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नोहर, (हम हिंदुस्तानी)-नोहर के वरिष्ठ पत्रकार विद्याधर जी मिश्रा की सुपुत्री युवा साहित्यकार शालू मिश्रा को आमिर वर्ल्ड अचीवर्स अवार्ड के लिए चुना गया है।
शालू ने बहुत कम समय में अपनी एक अनूठी पहचान बना ली है।
इनकी जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम है ।
आमिर सत्य फाउंडेशन इंडिया द्वारा सिरसा में 24 मार्च को होने वाले समारोह में शालू मिश्रा सहित अलग - अलग क्षेत्रो में उत्कृष्ट सेवा कार्य करने वाली देश विदेश की 101 शख्सियतों को पुरस्कार से नवाजा जाएगा इनमें समाज सेवा, साहित्य, शिक्षा,पत्रकारिता सहित विभिन्न सेवा क्षेत्रों के माध्यम से सेवा को समर्पित करीब 1500 लोगों ने देश भर से आवेदन किए थे।
उनके कागजात विकल्पों की जांच पड़ताल के बाद 101 प्रतिभाओं को इस अवार्ड के लिए चुना गया है। चयनित लोगों को संस्था की चेयर पर्सन अमन लवली मोंगा द्वारा 24 मार्च को सिरसा की पावन धरती पर OHM सिने गार्डन में होने वाले समारोह में पहुंचने का निमंत्रण दिया गया है ।
शालू के मुताबिक देश भर की महान प्रतिभाओं में चुना जाना उनके लिए बजे ही गौरव की बात है। अब तक इनको छोटे-बड़े कई अवार्ड मिल चुके हैं । एवं कुछ दिन पहले तृतीय श्रेणी सरकारी अध्यापिका के पद पर भी इनका चयन हुआ है ।
इनकी बहुत सी रचनाएं भारत के 12 से अधिक राज्यों में राजस्थान, यूपी,एमपी, उत्तराखंड,बिहार,हरियाणा,दिल्ली, पंजाब, असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश,
जय विजय पत्रिका(लखनऊ)डिप्रेस्ड पत्रिका (मथुरा), हम हिन्दुस्तानी,न्यूयॉर्क (अमेरिका)
साहित्य दर्पण पत्रिका (दुबई) में तीन बार,लोकचिंतन पत्रिका(बिहार),
साहित्यपीडिया पत्रिका,सरस्वती सुमन(देहरादून),मरुगंगा पत्रिका, एवं राजस्थान के विभिन्न जिले की विभिन्न राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में 400 बार से ज्यादा प्रकाशित हो चुकी है।
ये मिले है अब तक शालू को सम्मान -
*साहित्य संगम संस्थान नई दिल्ली द्वारा सृजन श्रेष्ठ रचना एवं रचनाकार का सम्मान
*"साहित्य अर्पण" द्वारा "दुबई हिंदी साहित्यिक एक पहल"के द्वारा श्रेष्ठ रचना हेतु सम्मान
*मरुगंगा पत्रिका द्वारा नवम्बर माह में श्रेष्ठ कविता रचनाकार का सम्मान
*राजस्थान से और वो भी जिला हनुमानगढ से मेरी कविता को चतुर्थ स्थान प्राप्त हुआ।
"साहित्यपीडिया" द्वारा आयोजित काव्य प्रतियोगिता में भारत के 509 कवि- कवयित्रियों की रचनाएँ पहुँची जिनके बीच लोकप्रिय हुई कविता
*साहित्य संगम संस्थान द्वारा श्रेष्ठ टिप्पणी कार का सम्मान प्रदत
*ब्राह्मण युवा मंडल (नोहर) द्वारा युवा कवयित्री को साहित्य लेखन हेतु पुरस्कृत किया गया।
*70 वे गणतंत्र दिवस पर उपखंड प्रशासन नोहर द्वारा युवा साहित्यकार का पुरस्कार
*राष्ट्रीय संस्था " प्यारी बहना "के द्वारा सम्भाग स्तरीय सम्मान समारोह में भारतीय महिला गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया
*अमीर सत्य फाउंडेशन के द्वारा देश प्रदेश की 101 प्रतिभाओं के लिए आयोजित राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान समारोह में भी मुझे 24 मार्च को सम्मानित किया जायेगा ।


