Editor

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निर्मल रानी
भारतवर्ष इस समय राजनीति में भयंकर संक्रमण के दौर से गुज़र रहा है। वैचारिक, जनसरोकारों से जुड़ी, सामजिक उत्थान को केंद्रबिंदु बनाकर चलने वाली तथा विकासवादी राजनीति का पतन होते देखा जा रहा है। इसका स्थान सांप्रदायिकतावादी, जातिवादी, क्षेत्रवादी, सत्ता पर काबिज़ होने की प्रवृति रखने वाली तथा वैचारिक मतभेदों के बजाए निजी मनभेदों को परवान चढ़ाने वाली राजनीति ने ले लिया है। नेता से लेकर अधिकारियों तक से चुन-चुन कर बदले लिए जाने जैसा घृणित व निजी द्वेष दर्शाने वाला माहौल देखा जा रहा है। खासतौर पर गत् कुछ वर्षों में राजनीति में ऐसी प्रवृति ने तेज़ी से ज़ोर पकड़ा है जहां किसी सत्ताधारी राजनेता से वैचारिक मतभेद रखने वाले या किसी राजनेता की पोल खोलने वाले तथा उसे आईना दिखाने वाले अधिकारी की किसी अन्य बहाने से या तो छुट्टी कर दी गई या उसे जेल भेज दिया गया। या फिर ऐसे किसी काबिल अधिकारी को बर्खास्त कर देना अथवा उसका किसी ऐसी जगह स्थानांतरण कर देना जहां उसे उसकी योग्यता व क्षमता के अनुरूप कार्य करने का अवसर न दिया जाए, यह आम बात हो गई है। कभी-कभी तो ऐसा महसूस होता है कि ऐसी संकुचित मानसिकता रखने वाले नेता वास्तव में देश व जनहित की राजनीति कर रहे हैं या फिर अपनी सत्ता हासिल करने की स्वार्थसिद्धि की खातिर निजी द्वेष या दुश्मनी निभाने के स्तर तक उतर आए हैं?
ताज़ातरीन घटना पंजाब के होशियारपुर निवासी एवं उत्तर प्रदेश कैडर के 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी जसवीर सिंह से जुड़ी है। उन्हें गत् दिनों उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने केवल इस आरोप में ब$र्खास्त कर दिया क्योंकि उन्होंने कथित रूप से किसी निजी वेबसाईट को एक साक्षात्कार दिया था। जसवीर सिंह पर आरोप है कि उन्होंने अपने साक्षात्कार में कथित रूप से कुछ ऐसी बातें कहीं जो एक पुलिस अधिकारी होते हुए उन्हें नियमानुसार नहीं करनी चाहिए थीं। हालांकि उनसे इस संबंध में स्पष्टीकरण भी मांगा गया था। परंतु स्पष्टीकरण का जवाब न देने पर योगी सरकार द्वारा उन्हें उनके पद से निलंबित कर दिया गया। जसवीर सिंह अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक(एडीजी)रूल्स एंड मैनुअल शाखा में तैनात थे। अब ज़रा जसवीर सिंह की सेवाकाल के पिछले पन्नों को पलटकर भी देखिए। यह वही जसवीर सिंह हैं जिन्होंने 2009 में वर्तमान मु यमंत्री उत्तर प्रदेश आदित्यनाथ योगी के विरुद्ध दंगे करवाने के आरोप में राष्ट्रीय सुरक्षा $कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की थी। इतना ही नहीं बल्कि इसी निडर अधिकारी ने 1997 में सबसे पहले उत्तर प्रदेश के कुंडा के विधायक रघुराज प्रताप सिंह उ$र्फ राजा भैया पर उस समय शिकंजा कसा था जबकि वे प्रतापगढ़ में बतौर पुलिस अधीक्षक तैनात थे। हालांकि इन दोनों ही नेताओं पर हाथ डालने का परिणाम स्थानांतरण के रूप में जसवीर सिंह को तत्काल ही भुगतना पड़ा था। यह राष्ट्रभक्त एवं कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी यह मानता है कि राष्ट्र तथा राष्ट्रीय कार्य सर्वोपरि हैं। इसके लिए अधिकारियों को किसी भी प्रकार का बलिदान देने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
जसवीर सिंह के उपरोक्त कारनामों को जानने के बाद क्या ऐसा समझा जा सकता है कि इतने जि़ मेदार व कर्तव्यनिष्ठ तथा ईमानदार अधिकारी को केवल इसलिए निलंबित कर दिया गया होगा कि उसने किसी वेबसाईट में अपने विचार क्यों व्यक्त किए? इन्हीं परिस्थितियों से देश के अनेक आलाअधिकारियों को जूझना पड़ रहा है। हम कह सकते हैं कि राजनीति के इस संक्रमण काल में ज्ञानवान तथा सूझ-बूझ रखने वाले कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की नहीं बल्कि चाटुकार $िकस्म के जी हुज़ूरी करने वाले खुशामदपरस्त वफादारों की ज़रूरत है। किसी अधिकारी की योग्यता का पैमाना उसकी काबिलियत नहीं बल्कि उसकी वफादारी व खुशामदपरस्ती बन चुकी है। गुजरात में संजीव भट्ट नामक एक ऐसा ही पुलिस अधिकारी इसी प्रकार के राजनैतिक विद्वेष की सज़ा भुगत रहा है। इस प्रकार के अधिकारियों की सूची बहुत लंबी है। नौकरशाही के लोगों से बदला लेने या उनपर किसी न किसी बहाने शासकों की गाज गिरने की कहानी तो इस देश में पुरानी हो चुकी है। वर्तमान दौर में तो राजनेता भी अपने प्रतिद्वंद्वी राजनेता से सीधे तौर पर बदला लेते दिखाई दे रहे हैं। साफ नज़र आ रहा है कि जैसे एक नेता दूसरे को यह संदेश दे रहा हो कि कल जब तु हारे पास सत्ता थी तो तुमने यह कर दिखाया, आज मेरे पास सत्ता है तो मैं भी वही काम कर सकता हूं।
लखनऊ में पिछले दिनों ऐसी ही एक घटना उस समय घटी जबकि उत्तर प्रदेश के पूर्व मु यमंत्री अखिलेश यादव को लखनऊ स्थित हवाई अड्डे पर उस समय भारी पुलिस बल द्वारा रोक दिया गया जबकि वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने हेतु इलाहाबाद के लिए उड़ान भरने वाले थे। प्रशासन द्वारा इलाहाबाद में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर अखिलेश यादव को इलाहाबाद की उड़ान भरने से रोका। अब ज़रा इस घटना की पृष्ठभूमि में भी झांककर देखिए। इलाहाबाद छात्रसंघ समारोह में 20 नवंबर 2015 को तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को शरीक होना था। उस समय अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री थे। जिस समय योगी, छात्रसंघ के निमंत्रण पर इलाहाबाद जा रहे थे उस समय उनके का$िफले को इलाहाबाद में प्रवेश करने से उत्तर प्रदेश पुलिस ने रोक दिया था। उस समय योगी आदित्यनाथ पर कई आपाराधिक मुकद्दमे चल रहे थे। वे एक फायरब्रांड नेता के रूप में भी अपनी पहचान रखते थे। अखिलेश सरकार ने इन्हीं बातों के मद्देनज़र तथा इलाहाबाद में कानून व्यवस्था बनाए रखने की गरज़ से योगी आदित्यनाथ को इलाहाबाद में प्रवेश करने से रोक दिया था। परंतु पिछले दिनों अखिलेश यादव को इलाहाबाद न जाने देने का कारण भी सरकार द्वारा हूबहू वही बताया गया जो 2015 में अखिलेश सरकार द्वारा बताया गया था। इस पूरे घटनाक्रम के पीछे के सच व झूठ का निर्णय तो जनता ही कर सकती है।
वैसे भी इस समय यदि आप राष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप में अथवा आय से अधिक संपत्ति रखने जैसे इल्ज़ामों में संलिप्त पाए जाने वाले नेताओं के नाम देखें या सीबीआई अथवा प्रवर्तन निदेशालय के निशाने पर आने वाले लोगों की सूची देखें तो आपको इस बात का सा$फतौर पर अंदाज़ा हो जाएगा कि भ्रष्टाचार केवल सत्ता का विरोध करने वालों की ओर ही दिखाई दे रहा है और सत्ता पक्ष पूरी तरह से 'दूध का धुला' है। पिछले दिनों शारदा चिटफं़ंड घोटाले को लेकर कोलकाता में सीबीआई व ममता बैनर्जी के मध्य चली रस्साकशी में भी अनेक विश£ेषक व समीक्षक यह पूछते रहे कि शारदा घोटाले का सबसे पहला व बड़ा आरोपी सांसद मुकुल रॉय क्या केवल इसलिए शारदा घोटाले का आरोपी नहीं रहा क्योंकि उसने भारतीय जनता पार्टी जैसी 'पवित्र गंगा' में डुबकी लगा ली? और ममता बैनर्जी व उनके अन्य सहयोगी केवल इसलिए जि़ मेदार हैं क्योंकि वे पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की प्रत्येक साजि़श का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं? दरअसल राजनीति में विद्वेषपूर्ण तथा निजी स्तर पर दुर्भावना रखने वालों के तेज़ी से बढ़ते प्रवेश ने राजनीति के चेहरे को कुरूपित कर दिया है। यही वजह है कि देश में वैचारिक राजनीति का पतन हो चुका है। अवसरवादी राजनीति तेज़ी से परवान चढ़ रही है। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय बिना किसी वैचारिक दृष्टिकोण के केवल पार्टी का टिकट अथवा मंत्री बनने की चाहत में अपनी सुविधा अनुसार किसी भी दल में बेरोक-टोक जा सकता है। राजनीति का प्रतिशोध काल भी इसी संक्रमणकारी राजनीति का हिस्सा है।

