Editor

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मुंबई (हम हिंदुस्तानी)- सिनेस्तान इंडियाज स्टोरीटेलर्स कॉन्टेस्ट के निर्णायक मंडल में शामिल पटकथा लेखिका अंजुम राजाबली का मानना है कि 2018 ने इस तथ्य को साबित कर दिया है कि कमजोर लेखन के कारण बड़ी फिल्में धाराशायी हुई है और छोटी फिल्मों ने बेहतर स्क्रिप्ट की वजह से शानदार प्रदर्शन किया है. अंजुम राजाबली कहती हैं, “सिनेमाई अभिव्यक्ति का उपयोग करते हुए एक कहानी को उचित और सक्षम तरीके से बताया जाना चाहिए. यदि ऐसा किया जाता है, तो सभी अन्य सिनेमाई विभाग एक साथ एक जगह पर ठीक से काम करते है. ऐसी कोई बात नहीं है कि कोई खास 'समय किसी विशेष शैली के लिए सही नहीं है'. यह भारतीय दर्शकों के बारे में है कि वे भी अन्य दर्शकों की तरह एक दिलचस्प कहानी का अनुभव चाहते हैं. वे कह रहे हैं कि कहानी में मुझे शामिल करो, मुझे व्यस्त करो, मेरा मनोरंजन करो और मैं बार-बार वापस आऊंगा. हमने यही देखा है.” अंजुम राजाबली ने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि यदि कहानी में कमजोर पटकथा है तो स्टार कास्ट, शानदार प्रोड्क्शन वैल्यू, अद्भुत लोकेशन, वेशभूषा और एक महान निर्देशक हो तो भी फिल्म नहीं चलेगी. भारतीय फिल्म उद्योग ने धीरे-धीरे गंभीर रूप से इस तथ्य को स्वीकार करना शुरू कर दिया है. पिछले वर्ष शुरू हुई प्रतियोगिता के पहले संस्करण की सफलता के बाद, स्क्रिप्ट प्रतियोगिता का दूसरा संस्करण शुरू और अब प्रविष्टियों की समापन तिथि नजदीक है.
सिनेस्तान डिजिटल प्राइवेट लिमिटेड (Cinestaan.com) द्वारा लॉन्च "सिनेस्तान इंडियाज स्टोरीटेलर्स" आज तक का भारत की सबसे बड़ी स्क्रिप्ट प्रतियोगिता है. सर्वश्रेष्ठ स्क्रिप्ट को 25 लाख रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा. इस प्रतियोगिता के लिए कुल नकद पुरस्कार 50 लाख रुपये है. कुछ टॉप स्क्रिप्ट्स को सिनेस्तान स्क्रिप्ट बैंक में रखा जाएगा जिसके जरिए स्टूडियो और प्रोडक्शन हाउस लेखकों के साथ सीधे संपर्क कर सकते हैं. यह उन लेखकों के लिए बेहतर अवसर होगा, जो अक्सर अपनी आवाज ऐसे स्टूडियो और प्रोडक्शन हाउस तक नहीं पहुंचा पाते हैं.


-दीपा डिंगोलिया
ईश्वर के रूप में इस धरती पर बेजान शरीर में भी जो जान डाल दे वो मसीहा है डॉक्टर यानी भगवान का दूसरा रूप। डॉक्टर आजकल हड़ताल पर हैं और इसकी भेंट में कई जानें चढ़ चुकी हैं। पढ़कर बहुत दुःख हुआ कि इंसान इतना कठोर हो गया है। अपनी जिम्मेदारी व सही - गलत की पहचान भी खो रहा है। दया भाव व बुद्धिमानी से निर्णय ले पाने की क्षमता ही इंसान को अन्य जीव-जंतुओं से अलग करती है। जीवन दान का विशेषाधिकार सिर्फ डॉक्टर को मिला है। कभी-कभी डॉक्टर अपने इलाज से या अपनी जुबान से भी मरीज के जीवन में चमत्कार कर देते हैं। निजी स्वार्थ को परे कर अपेक्षा है कि लोगों की पीड़ा व रुदन को अनसुना न करते हुए तथा अपनी अन्तरात्मा को सुनते हुए एक डॉक्टर का यही प्रण हो कि वह लोगों के बेरंग होने वाले जीवन में अपनी सामर्थय अनुसार रंग भर देगा और लोगों की दुआओं से अपनी झोली भर लेगा।

रोहिणी , दिल्ली
deepadingolia@yahoo.com

 