-तनवीर जाफ़री
न्यूज़ीलैंड के क्राईस्टचर्च शहर में स्थित अलनूर मस्जिद में नमाज़ पढऩे वालों पर हुए हमले में 49 लोगों के मारे जाने के बाद न्यूज़ीलैंड जैसा शांतिप्रिय देश भी आतंक प्रभावित देशों की सूची में शामिल हो गया। बताया जाता है कि आस्ट्रेलिया निवासी 28 वर्षीय बे्रन्टन टैरन्ट नामक युवक ने पांच स्वचालित बंदूकों का इस्तेमाल करते हुए क्राईस्टचर्च की दो मस्जिदों में एक के बाद एक हमले किए तथा अपने माथे पर कैमरा लगाकर इस पूरे वीभत्स हत्याकांड का वीडियो फेसबुक व इंस्टाग्राम पर लाईव प्रसारित किया। पूरे विश्व में सभी धर्म व समुदाय के लोगों ने इस आतंकी घटना की कड़ी निंदा की है। स्वयं न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अल्र्डर्न ने इस हमले को न केवल आतंकवादी हमला बताया बल्कि यह भी कहा कि यह दिन न्यूज़ीलैंड के इतिहास का सबसे काला दिन है। इसे देश के इतिहास का अब तक का सबसे घातक हमला भी बताया गया। उन्होंने कहा कि यह घटना हमें बताती है कि बुरे लोग हमेशा हमारे बीच मौजूद होते हैं और वह कभी भी ऐसे हमले कर सकते हैं। उन्होंने इस हमलावर को दक्षिणपंथी आतंकवादी बताया। न्यूज़ीलैंड में सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज को आधा झुकाया गया तथा नगर में होने वाले अनेक खेल व मनोरंजन के कार्यक्रम रद्द कर दिए गए। न्यूज़ीलैंड प्रशासन ने मृतकों के कफन दफन में मुस्लिम समुदाय को पूरा सहयोग दिया। जहां पीडि़तों का इलाज हो रहा था उसके निकट बॉटेनिकल गार्डन की दीवार को मृतकों को श्रद्धासुमन अर्पित करने हेतु समर्पित किया गया। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद्,लंदन के हाईट पार्क,ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी,हेलसिंकी के फिनलेडिया हॉल, आस्ट्रेलिया के पर्थ,बर्मिंघम तथा विश्व के अनेक स्थानों से मस्जिद में मारे गए लोगों के प्रति शोक सभा करने तथा उन्हें विभिन्न तरीकों से श्रद्धांजलि देने के समाचार प्राप्त हुए।
क्राईस्टचर्च में दो मस्जिदों पर हुए इस हमले के बाद एक बार फिर यह सोचने की ज़रूरत है कि आखिर अतिवादी व कट्टर विचारधारा किसी भी धर्म या नस्ल अथवा समुदाय के व्यक्ति को मानसिक रूप से इतना विक्षिप्त कैसे बना देती है कि कोई अतिवादी व्यक्ति किसी भी धर्मस्थान पर तथा वहां मौजूद श्रद्धालुओं पर जानलेवा हमला करने पर आमादा हो जाता है? मस्जिद में नमाजि़यों पर हमले की यह कोई पहली घटना नहीं है। पाकिस्तान,सीरिया,इराक़,भारत तथा और भी कई देशों में मस्जिद में नमाजि़यों पर हमले किए जा चुके हैं। सच तो यह है कि मस्जिदों व दरगाहों पर सबसे अधिक हमले स्वयं मुसलमानों के ही दूसरे समुदाय से संबंध रखने वाले अतिवादी गुटों द्वारा किए जाते रहे हैं। पाकिस्तान व अफगानिस्तान में शिया व अहमदिया समुदाय की मस्जिदें व इमामाबाड़े तो अक्सर अतिवादियों का निशाना बनते रहे हैं। इराक व सीरिया में तो कई ऐतिहासिक मकबरों को इन्हीं उग्रपंथियों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। दुनिया के कई देशों में ईसाई धर्म के आराधना स्थल चर्च को भी निशाना बनाया गया। ईसाई श्रद्धालुओं को मारा गया व चर्च की पवित्र इमारत को क्षतिग्रस्त किया गया। इसी प्रकार भारत में कई ऐतिहासिक मंदिर भी आतंकियों के निशाने पर रहे। इनमें अक्षरधाम मंदिर, रघुनाथ मंदिर, संकटमोचन वाराणसी जैसे देश के प्रमुख मंदिर शामिल हैं।
अतिवादियों द्वारा केवल धर्मस्थलों को ही निशाना नहीं बनाया जाता बल्कि कभी-कभी समाज को विभाजित करने वाले ऐसे लोगों के द्वारा विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों को भी जलाया,फाड़ा व अपमानित किया जाता है। ऐसी घटनाएं अतिवादियों की सोच तथा उनकी शिक्षा के प्रति निश्चित रूप से सवाल खड़ा करती हैं। उदाहरण के तौर पर इस्लाम के बारे में गत् 1450 वर्षों से यही कहा व सुना जाता रहा है कि इस्लाम शांति, प्रेम, सद्भाव, समानता तथा भाईचारे का संदेश देने वाला धर्म है। परंतु जब स्वयं को इस्लामपरस्त कहने का दावा करने वाले लोग ही मस्जिदों में नमाजि़यों पर हमले करने लगें, बेगुनाह लोगों को जुलूसों व दरगाहों में कत्ल करने लगें,मंदिरों व गिरिजाघरों में मानवता की हत्या करने लगें तो यह सवाल पूछना स्वभाविक है कि क्या इन अतिवादियों ने इस्लाम से यही शिक्षा हासिल की है या फिर इन्हें गलत तरीके से शिक्षित किया गया है? वीभत्स सामूहिक हत्याकांड के वीडियो प्रसारित किए जाने का सिलसिला भी धर्म के स्वयंभू ठेकेदार आईएसआईएस द्वारा ही शुरु किया गया था। इसी प्रकार हज़रत ईसा मानवता के इतने बड़े पक्षधर थे कि उनके नाम से मसीहाई शब्द विश्ववि यात हो गया। अब यदि कोई आस्ट्रेलियाई ईसाई नागरिक न्यूज़ीलैंड में नमाजि़यों की सामूहिक हत्या कर डाले या कोई अमेरिकी नागरिक कुरान शरीफ जलाने का सार्वजनिक प्रदर्शन कर मुसलमानों की भावनाओं को आहत करने का प्रयास करे या ईसाईयत के नाम पर संसार में वर्ग संघर्ष छेडऩे या सर्वशक्तिमान बनने की साजि़श रची जाने लगे तो इसे कम से कम हज़रत ईसा व बाईबल की बताई हुई शिक्षाएं तो नहीं कहा जा सकता?
इसी तरह महात्मा बुद्ध को भी दुनिया में शांति के दूत के रूप में जाना जाता है। परंतु बर्मा में रोहिंग्या मुसलमानों के साथ गत् कुछ वर्षों से बुद्ध समाज के लोगों का जो हिंसक व्यवहार देखा व सुना जा रहा है वह महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं के अनुरूप हरगिज़ नहीं है। खबरों के मुताबिक बौद्ध भिक्षु, यांमार की सेना तथा वहां के प्रशासन व आम नागरिक सभी ने मिलकर गरीब रोहिंग्या मुसलमानों के साथ हर वह अत्याचार किया जोकि संभव था। परंतु इसके लिए निश्चित रूप से महात्मा बुद्ध को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। भारत में बहुसं यक समाज के लोगों द्वारा अल्पसं यकों के साथ इसी प्रकार के अत्याचार किए जाने की खबरें सुनाई देती हैं। हिंसक भीड़ द्वारा समुदाय विशेष के लोगों को कई बार निशाना बनाया गया। परंतु उपरोक्त सभी घटनाएं ऐसी हैं जिसमें किसी भी धर्म से जुड़े हुए समग्र समाज का निश्चित रूप से कोई दोष नहीं है। अब क्राईस्टचर्च में मस्जिद पर हुए हमले को ही देख लें। मारने वाला एक व्यक्ति भले ही ईसाई समुदाय का क्यों न रहा हो परंतु इस घटना से सबसे अधिक सदमा भी विश्व के ईसाई बाहुल्य देशों को ही पहुंचा है। स्वयं न्यूज़ीलैंड इस हादसे से बहुत सदमे में है। इसी प्रकार भारतवर्ष में यदि किसी अल्पसं यक या दलित समाज का कोई व्यक्ति किसी दक्षिणपंथी व अतिवादी भीड़ का निशाना बनता है तो यहां का बहुसं यक समाज ही सबसे पहले इस प्रकार की घटना के विरोध में खड़ा होता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि निश्चित रूप से पूरा संसार तथा संसार की व्यवस्था उदारवादी व शांतिप्रिय लोगों के द्वारा ही संचालित हो रही है। परंतु यह भी सच है कि इस शांतिप्रिय संसार में पलीता लगाने का काम भी सभी धर्मों में मौजूद अतिवादियों द्वारा ही किया जा रहा है। यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इन मुठ्ठीभर अतिवादियों की लगाम धर्मगुरुओं तथा पिछले दरवाज़े से राजनेताओं के हाथों में भी है। ऐसे में प्रत्येक देश, धर्म व समुदाय के लोगों का ही यह परम कर्तव्य है कि वे अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे लोगों, ऐसी संस्थाओं तथा ऐसे संगठनों की पहचान करें जिनका पेशा ही समाज में इसी प्रकार की नफरत फैलाना है। हमें वैश्विक समाज में ऐसी व्यवस्था कायम करने की ज़रूरत है जहां सभी धर्मों के लोग एक-दूसरे धर्म के लोगों की एक-दूसरे के धर्म से जुड़े धर्मस्थानों की तथा एक-दूसरे के धर्मग्रंथों की इज़्ज़त कर सकें। और यदि किसी को उसकी पूर्वाग्रही अतिवादी शिक्षा इसकी इजाज़त नहीं भी देती तो उसे कम से कम इस बात का तो कोई अधिकार नहीं हासिल है कि वह किसी दूसरे धर्मस्थान या धर्मग्र्रंथ को अपमानित कर सके। दरअसल इसी मानसिकता के वैश्विक अतिवादी पूरी मानवता व मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा ख़तरा साबित हो रहे हैं।