1885/2, Ranjit Nagar
Ambala City 134002
Haryana, phone-09729229728


-घनश्याम भारतीय
पठानकोट और उरी के बाद पुलवामा में सैनिकों पर हुए हमले की पीड़ा देश के बच्चे-बच्चे की जुबान से फूट रही है। यह जम्मू-कश्मीर के इतिहास में सबसे बड़ा आतंकी हमला बताया जा रहा है। हमारी हिफाज़त करते-करते इतनी बड़ी संख्या में जिन जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, उनकी शहादत के सम्मान में आज देश भर के लोगों के सिर झुके हुए हैं। कैंडल मार्च और श्रद्धांजलि सभा के माध्यम से उठ रही नागरिकों की आवाज को किसी कीमत पर नज़र अंदाज नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह आवाज किसी एक जाति धर्म और संप्रदाय की नहीं अपितु उस सम्पूर्ण राष्ट्र की है जिसके आंगन में आतंकवाद का नाग फुफकार रहा है। जाने अनजाने में उसे दूध पिलाने के बजाय अब उसके विषैले फन कुचलने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकार के हर कदम का सभी राजनीतिक दलों को न सिर्फ समर्थन करना चाहिए अपितु मिलकर इसका उत्तर भी ढूंढना चाहिए।
आतंकवाद वह घनघोर अंधेरा है जिसकी काली छाया जहां भी पड़ जाय वहां की सारी व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाती है। देश के नागरिकों में दहशत के माहौल के साथ अपनी ही सरकार के विरुद्ध गुस्सा पनपने लगता है। नागरिकों को लगता है कि सरकार दहशतगर्दी रोक पाने में नाकाम हो रही है। ऐसे मे सियासी संकीर्णता से बाहर निकलकर सभी दलों को उत्तर तलाशने के साथ साथ आतंकवाद के विरुद्ध सरकार के हर उस ठोस कदम का समर्थन करना चाहिए जिससे दहशतगर्दी पर काबू पाया जा सके।
कुछ दिन पहले पठानकोट, उरी और अब पुलवामा में हुआ आतंकी हमला इस बात का संकेत है कि आने वाला दिन अच्छा नहीं है। आज यदि हम चुप रहे तो हमारी आने वाली पीढियां इसका दुष्परिणाम भुगतने को विवश होंगी और हमे दुत्कारेंगीं भी। यदि इससे बचना है और अमन चैन लाना है तो जाति धर्म की ऊंची हो चली दीवार को तोड़ और राजनैतिक प्रतिबद्धता त्याग सबको राष्ट्र भक्ति का जुनून और जज्बा पैदा करना होगा। सिर्फ भाषणों से न शांति मिलेगी और न अमनचैन आएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां एक तरफ दुनिया के कई राष्ट्र प्रमुखों के साथ मैत्री वार्ता कर वैश्विक मित्रता की ओर कदम बढ़ा रहे हैं वहीं आतंकी उस उम्मीद पर न सिर्फ पानी फेर रहे हैं अपितु मित्रता के सपने चकनाचूर कर रहे हैं। यह सपना पहले पठानकोट में, फिर उरी में और अब पुलवामा में टूट गया। इसी के साथ दहशतगर्दो के संरक्षक बने 'दोगले' पाकिस्तान का असली चेहरा भी रह रह कर सामने आ रहा है। अमन व शांति में खलल पैदा करके दहशत फैलाने की उसकी पुरानी और घिनौनी सोच भी उजागर हो रही है।
2 जनवरी 2016 को पठानकोट एयरबेस में घुसे आतंकवादियों को हमारे सैनिको ने न सिर्फ ढेर कर दिया था बल्कि अपना सैन्य नुकसान उठाकर भी पेंटागन जैसे हमले की पुनरावृत्ति की साजिश को बेनकाब भी कर दिया था। यह साहस सिर्फ भारतीय सेना ही दिखा सकती है। लेकिन इस बार पुलवामा में सेना इसलिए धोखा खा गयी क्योंकि उसे दुश्मन की साजिश का अंदाजा नहीं था। यदि अंदाजा होता तो इतनी संख्या में हमारे जवान किसी कीमत पर शहीद न होते और दुश्मनों की लाशें बिछी होतीं। लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हुआ। आज आतंकवाद के साथ साथ पाकिस्तान के खिलाफ देश गुस्से में है और उसके विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की मांग कर रहा है। इसी के साथ यह भी समझना चाहिए कि पाकिस्तान से ज्यादा दोषी हमारी आस्तीन के वे सांप हैं जिन्हें हम अपना हमदर्द समझने की लगातार गलती करते आ रहे हैं।अब उन्हें भी पहचानने का वक्त आ गया है।
जब पठानकोट में हमला हुआ था तब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तबाही की साजिश करने वाले दहशत गर्दों के खिलाफ कार्रवाई का भरोसा दिला कर आतंकवाद विरोधी अभियान में साथ रहने के संकेत दिए थे परन्तु पुलवामा की घटना के बाद पाक के मौजूदा प्रधानमंत्री का मौन कई सवाल खड़ा करता है। पूरे पांच दिन बाद वहां के प्रधानमंत्री इमरान खान ने सबूत मांगते हुए जवाबी कार्रवाई की चेतावनी देकर एक नई बहस का मौका दे दिया है। यह अलग बात है कि आतंकवाद आज वैश्विक समस्या बन गया है। इसका खामियाजा दुनिया के तमाम देश भुगत रहे हैं। खुद पाकिस्तान भी इस समस्या से अछूता नहीं है। वह तो सर्वाधिक पीड़ित है। उसके यहां आए दिन इस तरह की वारदातें सामने आ रही हैं। आतंकवादियों के सामने वहां की जनता और सरकार असहाय बनी हुई है।
कहा जा सकता है कि जिसे सांप पालने का शौक हो, उसे उसके भयंकर विष का शिकार तो होना ही पड़ेगा। इसके विपरीत अमनपसंद भारत की जनता और यहां की सरकार सदा प्रेम और सद्भाव की पक्षधर रही है। दूसरी तरफ अहिंसा परमो धर्म: के सिद्धांत पर चलने वाले भारत के सब्र का बांध जब भी टूटा है, महाभारत भी हुआ है। पाकिस्तान शायद इसे भूल रहा है, तभी तो रह-रहकर घात करते हुए दोस्ती की पीठ में छुरा घोंप रहा है।
दूसरी तरफ, भौगोलिक दृष्टिकोण से भारत की सीमाएं ऐसे देशों से सटी हैं जो लगातार अशांति को बढ़ावा देते आ रहे हैं। चाहे वह पाकिस्तान हो या अफगानिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, म्यांमार व चीन हो, सभी की कुदृष्टि भारत की ओर किसी न किसी रूप में लगी है। कोई सीमा रेखा पार कर घुसपैठ कर रहा है तो कोई दहशतगर्दो को भेजकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहा है।
जाहिर है आतंकवादी किसी भी तरह के अनुबंधों और समझौतों को नहीं मानते। खून-खराबा करना और दहशत फैलाना उनका कर्म, धर्म सब कुछ है। उनके साथ किसी भी तरह की नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए। अब पाकिस्तान को ही लें, जो अपने जन्म से लेकर अब तक उद्दंड बना हुआ है। बंटवारे के बाद अब तक भारत पाक के बीच मधुर संबंध स्थापित करने को लेकर हुए सारे प्रयास निर्थक साबित हुए हैं। माना जाता है कि भारत में आतंकवाद उसी का प्रतिफल है। चाहे वह 1965 का हमला हो या 1971 का युद्ध, या फिर कारगिल युद्ध। सबमें उसका दोगला चरित्र ही उजागर हुआ है। हम बराबर बात करते हैं और वह बात-बात पर घात करता है।पुलवामा हमले के पूर्व भी कई अन्य हमलों में भी पाकिस्तानी चाल ही सामने आई है।
पिछले दो दशक में हमलों और खून खराबे का दंश झेलते आए भारत के सामने आतंकवाद एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। 12 मार्च 1993 का मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 13 सितंबर 2001 को भारतीय संसद पर हमला, 24 सितंबर 2002 को गुजरात के अक्षरधाम मंदिर पर हमला, 29 सितंबर 2005 को दिल्ली में सीरियल ब्लास्ट, 11 जुलाई 2006 को मुंबई ट्रेन धमाका हुआ, जिसमें देश को भारी जन धन हानि उठानी पड़ी है। फिर सन 2008 में लगातार तीन मामले सामने आए, जिसमें 13 मई को जयपुर ब्लास्ट 30 अक्टूबर को असम धमाका और 26 नवंबर को मुंबई हमले में तमाम जाने गई। इसके बाद रह रह कर होती रही वारदातों के क्रम में 2 जनवरी 2016 को पठानकोट और 18 सितम्बर 2016 को उरी हमले ने देश को झकझोर दिया। इन सभी हमलो में किसी न किसी रूप में पाकिस्तान का ही हाथ सामने आया। और अब पुलवामा में जवानों से भरी बस पर हुआ हमला मानवता व एकता के माथे पर कलंक का टीका है।
कहा जाता है कि पाकिस्तान में ऐसे आतंकी संगठन है, जिन्हें दोनों देशों के बीच शांति का प्रयास बिल्कुल पसंद नहीं है। इन संगठनों और पाकिस्तानी सरकार में मतभेद शांति के रास्ते में रोड़ा बनते हुए आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है, जो समूची मानवता के लिए खतरा है। कुछ साल पूर्व एक व्यक्ति की मौत पर पुरस्कार लौटाने वालों का जमीर आज पुलवामा में इतनी बड़ी शहादत पर मौन क्यों है? उनका साहस आयातित आतंकवाद पर शांत क्यों है? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। जाहिर सी बात है कि भारत को आतंकियों से जितना खतरा है उससे अधिक खतरा अपने यहां पल रहे गद्दारों से है। जिन्हें समय रहते पहचानने की आवश्यकता है। भारत सरकार को खुद अपनी आतंकवाद विरोधी रणनीति की समीक्षा करते हुए उसमें आवश्यक सुधार और सेना का मनोबल बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम भी उठाया जाना आवश्यक हो गया है। उससे भी ज्यादा सर्वदलीय सहयोग की आवश्यकता है। सभी को मिलकर उत्तर तलाशना चाहिए। अब यह भी जानना जरूरी हो गया है कि वे कौन से कारण हैं जिनके चलते कश्मीर का युवा आत्मघाती हमलावर बनता जा रहा है।