-सुरेन्द्र कुमार (लेखक एवं विचारक)
हिमाचल प्रदेश।

प्रदेश के शासकीय विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए सरकार पाठ्य पुस्तकें,यूनिफार्म,मध्याह्न भोजन,स्वास्थ्य जांच इत्यादि सुविधाएँ निःशुल्क प्रदान कर रही हैं। इस कड़ी को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सरकार अब विद्यार्थियों को थाली-गिलास भी निःशुल्क वितरित करने जा रही है। राज्य के विद्यालयों में मुफ्त का यह ताना बाना जैसे जैसे विस्तारित होता जा रहा है,स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या का वैसे वैसे संकुचन होता जा रहा है। शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण व नि:शुल्क बनाने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। बावजूद इसके अभिभावकों का राजकीय पाठशालाओं से मोह भंग होता जा रहा है। विभाग हर वर्ष शिक्षा की बेहतरी के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। परंतु फिर भी सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या घटती ही जा रही है। राज्य के नौनिहालों के लिए भले ही हमारी सरकार अनेकों निःशुल्क सुविधाएँ प्रदान कर रही हो। लेकिन स्कूलों में इन सहुलियतों को प्रभावी रूप देने के लिए शिक्षक की नियुक्ति करना वह हर बार भूलती ही जा रही है। मुफ्त पुस्तकें,वर्दी स्वास्थ्य सुविधाएँ तभी पढ़ाई को प्रभावी बना सकती है यदि विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक तैनात हो। वर्तमान में प्रदेश में ऐसी अनेकों पाठशालाएं हैं,जहाँ उक्त सुविधाएँ तो मुहैया कराई गई है। लेकिन इन्हें सुचारु रूप से चलाने के लिए वहां अध्यापक नहीं है। राज्य में आज भी बहुत सी पाठशालाएं प्रतिनियुक्ति के सहारे हमारी काम चलाऊ व्यवस्था को ढो रही है। जबकि हजारों पाठशालाएं यहाँ ऐसी हैं जहाँ हम एक शिक्षक से शिक्षा की बेहतरी की आस लगाए हैं। हिमाचल में पीजीटी,टीजीटी,सीएंडवी शिक्षकों से लेकर पीआरटी शिक्षकों तक के अनेकों पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं। मार्च 2018 तक राज्य में कुल 17567 सीएंडवी अध्यापकों के सृजित पदों में से लगभग 5531 पद खाली पड़े थे। जिसमें शारीरिक शिक्षक के 1861,कला अध्यापक के 1467,भाषा अध्यापक के 768,गृह विज्ञान अध्यापक के 132, उर्दू अध्यापक के 11,योग शिक्षक के 07 तथा अन्य शिक्षकों के 13 पद रिक्त थे। जबकि पीजीटी के 1813 और टीजीटी के 2499 महत्वपूर्ण पद रिक्त पड़े हैं। जो दर्शाता है कि हमारे नीति निर्माता स्कूली शिक्षा के प्रति कितने गंभीर है। इतना ही नहीं प्रदेश की करीब दस हज़ार प्राथमिक पाठशालाओं में भी हजारों शिक्षकों के पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं। जेबीटी शिक्षक भर्ती में विभाग द्वारा अपनाए गए विभिन्न पैंतरों के उपरांत भी प्राथमिक अध्यापकों की नियुक्तियां राज्य में अभी भी सरकार की गले की फांद बनी हुई हैं। वर्ष 2012 में विभाग ने टेट मैरिट को शिक्षक भर्ती का आधार बनाया था। जिसे तात्कालिक प्रशिक्षित बेरोजगारों द्वारा प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी। मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा। परंतु बेरोजगारों को अभी तक न्याय नहीं मिला। शिक्षकों की कमी से जूझ रही हमारी मजबूर व्यवस्था का सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव हमारी दूरदराज की पाठशालाओं पर पड़ रहा है। जहां विभाग कड़ी मशक्कत के बाद कुछ अध्यापकों को नियुक्ति प्रदान करने का प्रयास तो करती है। परंतु प्रदेश सरकार की जुगाडु व्यवस्था हर बार नव नियुक्त शिक्षकों के राजनीतिक कद के समक्ष बौनी ही साबित होती है तथा वे ऐच्छिक स्टेशनों पर अपना समायोजन करवा देते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि सरकार एक शिक्षक की सुविधा के लिए दर्जनों शिक्षार्थियों के भविष्य से सहजता से खिलवाड़ कर देती है। इसी तरह राज्य में अनेकों स्कूल ऐसे हैं जो अभी भी 0-5 विद्यार्थियों के नामांकन के साथ विभाग की मजबूरी बने हुए हैं। विभाग की इस मजबूरी की वजह क्षेत्र के अभिभावकों की राजनीतिक पैठ है या स्कूल में तैनात अध्यापक का राजनीतिक रूतवा कहना मुश्किल है। परंतु इतना तय है कि सरकार के इस दोगले रवैये के चलते हमारी शिक्षा व्यवस्था का स्तर अवश्य गिर रहा है। कहीं तो 0-5 बच्चो पर दो-दो शिक्षक अपनी मोटी तनख्वा से राज्य की तिजोरी में डाका डाल रहे हैं पर कहीं हम 60 बच्चों के लिए एक शिक्षक से शिक्षा के उजयारे की उम्मीद लगाए बैठे हैं। विडम्बना यह भी है कि शिक्षार्थियों मुफ्त में मुहैया होने वाली उक्त सुविधाएँ अधिकतर उन्हें समय गुजर जाने के बाद ही उपलब्ध हो पाती हैं। इसका एक जीवंत उदाहरण हम शैक्षणिक सत्र 2018-19 की निःशुल्क यूनिफॉर्म वितरण में हो रही हद दर्जे की देरी के रूप में देख सकते हैं। सत्र समाप्त होने को है,परंतु मुफ्त वर्दी विद्यार्थियों को अभी तक नसीब नहीं हुई है। सरकारी झुनझुनों को झकझोरती यह कड़वी सच्चाई शासकीय प्रावधानों को कटघरे में खड़ा करती है। इस प्रकार राज्य के नौनिहाल इस वर्ष बिना यूनिफॉर्म ही पाठशालाओं में अनुशासन का पाठ पढ़ते रहे। अभिभावकों ने कई बार इस ज्वलंत मुद्दे को तपाने का प्रयास किया लेकिन ठंड के इस मौसम में उनके रोष की गरमाहट भी शीत विभागीय कार्यप्रणाली को गर्म करने में असमर्थ रही। यदि बच्चों को मिलने वाली निःशुल्क सहुलियतें समय रहते न मिले तो वक्त गुजर जाने के उपरांत उन्हें प्रदान करने का कोई सरोकार नहीं रहता और न ही बिना शिक्षक इनका पाठशाला में कोई औचित्य है। अरे साहब! अपने विद्यार्थियों को मुफ्त पुस्तकें,वर्दी,थाली-गिलास का प्रबंध तो कर दिया परंतु माकूल शिक्षक भर्ती से आप हर बार कतराते ही रहे हैं। श्रीमान हमें थाली-गिलास नहीं,स्कूलों के लिए पर्याप्त शिक्षक चाहिए। ताकि हमारे बच्चों की पढ़ाई सुचारु रूप से चल सके। जब तक शासकीय विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक नहीं होंगे तब तक आपकी उक्त सुविधाएँ पंगु ही साबित होगी। इसके अलावा शिक्षक भर्ती के लिए आपने अब तक जो रूमढुल रवैये अख्तियार किए है,उससे आगामी कई वर्षों तक स्कूलों को बिना अध्यापक ही गुजारा करने को मजबूर होना पड़ेगा। आप स्थाई शिक्षक भर्ती से कतरा रहे हैं तथा अस्थाई शिक्षक भर्ती को अधिमान दे रहे हैं। जबकि दूसरी ओर आप पिछले चौदह सालों से कार्यरत अस्थाई शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने से इतरा रहे हैं तथा साथ ही आपकी वर्तमान अस्थाई शिक्षक भर्ती को कुछ प्रशिक्षित बेरोजगारों ने कार्ट में चुनौती दी है। ऐसे में आपकी उच्च दार्शनिक सोच से न तो बच्चों को शिक्षक नसीब हो रहे हैं और न ही प्रशिक्षित बेरोजगारों को रोजगार। अतः सरकार को चाहिए कि सर्वप्रथम राज्य में तैनात अस्थाई शिक्षकों का स्थायी समाधान सुलझाए तथा भविष्य में विभाग में रेगुलर अध्यापकों को ही नियुक्त करें। तभी देश की अग्रणी कहलाए जाने वाली हिमाचली शिक्षा वास्तव में शिखर की ओर अग्रसर हो सकती है।


