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बुद्ध पूर्णिमा (18 मई) पर विशेष

 

 

- योगेश कुमार गोयल
प्रतिवर्ष वैशाख मास की पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘बुद्ध जयंती’ भी कहते हैं। माना गया है कि 563 ईस्वी पूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा के ही दिन लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था और वैशाख मास की पूर्णिमा को ही 35 वर्ष की आयु में 528 ई. पू. गौतम बुद्ध ने बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किया था तथा वैशाख पूर्णिमा को ही 80 वर्ष की आयु में 483 ई. पू. गौतम बुद्ध ने उत्तर प्रदेश में कुशीनगर में हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में वैशाख मास की पूर्णिमा को ‘त्रिविध पावन पर्व’ भी कहा गया है और संभवतः यही वजह है कि बौद्ध धर्म में बुद्ध पूर्णिमा को सबसे पवित्र दिन माना गया है। मान्यता है कि गौतम बुद्ध ने ही आज से करीब ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व बौद्ध धर्म की स्थापना की थी।
गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था। गौतम उनका गौत्र था किन्तु कालांतर में वह सिद्धार्थ गौतम, महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, गौतम बुद्ध, तथागत आदि विभिन्न नामों से जाने गए। शाक्य वंश से संबंध होने के कारण सिद्ध को ‘शाक्यों का संत’ भी कहा गया। सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोधन थे, जो कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय राजा थे। कपिलवस्तु हिमालय की तराई में नेपाल की सीमा पर एक काफी विशाल गणराज्य था, जो आज नेपाल में है। राजा शुद्धोधन की दो रानियां थी, जिनमें महामाया बड़ी और प्रजापति गौतमी छोटी थी। रानी महामाया जब गर्भवती हुई तो उस समय के शाक्य समाज के रीति रिवाजों के अनुसार प्रसव के लिए वह प्रजापति गौतमी के साथ अपने मायके देवदह जा रही थी किन्तु रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई और लुम्बनी वन में ही शाल के दो वृक्षों के बीच उन्होंने एक अति सुंदर तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पुत्रजन्म के पश्चात् दोनों रानियां कपिलवस्तु वापस लौट आई। इसी बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया।
सिद्धार्थ के जन्म के कुछ ही समय पश्चात् एक बहुत पहुंचे हुए सन्यासी ने राजा शुद्धोधन को बताया कि यह बालक या तो बहुत महान् चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर यह समस्त सांसारिक मोहमाया का परित्याग कर एक महान् सन्यासी बनेगा और विश्व का महान् उद्धारक साबित होगा। बालक के सन्यासी बनने की बात सुनकर राजा शुद्धोधन बहुत चिंतित हुए और उन्होंने सिद्धार्थ को मोहमाया और सांसारिक सुखों की ओर आकर्षित करने के लिए उनके समक्ष भोग विलास तथा ऐश्वर्य के समस्त संसाधनों का ढ़ेर लगा दिया लेकिन सिद्धार्थ हमेशा शांत और ध्यानमग्न ही रहा करते। अतः यही सोचकर कि कहीं सिद्धार्थ का मन सांसारिक सुखों से उचाट होकर पूरी तरह से वैराग्य में ही न लग जाए, राजा शुद्धोधन ने कम उम्र में ही एक अतिसुंदर, सुशील, अति तेजस्वी सर्वगुणसम्पन्न राजकन्या यशोधरा के साथ उनका विवाह कर दिया। विवाह के पश्चात् सिद्धार्थ गौतम को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई और पुत्र का नाम रखा गया राहुल।
बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ घंटों एकांत में बैठकर ध्यान किया करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने पुत्रजन्म तक सांसारिक सुखों का उपभोग किया परन्तु धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक सुखों से उचाट होता गया और एक दिन वे मन की शांति पाने के उद्देश्य से भ्रमण के लिए अपने सारथी छेदक को साथ लेकर रथ में सवार हो महल से निकल पड़े। रास्ते में उनका मनुष्य की दुःख की चार घटनाओं से साक्षात्कार हुआ। जब उन्होंने दुःख के इन कारणों को जाना तो मोहमाया और ममता का परित्याग कर पूर्ण सन्यासी बन गए।
सर्वप्रथम सिद्धार्थ ने रास्ते में एक रोगी व्यक्ति को देखा और सारथी से पूछा, ‘‘यह प्राणी कौन है और इसकी यह कैसी दशा है?’’