स्वतंत्र पत्रकार/स्तम्भकार, अम्बेडकनगर यूपी
ghanshyamreporter@gmail.com


-सुरेन्द्र कुमार स्वतंत्र लेखक हिमाचल प्रदेश
राष्ट्रीय राइफल्स, सीआरपीएफ और जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा पुलवामा में चलाए गए सर्च आपरेशन को एक बड़ी कामयाबी तब मिली जब उन्होंने पुलवामा से लगभग 10 किलोमीटर दूर पिंग्लेना में पुलवामा फियादीन हमले के मास्टरमांइंड एवं जैश-ए-मोहम्मद कमांडर कामरान राशिद गाजी को दो अन्य आतंकवादियों सहित मार गिराया। बीते रविवार को जो सर्च आपरेशन भारतीय सेना से वर्षा की वजह से अधूरा छुट गया था, सोमवार तड़के बारिश थमने के बाद सेना ने उसे एक बडी कामयाबी के साथ समाप्त कर दिया। आखिर इंद्र देव की कृपा उन बेरहम मानवीय दुश्मनों पर कब तक मेहरमानियां बरसती। इस प्रकार हमारी सेना आतंकियों को लगभग सौ घंटे के अंदर ही माकूल जवाब देने में सफल हो गई। मुठभेड़ में भारतीय सेना के एक मेजर सहित कुल पाँच जवान शहीद हो गए। जबकि कश्मीर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक, सेना के ब्रिगेडियर सहित कुछ सैनिक भी गंभीर रूप से घायल हो गए। सेना की इस सफलतम कार्रवाई ने आतंक के सरपरस्तो के बुलंद हौसलों पर कड़ा प्रहार करने में महारत दिखाई है। बताया जा रहा है कि घाटी में सेना को मिली यह कामयाबी बीते दशक की एक प्रमुख सफलता है। सेना का इस पराक्रमी पहल से पस्त होकर जब पहली बार मंगलवार को दुश्मन राष्ट्र का बजीर-ए-आजम मीडिया के सामने आया, तो उन्होंने अपने चिर परिचित अंदाज में कहा कि पुलवामा हमले में पाकिस्तान को जबर्दस्ती धकेला जा रहा है। यदि भारत पाक पर वार करता है तो हम भी ईट का जवाब पत्थर से देंगे। पाकिस्तान मीडिया की तरफ से आई इस इमरानी प्रतिक्रिया में दुश्मन राष्ट्र की सेना ने 22 से अधिक ऐडिटिंग कट्ज लगाएँ हैं। जो दर्शाता है कि यह जवाब पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि सेना प्रमुख बाजवा का है। जिसकी टेढ़ी नज़र का क्रुर नजरिया हमारी सेना दशकों से झेल रही है। पाक की एक नापाक करतूत के चलते गत चार दिनों में हमने लगभग 45 जाँबाज सैनिक खो दिए। आज हमारे पास पृथ्वी, अग्नि,ब्रामहोस और त्रिशूल जैसी कई मिसाइलें तो हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल से हम अभी तक कतराते ही फिरे हैं। हमारे सैकड़ों सैनिक शहीद हो गए पर देश ने कभी भी इन प्रभावशाली मार करने वाले शस्त्रों का इस्तेमाल करना मुनासिफ नहीं समझा। हम एक साथ 40-40 वीर जाबांजों को श्रद्धांजलि दे सकते हैं। लेकिन अपनी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकते। गत 14 फरवरी को कश्मीर घाटी में आतंकवादियों के कायर हौसलों ने दिखा दिया कि उन्हें हमारे जाँबाज सैनिकों के शरीर के साथ खेलना किस हद तक भाता है। मानवता के इन दुश्मनों ने पुलवामा में घात लगाकर जिस घिनौनी घटना को अंजाम दिया। उसमे दहशतगर्दों ने एक क्विंटल से ज्यादा का खतरनाक आरडीएक्स इस्तेमाल किया था। जिसने हमारे वीर योद्धाओं के शरीर को इस प्रकार क्षत-विक्षत किया मानो वे सैनिक नहीं बल्कि रबड या प्लास्टिक की कोई खेल वस्तु हो। आतंकवादियों का हमारे सैनिकों के शरीर के साथ इस तरह खेलना हमारे समक्ष पाकिस्तान की दोगली नीति का एक हृदय विदारक उदाहरण पेश कर गया। मानवता को तहस नहस करने वाले खेल वे हमारे साथ वर्षों से खेल रहे हैं। लेकिन अबकी वार उनके वार की जो मार हुई है उसने भारत के पराक्रमी सैन्य इरादों को बुरी तरह से झकझोर दिया है। यह हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी प्रणाली की दलेरी का ही एक नमूना है कि सीमा पार से घुसे डरपोक आतंकी सियार भी आज हमें शेर सी दहाड दिखाने लगे हैं और हमें परास्त करने में कामयाब हो रहे हैं। जबकि हमारे सैनिक हद दर्जे की आतंकवादी गतिविधियों में भी दिल्ली से प्रेषित होने वाले आदेशों का इंतजार करते रहते हैं। देश की जकड़ी हुई इस सैन्य कार्रवाई की वजह राजनीतिक है या सैन्य कहना मुश्किल है। परंतु इतना तय है कि भारत के इस रूमढुल रवैये से देश के सैन्य हौसलों को गहरा आघात लगा है। सवाल यह उठता है कि आखिर कब तक हम अपनी पीठ पर छुरा सहने करते रहेंगे, कब तक हम दहशतगर्दी का नंगा नाच देखते रहेंगे, कब तक हम पाक की नापाक हरकतों से दहशत में रहेंगे, कब तक हम हिंदुस्तान के स्वाभिमान पर दाग सहन करते रहेंगे, कब तक हम शहीदों के स्मारक पर शहादत के मेले लगते रहेंगे। आखिरकार कब तक हम देश में घटित होने वाली ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाओं के लिए कैंडल मार्च निकालते रहेंगे कब तक हम सीमा पर नहीं देश के अंदर शहीद होते रहेंगे। हम देख रहे हैं कि आतंकवादियों के इरादे हर बार बद से बदतर हो रहे हैं। उनकी दरिंदगी का ग्राफ दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। यदि हमारी सैन्य शक्ति अब भी राजनीतिक बेडियों में जकडी रही तो वह दिन दूर नहीं जब कश्मीर घाटी में वे इससे भी खतरनाक घटना को अंजाम देंगे। हम हर बार दुःखद घटना के घटित होने के बाद विभिन्न देशों के राजदूतों के साथ मीटिंग करके, राजनीतिक दलों से सलाह मशविरा करके, घाटी में इंटरनेट सुविधाओं को बंद करके, नापाक देश के साथ रिश्ता तोड़ने की धमकी दे कर, अपने बाजारों को बंद करके ऐसी भयानक घटना का हल तलाशते फिरते हैं। जबकि वास्तविकता इससे कोसो दूर है। यदि हम वास्तव में ऐसे वेदनापूर्ण घटनाओं से छुटकारा पाना चाहते हैं तो हमें कुछ हट कर विचारना होगा। हमें एक ऐसी सैन्य कार्रवाई को अंजाम देना होगा जो सोमवार तड़के की कार्रवाई से भी प्रभावशाली हो तथा खबर की सूचना किसी भी न्यूज चैनल को कानों कान न लग सके। हमें एक ऐसी जवाबी कार्रवाई अपनानी होगी जिसका प्रभाव बेहद सटीक व दूरगामी हो तथा बखान नाम मात्र। अबकी बार एक ऐसा वार करना होगा जिससे विरोधियों के पाक हौसले कड़ाई से नापाक हो सके। आज देश के न्यूज चैनल घाटी की प्रत्येक सैन्य कार्रवाई की कवरेज प्रमुखता के साथ प्रसारित करते हैं। जिससे वहां बैठा आतंकी बखूबी निहारता रहता है तथा समय आने पर अपने मंसूबों में सहजता से कामयाब हो जाता है और हमें पुलवामा जैसी असहनीय पीड़ा देता है। इसके अलावा यदि बीते साढ़े चार सालों में हमने देश की सेना को पहले भी फ्री हैंड दिया होता तो शायद पुलवामा जैसी दुखद घटना भी नहीं घटती। भारतीय सेना आज इतनी सक्षम है कि वह किसी भी दुश्मन को मार गिरा सकती है पर हमारा रूमढुल रवैये उसे हर बार ऐसा करने से रोकता रहता है। पुलवामा के पिंग्लेना में हुई सैन्य कार्रवाई छोटी अवश्य है परंतु इसके परिणाम हमें आगामी दिनों में बड़े मिल सकते हैं। जब तक सरकार ने हमारे रण बांकुरों को सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने में स्वतंत्रता दी है तब तक भारतीय सेना ऐसे नत्थु गैरों का सफाया सहजता से करती रहेगी। अतः केंद्र सरकार को चाहिए कि वह भावी भविष्य में भारतीय सेना की कार्यप्रणाली पर नाम मात्र हस्तक्षेप करें।


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-अभिनेता गुलशन देवैया के साथ हाल ही में एक ऐसी घटना हुई, जिसमें उन्होंने समझदारी से आँख न मूंदने का अर्थ गहराई से समझा। हाल ही में जब गुलशन अपने अपार्टमेंट में थे, तब उन्होंने स्कूल के कुछ लड़कों को अपनी सोसाइटी की कंपाउंड की दीवार के पास लिक्विड ग्लू की बोतल पकड़े हुए देखा, जिसके मिश्रण को उन्होंने कपड़े के टुकड़े पर डाला और इसका विषाक्त धूआं सूंघने ही वाले थे। ये तरल पदार्थ, कई कफ सिरप, स्पिरिट्स और ऐसी कई अन्य सामग्रियों के रूप में स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हैं जिनमें ऐसे कंटेंट होते हैं जो उपयोगकर्ताओं को ड्रग्स के समान हाई फीलिंग देते है और ये नशे की शुरुआत मानी जाती है। आमतौर पर कम उम्र के बच्चे इस तरह की चीजों से अवैध सामग्री के रास्ते चल पड़ते हैं । जब गुलशन ने उन्हें सूनसान जगह पर हाथों में ग्लू की बोतल लिए देखा तो वे चिंतित हो गए और इन बच्चों को रोकने तुरंत मौके पर पहुंचे। गुलशन ने उन तक पहुँचकर उन्हें सलाह और चेतावनी दी कि वे ऐसे हानिकारक काम ना करें जो आगे चलकर उनके जीवन की एक बड़ी बाधा बन सकती है। डर के मारे बच्चों ने उस ग्लू और कपड़े को फेंक दिया और परिसर से बाहर निकल गए। हालांकि वे समझते हैं कि सिर्फ एक बार उन्हें रोकने से, वे हमेशा के लिए बुराई के प्रति हतोत्साहित नहीं हो सकते। लेकिन वे लोगों से आग्रह करते हैं कि जब भी वे सार्वजनिक या निजी स्थानों पर जाएं तो ऐसे कृत्यों को हतोत्साहित करें। वे आगे कहते हैं, एक जिम्मेदार व्यक्ति के रूप में जब भी आप अन्याय, अपराध, जानवरों को नुकसान पहुंचाना, घरेलू हिंसा इत्यादि जैसी कोई बात देखें तो तुरन्त अपनी आवाज उठाएं। केवल एक मूक दर्शक बने रहने के बजाय हमें गलत कामों को रोकने और युवा दिमाग को बेहतर जानने की कोशिश करनी चाहिए।