surenderkchaun@gmail.com


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-‘बोईसर-पालघर पत्रकार संघ’ द्वारा एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन एमआईडीसी टीमा हाल, नवापुर रोड,बोईसर (पश्चिम)में किया गया था, जोकि सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि चेयरमैन चिंचणी- तारापुर एजुकेशन सोसायटी के रजनीकांत भाई श्राफ थे और कार्यक्रम का संचालन चिंचणी कालेज के प्रो. संजय घरत ने किया। इस अवसर पर बोईसर-पालघर पत्रकार संघ के अध्यक्ष रामप्रकाश निराला एवं समस्त व्यास पीठ पर विराजमान विशिष्ट जनो का सत्कार अन्य पदाधिकारियों के हस्तों से पुष्प गुच्छें तो कार्यक्रम में सम्मिलित सभी स्नेहिल जनों को कलम एवं गुलाब के फुल देकर सदस्यों से स्वागत किया।संघ ने उत्कृष्ट कार्य करने के लिए सातपाटी के मिलन शंकर तरे की अनुपस्थिति में उनके आई एवं भाऊ को शाँल श्रीफल एवं स्मृति चिंह समेत ट्राफी समस्त अतिथियों एवं पत्रकारों की संयुक्त मंच से भेंट किया।समारोह में भारतीय प्रेस आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष डाँ. रविंद्र मिश्रा की ओर से जिले के राष्ट्रीय पत्रकारिता रत्न पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ श्री रामप्रकाश निराला,ओमप्रकाश द्विवेदी, अजीत सिंह, प्रमोद गजभिए को दी गयी। समारोह में बबन जाधव, अजित राणे,नितिन अग्रवाल(सभी औद्योगिक परिक्षेत्र), सोमनाथ कदम(पुलिस उपनिरीक्षक बोईसर)दिनेश अ़ंभोरे (सहा.अग्निशमन अधिकारी तारापुर), महेंद्र सिंह (आधार प्रतिष्ठान), रविंद्र मिश्रा (भारतीय प्रेस आयोग),नंदन मिश्रा (केसीएन क्लब), रफीक घांची, डी.वी.पाटील,वी.पी.मराठे, जयवंत अहिरे, प्रविण पाटील, प्रमोद तिवारी, गणेश पाण्डेय,ज्ञानेंद्र पाण्डेय असगर शेख इत्यादि वरिष्ठ पत्रकारों ने कार्यक्रम में उपस्थित रहकर कार्यक्रम को चार चाँद लगाया।


