बालाघाट। अडोरी गांव की 52 वर्षीय आदिवासी महिला राया परते को न तो वन्यप्राणियों का डर है और न ही नक्सलियों का। वह सुबह से पैदल जंगल वाले गांवों में बैगाओं को शासकीय योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ दिलाने निकल पड़ती हैं। इसके लिए रोजाना वह करीब 32 किलोमीटर का सफर तय करती हैं। बारिश के दिनों में कई बार जंगल वाले गांवों में रात बितानी पड़ती है। उनके प्रयास का असर भी हुआ है। बैगा आदिवासी अस्पताल तक इलाज कराने पहुंच रहे हैं।एक दशक में एक दर्जन से अधिक नक्सल प्रभावित गांवों में बीमारी से मौत का आंकड़ा कम हुआ है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिला मुख्यालय से करीब 98 किलोमीटर दूर जनपद पंचायत बिरसा के अडोरी गांव की निवासी राया परते पति नसीब परते ने बताया कि वे प्रतिदिन अडोरी सहित आसपास के नक्सल प्रभावित गांवों में जाकर बैगा आदिवासी महिला, पुरुष, बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी लेती हैं। यदि किसी को बीमारी है तो उन्हें शासकीय अस्पताल पहुंचकर इलाज कराने के लिए कहती हैं। जो अस्पताल जाने तैयार नहीं रहते उनके लिए एंबुलेंस बुलाकर इलाज कराया जाता है।राया परते बताती हैं कि 15 साल पहले अडोरी में पांच बैगा आदिवासियों की बुखार के दौरान इलाज नहीं मिलने से मौत हो गई थी। बैगा आदिवासी अस्पताल जाने से डरते थे। वे समझते थे कि अस्पताल में इलाज के पैसे लगते हैं। इसके बाद से उन्होंने संकल्प लिया कि सभी बैगा आदिवासियों को सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं की जानकारी देकर समय पर इलाज होने से उनकी जान बचाई जा सकती है। इसीलिए गांव- गांव में जाकर जाकर यह प्रयास शुरू किया और कई लोगों को अस्पताल तक ले आईं।

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