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-विजय वर्मा गली बॉय के मोइन भाई के अपने ऑन-स्क्रीन अवतार में कल सोशल मीडिया पर गए थे। उन्होंने फ़िल्म के किरदार मोइन शैली में ही रैप किया, जो फिल्म में उनकी स्टाइल है। उनके इस चरित्र को फिल्म के सबसे यादगार चरित्रों में से एक कहा जा रहा है, और सोशल मीडिया पर भी उनके चरित्र के लिए फैन्स उन पर प्यार बरसा रहे हैं। इस किरदार के ऐसे ही एक प्रशंसक हैं, ईशान खट्टर जिन्होंने सोशल मीडिया पर आकर मोईन उर्फ विजय वर्मा के लिए अपना स्वयं का रैप वीडियो पोस्ट किया है। मोइन की ही स्टाइल में रैप करते हुए, पोस्ट के कैप्शन में उन्होंने कहा - मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक और मोइन भाई के सम्मान में, जो ज़ोया अख्तर के सर्वश्रेष्ठ पात्रों में से एक हैं। इस किरदार को जीता जागता मानव बनाने के लिए @itsvijayvarma आपका धन्यवाद।

द्विस्तरीय या त्रिस्तरीयसर्जिकलस्ट्राइकों की दरकार

 

- योगेश कुमार गोयल*
14 फरवरी की शाम जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में अवंतिपुरा इलाके में सुरक्षा बलों पर किए अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 44 जवान शहीद हो गए तथा कई गंभीर रूप से घायल हुए हैं। सीआरपीएफ के जिस काफिले पर यह हमला हुआ, उसमें 78 वाहन शामिल थे और सीआरपीएफ की 54वीं बटालियन के इस काफिले में 2500 से अधिक जवान थे। यह काफिला जम्मू से श्रीनगर जा रहा था और काफिले की एक गाड़ी आतंकियों के निशाने पर थी। एक आईडी ब्लास्ट के जरिये सीआरपीएफ के काफिले पर किया गया यह आतंकी हमला इतना भयावह था कि काफिले में शामिल कई गाडि़यों के तो परखच्चे उड़ गए। विस्फोटकों से भरी स्कॉर्पियो कार लेकर आए जैश-ए-मोहम्मद के आत्मघाती आतंकी आदिल अहमदडार ने सीआरपीएफ जवानों के काफिले की जिस बस को निशाना बनाया, उसमें 39 जवान सवार थे। बताया जाता है कि आदिल वर्ष 2018 में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हुआ था। आदिल पुलवामा के काकापोरा इलाके का रहने वाला है।
हालांकि सितम्बर 2016 में उरी में हुए आतंकी हमले के बाद कश्मीर में सुरक्षा बलों पर यह अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है लेकिन जैश की अफजल गुरूस्क्वैड जम्मू-कश्मीर में अभी तक अनेक आतंकी वारदातों को अंजाम दे चुकी है। बीती 10 फरवरी को श्रीनगर के लाल चौक पर हुए आतंकियों के ग्रेनेड हमले में पुलिस और सीआरपीएफ के 7 जवानों सहित 11 व्यक्ति घायल हुए थे, जिसकी जिम्मेदारी भी अफजल गुरूस्क्वैड ने ही ली थी। इसके अलावा 30-31 दिसम्बर 2017 को पुलवामा में बीएसएफ के जवानों पर हुए हमले में भी अफजल गुरूस्क्वैड के शामिल होने की बात कही गई थी।
चिंता की बात है कि पिछले कुछ समय से सैन्य बल बार-बार आतंकी निशाने पर आकर शहीद हो रहे हैैं और हम पाकिस्तान में सरेआम सीना तानकर घूम रहे इन दुर्दान्तआतंकियों के आकाओं का बाल भी बांका नहीं कर पा रहे हैं। करीब एक साल पहले 15 फरवरी 2018 को आतंकियों ने पुलवामा के पंजगाम स्थित केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक कैंप पर हमला किया था। तब आतंकियों ने सीआरपीएफ के शिविर पर हमला कर कैंप में घुसने की कोशिश की थी लेकिन जवानों की सतर्कता के चलते वे अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो सके थे। पिछले ही साल जम्मू के सुंजवां सैनिक शिविर में भी 10 फरवरी की सुबह आतंकी हमला हुआ था और उसके दो दिन बाद श्रीनगर के कर्ण नगर इलाके में भी आतंकियों ने सीआरपीएफ के शिविर पर हमले का नाकाम प्रयास किया था। अगले दिन 13 फरवरी को भी जम्मू में जम्मू-अखनूर मार्ग पर सेना के दोमाना कैंप शिविर को बाइक सवार आतंकवादियों ने निशाना बनाने का असफल प्रयास किया था। उस वक्त लंबे दौर के ऑपरेशनों के बाद सेना ने उन हमलों में शामिल आतंकियों को तो मार गिराया था किन्तु हमने अपने कुछ जांबाज जवानों और नागरिकों को भी उन हमलों में सदा के लिए खो दिया था। खुफिया जानकारियों के अनुसार जम्मू-कश्मीर में सैन्य श्वििरों पर हमलों के लिए जैश-ए-मोहम्मद तथा लश्कर-ए-तैयबा जैसे दो कुख्यात आतंकी संगठनों ने हाथ मिला लिया है। ऐसे में आज ऐसी ठोस रणनीति की जरूरत महसूस की जाने लगी है, जिससे इन आतंकी संगठनों की कमर तोड़ी जा सके।
