नई दिल्ली। हाल में एक खबर आई थी कि किसी हैकर ने डबस्मैश, शेयरदिस और एनिमोटो समेत 16 वेबसाइट्स से लोगों के डाटा चुरा लिए हैं। उसने लोगों का लॉगइन डिटेल चुराया है। उसने यह सब डाटा ‘डार्क वेब’ पर बिक्री के लिए रखा है। इनके लिए क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन में भुगतान मांगा गया है। कीमत 20,000 डॉलर (14 लाख रुपये) रखी गई है। इस खबर में इस्तेमाल शब्द ‘डार्क वेब’ ने कई लोगों के मन में सवाल पैदा किया है।संभव है कि हम में से बहुत लोगों को यह भी लगा हो कि ‘डार्क वेब’ किसी वेबसाइट का नाम है। इस वेबसाइट पर जाकर कोई भी इस डाटा को खरीद सकता है। लेकिन ऐसा है नहीं। ‘डार्क वेब’ किसी वेबसाइट का नाम नहीं, बल्कि इंटरनेट की पूरी अलग दुनिया है। इसे समझने के लिए हमें जानना होगा कि इंटरनेट की दुनिया है कितनी बड़ी।दरअसल, इंटरनेट की दुनिया हमारी कल्पना से कहीं ज्यादा बड़ी है। आमतौर पर हम इंटरनेट पर जितना कुछ देखते हैं या देख सकते हैं, वह सब इंटरनेट की दुनिया का एक छोटा सा हिस्सा है। इससे कहीं विशाल दुनिया इसके पीछे छिपी हुई, जिसका ज्यादातर लोगों को अंदाजा भी नहीं है। सामान्य भाषा में कहें तो इंटरनेट की तीन परतें हैं - सर्फेस वेब, डीप वेब और डार्क वेब।
क्या है सर्फेस वेब?;-जैसा इसके नाम से ही स्पष्ट है, सर्फेस वेब इंटरनेट की बाहरी सतह की तरह है। आमतौर पर हम इंटरनेट की जो दुनिया देखते हैं, वह सर्फेस वेब ही है। समाचार से लेकर वीडियो देखने की सुविधा देने वाली तमाम वेबसाइट इसी पर दिखती हैं। इंटरनेट एक्सप्लोरर, गूगल क्रोम और मोजिला फायरफॉक्स जैसे विभिन्न ब्राउजर की मदद से इन सभी वेबसाइट को आसानी से खोजा और देखा जा सकता है। इस पर जो कुछ भी लिखा है, वह भी आसानी से सर्च इंजन की मदद से खोजा भी जा सकता है। यही कारण है कि आप किसी समाचार की शीर्षक या उसके अंदर की कुछ पंक्तियां लिखकर उसके सोर्स तक पहुंच जाते हैं।
गहराई में गोता लगाकर दिखता है डीप वेब;-सर्फेस वेब के बाद डीप वेब का नंबर आता है। सुनकर अजीब लग सकता है, लेकिन डीप वेब तक भी हम सबकी आसान पहुंच है। दरअसल ईमेल लॉगइन करने के बाद इंटरनेट की जो दुनिया खुलती है, वह डीप वेब कहलाती है। निसंदेह इंटरनेट के इस हिस्से में भी अथाह डाटा छिपा हुआ है, लेकिन उसे सर्च इंजन की मदद से खोजा नहीं जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, आपके ईमेल में क्या है, इसका पता ईमेल खोलने के बाद ही लग सकता है। किसी भी अन्य माध्यम से वहां तक पहुंचना संभव नहीं है। बैंकिंग लॉगइन से लेकर अन्य इसी तरह के लॉगइन डीप वेब की श्रेणी में ही आते हैं। यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि कुछ लोग डीप वेब और डार्क वेब को एक समझते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।
बहुत अंधेरी है डार्क वेब की दुनिया;-डार्क वेब के नाम से ही जाहिर है कि यह इंटरनेट की अंधेरी दुनिया है। इसे अंधेरी दुनिया या डार्क वेब इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यहां तक पहुंचना सबके लिए संभव नहीं है। इंटरनेट के इस हिस्से तक पहुंचने के लिए खास रास्ते अपनाने पड़ते हैं। सबसे अहम बात यह है कि गूगल क्रोम, इंटरनेट एक्सप्लोरर और फायरफोक्स जैसे ब्राउजर डार्क वेब पर मौजूद वेबसाइट नहीं खोलते हैं। इन वेबसाइट को खोलने के लिए टोर या कुछ अन्य ब्राउजर की मदद लेनी होती है। इसके अलावा भी इन वेबसाइट तक पहुंचने के लिए कई तरह की जानकारियों की जरूरत पड़ती है।
यहां बहुत कुछ काला है:-डार्क वेब का इस्तेमाल आमतौर पर हैकर करते हैं। यहां चुराए गए डाटा की खरीदफरोख्त होती है। कई अपराधों को अंजाम दिया जाता है। बहुत कुछ जो सर्फेस वेब पर प्रतिबंधित है, यहां मिल जाता है। कुछ पत्रकार और खुफिया एजेंसियां भी इनका इस्तेमाल करती हैं। गोपनीय जानकारियों के आदान-प्रदान में इन्हें भरोसेमंद माना जाता है। सामान्य यूजर को इनसे दूर रहने की सलाह दी जाती है। तकनीकी जानकारी की जरा सी कमी यहां आने वाले को बड़े आपराधिक जाल में फंसा सकती है।

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