1885/2, Ranjit Nagar Ambala City. 134002
Haryana
phones 098962-19228 0171-2535628

 

-प्रकाश दर्पे
अस्पताल कैम्पस में एक वृद्धा ने पहले प्रवेश किया।पीछे पीछे एक युवा व्यक्ति दाखिल हुआ। असहाय वृद्धा खुद को जैसे तैसे संभालते हुए नपे तुले कदमो से अंदर रिसेप्शन काउंटर की ओर चली आ रही थी। पर सक्षम युवा अपनी तेज गति से रिसेप्शन पर उस महिला के पहले ही पहुँच गया। रिसेप्शनिष्ट ने उससे कहा ," जल्दी से अपना नाम बताईये । इसके बाद डॉक्टर साहब किसी को भी नही देखेंगे।"
तो उसने अपने स्वाभाविक गति से चली आ रही वृद्धा की ओर इशारा करते हुए कहा, "पहले उनका नम्बर लगाईये ।
" कितना खयाल रखते है आप दूसरों का । अपना नम्बर उनको दे दिया ।
' नही । नंबर की सही हकदार तो वो वृद्धा ही है। मैं तो नाहक ही स्पर्धा समझ लंबे डग भरता चला आया। लेकिन वो तो अपनी गति से ही चलेगी न। यह मैं भूल गया था।
इतनी गहराई से भी कोई सोचता होगा , यह उसने पहलीबार महसूस किया। वह उस युवा को अचरज भरी नजरों से देखती रही और वह वृद्धा कृतज्ञ भाव से।


A 105, गणेषणभंगन, रायकर नगर, धायरी
पुणे 41, मोब 9922730092


- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
जमुनिया भोर के अंधेरे में ही महुआ बीनने निकल पड़ी थी, जबकि सारी रात उसे तेज बुखार रहा था | मगर महुआ नहीं बीनेगी तो खायेगी क्या...? भूखो मरना पड़ेगा | घर में कोई दो पैसे कमाने वाला भी तो नहीं |