दरअसल उरी हमले के बाद की गई सर्जिकलस्ट्राइक के बाद से बुरी तरह बौखलाये आतंकवादियों द्वारा प्रदेश में सैन्य शिविरों पर किए जा रहे हमले जिस तरह से तेजी से बढ़ रहे हैं, वह गहन चिंता का सबब हैं और ऐसे में पुनः ऐसी ही द्विस्तरीय अथवा त्रिस्तरीयसर्जिकलस्ट्राइकों की आवश्यकता महसूस होने लगी है, जो न केवल किसी खास क्षेत्र तक सीमित रहें बल्कि पाकिस्तानी सीमा के भीतर बड़ी तादाद में आतंकी शिविरों को तबाह कर कई जगहों पर एक साथ आतंकियों की कब्रगाह बना दी जाए, जिससे पाकिस्तान के आतंकी मंसूबों को ध्वस्त किया जा सके। पाकिस्तान भारतीय सैन्य शिविरों पर लगातार हमले करा रहा है और सीजफायर का उल्लंघन कर बार-बार भारतीय सैन्य चौकियों को निशाना बना रहा है। विगत पांच वर्षों में पाकिस्तान द्वारा पांच हजार से ज्यादा बार सीमा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन किया जा चुका है और इस दौरान 450 से भी ज्यादा जवान जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमलों में शहीद हो चुके हैं।
हालांकि 2 जनवरी 2016 को पठानकोट हमले और 18 सितम्बर 2016 को हुए उरी हमले के बाद पुलवामा जिले के अवंतिपुरा इलाके में सुरक्षा बलों पर यह अभी तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला है लेकिन देखा जाए तो शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता हो, जब हमें अपने किसी जवान के शहीद होने की खबरें न मिलती हो। पिछले तीन वर्षों में कई ऐसे आतंकी हमले भी हो चुके हैं, जब सेना को आतंकियों के खिलाफ दो से तीन दिनों तक मोर्चा संभालना पड़ा। ऐसे ही हमलों में 22 फरवरी 2016 को श्रीनगर में उद्यमिता विकास संस्थान की तीन मंजिला इमारत को आतंकियों से मुक्त कराने में सेना को पांच दिन तक मशक्कत करनी पड़ी थी। 14 सितम्बर 2016 को पुंछ में सेना मुख्यालय के समीप एक रिहायशी इमारत में छिपे आतंकियों को मार गिराने में कई घंटों का ऑपरेशन चलाना पड़ा था। 12 अक्तूबर 2016 को श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित पंपोर की सरकारी इमारत में छिपे दो आंतकियों को मार गिराने में सेना को 56 घंटे लग गए थे। 5 मार्च 2017 को आतंकियों और सेना के बीच त्राल में दो दिन तक मुठभेड़ चली थी।
अगर बात करें सेना के कैंपों पर हुए कुछ प्रमुख आतंकी हमलों की तो इन हमलों की फेहरिस्त भी छोटी नहीं है। 5 फरवरी 2018 को पुलवामा में सेना कैंप पर जैश का आतंकी हमला, 7 जनवरी 2018 को पुलवामा में सीआरपीएफ कैंप पर आतंकी हमला, 31 दिसम्बर 2017 को पुलवामा जिले में सीआरपीएफ के ट्रेनिंग कैंप पर हमला, 1 दिसम्बर 2017 को नगरोटा स्थित सैन्य शिविर पर आतंकी हमला, 3 अक्तूबर 2017 को बीएसएफ शिविर पर हमला, 12 अगस्त 2017 को कुपवाड़ा में सेना के कैंप पर हमला, 13 जून 2017 को पुलवामा में सीआरपीएफ कैंप पर ग्रेनेड से आतंकी हमला, 27 अप्रैल 2017 को कुपवाड़ा जिले के पंजगाम में सेना के कैंप पर हमला, 9 जनवरी 2017 को जम्मू के अखनूर सेक्टर के जीआरईएफ कैंप पर आतंकी हमला। ये सभी आतंकी हमले एक ओर जहां हमारी सम्प्रभुत्ता के लिए खुली चुनौती बने रहे हैं, वहीं इन हमलों में हमारे जांबाज जवान, सैन्य अधिकारी और नागरिक लगातार मारे जा रहे हैं।
सैन्य ठिकानों पर हमले कितने सुनियोजित ढ़ंग से होते हैं, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि कई-कई दिनों की बड़ी सैन्य कार्रवाई के बाद मिशन सफल हो पाता है। ऐसी घटनाओं को लेकर चिंता की बात यह भी है कि इस तरह के हमलों की पूर्व सूचनाएं मिलती रही हैं और इन्हीं सूचनाओं के अनुसार हमले भी होते रहे हैं किन्तु फिर भी ऐसे हमलों को नाकाम करने में हम कई बार चूक जाते हैं। आखिर बार-बार ऐसी चूक के कारण क्या हैं? इसकी तह तक जाना होगा। सुंजवां सैनिक शिविर में तो गत वर्ष 10 फरवरी को सेना की वर्दी में आए जैश के आतंकी एके-56, असाल्टराइफलों, रॉकेटलांचर, गोला-बारूद तथा हथगोलों से लैस थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि अभेद समझे जाने वाले सैन्य शिविरों में भी आतंकी इतनी आसानी से भारी मात्रा में हथियारों और गोला-बारूद के साथ कैसे घुसने में सफल हो जाते हैं? निश्चित रूप से हमारे तंत्र में कुछ ऐसे बड़े छिद्र हैं, जिनसे होते हुए ये आतंकी आसानी से अपने मंसूबों में सफल हो जाते हैं।
बहरहाल, जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह और केन्द्रीय मंत्री अरूणजेटली का कहना है कि पाकिस्तान पोषित आतंकवादियों और उनके आकाओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा और इस जघन्य कृत्य के लिए उन्हें कभी न भूलने वाला सबक सिखाया जाएगा। बहरहाल, अब जरूरत भी इसी बात की है कि आतंकियों और उनके पाक परस्त आकाओं का ऐसा कठोर सबक सिखाया जाए कि भारत में इस प्रकार की वारदात को अंजाम देना तो दूर की बात, ऐसा सोचने तक से उनकी सात पुश्तों की रूह कांप उठे।

*लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं

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-डा. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा


पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर आतंकवादी हमला और इस हमलें में 44 सैनिकों के शहीद होने और बहुत से सैनिकों के हताहत होने के साथ ही समूचा देश उद्वेलित और आक्रोशित हो गया है। देशवासियों का गुस्सा इस समय चरम पर है और जो उभर कर आ रहा है उसमें खास यही कि अब प्रतिक्रियाओं और व्यक्तव्यों के लिए कोई स्थान नहीं है अपितु अब तो कुछ कर दिखाने का समय आ गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि सेना को कार्यवाही करने की पूरी छूट दे दी है वहीं साफ चेतावनी भी दे दी है तो शनिवार को हुई सर्वदलीय बैठक में भी यही उभर कर आया है कि सीमा पार के आतंकवाद की चुनौतियों से लड़ने के लिए पूरा देश सरकार और सेना के साथ है। कश्मीर की समस्या कहा जाए तो हमें आजादी के साथ एक गंभीर बीमारी के रुप में मिली और पिछले 30 सालों में इस समस्या ने और अधिक विकराल रुप ले लिया। दरअसल पाकिस्तान के सत्ताधीशों और सेना का अस्तित्व और अहमियत पूरी तरह से कश्मीर को हवा देने में ही बना हुआ है। विगत में कुछ अदूरदर्शी निर्णयों या यों कहें कि पाकिस्तान के खिलाफ सहृदय बने रहने का ही परिणाम रहा है कि यह समस्या दिन प्रतिदिन विकराल रुप लेती जा रही है। मजे की बात यह है कि अलगाववादी नेताओं को एक तरह से सुरक्षा व सुविधाएं उपलब्ध कराकर हमने ही इस फोड़े को नासूर बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। इसी का परिणाम है कि देश के टुकड़ों पर पलने वाले अलगाववादियों ने नाक में दम कर रखा है। यह अलगाववादी एक और सरकारी सुविधाओं से युक्त होकर एशो-आराम की जिंदगी बसर कर रहे हैं वहीं कश्मीर के युवाओं को गुमराह करने और आए दिन नए नए सगूफे और प्रदर्शनों के साथ हवा दे रहे है। यहां तक कि आतंकवादियों व घुसपैटियों को भी संरक्षण देने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे हैं। पत्थरबाजों की नई खेप तैयार कर सेना के सामने दोहरी परेशानी पैदा कर रहे हैं। उधर सेना द्वारा पत्थर बाजों के खिलाफ या किसी कारण से किसी नागरिक की मौत को मानव अधिकारों का हनन बनाते हुए इस तरह से शोरगुल करने लगते हैं। सबसे दुःखद यह कि इस देश का नमक खाने वाले, यहां की सुविधाओं से ऐशो आराम करने वाले कुछ तथाकथित वुद्धिजीवी, दोहरे चरित्र के छद्म मानवतावादी स्वतंत्रता के नाम पर बरगलाने मंे कोई कमी नहीं छोड़ते। मैं आज पूछता हूं कि पुलवामा में 44 निर्दोष सैनिकों की शहादत पर आज तथाकथित कितने लोग अपने पद्मश्री या दूसरे अलंकरण लौटाने की बात कर रहे हैं। क्या देश के लिए शहादत देने वालों के लिए दो शब्द विभिन्न मंचों पर जोर जोर से गाल बजाने वालों के पास नहीं है।
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में कन्हैया के साथ आकर गाल बजाने वाले आज कहां गए। अन्य विश्वविद्यालयों और मंचों पर देश में अपने आप पर खतरा बताने वाले कहां गए? न्यायपालिका और अन्य संस्थाओं की स्वतंत्रता के नाम पर प्रेस काॅफेंस करने वाले कहां गए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हनन के नाम पर भाषण देने वाले कहां गए? क्या देश की रक्षा करने वाले जवानों की शहीदी पर उनका कोई दायित्व नहीं बनता? आखिर यह कब तक चलेगा। आज देश के अधिकांश नागरिक सरकार से दोहरी अपेक्षा रख रहे हैं। एक और अलगाववादियों को पनाह देने वाले सरकारी धन पर पल रहे नेताओं और दूसरे यह तथाकथित मानवतावादी और अलंकरण लौटाने की घोषणा करने वालों को सबक सिखाने की आवश्यकता है तो दूसरी और पाकिस्तान के खिलाफ कर गुजरने की अपेक्षा है देशवासियों की। आखिर इस तरह कब तक हम जवानों की शहादत देते रहेंगे। बल्कि होना तो यह चाहिए कि सेना का विरोध करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाए और इनके पक्ष में आवाज उठाने वालों को देश द्रोही मानते हुए कठघरोें में बंद कर दिया जाए। आखिर सीमा पर शहादत देने वाले भी किसी माॅ के बैटे, किसी बेटी के मांग का सिंदुर तो किसी बहन का भाई है। केवल शहादत को ग्लेमरस बनाने से कुछ होने वाला नहीं है। कुछ घोषणाएं करने से उस शहीद की पूर्ति उस परिवार में होने वाली नहीं है। ऐसे में देश में बैठे दुश्मनों से अधिक सजग होना होगा, उनके खिलाफ पूरे देश को आवाज उठानी होगी। देश के किसी भी कोने से सेना की कार्यवाही के खिलाफ आवाज उठाने वालों और पाकिस्तान या अलगाववादियों या आतंकवादियों के नाम पर मानवता हनन की बात करने वालोें का जब तक बहिष्कार नहीं होगा तब तक इस देश के अच्छे दिन नहीं आने वाले हैं। अलंकरण लौटाना या देश में बिघटन की आवाज को हवा देना कहां का न्याय है, अब यह सेाचने समझने का समय आ गया है।
दरअसल पिछले कुछ समय से जिस तरह से सेना ने आतंकवादियों पर शिकंजा कसा है उसके परिणाम अब हताशा के रुप में आ रहे हैं। सैनिकों या सरकारी कर्मचारियोें को निशाना बनाकर मारना या सैनिकों के अड़डो पर कायराना हमला या पुलवामा जैसी घटनाएं इसी का परिणाम है। यह समय एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप या दोषारोपण का नहीं है। यह समय अलगाववादियों, आतंकवादियों, घुसपेटियों, पाकिस्तान में इनके सरपरस्तों और देश में रहकर इनके पक्ष में आसूं बहाने वालों का सबक सिखाने का है। देश का बच्चा बच्चा आज आंदोलित है,उद्वेलित है और यह सही समय है जब सरकार को ठोस और कठोर कदम उठाते हुए कार्यवाही करें ताकि इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने का दुस्साहस नहीं हो सके। हमें नही भूलना चाहिए कि इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद कुछ लोग इस घटना से पाकिस्तान का हाथ होने की चर्चा करने लगते है तो उन्हें सांप सूंघ जाता है। आखिर ऐसा क्यों है?आज देश लाल बहादुर शास्त्री या इन्दिरा गांधी या अटल बिहारी जैसे अटल संदेश की चाह नरेन्द्र मोदी से कर रहा है। अब देशवासियों को पाकिस्तान या अलगाववादियों व घुसपेटियों के खिलाफ कार्यवाही यहां तक की पाकिस्तान के खिलाफ जंग के समाचारों की चाहत है और कुछ नया मिलेगा इसी आस में वे न्यूज चैनलों की और ताक रहे हैं। यह साफ हो जाना चाहिए कि समूचा देश अब अंतिम कदम यानी की ऐसा सबक सिखाने की बात कर रहा है जिससे इस तरह की घटनाओं को अंजाम देना तो दूर सरहद की और देखने का भी साहस नहीं कर सके।

रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
फोन-0141-2293297 मोबाइल-9414240049

 

-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के भारत के कूटनीतिक प्रयासों में चीन के अड़ंगे के बाद एक बार फिर देश में चाइनीज सामान के बहिष्कार की मुहिम छिड़ गई है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने कहा है कि मसूद अजहर को लेकर चीन के भारत विरोधी अड़ियल रुख के मद्देनजर देश में चाइनीज सामान के बहिष्कार का अभियान शुरू किया जाएगा और जल्द ही इस बारे में सभी असोसिएशंस के बीच इस बात के लिए सहमति बनाई जाएगी कि कोई भी व्यापारी अपनी दुकान पर चाइना निर्मित सामान नहीं बेचेगा। दूसरी तरफ पाकिस्तान से आयात पर ड्यूटी २०० फीसदी तक बढ़ाए जाने से ड्राई फ्रूट्स, मसालों और कुछ अन्य खाद्य चीजों के बाजारों में पाकिस्तानी आयात लगभग बंद होने के आसार हैं। मगर असल मामला पाकिस्तानी बाजार नहीं होकर चीनी बाजार है जिसने भारत के कौने कौने में अपनी मजबूत पकड़ बनाली है और हम चाहकर भी अभी तक चीन के आर्थिक साम्राज्य की कमर तौड़ नहीं पाए है। चीन सस्ते सामान की आड़ में भारत के बाजार पर कब्जा जमाने में सफल हुआ है और हम धडले से चीनी सामान का उपयोग कर रहे है। चीनी सामान के बहिष्कार की बात अनेकों दफा उठी है मगर हर बार मीडिया में सुर्खियां बन कर रह गई। वास्तव में यदि चीनी सामान का भारत में बहिष्कार हो जाये तो हम चीन के साथ पाकिस्तान पर नकेल डालने में सफल हो जायेंगे। पाक की आर्थिक स्थिति इस समय बर्बादी के कगार पर है। चीन की दोमुंही नीति उसे हर बार बचा लेती है। चीनी सामान के बहिष्कार से पहले हमें उसके गणित को समझना बहुत जरुरी है।
चीनी माल के बहिष्कार की मांग करने वाले लोगों का मानना होता है कि इससे चीन पर दबाव बनाया जा सकता है। भारत और चीन के आपसी कारोबार पर नजर डालें तो पत्ता चलेगा २०१७-१८ में चीन के साथ व्यापार घाटा ६३ अरब डॉलर का हो गया है जबकि पिछले साल यह ५१ अरब डॉलर था। पिछले दस सालों के दौरान हमारा चीन को निर्यात महज २.५ अरब डॉलर का बढ़ा है जबकि आयात ५० अरब डॉलर का। जहां २०१३-१४ में हमारे कुल आयात का ११.६ फीसदी चीन से होता था, २०१७-१८ में यह बढ़कर २० फीसदी हो गया है। २०१३-१४ में चीन से आयात की विकास दर ९ फीसदी थी जो अब बढ़कर २० फीसदी हो गई है। यह बहुत बड़ा अंतर है जिसे पाटना नामुमकिन है। आधे दशक में यह व्यापार घाटा छह गुना हो गया है। बताया जाता है की लाभ और घाटे के इस गणित के पीछे चीन सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी है जो चीन के उद्योगों को दी जाती है। भारत सरकार ने संसद में बताया कि चीन में बने उत्पाद को इसलिए सस्ता बताया जाता है क्योंकि चीन सरकार अपने देश में बने सामान पर अलग से सब्सिडी देती है और इसी वजह से उनका सामान सस्ता होजाता है। भारत और चीन के बीच कारोबार की असलियत समझने की जरूरत है। तभी किसी सही और जमीनी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। मगर इस सत्य से कोई इंकार नहीं कर सकता कि पिछले एक दशक में चीनी उत्पादों ने हमारे घर और चैकी चूल्हे तक अपनी पकड़ मजबूत बनाली है। कभी गुणवत्ता में कमजोर इन उत्पादों ने अब अपनी गुणवत्ता में काफी सुधार कर भारतीय बाजार की कमजोरियों को पकड़ अपने सस्ते माल को सड़कों तक पहुँचाने में सफलता हासिल करली। इससे यह साफ जाहिर होता है की भारत में रोजगार के अवसरों को चीन डकार रहा है। समय रहते अगर सरकार ने चीन से होने वाले आयात पर लगाम न लगाई तो देश के उद्योग जगत का धराशायी होना तय है।
सस्ते चीनी सामान के आयात से न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को हर साल लाखों करोड़ रुपये की अपूरणीय क्षति हो रही है बल्कि लाखों नौकरियां भी जा रही हैं। सिर्फ सोलर पैनल के आयात से देश में दो लाख लोगों का रोजगार खत्म हो गया है। ये निष्कर्ष नरेश गुजराल की अध्यक्षता वाली संसद की वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति के हैं जो उन्होंने च्चीनी सामान के आयात का भारत के उद्योग जगत पर असरज् पर अपनी रिपोर्ट में दिए हैं। चीनी सामान के अंधाधुंध आयात के खतरों के प्रति आगाह करते हुए संसदीय समिति ने सरकार को इस पर अंकुश लगाने और घरेलू उद्योग को इसकी मार से बचाने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा है।
अगर चीन के सामान का बहिष्कार करना है तो खुद के सामान को सस्ता बेचना होगा। उसे लोगों की पहुंच तक ले जाना होगा। लोग खुद-ब-खुद अपने घर का सामान खरीदना शुरू कर देंगे। दीया बनाने और फिर उसे बेचने में कितनी मुश्किलें हैं इसे सरल करना होगा और किसी भी थोक की दुकान से ज्यादा सामान खरीदकर छोटी दुकान में आसानी से बेचने के अंतर को अगर नहीं समझेंगे तो शायद ऐसे ही तुलना करेंगे जैसे कि अभी कर रहे हैं।