-गौरव मौर्या (सामाजिक विचारक)
संवेदनशीलता सभी प्राणियों में होती है,चाहे वो मनुष्य हो या पशु-पक्षी। लेकिन कुछ घटनाओं और तथ्यों का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलेगा कि मानवों की अपेक्षा अन्य जीव-जंतु अधिक संवेदनशील होतें है, और हो भी क्यों न ! आखिर वे प्रकृति के इतने करीब जो होतें है। शायद इसी लिए वे आने वाले खतरों के आभास कर लेतें है और अपने व्यवहार के माध्यम से इसे अभिव्यक्त भी करते हैं।हालांकि उनकी कोई भाषा या बोली नही होती पर खतरे का आभास होते ही वे विचित्र ढंग का व्यवहार करने लगतें है। विकसित सभ्यता के इस दौर में ऐसा लगता है, जैसे मनुष्य प्रत्येक प्रकार की विपदाओं से निपटने में पूरी तरह सक्षम है। जबकि ऐसा है नहीं। पहले जब मनुष्य प्रकृति के घनिष्ठ सम्पर्क में रहता था, तब उसे शायद आने वाली विपदाओं का पूर्वाभास हो जाता था। पशु-पक्षियों में आज भी इस तरह की क्षमतायें देखी जाती हैं। पूर्व में हुए कुछ अध्ययन से ये पता चलता है कि खतरे का आभास होते ही पशु पक्षी अपने सामान्य व्यवहार में परिवर्तन करने लगतें है जैसे भूकम्प से पहले घरेलू पशु-पक्षी अपने स्थान से आजाद होने की कोशिश करते हैं और स्वतंत्र होकर भागने लगते हैं; कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगते हैं; बिल्लियाँ रोने लगती हैं; कौए अपने घोंसले छोड़ कर हवा में उड़ने लगते हैं और भयंकर क्रंदन करते रहते हैं तथा साँप और चूहे अपने अपने बिलों से बाहर आ जाते हैं।
इससे जुड़ी कुछ घटनाओं पर नजर डालें तो हम ये पातें है कि वास्तव में जानवरों को खतरे का आभास पहले ही हो जाता है जैसे-1960 के चिली में आये भूकम्प से पहले वहाँ के हजारों पशु-पक्षी उस स्थान से प्रस्थान कर गए थे; जबकि उस भूकंप में हजारों लोगों की मौत हो गई थी। अण्डमान एवं निकोबार द्वीप समूह में सुनामी के आने से पहले ही अधिकतर जानवर ऊँचाई वाले क्षेत्रों में सुरक्षित पहुँच चुके थे। सुनामी में कोई भी स्वस्थ जानवर मृत अवस्था में नहीं मिला। श्रीलंका की सरकारी समाचार विज्ञप्ति के अनुसार वहाँ मानवीय नुकसान अवश्य हुआ, लेकिन मुख्य जंगल (रिजर्व) में समुद्री लहरें 35 मील तक अन्दर आ जाने के बावजूद पशु-पक्षी नहीं मरा। गुजरात भूकम्प के दौरान एक महिला को उसके कुत्ते ने साड़ी पकड़ कर खींचा और घर से बाहर निकलने को विवश कर दिया। जैसे ही महिला बाहर आयी, भूकम्प से मकान भरभरा कर गिर पड़ा। गुजरात में भूकम्प आने से ठीक पहले कई स्थानों पर गायों ने जोर-जोर से रंभाना प्रारम्भ कर दिया था। इसी तरह 1966 में ताशकंद को हिला कर रख देने वाले भूकंप से पहले वहाँ के चिड़ियाघर के संचालको ने जानवरों में अजीब सी बेचैनी पैदा होने की सूचना दी थी उन्होंने ये भी देखा कि भूकंप आने से कुछ घण्टे पहले चींटियों की लंबी कतारें जमीन से निकलकर अन्य स्थानों को ओर जा रही थी।
ये सब उदाहरण हैं ,जो ये दर्शातें हैं कि पशु-पक्षियों को आगामी खतरों का पूर्वाभास हो जाता है।ये सब कैसे होता है ,इसका कोई ठोस स्पष्टीकरण नही है।ये सब तो उन्हें प्रकृति प्रदत्त उपहार हैं। यदि गहराई से इन बातों को देखा जाय तो एक बात स्पष्ट होती है कि जो प्रकृति के जितना करीब होता है प्रकृति उससे उतना ज्यादा लगाव रखती है और विभिन्न प्रकार के सकारात्मक और नकारात्मक संकेत देती रहती है। अतः प्रकृति ऐसे संकेत हमे भी देती है लेकिन प्रकृति से मुँह मोड़ लेने के कारण न तो हम उन्हें समझ पातें हैं और न ही उसके आधार पर अपने जीवन को सुरक्षित बना पातें है। इसलिए जरूरत है प्रकृति से जुड़े रहने की और उन संकेतों को समझने की जो प्रकृति हमारी रक्षा हेतु हमें देना चाहती है।

जौनपुर, उत्तर प्रदेश
8317036927
पूर्व छात्र- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी


"आशुतोष", पटना (बिहार )