सारथी ने बताया, ‘‘हे स्वामी! यह भी एक मनुष्य है और इस समय यह बीमार है। इस दुनिया में हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी रोगी होकर दुःखों का सामना करना ही पड़ता है।’’
आगे बढ़ने पर सिद्धार्थ ने मार्ग से गुजरते एक वृद्ध, निर्बल व कृशकाय व्यक्ति और उसके बाद एक मृत व्यक्ति की अर्थी ले जाते विलाप करते लोगों को देखा तो हर बार सारथी से उसके बारे में पूछा। सारथी ने एक-एक कर उन्हें मनुष्य की इन चारों अवस्थाओं के बारे में बताया कि हर व्यक्ति को कभी न कभी बीमार होकर कष्ट झेलने पड़ते हैं। बुढ़ापे में काफी दुःख झेलने पड़ते हैं, उस अवस्था में मनुष्य दुर्बल व कृशकाय होकर चलने-फिरने में भी कठिनाई महसूस करने लगता है और आखिर में उसकी मृत्यु हो जाती है।
यह रहस्य सिद्धार्थ जानकर बहुत दुःखी हुए। आगे मार्ग में उन्हें एक साधु नजर आया, जो बिल्कुल शांतचित्त था। साधु को देख सिद्धार्थ के मन को अपार शांति मिली और उन्होंने विचार किया कि साधु जीवन से ही मानव जीवन के इन दुखों से मुक्ति संभव है। बस फिर क्या था, देखते ही देखते सिद्धार्थ सांसारिक मोहमाया के जाल से बाहर निकलकर पूर्ण वैरागी बन गए। एक दिन रात्रि के समय पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को गहरी नींद में सोता छोड़ गौतम बुद्ध ने अपने घर-परिवार का परित्याग कर दिया और सत्य तथा ज्ञान की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे। उन्होंने छह वर्षों तक जंगलों में कठिन तप व उपवास किए और सूखकर कांटा हो गए किन्तु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति न हो सकी। अतः उन्होंने एक दिन सन्यास छोड़ दिया और उनके शिष्य भी एक-एक कर उनका साथ छोड़ गए।
उसके बाद गौतम बुद्ध ने शारीरिक स्वास्थ्य व मानसिक शक्ति प्राप्त की और फिर वे बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर गहन चिंतन में लीन हो गए तथा मन में दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस बार ज्ञान प्राप्त किए बिना वे यहां से नहीं उठेंगे। सात सप्ताह के गहन चिंतन-मनन के बाद वैशाख मास की पूर्णिमा को 528 ई. पू. सूर्योदय से कुछ पहले उनकी बोधदृष्टिजागृत हो गई और उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई। उनके चारों ओर एक अलौकिक आभा मंडल दिखाई देने लगा। उनके पांच शिष्यों ने जब यह अनुपम दृश्य देखा तो वे महात्मा बुद्ध के चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगे और इन शिष्यों ने ही उन्हें पहली बार ‘तथागत’ कहकर संबोधित किया। ‘तथागत’ यानी सत्य के ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करने वाला। पीपल के जिस वृक्ष के नीचे बैठकर सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया, वह वृक्ष ‘बोधिवृक्ष’ कहलाया और वह स्थान, जहां उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया, बोध गया के नाम से विख्यात हुआ तथा बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद ही सिद्धार्थ को ‘महात्मा बुद्ध’ कहा गया।
अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में महात्मा बुद्ध ने दुनिया भर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए। ईसा पूर्व 483 को वैशाख मास की पूर्णिमा को उन्होंने कुशीनगर के पास हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने उन्हीं साल वृक्षों के नीचे प्राण त्यागे, जिन पर मौसम न होते हुए भी फूल आए थे। उनका अंतिम उपदेश था कि सृजित वस्तुएं अस्थायी हैं, अतः विवेकपूर्ण प्रयास करो। उनका कहना था कि मनुष्य की सबसे उच्च स्थिति वही है, जिसमें न तो बुढ़ापा है, न किसी तरह का भय, न चिन्ताएं, न जन्म, न मृत्यु और न ही किसी तरह के कष्ट और यह केवल तभी संभव है, जब शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मन भी संयमित हो क्योंकि मन की साधना ही सबसे बड़ी साधना है।

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-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