 

डी . ३२ माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- ९४१४४४१२१८

 


-बाल मुकुन्द ओझा
भारत में शराब ने उत्पात मचा रखा है। एक सरकारी अध्ययन रिपोर्ट को गहनता से देखें तो पता चलेगा शराब की पहुँच घर घर हो गयी है। हो भी क्यों नहीं, सरकार खुद शराब के धंधे को बढ़ावा दे रही है। लाइसेंस बाँट कर राजस्व एकत्रित कर कल्याणकारी योजनाओं का सञ्चालन कर रही है। ऐसे में शराबियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। देश में बच्चे से बुजुर्ग तक शराबी बनता जा रहा है। इसी कारण अपराधों में भी बढ़ोतरी होती जा रही है। सच तो यह है सरकार शराब से होने वाली बड़ी कमाई से हाथ धोना नही चाहती। केन्द्र ओर राज्य सरकार शराब से मिलने वाले राजस्व से कई कल्याणकारी योजनाए चलती है जिसमे अस्पताल भी शामिल है इसीलिए सरकारे शराब से होने वाले नुकसान होने की बड़ी वजह जानते हुए भी शराब पर प्रतिबंद नही लगा सकती है ।
सरकार की ओर से कराए गए ताजा सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पांच में से एक शख्स शराब पीता है। सर्वे के अनुसार 19 प्रतिशत लोगों को शराब की लत है। जबकि 2.9 करोड़ लोगों की तुलना में 10-75 उम्र के 2.7 प्रतिशत लोगों को हर रोज ज्यादा नहीं तो कम से कम एक पेग जरूर चाहिए होता है और ये शराब के लती होते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार देशभर में 10 से 75 साल की आयु वर्ग के 14.6 प्रतिशत यानी करीब 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश और गोवा में शराब का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इस सर्वे की चैंकाने वाली बात यह है कि देश में 10 साल के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों में शामिल हैं। सर्वेक्षण में यह भी पता चला है कि शराब पर निर्भर लोगों में से 38 में से एक ने किसी न किसी बीमारी की सूचना दी, जबकि 180 में से एक ने रोगी के तौर पर या अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी दी।
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स के साथ मिलकर यह सर्वे किया। यह सर्वे सभी 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में किया गया। इसमें कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 186 जिलों के 2 लाख 111 घरों से संपर्क किया गया और 4 लाख 73 हजार 569 लोगों से इस बारे में बातचीत की गई। सैंपल के आधार पर देश की पूरी आबादी के हिसाब से नतीजों का आकलन किया गया है। सरकारी स्तर करीब 12 वर्षों बाद देश में नशीलें पदार्थों के सेवन की स्थिति व आकार और इसके प्रभावितों की जानकारी जुटाने के लिए राष्ट्रीय स्तर यह सर्वेक्षण हुआ है।
हमारे समाज में नशे को सदा बुराइयों का प्रतीक माना और स्वीकार किया गया है। इनमें सर्वाधिक प्रचलन शराब का है। शराब सभी प्रकार की बुराइयों की जड़ है। शराब के सेवन से मानव के विवेक के साथ सोचने समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। वह अपने हित-अहित और भले-बुरे का अन्तर नहीं समझ पाता। शराब के सेवन से मनुष्य के शरीर और बुद्धि के साथ-साथ आत्मा का भी नाश हो जाता है। शराबी अनेक बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। अमीर से गरीब और बच्चे से बुजुर्ग तक इस लत के शिकार हो रहे हैं।
एक अन्य सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी-कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है तथा सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं वे शराब पर फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिन्ता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़फ रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। ये लोग कहते हैं वे गम को भुलाने के लिए नशे का सेवन करते हैं। उनका यह तर्क कितना बेमानी है जब यह देखा जाता है कि उनका परिवार भूखे ही सो रहा है। युवाओं में नशा करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते शहरी और ग्रामीण अंचल में आपराधिक वारदातों में काफी इजाफा हो रहा है। शराब के साथ नशे की दवाओं का उपयोग कर युवा वर्ग आपराधिक वारदातों को सहजता के साथ अंजाम देने लगे हैं। हिंसा ,बलात्कार, चोरी ,आत्महत्या आदि अनेक अपराधों के पीछे नशा एक बहुत बड़ी वजह है । शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करना, शादीशुदा व्यक्तियों द्वारा नशे में अपनी पत्नी से मारपीट करना आम बात है ।
आजादी के बाद देश में शराब की खपत 60 से 80 गुना अधिक बढ़ी है। यह भी सच है कि शराब की बिक्री से सरकार को एक बड़े राजस्व की प्राप्ति होती है। मगर इस प्रकार की आय से हमारा सामाजिक ढांचा क्षत-विक्षत हो रहा है और परिवार के परिवार खत्म होते जा रहे हैं। हम विनाश की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। देश में शराब बंदी के लिए कई बार आंदोलन हुआ, मगर सामाजिक, राजनीतिक चेतना के अभाव में इसे सफलता नहीं मिली। सरकार को राजस्व प्राप्ति का यह मोह त्यागना होगा तभी समाज और देश मजबूत होगा और हम इस आसुरी प्रवृत्ति के सेवन से दूर होंगे।


डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

 


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-कश्मीर के पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले में शहीद हुए बहादुर सी आर पी एफ के जवानों को सम्मान और श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से मालाड (वेस्ट) में स्थित राजस्थानी सम्मेलन के घनश्यामदास सराफ कॉलेज के छात्रों द्वारा एक रैली का आयोजन १८ फरवरी २०१९ को किया गया था,जहाँपर हज़ारों की संख्या में कॉलेज के छात्रों ने, शिवाय चैरिटेबल ट्रस्ट,घनश्यामदास सराफ कॉलेज के रोट्रैक्ट क्लब के लोग, डी एल एल इ के छात्रों ने हिस्सा लिया। रैली की शुरुवात कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. जयंत आप्टे ने कैंडल जलाकर कर की।
रैली कॉलेज से शुरू करके पूरे सूंदर नगर में घूमकर फिर कॉलेज में आकर ख़त्म हुई।बैनर,पोस्टर और 'जय हिंद’,'भारत माता की जय’ आदि नारों के साथ यह रैली निकली गयी।रैली में छात्रों के साथ कॉलेज से सभी स्टाफ और स्थानीय लोग भी शामिल हुए।सभी ने मोमबत्ती जलाकर,पुष्प अर्पित कर और ईश्वर से प्रार्थना कि वे शहीदों की आत्मा को शांति दें और उनके परिवारों को शक्ति प्रदान करें।अंत में प्रिंसिपल डॉ. जयंत आप्टे ने सभी लोगों को और मालाड पुलिस स्टेशन के लोगों को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया।

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