ऊँचे ऊँचे पहाड़ियों टेढ़े-मेढ़े रास्ते और उबर-खावर खेत के बीच शीतल ऐसे दौड़ती हुई चल रही थी जैसे कोई आम रास्ता हो दरअसल वो इन रास्तो की अभ्यस्त थी।रोज ही दूर ऊन पहाड़ियो में अपने ताऊ को खाना देने या जरूरत की सामान देने जाया करती थी।उसकी खेत थोड़ी दूरी पर थी जो सामने के रास्ते से दूर होती थी पर पहाड़ियों के रास्ते से नजदीक ।
आसमान में काले बादल उमड़ रहे थे ऊँचे लिप्ट्स के पौधे हिलते हुए मानो अंगड़ाई ले रहे हो उँचे पहाड़ो के बीच खेतो में पलास के फूल और काले बादल शीतल हवा के बीच शीतल झूमती हुई पगडंडियों से होते हुए खेत पर आते ही ऐ ताऊ! क्या कर रहे हो?पहले नाश्ता कर लो?
ताऊ! आ गई तू रे आज देर कर दी?
देखो ताऊ देखो बादल कितनी जोर की लगी है जल्दी करो मुझे घर भी तो जाना है ?
ताऊ जबतक बादल छट नही जाते घर मत जाना जा उस मचान के नीचे बैठ मै अभी आया ।
ताऊ हाथ मुँह घोकर नाश्ता कर वही लेट गये और शीतल चुपके से अपनी घर लगभग दौडती हुई आ गयी।बादल जोर की गरजने लगे बिजली चमक रही थी और जोर की बारिस होने लगी ताऊ मचान मे ही थे उनको अंदेशा तो हो रहा था पर वो आश्वस्त थे कि शीतल घर पहुँच गयी होगी।वारिस रूकने की बजाय और तेज हो गई पहाडियो में अकेले ताऊ की घबराहट बढने लगी पिछले चार घंटे से वारिस तेज हो रही थी बिजली चमकने पर कंपन सी हो जाती और भूस्कखलन का डर सता रहा था ताऊ को! आखिर कार हुआ भी वही पहाड़ियो से पत्थर लुढकने लगे देखते ही देखते ताऊ की खेत और ताऊ जमींदोज हो गये बारिस होती रही तकरीबन पूरी रात बरसने के बाद सुबह सुबह शीतल ताऊ को देखने पहुँची न उसे खेत मिल रहे थे न ही ताऊ दरअसल भूसंख्लन से नक्शा ही बिगड़ चुका था तब तक गाँव के लोग और परिवार के सदस्य भी आ चुके थे।स्थानीय प्रशासन को बुलाया गया खुदाई की जाने लगी और बडी मशक्कत के बाद ताऊ जी को बाहर निकाला जा सका वो वेहोश थे उन्हें हास्पीटल ले जाया गया जहा उनका ईलाज चल रहा है लेकिन सिर्फ सांसे चल रही ताऊ न बोलते है न कुछ कहते है सिर्फ जिंदा है शीतल बहुत उदास बैठी थी क्योंकि वो समझती थी अपने ताऊ की परेशानी ताऊ यदि घर पर रहते तो आज ठीक होते।इन सब की वजह वो पारिवारिक कलह मानती है कैसे ताऊ सभी लोग व्यवहार करते थे बात-बात पर ताने देना इन सब से तंग आकर ताऊ पहिड़ियो पर खेतो में ही रहने लगे थे । काश ऐसा न हुआ होता तो ताऊ भी बात करते यही सब सोचते हुए शीतल उदास बैठी थी कि अचानक ताऊ बोले शीतल बेटा उदास मत हो मै ठीक हो जाऊँगा शीतल ईधर उधर देखने लगी कहीं वहम तो नही लेकिन ताऊ पर नजर पडते ही दूर हो गई ताऊ को होश आ रहा था परिवार के लोग भी अपने किए पर पश्चाताप कर रो रहे थे ताऊ के होश मे आना जैसे सभी के लिए वरदान हो।

jhaashu00@gmail.com


*सुभाष चन्दर,गिरीश पंकज,आलोक पुराणिक,राम किशोर उपाध्याय आदि व्यंग्य पुरोधाओ की उपस्थिति में संपन्न हुआ व्यंग्य की महा पंचायत