पिछले साल तक सब ठीक ठाक चल रहा था | एक दिन पति रामआसरे जंगल गये तो फिर लौटकर ही न आये | आये तो बस उनके शरीर के कुछ अवशेष, जिनसे बस पहचान ही हो सकी कि ये रामआसरे ही थे | पति का खयाल आते ही जमुनिया की आँखों से आंसुओं की धारा बह पड़ी | एक लम्बी सांस भरी और जमुनिया ने अपने कदमों की रफ्तार तेज कर दी | अगर वो देर से पहुंचेगी तो अन्य लोग महुआ बीन लेगें फिर उसे सारा दिन जंगल में भटकना पड़ेगा | तभी पीछे से झाडियों में कुछ हलचल हुई | जमुनिया के कदम एकदम से रूक गये | वो कुछ समझ पाती, इससे पहले उसके ऊपर एक भारी भरकम जानवर ने छलांग लगादी | जमुनिया चीख भी न सकी |

सूरज निकल आया था | फ़ॉरेस्ट गार्ड धनंजय व रघुवर अपनी ड्यूटी पर निकले थे | एक जगह आसमान में कुछ चील और कौए उढ़ रहे थे | दोनों को समझते देर न लगी | पास पहुंचे तो देखा एक बूढी औरत का छिन्नभिन्न जिस्म झाड़ियों में पड़ा था |

धनंजय - ‘इन आदिवासियों को कितना भी समझाओ इनकी समझ में कुछ आता ही नहीं | कल ही बस्ती में सूचना दी थी कि जंगल में आदमखोर बाघ आ गया है, सावधान रहें |’

रघुवर - ‘बेचारे क्या करें ? इस जंगल के अलावा इनके पास जीने का कोई दूसरा चारा भी तो नहीं | इनके लिए तो जीना यहाँ - मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ |’

 

ग्राम रिहावली, डाक तारौली,
फतेहाबाद, आगरा, 283111


-ओम प्रकाश उनियाल
लापरवाहियों का नतीजा कितना भयानक होता है। यह जानते हुए भी हर बात पर आदमी लापरवाही बरतता है। लापरवाही को हरेक ने अपने जीवन में इस कदर रचा-बसा लिया है कि छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करता फिरता है। हर कोई लापरवाही कर अपने जीवन को तो खतरे में डालता ही है दूसरों की जिंदगी से भी खिलवाड़ करता है। हरेक ने इसे एक आदत बना डाला है। मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर जर्जर फुट ओवर ब्रिज का ढह जाना ताजी घटना है। यदि इस पर बीएमसी द्वारा पहले ही ध्यान दिया गया होता तो शायद यह नौबत नहीं आती। ऐसे ही न जाने कितनी घटनाएं लापरवाही के कारण घटती हैं। सड़क, रेल, हवाई हादसे, नयी व जर्जर इमारतों का ढह जाना, अग्निकांड आदि जैसी घटनाएं जो मानवजनित होती हैं को हम अपना दोष न मानकर 'ईश्वर की ऐसी ही मर्जी थी', 'ऐसा तो होना ही था', ' हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता' या 'खराब किस्मत है' का बहाना बनाकर बरगलाने व टालने की कोशिश करते हैं। अपनी गलती को स्वीकार करने में अहम टकराने लगता है। यही वजह है कि लापरवाही हम पर हावी हो जाती है। तब बुरा-भला के बारे में नहीं सोचा जाता। आखिर, रोज घटने वाली घटनाओं से हम सबक क्यों नहीं लेते। यह सवाल हमेशा ही सवाल बन कर रहेगा? दुर्घटनाएं घटती रहेंगी, लोग इनका शिकार होते रहेंगे। पर कोई भी सजग व चेतने का प्रयास नहीं करेगा।


