं। कहते हैं कि 1946 की बात है, वे स्नातक कर चुके थे। सेल टैक्स इंस्पेक्टर का पद पर आवेदन मांगा गया था। वे आवेदन भेज दिए।कुछ दिनों बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिला, जिसमें पांच सौ रुपये मासिक पगार था। खुश होकर पिताजी को बताए। पिताजी नाराज हो गए। कहे कि नेवाने तक (अंतिम तक) पढ़ाई पूरी हुई कि नहीं। इसके बाद वे कोलकता भेज दिए। जहां से अर्थशास्त्र व वाणिज्य में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की व वहीं से एलएलबी की पढ़ाई पूरी कर सीधे गांव आए। 1952 में वे सासाराम अनुमंडलीय कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की।
हरिवंश से बन गए थे हरिनारायण;-अंग्रेजों के जुल्म व स्वतंत्रता आंदोलन की बात को याद कर कहते हैं कि वे मैट्रिक के छात्र थे और स्वतंत्रता आंदोलन अपना चरमोत्कर्ष पर था। अंग्रेज स्वतंत्रता आंदोलन के आंदोलनकारियों पर अधिक जुल्म ढाना शुरू कर दिया था। वे भी तिरंगा ले स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए। उनपर वारंट जारी हो गया और स्कूल से नाम काट दिया गया। वे अंडरग्राउंड हो गए।बाद में वे हरिवंश से अपना नाम बदल हरिनारायण बन गए वे फिर से नाम लिखवा जिला स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की। जैन कॉलेज आरा से स्नातक किया।
नियमित है दिनचर्या:-कहते हैं कि वे आज भीचार बजे सुबह में उठते हैं वे दैनिक क्रिया से निवृत हो साढ़े चार बजे टहलने निकल जाते हैं। लगभग एक घंटा नियमित टहलते हैं। सुबह सात बजे से अपने कार्यालय में बैठ मुवक्किलों का कार्य शुरू कर देते हैं। पुन: 10 बजे कचहरी के लिए निकल जाते हैं। शाम चार बजे ही वे घर लौटते हैं। वे बिना चश्मा के भी पढ़ लेते हैं तथा श्रवण शक्ति भी पूरी तरह ठीक है।
बेटा रह चुके हैं एमएलसी, परिवार में 63 सदस्य रहते हैं साथ-साथ:-हरिनारायण सिंह कहते हैं कि जीवन में सबसे बड़ी पूंजी परिवार होता है और अनुशासन के साथ कर्म मनुष्य को महान बनाता है। आज वे चार पीढ़ियों के साथ 63 सदस्यों के बीच एक छत के नीचे रहते हैं। उनके चार पुत्र व चार पुत्री हैं। सभी के दो-दो पुत्र व दो-दो पुत्रिया हैं।उनके पुत्र कृष्ण कुमार सिंह दो बार बिहार विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं। उनके पौत्र व पर्ल कार्स के प्रबंध निदेशक अभिषेक कुमार सिंह उर्फ सोनू सिंह कहते हैं कि बाबा की सीख से ही हम सभी परिवार आगे बढ़े हैं। परिवार में किसी के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं रहता। जिससे संबंधों की डोर और मजबूत होती है।

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