नई दिल्ली मुंबई (हम हिंदुस्तानी)- हिन्दी भवन नई दिल्ली में 11 जनवरी 2018 को संध्या 4:30 बजे से माध्यम साहित्य संस्थान के तात्वाधान एवं व्यंग्य श्री सुभाष चन्दर की अध्यक्षता में ‘व्यंग्य की महापंचायत’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम में 6 पुस्तकों एवं दो पत्रिकाओं का विमोचन भी किया गया। जिसमें विनोद कुमार विक्की के अतिथि संपादक में प्रकाशित ‘‘अट्टहास’’ का जनवरी पूर्वोत्तर/पूर्वांचल व्यंग्य विशेषांक और उनका स्वयं का व्यंग्य संग्रह ‘‘हास्य-व्यंग्य की भेलपूरी’’ भी शामिल था। इसी कड़ी में डाॅ. ममता मेहता का व्यंग्य संग्रह ‘‘धोबी का व्यंग्य पाट‘‘ और डाॅ. स्नेहलता पाठक का व्यंग्य संग्रह ‘‘सच बोले कौवा काटे’’ का भी लोकार्पण किया गया। साथ ही साथ सुश्री वीना सिंह की पुस्तक ‘‘बेवजह यूं ही’’ और डाॅ. संगीता की पुस्तक ‘‘तुम्हारे लिये’’,राम किशोर उपाध्याय के संपादन वाली पत्रिका उत्कर्ष की ओर एवं अंशु प्रधान की पुस्तक का विमोचन भी किया गया।
विदित हो कि माध्यम साहित्यिक संस्थान की स्थापना 54 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध कवि डाॅ. हरिवंश राय बच्चन, डाॅ. शिव मंगल सिंह सुमन, डाॅ. विद्या निवास मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, डाॅ. चन्द्र देव सिंह और वर्तमान महासचिव श्री अनूप श्रीवास्तव ने की थी।
इस महा पंचायत मे एमपी,छत्तीसगढ़,चंडीगढ़,यूपी,उतराखण्ड,बिहार सहित दिल्ली के कई दिग्गज व्यंग्यकारों की उपस्थिति देखने को मिली।
मंचस्थ अध्यक्ष सुभाष चन्दर एवं विशिष्ट अतिथि अरूण अर्णव खरे,गुरमीत बेदी,आलोक पुराणिक,गिरीश पंकज,श्रवण कुमार उर्मलिया,राजशेखर चौबे के अलावा अनूप श्रीवास्तव, अंशुप्रधान, आलोक खरे,निर्मल गुप्त,सुनील जैन राही,खगड़िया के गज़लकार शिवकुमार सुमन,अवधेश्वर प्रसाद सिंह,राजेश कुमार,मेट्रो रेलवे राजभाषा अधिकारी डाॅ राजाराम यादव,ममता मेहता,स्नेह लता पाठक,डाॅ.संगीता,शिल्पा श्रीवास्तव,राजशेखर भट्ट,विनोद कुमार विक्की,संतराम पांडेय,कैलाश झा किंकर,सुधांशु माथुर, अंजु निगम (संयुक्त सचिव सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय) , ओम प्रकाश शुक्ल
सहित दर्जनों व्यंग्यकार व साहित्यकार श्रोता के रूप में उपस्थित थे।
अतिथियों का सम्मान शिल्पा सुधांशु,विनोद कुमार विक्की,राम किशोर उपाध्याय ने किया।सम्मान समारोह में शिल्पा सुधांशु की नन्ही सुपुत्री परी की भूमिका भी सराहनीय रही।
‘व्यंग्य की महापंचायत’’ कार्यक्रम में सभी वरिष्ठ व्यंग्यकारों द्वारा चर्चा-परिचर्चा का दौर चला। जिसमें ‘‘व्यंग्य के मानक और संप्रेषणीयता की चुनौती’’ पर चर्चा की गयी। इस चर्चा में श्री सुभाष चन्दर, श्री अरविंद तिवारी, श्री गुरमीत बेदी, श्री आलोक पुराणिक, श्री राजेन्द्र वर्मा, श्री रामकिशोर उपाध्याय, श्री अनूप श्रीवास्तव, डाॅ. स्नेहलता पाठक, श्री महेन्द्र ठाकुर , श्री राजशेखर चैबे, श्री अरूण अर्णव खरे, श्री अरूण कुमार उर्मेलिया, श्री गिरीश पंकज, श्री निर्मण गुप्त, सुश्री वीणा सिंह और श्री विनोद कुमार विक्की ने भाग लिया। इस परिचर्चा में व्यंग्य के गिरते स्तर और पाठकों के घटते स्तर गहन मंथन किया गया। व्यंग्य के मानकों और व्यंग्य विधा के बदलते स्वरूप पर भी सभी व्यंग्यकारों ने अपनी-अपनी टिप्पणी से अनेक नये तथ्य उजागर किये। जाहिर है कि विसंगतियों से व्यंग्य पैदा होता है, लेकिन अब वर्तमान समय और नये लेखकों की नयी मंत्रणा से व्यंग्य स्वयं विसंगति बनता जा रहा है। जिसके उपचार की आवश्यकता है और नये व्यंग्यकारों को पठन-पाठन, चिंतन-मनन करने की जरूरत है।
सुभाष चन्दर ने व्यंग्य विमर्श में चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इन दिनों छपने की होड़ में व्यंग्य कार अपनी मौलिकता खो रहे है। महज कुछ पत्र पत्रिकाओं में छप जाना किसी भी कसौटी से आपके व्यंग्यकार होने का प्रमाण नहीं है।उन्हें पहले व्यंग्य को जीना व समझना चाहिए।अरविंद तिवारी ने भी विषय पर अपने विचार व्यक्त किये।
गिरीश पंकज ने स्पष्ट तौर पर कहा कि व्यंग्य के नाम पर आने वाली पुस्तकों में अधिकांश रचनाएँ व्यंग्य शून्य व सपाटबयानी होती है।स्नेह लता पाठक ने व्यंग्य साहित्य में महिलाओं की भागीदारी की तारीफ की तो महिला की अधिकाधिक प्रोत्साहन की वकालत भी की।महेन्द्र ठाकुर ने महिलाओं के नाम पर सहानूभूति तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और बेटे को मार दो।उन्होंने कहा कि हर जगह स्त्रियों,माँ आदि की अहमियत व महत्ता बताई जाती है और पुरुष या पिता की जयकार कोई नहीं करता। आलोक पुराणिक ने व्यंग्यकारों को ना केवल राष्ट्रीय परिदृश्य अपितु अंतराष्ट्रीय जानकारी रखने की नसीहत दी ताकि रचना धर्मिता में कोई चूक ना रह जाए।
राजेंद्र वर्मा ने व्यंग्य के प्रेषण व संप्रेषण पर काफी बारीकी से मुद्दे को उठाया।
अरूण अर्णव खरे एवं श्रवण कुमार उर्मलिया ने अपने संक्षिप्त संबोधन में कहा कि व्यंग्य का कोई भी मानक सुनिश्चित नहीं किया जा सकता बस व्यंग्यकार की सोच ही व्यंग्य का सृजन कर सकती हैं।वीना सिंह,गुरमीत बेदी,राजशेखर चौबे, निर्मल गुप्त ने भी संक्षेप में व्यंग्य के मानक व संप्रेषणीयता पर चर्चा की तो विनोद कुमार विक्की ने कामचलाऊ लेखक संघ पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की।
इस मौके पर व्यंग्य साहित्य जगत के सात साहित्यकारों को सम्मानित भी किया गया।
मेरठ के संतराम पाण्डेय हिन्दी साहित्य संवर्धन एवं प्रोत्साहन हेतु तो देहरादून के राज शेखर भट्ट युवा संपादक सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया।
बिहार के विनोद कुमार विक्की को युवा व्यंग्यकार सारस्वत सम्मान से नवाजा गया।
पिथौरागढ़ के ललित शौर्य नवलेखन हेतु तो बिहार के कैलाश झा किंकर को अंगिका भाषा में व्यंग्य लेखन हेतु सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया दिल्ली की शशि पाण्डेय को युवा महिला व्यंग्यकार हेतु सारस्वत सम्मान एवं अर्चना चतुर्वेदी को सारस्वत सम्मान से सम्मानित किया गया। ललित शौर्य दुर्घटना में चोटिल होने की वजह से एवं अर्चना चतुर्वेदी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाएं।
मंच का संचालन श्री राम किशोर उपाध्याय ने एवं धन्यवाद ज्ञापन श्री अनूप श्रीवास्तव ने किया।