-आशुतोष, पटना बिहार
बात ऊन दिनों की है जब मै छोटा था, और शहर में किराये की मकान में अपने पिताजी के साथ रहता था।मेरी उम्र लगभग दस ग्यारह वर्ष की होगी मेरे पड़ोस में एक नेताजी रहते थे।वो मुझे अक्सर प्यार से छोटू कहा करते थे। वे बहुत ही मिलनसार और लोगो से घुले मिले रहते थे। मैने कभी उनको अकेले नहीं देखा था।अक्सर लोग उन्हें दुआये देते रहते थे। किसी का कोई काम हो जाता या कोई काम से आता पर नेताजी सभी काम बड़ी ही तत्परता से करते थे।नेताजी अक्सर घोती कुर्ता ही पहनते थे।मै बच्चा था पिताजी पेंट पहनते थे और नेताजी घोती, तो मैरे मन मे ख्याल आया क्यों न पूछा जाय नेताजी से ? मै खेलते-खेलते उनके पास गया शाम की गोघूली बेला थी उनके पास इक्के दुक्के ही लोग थे चूँकि मैं उनसे घूला मिला था इसलिए उनसे पूछ लिया नेता अंकल !आप हमेशा धोती ही क्यूँ पहनते हैं?पहले तो वो जोर से हँसे फिर बोले बेटा आव यहाँ बैठो ! और बोलने लगे ! धोती से हमें आराम गर्व और सकून मिलता है यह हमारे देश में बनती है दूसरी हमारी संस्कृति की पहचान है धोती।अब तो चंद लोग ही बचे है धोती पहनने वाले पता नही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का,आदर्शो का क्या होगा?हमारे जमाने में तो दुश्मनी भी आदर्शो से निभायी जाती थी ।कोई जीते कोई हारे रास्ते में मिलने पर एक दूसरे के गले मिलते थे और हालचाल पूछते थे आज वो आर्दश, वो नैतिकता समाप्त हो रही है स्वार्थ की दीमक ने खोखला कर दिया है । हमारे नीतियो पर आधुनिक अल्हडता टाईट फिटिग हावी है मानसिक असंतुलन मुँह चिढा रहा ।बोल चाल में उदंडता कायम है एक हमलोग है बेटा कितनी भी कष्ट झेले पर अपनी शिष्टाचार नही भूले।वैसे भी शिष्टाचार चंद धोती पहनने वालो की तरह हो गई है जो चंद लोगो तक ही सीमित हो जाएगी मै उस दिन को सोचकर चिंतित हो जाता हूँ । अब मै बूढा लाचार हो गया हूँ जब तुम्हें मेरी बातें समझ मे आएगी तबतक शायद मैं जीवित भी न रहूँ और उनकी आंखे डबडबा गयी।उन्होने परिस्थितियों से परेशान होते हुए सामाजिक संदर्भ में आने वाले समय के बारे मे कहा कैसे लोग, लोगों से ही नफरत करने लगे है कैसे सामाजिक परिवेश दिन -ब -दिन गिरता जा रहा जाति-धर्म समुदाय में बँटता जा रहा है आने वाला समय और भी विषमताओ से भरा होगा बुजुर्ग की उपेक्षा नैतिकता का पतन एवं सांस्कृतिक मूल्यों के ह्रास होने से नेता जी काफी परेशान दिख रहे थे उनके हाव भाव और बोलने का अंदाज निराला और आकर्षित करने वाला था।बेटा!अब तो चंद लोग ही बचे है जो धोती के महत्व को समझते हैं यह हमारी पहचान है आर्दश है जो हमें भारतीय परम्पराओ की याद दिलाता रहता है इसलिए मै हमेशा से इसे पहनता आया हूँ।बात कहते कहते काफी समय हो गया था और मै छोटा था चंचल सा इसलिए भागकर घर आ गया पापा आ चुके थे रात का खाना खाकर सोने चला गया पर नेताजी के शब्द मुझे जैसे सुनाई पड़ रहे हो ऐसा महसूस कर रहा था।सुबह जब सोकर उठा तो देखा पड़ोस में काफी लोग जमा है मैने पापा से पूछा!पापा इतनी भीड क्यो है? पिताजी बोले बेटा!वो तेरे नेता अंकल को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।मैं हतप्रभ हो गया मेरे आँखो से आँसू बहते गये। मेरे कानो में नेताजी के कहे एक-एक शब्द गूँजने लगे । मै नेताजी जैसे पडोसी को खो चुका था जिसका अफसोस और कमी आज भी महसूस करता हूँ । उनकी दूरदर्शी सोच आज कितनी चरितार्थ हो रही है यह कहने की जरूरत नहीं उनके शब्द आज भी मेरे कानों में गूँजते है काश सभी के कानों में ऐसे शब्द गूँजने लगे तो हमारा देश और समाज नेताजी के सपनो का भारत बन जाएगा।


भवानीमंडी (हम हिंदुस्तानी)- साहित्य संगम संस्थान दिल्ली द्वारा चार मार्च 2019 को शिवाराधना ऑनलाइन विडीओ कवि सम्मेलन में प्रतिभागी सभी रचनाकारों को नीलकण्ठ सम्मान से शुक्रवार को सम्मानित किया।
सम्मान समारोह के संचालक आशीष पांडेय जिद्दी ने बताया कि जिन कवि कवयित्रियों ने भगवान शिव के लिए भक्तिमय काव्य स्वर साधना के माध्यम से श्रेष्ठ प्रस्तुति दी उन्हें नीलकण्ठ सम्मान से सम्मानित किया गया।
सम्मान समारोह में संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवीर सिंह मन्त्र,पंच परमेश्वर कैलाश मण्डलोई कदंम्ब, अनुशासन प्रमुख आशीष पांडेय,सचिव कविराज तरुण सक्षम, देश की ख्यायिनम कवयित्री दीपाली पांडेय, राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी राजेश पुरोहित,अरुण श्रीवास्तव अर्णव,सहित संस्थान के कई रचनाकार मौजूद रहे।
नीलकण्ठ सम्मान से सम्मानित रचनाकारों में राजवीर सिंह मन्त्र,राजेश कुमार शर्मा पुरोहित आशीष पांडेय जिद्दी अनिता मंदिलवार छाया सक्सेना प्रभु आदेश कुमार पंकज पंडित रामजस त्रिपाठी राजेश तिवारी रामू सुमिता राजकुमार मूंदड़ा पंकज चन्देल प्रसून सरोज सिंह राजपूत प्रेमलता मिश्रा लता खरे कल्पना खूबसूरत ख्याल गीता गुप्ता मन मीना भट्ट आर्यावर्त वेदप्रकासज महालक्ष्मी सक्सेना मेधा वीणा चौधरी इन्दु शर्मा शचि कैलाश मण्डलोई कदंम्ब छगनलाल गर्ग विज्ञ ऋतु गोयल सरगम संतोष कुमार प्रजापति माधव रानी परी सोनी सरिता श्रीवास्तव प्रेम राजावत शिवकुमार लिल्हारे अमन प्रकाशचन्द्र जांगीड़ पिड़वा कुमुद श्रीवास्तव वर्मा रवि रश्मि अनुभूति सुचिता अग्रवाल सूची संदीप राजीव डोगरा भगवान पाटीदार जय अजय सिंह मण्डलोई उदय नवीन कुमार तिवारी अथर्व शैलेन्द्र खरे सोम एस के कपूर श्रीहंस वीरेंद्र दसौंधी रजनी गुप्ता पुरूषोत्तम दास प्रजापति हेमन्त कुमार अदम। सुनील कुमार अवधिया मुक्तानिल अरुण श्रीवास्तव अर्णव राकेश राज पार्थ राजलक्ष्मी शिवहरे रामप्रसाद मीना लिल्हारे प्रमोद गोल्हानी प्रमुख हैं।