प्रधान मंत्री मोदी को चुनाव आयोग से आचार संहिता उल्लंघन मामलों में लगातार मिल रही क्लीनचिट से कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के खेमों में खलबली मची हुई है। वे इस क्लीनचिट को पचा नहीं पा रहे है और नित नए मामले प्रस्तुत कर मोदी को येन केन प्रकारेण दण्डित करवाने पर तुले हुए है। आयोग है की किसी भी मामले में मोदी के विरुद्ध संज्ञान लेने को तैयार नहीं है। अब कांग्रेस ने आयोग पर ही तोहमत लगाने शुरू कर दिए है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के लगभग एक दर्जन मामलों में क्लीनचिट मिलने से विपक्ष ने बवाल मचा दिया है। कांग्रेस और सपा, बसपा का कहना है चुनाव आयोग मोदी से मिला हुआ है। खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे कहावत को चरितार्थ करता विपक्ष चाहता है चुनाव आयोग मोदी के खिलाफ संज्ञान ले। चाहे मामला बनता हो या नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के सभी मामले में चुनाव आयोग से क्लीन चिट मिल गई है। इसमें गुजरात के अहमदाबाद में कथित रोड शो और कर्नाटक के चित्रदुर्ग में भाषण का मामला शामिल है। वहीं उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राजीव गांधी को कथित रूप से भ्रष्टाचारी नंबर वन कहे जाने पर चुनाव आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपी। आयोग को रिपोर्ट और उसके साथ ऑडियो-वीडियो रिकार्डिंग भेजी गयी। रिपोर्ट में मोदी के भाषण का संबंधित अंश है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि प्रथम दृष्टया प्रधानमंत्री की टिप्पणी को आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन नहीं पाया गया है।
जिन ताजा मामलों में मोदी को क्लीन चिट दी गई है, उनमें से एक मामले में कांग्रेस ने आरोप लगाते हुए कहा था कि पीएम ने रोड शो निकालकर आचार संहिता का उल्लंघन किया था। इसके अलावा मोदी ने बालाकोट एयर स्ट्राइक के हीरो का जिक्र करते हुए नए मतदाताओं से से वोट डालने की अपील की थी। इसके बाद कांग्रेस ने चुनाव आयोग से शिकायत की थी। अब दोनों ही मामलों में पीएम को क्लीन चिट दे दी गई है। इससे पहले प्रधानमंत्री के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन के सभी मामलों में चुनाव आयोग क्लीन चिट दे चुका है। इसको लेकर कांग्रेस भी कई सवाल खड़े कर चुकी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया। कांग्रेस पीएम के हर भाषण पर आपत्ति जता कर चुनाव आयोग में अपनी शिकायत दर्ज करवा रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता और खुद कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गाँधी मोदी पर संवैधानिक संस्थाओं को नष्ट करने का आरोप लगा रहे है मगर वे खुद पीएम जैसे पद पर आरोप लगाने से नहीं चूक रहे है। चैकीदार चोर है का नारा लगाकर राहुल खुद संविधान को चीर चीर कर रहे है। खुद काकोजी गुड़ खावे और दूसरों को नसीहत देवे की बात कर रहे है।
इससे पूर्व कांग्रेस ने अब तक पीएम मोदी और अमित शाह के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन की 11 शिकायतें दर्ज कराई थीं। आयोग उन्हें अनसुना करता रहा तो कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई कि हुजूर आप ही कुछ करें। आयोग तो सुनता ही नहीं। इसके बाद कोर्ट ने आयोग को सचेत किया कि आखिर आयोग अपनी शक्तियों का इस्तेमाल क्यों नहीं कर रहा? कोर्ट ने मोदी-शाह के खिलाफ दर्ज आचार संहिता उल्लंघन की सभी शिकायतों को निपटाने को कहा। इसके बाद आयोग ने शिकायतों पर अपनी कुंडली ढीली की और दनादन फरमान आने लगे। सब में क्लीन चिट! शिकायतों में स्थानीय चुनाव प्रशासन की भेजी रिपोर्ट विपक्ष की शिकायतों और भाषणों की वीडियो रिकॉर्डिंग वाले सबूतों के बावजूद आयोग को किसी में कोई दम नजर नहीं आया।
कांग्रेस आरोप लगा रही है मोदी लगातार सेना के नाम का उपयोग कर रहा है। इसके जवाब में भाजपा कह रही है इंदिरा गाँधी ने बांग्ला देश युद्ध का उदहारण देकर तो एक चुनाव ही जीत लिया था।


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- योगेश कुमार गोयल*
दिल्ली तथा हरियाणा में 12 मई को मतदान प्रक्रिया सम्पन्न हो जाने के पश्चात् अब सभी की नजरें पड़ोसी राज्य पंजाब पर केन्द्रित हैं, जहां चुनावी प्रक्रिया के अंतिम चरण में 19 मई को सभी 13सीटोंअमृतसर, आनंदपुर साहिब, भटिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, खडूर साहिब, लुधियाना, पटियाला तथा संगरूर के लिए 2.03 करोड़ मतदाता कुल 278प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे। करीब दो तिहाई मतदाता ग्रामीण पृष्ठभूमि के हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां देशभर में प्रचंड मोदी लहर के बावजूद भाजपा केवल दो सीटें जीतने में ही सफल हो सकी थी जबकि भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (शिअद) 4 सीटें, कांग्रेस 3 सीटें तथा पंजाब में पहली बार चुनाव लड़ने वाली ‘आप’ 4 सीटें झटकने में कामयाब हुई थी। बाद में उपचुनाव में भाजपा ने एक सीट गंवा दी थी और कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़कर 4 हो गई थी। 2009 के चुनाव में ‘आप’ का कोई अस्तित्व ही नहीं था, अतः मुकाबला भाजपा-शिअद गठबंधन तथा कांग्रेस के बीच ही सीमित था। तब कांग्रेस को 8 और इस गठबंधन को 5 सीटें मिली थी।