रोहतक (हम हिंदुस्तानी)- बहलम्बे गाँव की बेटी और अजायब गांव की बहू प्रसिद्ध कवयित्री, शिक्षाविद एवं समाज सेविका डॉ सुलक्षणा अहलावत को जयपुर में वीआ अवार्ड और रोहतक में सुमेर सिंह आर्य संस्थान ने गेस्ट ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया। 12 जनवरी को जयपुर के मैसूर महल में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर वीआ अवार्ड 2019 से सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में जानी मानी अभिनेत्री डॉ अदिति गोवित्रिकर मुख्य अतिथि और राजस्थान की मशहूर कालबेलिया डांसर पदम् श्री गुलाबो सपेरा विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। डॉ सुलक्षणा वीआ अवार्ड 2019 सामाजिक कार्यों के लिए प्रदान किया गया। वहीं 13 जनवरी को सुमेर सिंह आर्य संस्थान द्वारा रोहतक में आयोजित लोहड़ी मिलन समारोह एवं भारतीय प्रतिभा गौरव अवार्ड 2019 में गेस्ट ऑफ ऑनर से सम्मानित किया गया।
डॉ सुलक्षणा अहलावत आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, समाज में उनकी पहचान शिक्षाविद, कवयित्री एवं समाज सेविका के तौर पर है। डॉ सुलक्षणा सामाजिक संस्था विलक्षणा एक सार्थक पहल समिति की संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। वो अपनी संस्था के माध्यम से समाज हित के कार्य करती रहती हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण पर कार्य करती हैं। अपनी संस्था के माध्यम से स्वास्थ्य जांच एवं रक्तदान शिविर आयोजित करती हैं तथा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुफ्त में सिलाई प्रशिक्षण व ब्यूटीशियन प्रशिक्षण केंद्र संचालित कर रही हैं।
दूसरी तरफ वो अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से हमारे समाज की कुरीतियों को दूर करने का प्रयास करती हैं। अपनी कलम के माध्यम से वो सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार करती हैं। सोशल मीडिया में उन्हें उनके बेबज लेखन के लिए जाना जाता है। अब तक अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर 90 से ज्यादा पत्र पत्रिकाओं एवं अखबारों में उनकी रचनाएं निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं।
पत्रकारों से बात करते हुए डॉ सुलक्षणा ने बताया कि यह सम्मान उनका नहीं पूरे क्षेत्र और सभी महिलाओं का है। वो आम जनता की मदद से ही समाजहित कार्य करने का प्रयास करती हैं और यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि हमें सब कुछ अपने समाज से मिलता है और हमारा भी दायित्व बनता है कि हम भी समाज को कुछ दें। उन्होंने लोगों से अपील करते हुए कहा कि जितना हम सभी से हो सके उतना हमें समाज हित में कार्य करना चाहिए।


विवेक कुमार पाठक (स्वतंत्र पत्रकार)

भारतीय राजनीति में समानता के हक की बात करने वालों के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का एक कदम उत्साहजनक है। कांग्रेस ने किन्नर अप्सरा रेड्डी को महिला कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव नियुक्त किया है। पत्रकारिता, राजनीति और समाजसेवा में लंबे अरसे से काम रहीं अप्सरा को यह दायित्व मिलना एक बड़ी शुरुआत का सुखद संकेत है। कोई बड़ी बात नहीं कि अर्से से समाज में जिल्लत की जिन्दगी जी रहे किन्नरों को आगामी दिनों में लोग हर क्षेत्र में खुले दिल से समानता के साथ स्वीकारेंगे।
हम जानते हैं कि ईश्वर की बनाई रचना अनुसार स्त्री और पुरुष के अलावा एक तीसरा वर्ग भी है जिसे समाज में किन्नर कहा जाता है। उनकी शारीरिक बनावट और लिंग असंतुलन में उनका कोई दोष नहीं है इसके बाबजूद समाज मे किन्नरों के साथ अपराधियों की तरह अरसे से दोयम दर्जे का व्यवहार किया जा रहा है। पश्चिमी देशों में नागरिक अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता जगजाहिर है। वहां किन्नरों के प्रति समाज में न ही दोयम दर्जे का भाव नहीं है न ही उनकी लैगिंक भिन्नता के कारण वे समाज की मुख्य धारा से अलग हैं।
भारत में इससे इतर हालत काफी खराब रहे हैं। पुरुष और स्त्री से अलग तीसरे लिंग वाले नागरिक के प्रति समाज में दोयम दर्जे का व्यवहार आए दिन देखा जाता है। किन्नर समाज में रहकर भी समाज में शामिल नहीं हैं। उनकी दुनिया जैसे एकदम अलग कर दी गई है। समाज का बहुसंख्यक वर्ग किन्नरों को सिर्फ ताली पीटकर नाचने गाने वाले ऐसे इंसान मानता है जो बाकी दुनिया से एकदम अलग हैं। दुआएं देते नाचते गाते किन्नर एक नागरिक के रुप में किस तरह असमानता का सामना कर रहे हैं लोग देख ही नहीं पाते। वे विदूषक का जीवन जीने के लिए अभिशप्त रहे हैं। इन सबके बाबजूद किन्नरों की राजनैतिक उपस्थिति समाज में बडे़े बदलाव का वातावरण बना रही है।