-डॉ प्रदीप उपाध्याय
फिर समय आ गया है जब तुम्हें अग्नि परीक्षा देना होगी।पहले की तरह ही लोग तुम्हारे चरित्र पर ऊंगलियाँ उठायेंगे।वैसे सभी जानते हैं कि इसमें कहीं कोई तुम्हारा दोष नहीं है लेकिन फिर भी यह इंसानी फितरत है कि बिना किसी को दोष दिये काम चलता ही नहीं है।तुम कर भी क्या सकती हो,जब आज के रावणों की कुटिल चालें और कुदृष्टि तुम्हें निशाना बनाए हुए है ।तुम्हारे अपने में कहीं कोई खोट या दोष तो नहीं दिखाई देता किन्तु राक्षसी स्वभाव का क्या कीजै!
पहले भी जबकि रामराज्य स्थापित था तब भी सीता मैया को एक धोबी के कहने पर अग्नि परीक्षा देना पड़ गई थी लेकिन वे स्वाभिमानी थीं सो धरती माता की गोद में ही समा गई किन्तु हम सब जानते हैं कि तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकती हो।हालांकि तुम्हारे ऊपर तो इल्जाम पर इल्जाम लगते चले आ रहे हैं।तुम भी सोचती होंगी कि क्यों परिवर्तन किया जाकर आधुनिकीकरण के नाम पर तुम्हें लाया गया।बेहतर होता कि पहले जो चल रहा था,वही चलता रहता।लेकिन एक बार जब तुम्हारे ऊपर विश्वास कर लिया था और व्यवस्था का अंग बना लिया तो बार-बार चरित्र हनन का प्रयास क्या उचित है!तुम्हारा विरोध करने वाले तो अभी भी चाह रहे हैं कि तुम्हें निष्कासित कर दिया जाए और पूर्व अवस्था को ही प्राप्त कर लिया जाए।इन्हें तुम्हारी आधुनिकता पसन्द नहीं है।ये लोग पुरातनपंथी हैं।बुआजी, बबुआ, दीदी तक तुम्हारी खिलाफत कर रहे हैं।क्या इन्हें नहीं मालूम कि पहले बन्दूक की नोंक पर उठा लिया जाता था, रास्ते में ही अपहरण हो जाता था।
क्या यही सब वे फिर से चाहते हैं! एक बात समझ में नहीं आ रही है कि जहाँ चुनाव सिर पर सवार होते हैं या हो जाते हैं, तभी तुम्हारे ऊपर ऊंगलियाँ उठना क्यों शुरू हो जाती है।शायद तुम्हारा स्त्रीलिंग होना ही तुम्हारे लिए अभिशाप बन गया है वरना पहले बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स पुल्लिंग थे,इनके लूटने, फटने, पीटने पर किसी को ऐतराज नहीं।उनपर फिर से ऐतबार कर रहे हैं जबकि तुम खामोशी से अपना काम करती चली आ रही हो तो तुम्हारे ऊपर अविश्वास की गहरी छाया।मन तो होता है कि उन्हें धिक्कारे।माना कि तुममें भी कुछ कमियाँ रही होगी और आज भी होगी लेकिन तुमने अपने आप में बहुत सुधार कर लिया है और जो जो सुधार की गुंजाइश नजर आ रही है, वह सब तुम्हारे परिजन कर रहे हैं लेकिन इसके बाद भी असंतोष होना अच्छी बात नहीं है।तुम्हारे चरित्र पर ये लोग लांछन लगाते हैं तो दुख होता है क्योंकि इनका अपना चरित्र और चाल-चलन ठीक नहीं है।
अब जब चुनाव की घोषणा हो चुकी है, तुम तो अपना काम ईमानदारी से करती रहना,भले ही लोग कहें कि ईवीएम मशीनें विश्वसनीय नहीं हैं।हम आम मतदाता का तो तुम्हारे ऊपर पूरा विश्वास है।तुम अपना सतीत्व बरकरार रखते हुए अपना कर्तव्य निभाते रहना।बस।

16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
9425030009(m)