2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 45.23 फीसदी, अकाली दल को 33.85 फीसदी तथा भाजपा को 10.06 फीसदी मत मिले थे किन्तु 2014 में आप के भी मैदान में आ जाने से स्थितियां बदली और कांग्रेस का मतप्रतिशत गिरकर 33.1 फीसदी रह गया था जबकि अकाली दल का मतप्रतिशत भी 26.3 फीसदी पर आ गया था और सहयोगी भाजपा को महज8.7 फीसदी वोट ही मिले थे। पहली बार चुनाव लड़ने वाली आप को रिकॉर्ड24.4 फीसदी वोट मिले थे। 2017 के विधानसभा चुनाव में आप का जहां 23.7 फीसदी मतों के साथ अपना मतप्रतिशत लगभग स्थिर रखने में सफल रही, वहीं कांग्रेस अपनी स्थिति सुधारते हुए 38.5 फीसदी मतों के साथ विजयी रही। शिअद को 25.2 और भाजपा को महज5.4 फीसदी मत ही प्राप्त हुए।
2014 में पहली बार आप पंजाब में एक प्रमुख पार्टी बनकर उभरी, जिसने देशभर में 4सीटों पर विजय प्राप्त की और ये चारों सीटें पंजाब की ही थी लेकिन पिछले साल राज्य में भारी टूट-फूट की शिकार हो चुकी आप की स्थिति अब पहले जितनी मजबूत नहीं रही है किन्तु फिर भी इस बार कांग्रेस, अकाली-भाजपा गठबंधन तथा आप के बीच ही त्रिकोणीय मुकाबला है। वैसे अकाली-भाजपा गठबंधन तथा आप के लिए पिछली जीत को दोहरा पाना इतना आसान नहीं लगता। भाजपा तो पंजाब में अपना अस्तित्व बनाए रखने की ही लड़ाई लड़ रही है, आप की हालत बेहद खस्ताहाल है। ऐसे में स्पष्ट है कि मुख्य मुकाबला कांग्रेस तथा शिअद के बीच ही होना तय है। वैसे आप के साथ-साथ शिअद भी आंतरिक कलह और विभाजन की स्थिति का सामना कर रही है। वयोवृद्ध प्रकाश सिंह बादल की सक्रियता बेहद कम हो गई है और पार्टी अध्यक्ष सुखबीर बादल ही पार्टी को सक्रिय रखने की कोशिशों में जुटे नजर आते हैं लेकिन उनके पास मजबूत प्रत्याशियों की कमी साफ झलकती है। इन परिस्थितियों में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिअद गठबंधन को पटखनी देते हुए तीन चौथाई सीटों पर परचम लहरा चुकी कांग्रेस अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई पड़ती है। दस साल तक सत्ता पर काबिज रहे भाजपा-अकाली दल गठबंधन को 117 में से 20 सीटें भी नहीं मिली थी और आप पहली बार पंजाब में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी, जिसके बाद लगने लगा था कि राज्य में अगली सरकार आप की भी हो सकती है लेकिन बुरी तरह से आंतरिक फूट का शिकार हुई आप ने बहुत थोड़े ही समय में राज्य में अपना आधार खो दिया है। प्रदेश की राजनीति में दबदबा रखने वाले उसके कई बड़े नेता पार्टी मुखिया केजरीवाल के कुछ मनमाने फैसलों से खफा होकर पार्टी को अलविदा कह दूसरे दलों का थामन चुके हैं तो कुछ ने आप से अलग होकर अपनी ही पार्टी बना ली।
वर्ष 2004 में पंजाब में लोकसभा चुनाव ‘शाइनिंग इंडिया’ तथा सोनिया गांधी के विदेशी मूल जैसे देशव्यापी मुद्दों पर लड़ा गया था, वहीं 2009 में सिख समुदाय के डा. मनमोहन सिंह के आर्थिक विकास के नारे की गूंज स्पष्ट सुनाई दी थी। 2014 का चुनाव तो पूरी तरह नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही लड़ा गया था किन्तु प्रदेश की राजनीति में यह पहला अवसर है, जब लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय खेती-किसानी से जुड़े मसलों, किसानों की कजर्माफी, पंजाब को नशामुक्त करने जैसे स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने सरकार बनने पर चार हफ्तों में नशा खत्म करने का वादा किया था। सरकार बनने पर दो साल के भीतर दो लाख से ज्यादा नशा कारोबारियों को जेल भेजने का दावा भी किया गया किन्तु उनमें ड्रग रैकेट चलाने वाले बड़े लोग न होकर अधिकांश नशा करने वाले व्यक्ति ही शामिल हैं। विपक्ष इस मुद्दे पर भी कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रहा है।