आम लोगों की तरह बीबी बच्चों वाला जीवन न जीने के कारण कहीं न कहीं लोग मानते हैं कि उनका राजनैतिक जीवन परिवार के स्वार्थों से भरा नहीं होगा। आम मतदाता चुनाव में बाकी उम्मीदवारों को धता बताते हुए किन्नरों को अपना वोट देते हुए शायद यही मंशा जता रहे हैं। देश में होने वाले चुनावों में अब किन्नर प्रत्याशियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
25 अप्रैल 2014 ने भारतीय समाज में किन्नरों की स्वतंत्र पहचान स्थापित की है। देश में इस तारीख से उन्हें तीसरे ट्रांसजेंडर के रुप में तीसरे लिंग की पात्रता हांसिल हुई है। वे अब पुरुष और स्त्री वर्ग से अलग अपनी स्वतंत्र पहचान रखते हैं।
किन्नरों के लिए राजनीति का द्वार मध्यप्रदेश में शबनम मौसी के साहस के कारण खुला। वे शहडोल जिले के सोहागपुर क्षेत्र से साल 2000 में पहली दफा चुनाव लड़कर निर्दलीय विधायक बनीं। इसके बाद देश में कई किन्नरों ने अपनी किस्मत राजनीति में आजमाई है। मप्र विधानसभा चुनाव 2018 में अंबाह से किन्नर प्रत्याशी को बंपर वोट मिले। ग्वालियर में कांग्रेस के चुनावी अभियान के वक्त आधा दर्जन किन्नर समारोहपूर्वक कांग्रेस में शामिल किए गए। किन्नरों की यह यात्रा बराबर जारी है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में दक्षिणी राज्यों में किन्नरों के बीच अधिक राजनैतिक महत्वकांक्षा देखी जा रही है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिवस जिन अप्सरा रेड्डी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया है वो तमिलनाडु की हैं और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के सामने 2016 में भाजपा की सदस्य ले चुकी थीं। राजनीति में आगे बढ़ने के लिए सक्रिय अप्सरा आखिरकार दिल्ली की राजनीति में दमदारी से आई हैं। उन्हें राहुल गांधी और महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुष्मिता देव ने अपनी उपस्थिति में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के रुप में मीडिया से मुखातिब कराया। अप्सरा रेड्डी ने इस जिम्मेदारी पर कहा कि वे भावुक हैं और उन्हें अपनी जिम्मेदारियों से वाकिफ हैं। वे राजनीति के जरिए जनसेवा का काम ईमानदारी से करेंगी। राष्ट्रीय राजनीति में अप्सरा का पहुंचना किन्नरों के लिए न केवल एक प्रेरणा देगा बल्कि ये समाज में किन्नरों की स्वीकार्यता और सम्मान की दिशा में बड़ा कदम है। समाज में उनके नागरिक अधिकारों को देश के राजनैतिक दलों की तरह आम नागरिक पूरा महत्व देंगे फिलहाल तो यही आशा की जानी चाहिए।

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शामली (हम हिंदुस्तानी)- एम. टी. डी. मीडिया वर्कस् के बैनर तले अभी हाल ही में कबर सोंग क्या हुआ रिलीज किया गया | इस सदाबहार गीत में अमित आरोही ने बेहतरीन अभिनय किया है |
‘क्या हुआ’ के प्रोड्यूसर शंशाक तिवारी हैं, निर्देशक टी. एम. मोहन सारस्वत हैं | डीओपी ओम सारस्वत, प्रोजेक्ट हैड ठाकुर अंकित गहलोत, क्रिएटिव हैड हिमांक पी कानव, ग्राफिक्स आर. हंसराज, मीडिया पार्टनर मुकेश कुमार ऋषि वर्मा, सहयोगी गायक रजनीश पिंगलराज, रजत चौधरी, चिन्ता चौधरी, अजय शर्मा, प्रवीन, सोनू राठोर आदि |
आपको बतादें कि एम. टी. डी. मीडिया वर्कस् के बैनर तले जो भी प्रोजेक्ट आते हैं वे अश्लीलता से कोसों दूर होते हैं | एम. टी. डी. मीडिया वर्कस् के बैनर तले अब तक तमाम लघु फिल्में, सदाबहार गीत, धारावाहिक आदि रिलाज किये जा चुके हैं | उपर्युक्त कबर सोंग भी लीक से हटकर है |

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