नई दिल्ली।महाराष्ट्र में पिछले 18 दिनों से मुख्यमंत्री के पद को लेकर चल रही खींचतान, सोमवार को चरम पर रही। सोमवार सुबह से ही महाराष्ट्र की राजनीति में पल-पल नए रंग देखने को मिल रहे हैं। कभी हां-कभी न के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर मानों म्युजिकल चेयर का खेल चल रहा है। सरकार गठन के लिए केंद्रीय भूमिका निभा रही शिवसेना सांसद अरविंद सावंत ने सोमवार को मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। साथ ही इशारों-इशारों में बता दिया कि महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना का 35 साल पुराना साथ खत्म हो चुका है। महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर जारी ये रस्साकसी कोई नई नहीं है।पहले भी कई बार महाराष्ट्र इस तरह के राजनीतिक संकट का सामना कर चुका है। यही वजह है कि महाराष्ट्र में जैसे-तैसे सरकार तो बन जाती है, लेकिन उसे चला पाना हमेशा से टेढ़ी खीर साबित हुआ है। यही वजह है कि महाराष्ट्र में अब तक केवल दो मुख्यमंत्री ही अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सके हैं। इसमें एक नाम वर्तमान कार्यवाहक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का भी है। मौजूदा राजनीतिक संकट के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर जो नए समीकरण बन रहे हैं, वो इशारा कर रहे अगर किसी तरह सरकार बन भी गई तो बहुत संभव है कि अस्थिर सीएम का इतिहास फिर से दोहराया जाए।
सरकार बनाने का हर फार्मूला पड़ रहा कमजोर;-महाराष्ट्र में सीएम की कुर्सी को लेकर खींचतान की वजह से पहले भी सरकार बनाने में कई बार देरी हो चुकी है। इस बार महाराष्ट्र ने सरकार गठन में देरी का रिकॉर्ड बना दिया है। 24 अक्टूबर को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ गए थे। नतीजों में भाजपा 105 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है। दूसरे नंबर पर भाजपा की 35 साल पुरानी साथी शिवसेना है, जिसे 56 सीटें बरामद हुई हैं। आंकड़ों में भाजपा-शिवसेना, बहुमत के काफी आगे है। बावजूद मुख्यमंत्री पद को लेकर सहयोगी दलों की खींचतान में 18 दिन बीत चुके हैं। अब राज्य में जो नए समीकरण बन रहे हैं, उसमें शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस द्वारा सरकार बनाने की कवायद जोरों पर चल रही है। सोमवार को दिन भर तीन पार्टियों की आपसी और अंदरूनी बैठकों का दौर जारी रहा। हालांकि, शाम छह बजे तक कोई नतीजा नहीं निकला था। दरअसल नई सरकार में हर दल खुद को राज्य में ज्यादा मजबूद दिखाना चाहता है, इसलिए सरकार बनाने का हर फार्मूला फिलहाल कमजोर पड़ जा रहा है।
पहले भी सरकार बनाने में हुई देरी;-महाराष्ट्र में सरकार गठन में देरी का ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी 1999 में सरकार गठन में 11 दिनों की देरी हुई थी। तब एनसीपी राज्य में नई पार्टी के तौर पर उभरी थी और उसने कांग्रेस से अलग चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में एनसीपी को 58 और कांग्रेस को 75 सीटें मिली थीं। वहीं भाजपा-शिवसेना गठबंधन को 125 सीटें मिलीं थीं। शिवसेना के खाते में 69 और भाजपा के खाते में 56 सीटें थीं। तब भी राजनीतिक रस्साकसी चरम पर थी। हालांकि 18 अक्टूबर को कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने कुछ निर्दलीय विधायकों संग विलासराव देशमुख के नेतृत्व में सरकार बनाई थी।वर्ष 2004 में भी महाराष्ट्र में सरकार गठन में 16 दिन का वक्त लगा था। उस वक्त भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस-एनसीपी ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था। दोनों को क्रमशः 126 और 140 सीटें मिली थीं। उस वक्त भी कांग्रेस-एनसीपी कुछ निर्दलीय विधायकों के समर्थन से आसानी से सरकार बना सकती थी। 2019 चुनाव में जैसी भाजपा-शिवसेना गठबंधन की स्थिति है, 2004 में वही स्थिति एनसीपी-कांग्रेस की थी। ज्यादा सीटें होने की वजह से एनसीपी सीएम पद पर अड़ गई। 16 दिन की जद्दोजहद के बाद किसी तरह विलासराव देशमुख ने सीएम का पद संभाल लिया, लेकिन मंत्रीमंडल के बंटवारे में इसके बाद भी खींचतान जारी रही। नतीजा ये हुआ कि सीएम के शपथ लेने के बाद भी कैबिनेट गठन में 13 दिन का वक्त लग गया था।
50-50 पर क्यों नहीं मान रही भाजपा;-शिवेसना के 50-50 के फार्मूले पर भाजपा तैयार नहीं है, क्योंकि उसकी स्थिति वैसी ही है जैसे दूध का जला छाछ भी फूक-फूककर पीता है। दरअसल भाजपा इस फार्मूले के तहत उत्तर प्रदेश में बसपा संग सरकार बनाकर धोखा खा चुकी है। इसके बाद उसे दोबारा इसी फार्मूले पर कर्नाटक में कुमारस्वामी ने धोखा दिया था। जाहिर है कि दो बार 50-50 के फार्मूले पर धोखा खा चुकी भाजपा अब ऐसा जोखिम उठाने के मूड में नहीं है।
दो मुख्यमंत्रियों ने ही पूरा किया कार्यकाल:-महाराष्ट्र के राजनीतिक दंगल में अब तक दो ही मुख्यमंत्री ऐसे हुए हैं, जिन्होंने पांच साल सरकार चलाई है। कार्यकाल पूरा करने वाले पहले मुख्यमंत्री थे, वसंतराव नाइक और दूसरे हैं देवेंद्र फडणवीस। वसंतराव नाइक ने राज्य में सबसे लंबे समय तक 11 साल 77 दिनों तक लगातार सीएम की कुर्सी संभाली है। इसके अलावा बाकी मुख्यमंत्री कभी 50-50 फार्मूले की वजह से तो कभी गठबंधन टूटने की वजह से कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। वहीं कई बार मौजूदा सीएम को केंद्र में बुला लिए जाने की वजह से एक ही कार्यकाल में दो या उससे ज्यादा मुख्यमंत्रियों को राज्य की कमान संभालनी पड़ी।

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