कांग्रेस ने हालांकि लोकसभा चुनावों को ‘मिशन-13’ नाम दिया है किन्तु हाल ही में कांग्रेस के थिंकटैंक माने जाने वाले सैमपित्रोदा के सिख दंगों संबंधी दिए गए असंवेदनशील बयान ने अपने इस मजबूत गढ़ में भी पार्टी को फ्रंटफुट से बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। बड़बोले सिद्धू के चलते पार्टी पहले ही संकटों से घिरी रही है। आप से एनआरआई समुदाय के मोहभंग को भुनाने के लिए सैम की अगुवाई में इंडियन ओवरसीज कांग्रेस पिछले काफी समय से सक्रिय थी और इसमें कांग्रेस को लाभ मिलता भी दिखाई दे रहा था लेकिन सैम के ‘हुआ तो हुआ’ बयान ने सारे किये कराये पर पानी फेर दिया। अब पंजाब में सिख समुदाय के आक्रोश से बचने के लिए पार्टी डा. मनमोहन सिंह तथा कै. अमरिन्दर सिंह सरीखे नेताओं की साख का इस्तेमाल कर रही है। राज्य में जहां करीब 38.5 फीसदी हिन्दू आबादी है, वहीं सिखों की आबादी करीब 58 फीसदी है। मुस्लिम 1.9 फीसदी तथा ईसाई आबादी 1.3 फीसदी ही है। ऐसे में सिख समुदाय के मतों महत्व को बखूबी समझा जा सकता है। एक ओर जहां कांग्रेसी नेताओं के बयान उसके गले की फांस बनते जा रहे हैं, वहीं दो साल से सत्ता में होने के बावजूद अधिकांश वायदे पूरे न होना कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है तो दूसरी ओर अकाली-भाजपा के पास मोदी सरकार की चंद उपलब्धियों का हवाला देने के सिवा पिटारे में और कुछ नहीं है।
राज्य की 13 में से पांच सीटें बठिंडा, फिरोजपुर, संगरूर, गुरदासपुर तथा पटियाला सबसे हॉट मानी जा रही हैं, जिनके चुनाव परिणामों पर तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें टिकी रहेंगी। बठिंडा तथा फिरोजपुर सीटें शिअद के लिए अस्तित्व का सवाल बन चुकी हैं। बठिंडा से शिअद की मौजूदा सांसद हरसिमरत कौर को कांग्रेस के राजा वडि़ंग, आप की बलजिंदर कौर तथा पंजाब डेमोक्रेटिकअलायंस के सुखपाल सिंह खैरा चुनौती दे रहे हैं लेकिन यहां तीनों दलों के मतों का विभाजन होने से शिअद को लाभ मिलने का अनुमान है। 25 वर्षों से लगातार अकाली दल के ही कब्जे में रही फिरोजपुर सीट से अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल को दो बार इसी सीट से अकाली दल के ही सांसद रह चुके शेर सिंह घुबाया इस बार कांग्रेस के टिकट पर चुनौती देने के लिए मैदान में हैं। सिख बहुल इस सीट पर घुबाया को मजबूत प्रत्याशी माना जा रहा है किन्तु बादल को भी कमतर आंकना ठीक नहीं होगा। वैसे घुबाया के कांग्रेस के टिकट पर मैदान में उतरने से सिख समुदाय का एक वर्ग नाराज भी है। अब इस नाराजगी को अपने पक्ष में बदलने में बादल कितने कामयाब होंगे, यह देखना दिलचस्प होगा।
संगरूर सीट से आप के प्रदेशाध्यक्ष व सांसद भगवंत मान को कांग्रेस के केवल सिंह ढिल्लों तथा शिअद के पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा चुनौती दे रहे हैं। इस इलाके में मान की छवि बहुत अच्छी और मजबूत मानी जाती है। पंजाब की एकमात्र यही सीट है, जहां से ‘आप’ के लिए कुछ संभावनाएं नजर आती हैं और यही सीट प्रदेश में आप के अस्तित्व के लिए भी निर्णायक साबित होगी। गुरदासपुर सीट से कांग्रेस ने प्रदेशाध्यक्षसुनीलजाखड़ को मैदान में उतारा है, जिन्हें चुनौती देने लिए भाजपा ने बालीवुड अभिनेता सनी देओल पर दांव लगाया है। हालांकि देओल द्वारा रोड़ शो में जबरदस्त भीड़ जुटाने से इस सीट पर चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है लेकिन यह भीड़ वोटों में परिवर्तित होगी, कहना मुश्किल है। इस सीट से सातों विधायक कांग्रेस के ही हैं, ऐसे में जाखड़ की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। पटियाला वीवीआईपी सीट है, जो मुख्यमंत्री कै. अमरिंदर सिंह का गढ़ है और यह सीट उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न भी है। यहां से उनकी पत्नी परनीत कौर कांग्रेस की प्रत्याशी हैं। पिछली बार परनीत ‘आप’ प्रत्याशी धर्मवीर गांधी से पराजित हो गई थी किन्तु इस बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग है, न तो राज्य में आप की कोई लहर है और न ही धर्मवीर गांधी आप के उम्मीदवार हैं। वह आप से अलग होकर अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में उतरे हैं जबकि शिअद ने पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा को अपना उम्मीदवार बनाया है।
वैसे पंजाब की राजनीति में डेरों की भी बहुत बड़ी भूमिका रही है। यहां छोटे-बड़े करीब 9 हजार डेरे हैं, जिनके कई लाख ऐसे कट्टर समर्थक हैं, जो आंख मूंदकर इन डेरों के हर आदेश को शिरोधार्य करके चलते हैं। यही कारण है कि कमोवेश हर राजनीतिक दल इन डेरों को अपने-अपने तरीके से प्रभावित करने के प्रयासों में जुटा रहता है ताकि डेरों के समर्थकों के एकमुश्त वोट उन्हें मिल सकें। ऐसे में यह कहना असंगत नहीं होगा कि पंजाब के चुनाव में ये डेरे भी अपनी ताकत का अहसास बखूबी कराएंगे। बहरहाल, अब यह देखना बहुत दिलचस्प होगा कि पंजाब में लोकसभा चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा?