-सलीम रज़ा
हमारे देश का राजनीतिक सिस्टम पूरी तरह से बीमार नजर आ रहा है। खैर बीमार होना तो एक बहाना ही है लेकिन इसके पीछे का सत्य और भी ज्यादा खतरनाक है। आज के दौर में सियासत का जो रूख है वो बेहद ही खतरनाक है। आज सत्ता चाहत इस कदर हावी है कि हर पार्टी दूसरी पार्टी के मुकाबले अपने आप को पम्बर वन साबित करने की ज्रग में हर हदें पार कर चुकी है। देश के अन्दर चाहे कोई भी मुद्दा हो उसे ये सियासी पार्टियां भुनाने में जरा भी देर नहीं करती। इन राजनीतिज्ञों की चपलता और वाक्पटुता से आवाम भी भ्रमित हो जाती ह,ै उसे इस बात का अन्दाजा लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है कि अब वो क्या करे। दूसरा सबसे बड़ा और गम्भीर सवाल ये है कि ये अल्प शिक्षा और अल्प ज्ञान लिए राजनीति के धुरन्धर बनने वाले मठाधीशों को ये भी ज्ञान नहीं होता कि वो जिस मुद्दे को लेकर अपनी बेबाक बयानों से आवाम के एक बड़े धड़े को अपने पक्ष में करने के लिए कूद रहे हैं वो किस कदर और कितना खतरनाक है। ये बड़बोले देश की आन्तरिक और वाहय सुरक्षा पर भी बयानबाजी करने से नहीं चूकते। अब आप हाल के ही बदले राजनीतिक घटनाक्रम को देख लीजिए, अभी हाल में ही पुलवामा अटैक के बाद देश के अन्दर एक अलग सा माहौल बनाया गया जिसमें देश के बडे़-बड़ेे लोगों के अलग-अलग बयान थे । उन बयानों को लेकर ही एक अलग तरह की बहस पूरे देश के अन्दर छिड़ गई हर व्यक्ति एक दूसरे के बयान पर अपना एक नया बयान देने के लिए आतुर था। हद तो तब हो गई जब अपने ही देश के लोग अपने ही देश के लोगों को अलग-थलग करके उनकी राष्ट्रभक्ति पर ही सवाल खड़े करने लगे। ये उस से भी ज्यादा खतरनाक है जिनकी कायराना हरकत से हमारे देश के वीर जवान शहीद हुये थे। ये वो समय था जब देश की आन्तरिक और बाह्य सुरक्षा दोनों पर प्रहार हुआ था ऐसे में इस तरह की सियासी चाले देश के अन्दर गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा करने में लगी थीं। इसका उदाहरण आपके सामने है जब हिन्दुस्तान ने पड़ोसी देश के वालाकोट जहां पड़ोसी देश के आतेकी शिविर थे उस पर एअर स्ट्राइक करी थी लेकिन देखिये उसके बाद सियासी रणवांकुरों ने किस कदर हायतौबा मचा दी कि सेना की एअर स्ट्राइक जिस वालाकोट गांव पर हुई वो अपने देश में ही था न कि पड़ोसी देश में। वहीं इन मंझे सियासतदाओं ने प्रधानमंत्री से एअर स्ट्राइक तक के सबूत मांग लिए इतना ही नहीं ये भी कहा गया कि एअर स्ट्राइक में कहां-कहां बम गिराये गये और कितने आतंकी ढ़ेर हुये । एअर स्ट्राइक हुई तो सैटेलाईट के माध्यम से प्राप्त चित्रों को साझाा करा जाये वगैरा-वगैरा उसके बाद ये भी सवाल उठाये गये कि प्रधानमंत्री ने एअर स्ट्राइक के बाद सर्वदलीय बैठक नहीं बुलाई जबकि ये निरर्थक और बेबुनियाद है। ये सिर्फ आवाम को विचलित करने की सोची समझी चाल ही कही जा सकती है। लेकिन मौजूदा सरकार ने भी अपनी सत्ता की बलवती होती हुई महत्वाकांक्षा को भी सामने रख दिया । जहां एक तरफ समूचा विपक्ष मौजूदा सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा था वही ंमौजूदा सरकार के मुखिया ने तो हद ही कर दी उन्होंने न सिर्फ शहीदों के परिजनों के जख्मों को कुरेदा वल्कि शहीदों की शहादत का उपहास भी उड़ाया है, वो भी ऐसी पार्टी ने जो देश को एकजुट करने का दम भरती है। कितना शर्मनाक है कि स्वयं मोदी की रैली में सत्ता के मंच पर पुलवामा में शहीद सैनिको के चित्र का बैनर लगा था तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह अपनी रैली में पड़ोसी मुल्क पर किये गये एअर स्ट्राईक का श्रेय भाजपा को देकर राजनैतिक लाभ लेने का घिनौना खेल खेल रहे थे ये सचमुच बेहद अफसोसजनक और निंदनीय है जिसके लिए अदालत से लेकर सेना तक ने मौजूदा सरकर कि इस हरकत पर अपना ऐतराज दर्ज कराया था। आज जब देश के अन्दर आम चुनाव का ऐलान हो चुका है ऐसे में वो सारे मुद्दे जो पांच साल में सरकार धरातल पर नहीं उतार पाई जिनका सवाल आशावान उर्जावान प्रधानमंत्री मोदी से आवाम पूछ रही थी उस असंतोष को दबाने और आवाम को गुमराह करने तरीका भी मौजूदा सरकार ढ़ेंढ़ ही लिया जिसे इमोशनल ब्लैकमेल कहते हैं। उसी को हथियार बनाकर भाजपा की मौजूदा सरकार चुनावी संग्राम को जीतने का मन बना चुकी है। इस चुनाव में तरीका चाहें कोई भी हो उसे हर सियासी दल अपनाने में कोताही नही बरत रहे हैं । बहरहाल कहने का मतलब साफ है कि सोशल मीडिया पर हीरो बन चुके मोदी और पूरी भाजपा पार्टी इन्डायरेक्टली देश के अन्दर एक संदेश देने की कोशिश में लगी हैं वो ये कि देश अगर सुरक्षित है तो उनकी वजह से और सुरक्षित रखना है तो उन्हें लाना होगा। ये एक ऐसा संदेश है जो देश के सबसे बड़े लोकतंत्र को विभाजित करने की भूमिका निभा रहा है जो अंग्रेजी हुकूमत से कहीं ज्यादा खतरनाक है। दुनिया के सबसे बड़ा लोकतंत्र हिन्दुस्तान कभी भी एक धर्म एक पंथ के ािद्धान्त पे नहीं चल सकता। अगर कैसे भी और किसी भी तरीके से इसे जबरदस्ती चलाने की कोशिश इन सियासी दलों द्वारा की गई तो तस्वीर और ज्यादा खतरनाक हो सकती है। इस बात से भी नहीं झुठलाया जा सकता कि देश के अन्दर ही गृह युद्ध जैसे हालात कहीं उत्पन्न न हो जायें। देश की आवाम को ये समझना होगा कि वे इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर बैठे आज भी बेरोजगार होने का दंश झेल रहे हैं और हम अपनी आंख बन्द करके इन राजनेताओं के उल्टे सीधे फूहड़ और गुमराह करने वाले बयानों पर तालियां फटकार कर अपने अशिक्षित होने का सबूत दे रहे है। कुल मिलाकर सार ये है कि हमारे देश के अन्दर जिस तरह से बीमार और दूषित मानसिकता से सियासत की जा रही है उसे देखकर ये कहना अनुचित न होगा कि देश की एकता अखण्डता का वजूद को खतरा तो है ही साथ ही देश का सबसे बड़ा लोकतंत्र विभाजन के कगार पर खड़ा है जिसमें देश के ये सियासी दल पूर्ण रूप से जिम्मेदार होगे।