*(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


भारत के लोकसभा चुनाव में समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर की एंट्री भी हो गयी है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली के दौरान मचे बवाल में इस महान समाज सुधारक की मूर्ति अज्ञात समाज कंटकों ने तौड़ दी जिसके कारण वे चर्चा में आ गये। शायद विद्यासागर को भी यह पत्ता नहीं था की जिस समाज को सुधारने के लिए वे जीवन पर्यन्त संघर्षरत हुए उसी समाज की हिंसा का शिकार हो जायेंगे। सच तो यह है उनकी मूर्ति नहीं अपितु उनके विचारों को खंडित करने का यह कुत्सित प्रयास हुआ है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए बेहद शर्मनाक है। इस पर की ज ारही सियासत भी निश्चय ही निंदनीय है। सरकार को चाहिए वह उन समाज कंटकों को खोजकर कानून के हवाले करे जिन्होंने इस घिनोने कृत्य को जन्म दिया है। यह भारत माता के लाल का अपमान नहीं अपितु हमारे संस्कारों और संस्कृति का भी घोर अपमान है जिसे किसी भी हालत में सहन नहीं किया जा सकता। इससे पूर्व भी गाँधी और आंबेडकर की मूर्तियां खंडित हुई थी मगर प्रभावी कार्यवाही नहीं होने से समाज कंटकों के हौसले बुलंद हुए। महान दार्शनिक, समाजसुधारक और लेखक ईश्वरचंद विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर, 1820 को कोलकाता में हुआ था। वह स्वाधीनता संग्राम के सेनानी भी थे। ईश्वरचंद विद्यासागर को गरीबों और दलितों का संरक्षक माना जाता था। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह कानून के लिए खूब आवाज उठाई और अपने कामों के लिए समाजसुधारक के तौर पर भी जाने जाने लगे।
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का बचपन गरीबी में ही बीता। उन्होंने गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा ली और फिर अपने पिता के साथ कोलकाता आ गए। पढ़ाई में अच्छे होने की वजह से यहां उन्हें कई संस्थानों से छात्रवृत्तियां मिली। उनके विद्वान होने की वजह से ही उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई थी।
साल 1839 में उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और फिर साल 1841 में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया था। उस वक्त उनकी उम्र महज 21 साल ही थी। फोर्ट विलियम कॉलेज में पांच साल तक अपनी सेवा देने के बाद उन्होंने संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के तौर पर सेवाएं दीं। यहां से उन्होंने पहले साल से ही शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए कोशिशें शुरू कर दी और प्रशासन को अपनी सिफारिशें सौंपी। इस वजह से तत्कालीन कॉलेज सचिव रसोमय दत्ता और उनके बीच तकरार भी पैदा हो गई। जिसके कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। लेकिन, उन्होंने 1849 में एक बार वापसी की और साहित्य के प्रोफेसर के तौर पर संस्कृत कॉलेज से जुडे। फिर जब उन्हें संस्कृत कालेज का प्रधानाचार्य बनाया गया तो उन्होंने कॉलेज के दरवाजे सभी जाति के बच्चों के लिए खोल दिए।
ईश्वर चंद विद्यासागर एक महान समाज सुधारक, लेखक, शिक्षाविद् और संस्कृत के विद्वान थे। समाज में क्रांतिकारी बदलाव के लिए उन्होंने अथक प्रयास किया। महिलाओं की शिक्षा और स्थिति में बदलाव के प्रति उनका योगदान उल्लेखनीय है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने निज भाषा और लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूलों की एक श्रृंखला के साथ कोलकाता में मेट्रोपॉलिटन कॉलेज की स्थापना की। इससे भी कई ज्यादा उन्होंने इन स्कूलों को चलाने के पूरे खर्च की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। उन्होंने विधवाओं की शादी के समाज में खूब आवाज उठाई और उसी का नतीजा था कि विधवा पुनर्विवाह कानून-1856 पारित हुआ।
उन्होंने खुद एक विधवा से अपने बेटे की शादी करवाई थी। उन्होंने बहुपत्नी प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। उनके इन्हीं प्रयासों ने उन्हें समाज सुधारक के तौर पर पहचान दी।
आधुनिक बंगाली भाषा के जनक विद्यासागर न सिर्फ महान लेखक थे बल्कि उनको आधुनिक बंगाली भाषा का जनक भी कहा जाता है। बंगाली की कई वर्णमालाओं में उन्होंने संशोधन किया। उन्होंने संस्कृत पर भी काफी काम किया। सेवानिवृत्त होने के समय तक वह संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता में संस्कृत के प्रफेसर थे। उन्होंने संस्कृत व्याकरण के नियमों पर एक किताब भी लिखी।
उनका नाम ईश्वर चंद बंदोपाध्याय था। लेकिन विभिन्न विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ और ज्ञान के कारण उनके गावों के लोगों ने उनको विद्यासागर के नाम से पुकारना शुरू कर दिया।


डी-32, माॅडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218


नूंह (हम हिंदुस्तानी)- जिले के आरोही मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल, रेवासन का अंग्रेजी विषय का बोर्ड परीक्षा परिणाम शत प्रतिशत रहा। अंग्रेजी प्राध्यापिका डॉ सुलक्षणा अहलावत ने बताया कि सभी बच्चों की फर्स्ट डिवीजन है और अंग्रेजी विषय में अन्य विषयों की तुलना में सबसे अधिक अंक आये हैं। उन्होंने बताया कि उनके विषय में इकरार ने सबसे ज्यादा 95 अंक हासिल किए। उन्होंने बताया कि विद्यालय के किसी भी छात्र के संगीत और शारिरिक शिक्षा जैसे प्रैक्टिकल सब्जेक्ट में भी 95 या उससे ज्यादा अंक नहीं आये। इकरार द्वारा इतने अंक हासिल करना उनके लिये गर्व की बात है। विद्यालय का परीक्षा परिणाम लगभग 82% रहा है और कुल 6 मैरिट आई हैं। विद्यालय के छात्र शाहरुख ने 433, इकरार ने 425, अहसान ने 419 अंक प्राप्त करके विद्यालय में क्रमशः पहला, द्वितीय और तृतीय स्थान प्राप्त किया। विद्यालय के प्रधानाचार्य अब्दुल मजीद ने शानदार परीक्षा परिणाम के लिए सभी शिक्षकों और छात्रों को बधाई दी।


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-एक्टर्स अक्सर अपने चरित्र को पूरी तरह अपनाने के लिए कई बार काफी दिलचस्प और अनूठे काम करते हैं ताकि वे अपनी भूमिका को बेहतरीन तरीके से निभा पाएं। कुछ लोग अपना वजन कम करके या बढ़ा के खुद को शारीरिक रूप से बदल लेते हैं और कुछ खुद को बाहरी दुनिया से बिलकुल अलग कर लेते हैं ताकि अपने चरित्र की मानसिकता से जुड़ सकें। अभिनेता सुमीत व्यास भी एक ऐसे ही अभिनेता हैं, जो परदे पर निभाने वाले पात्रों के लिए खुद को बहुत पहले से तैयार कर लेते हैं। सुमीत बहुत जल्द भारत के अभिजात्य अदालत मामले नानावटी मर्डर केस पर आधारित अपनी अगली श्रृंखला की शूटिंग शुरू करने जा रहे हैं, जिसने देश को 1959 में हिला के रख दिया था। सुमीत व्यास को इसमें भारत के प्रमुख वकील राम जेठमलानी के चरित्र को चित्रित करते हुए देखा जाएगा। जेठमलानी ने इस हाई प्रोफाइल हत्या के मामले में अभियोजन पक्ष का प्रतिनिधित्व किया था।
यह पहली बार होगा जब सुमीत किसी कोर्ट रूम ड्रामा सीरीज़ वर्डिक्ट में एक वकील की भूमिका करते हुए दिखाई देंगे और इतने ऊँचे कद के व्यक्तित्व को निभाएंगे। इस भूमिका को निभाने के लिए सुमीत को इस तरह के हत्या के मामलों के मनोविज्ञान और परिदृश्य को समझने की आवश्यकता थी। इसके लिए वे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते थे इसलिए उन्होंने कई क्राइम ड्रामा सीरीज़ देखना शुरू कर किया। एक आपराधिक मानसिकता कैसी होती है और वकील इस तरह के मामलों से कैसे निपटते हैं ये समझने के लिए वे सबसे अच्छे क्राइम ड्रामा सिरीज़ का चुनाव कर रहे हैं। सुमीत लोकप्रिय श्रृंखलाओं जैसे कि लूथर, द सिनर, माइंड हंटर अमेरिकन क्राइम स्टोरी, बॉश, टिन स्टार और अन्य को लगातार देख रहे हैं। जेठमलानी के कैरेक्टर को अपनाने से पहले सुमीत ये सुनिश्चित करना चाहते थे कि इन श्रृंखलाओं के कंटेंट को सही तरीके से समझ पाएं इसलिए उन्होंने बैक टू बैक सारी श्रृंखलाएं देखीं।