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-आशुतोष, पटना बिहार


बचपन के ऊन दिनों की बात है होली का त्योहार आने वाला था। बसंत अपने पूरे शबाब पर था पूरवईया हवा खेतो में फसलों की लहड़ाती बालिया, बागो में फूलो की महक और पीली सरसो के फूल आम के छोटे छोटे फल उस पर कोयल की मीठी मीठी संगीत मानो हर्षोउल्लास के वातावरण में मन को प्रसन्नचित कर रहे हों।
मेरे पिता साधारण सी नौकरी करते थे। परदेश में, मै अपने बहन और माँ के साथ गाँव में ही रहता था।पिताजी प्रायः प्रत्येक पर्व में आते थे, इसलिए मुझे होली पर उनके आने का इंतजार था । प्रत्येक बस को देखता कि शायद पिताजी आ गए लेकिन मायूसी तब होती जब बस बिना रूके चली जाती।
अचानक एक सूचना मिली कि दूर एक ट्रेन दुर्घटना हुई हमलोग आशंकित हो गये उस समय मोबाईल नही थे और दिन का वक्त था। इसलिए मुन्नी को पडोस मे रखकर मै और मेरी माँ शहर गए फोन करने पापा की ऑफिस में, वहाँ से जानकारी मिली वह हैरान करने वाला था। पिताजी की छुट्टी मिल चुकी थी और वो वहाँ से चल दिए थे तो फिर घर क्यो नही पहुँचे? तमाम तरह के आशंकाओ ने हम माँ बेटो को घेर लिया और क्या करे समझ नही आ रहा था ।आखिर में हमलोग रेलवे इन्क्वायरी आकर पता लगाया तो पता चला की एक ट्रेन घटना स्थल तक जानेवाली है तो हम दोनो माँ बेटे उस ट्रेन से घटना स्थल तक जा पहुँचे वहाँ का मंजर बहुत भयावह और ह्रदयविदारक था। कोई चीख रहा था, कोई कराह रहा था, बोगिया उलटी हुई थी,वही टेन्ट में चोटग्रस्त मुसाफिरो का ईलाज किया जा रहा था। हमलोग पिताजी की खोज में लग गये । टेन्ट दर टेन्ट यहाँ-वहाँ दौडते हुए रात हो गई पर पिताजी नही मिल रहे थे।इतने में मेरी नजर एक थैले पर पडी जो पिताजी की लगती थी। मै थैले के पास गया वहाँ दो सिपाही थे मैने कहा ये थैला मेरे पिताजी की है यहाँ से वो किधर गये उसने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा और कहा बेटा इस बाॅगी के जितने लोग बचे थे वो टेन्ट नम्बर दस मे हैं।मैने थैला उठाया और टेन्ट नम्बर दस की तरफ भागा सभी को देखते हुए भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि पिताजी सही सलामत हो इतने मे एक व्यक्ति कराह रहा था। मै वही पहुँचा तो देखा पिताजी दर्द से छटपटा रहे थे पर होश मे थे डाक्टर उन्हे इंजेक्शन लगा रहा था।मुझे और माँ को वहाँ पाकर आश्चर्य भरी नजरो से देखा और फिर सो गए दरअसल डाक्टर ने नींद की दवा दी थी। पिताजी का दो जगह फ्रेक्चर हो गया था जिससे काफी दर्द हो रहा था।प्राथमिक उपचार के बाद अगले दिन हमलोग पिताजी को हास्पीटल में भर्ती कराया और पूरे एक माह तक इलाज होने के बाद हमलोग घर आये पता ही नही चला कब होली आयी और चली गयी पर इतना जरूर अनुभव कर पाया हूँ कि सभी त्योहार आपके और परिवार के स्वस्थ रहने पर ही आनंदित करती है। आना जाना भी सुरक्षित हो यह सुनिश्चित नही है कहाँ कैसे और कब निर्दोष होते हुए भी लोग दुर्घटना के शिकार हो जाय कह पाना मुश्किल है। जिसके कारण दुर्घटना पीडित की संख्या काफी तेजी से बढी है।ये सच है हम सभी के लिए रफ्तार जरूरी है पर रफ्तार के सिस्टमो को सावधानी और सुरक्षा की दृष्टि से नजर अंदाज नही किया जा सकता।इसलिए सभी के पर्व त्योहार खुशहाली से मनाने के लिए बढती दुर्घटना पर लगाम लगाने की जरूरत है।

 

मेरा लाल लौटा दो
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मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल
ठहर गया वक्त
खून से धरा लाल
जम से गये सारे
देश के होनहार।
फिर भी
मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल

हर्षित मन को
मनहूस तूफानों ने
खामोश कर डाली
वो मनहूस शाम
कितनों को विवश कर डाली
फिर भी
मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल

जरा सोचो सारी उम्र
तपती धूप में इंतज़ार
हर पल एक इन्तहाँ
पाला और बडा होगा संतान
अरमानो के साथ
ढलती हुई मुस्कान पर
ख्वाबो की उड़ान भरने वाली थी
अचानक एक तूफान उठा
लोगों की भीड़ चीख पुकार
और सब परेशान
फिर भी
मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल ।

रौंदते हुए निकल चुकी
सब पड़े मजधार में वीरान
उम्मीदों के जहाज़ को
डूबते देखा ऑखो ने
फिर भी
मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल

आज भी है ये आस
हर घड़ी हर पल
एक माँ को बस
अपने लाल का है इंतजार
फिर भी
मौत की ट्रेन की
कम न हुई चाल

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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