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-ये हम सभी जानते हैं कि अभिनेता अली फज़ल पर्दे पर अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए मेहनत करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। अपने पिछले प्रोजेक्ट जिसमें उन्होंने एक गैंगस्टर की भूमिका निभाई थी, उसमें उन्होंने अपने चरित्र को साकार रूप देने के लिए खुद में शारीरिक बदलाव किए थे। हालांकि, कई बार अली अपने पात्रों को बिना पूर्व तैयारी के ही निभाते हैं और इस तरह कैमरे के सामने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देते हैं। पर हाल ही में एक नए प्रोजेक्ट के लिए अली को एक दिलचस्प अनुभव मिला। अपने व्यक्तिगत शौक को इसमें शामिल करते हुए उन्होंने सेट पर जाने से काफी पहले ही अपने चरित्र को जिया। अली को जब भी काम से फुर्सत होती है, वे बिना रुके अपने पसंदीदा टीवी शो देखना पसंद करते हैं, और इस बार वे बेहद मशहूर सिरीज़ गेम ऑफ थ्रोन्स देखने के लिए खूब उत्साहित थे। असल में अली फजल ने अब तक इसका एक भी एपिसोड नहीं देखा था। पर एक प्रशंसक होने के नाते और जीओटी के कलाकारों से अपनी दोस्ती के कारण अली ने आखिरकार इस शो के नवीनतम 8वें सीजन के सभी एपिसोड देखने का फैसला किया।
दिलचस्प बात यह है कि ये वही वक़्त था जब उन्हें अपने अगले प्रोजेक्ट हाउस अरेस्ट की शूटिंग शुरू करनी थी। यह फिल्म समित बसु और शशांक घोष द्वारा निर्देशित एक सिचुएशनल कॉमेडी है और अली ने इसमें एक ऐसे इंसान की भूमिका निभाई है जो किसी वजह से अपने ही घर में कैद हो गया है। यह भूमिका उन्हें बिल्कुल सही वक़्त पर मिली जबकि अली ने सच में ही बाहरी दुनिया से जुड़े बगैर या किसी से भी बातचीत किए बिना लगातार अपने घर में दस दिन बिताए। अपने पसंदीदा टीवी शो को बिना अवरोध के देख पाना ही इस एक प्रकार के मैराथन की वजह थी, पर इस प्रक्रिया में उन्हें अगली फिल्म के अपने चरित्र को पूरी तरह महसूस करने का मौका भी मिल गया।
संयोग से हुए इस प्रयोग ने उन्हें उस चरित्र और इस प्रकार के फोबिया से जुड़ी बदनामी को समझने में मदद की। ऐसा करके उन्हें अकेले रहने वाले लोगों की मानसिकता का एहसास हुआ। पूरे दस दिनों तक घर में बंद रहने के अनुभव से उन्हें हाउस अरेस्ट के लिए अपने किरदार को बेहतर बनाने में काफी मदद मिली।


-सुरेश हिन्दुस्थानी
कांग्रेस में एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले सेम पित्रोदा के बयान के बाद एक बार फिर से कांग्रेस बैकफुट पर आती दिखाई दे रही है। हालांकि कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने पंजाब में चुनाव प्रचार के दौरान एक प्रकार से यह जताने का प्रयास किया है कि वह अपने राजनीतिक सलाहकार सेम पित्रोदा के बयान से काफी दुखी हैं। राहुल गांधी ने सेम पित्रोदा के बयान पर कहा है कि देश के बाहर विदेशों में दोषियों को सजा मिलनी चाहिए और मिलेगी भी। दंगों को त्रासद करार देते हुए कहा कि उन्होंने श्री पित्रोदा से भी कहा है कि वह बयान के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगें। यहां सबसे बड़ा सवाल यह आता है कि पित्रोदा ने तो केवल बयान ही दिया है, दोषी तो पूरी कांग्रेस ही है। पहली बात तो यह है कि सिखों को जिन्दा जला देने वाला यह वीभत्स हत्याकांड कांग्रेस के शासनकाल में हुआ और इसमें कांग्रेस के बड़े नेताओं का हाथ होने की भी खबरें आती रही हैं। इतना ही नहीं लगभग छह महीने पूर्व कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को इस मामले में सजा भी मिल चुकी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ भी सिख दंगों में आरोपी हैं।
ओवरसीज कांग्रेस प्रमुख सैम पित्रोदा के 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों को लेकर बयान हुआ तो हुआ बहुत ही शर्मनाक है। राहुल गांधी ने सेम पित्रोदा के बयान को बुरा बताकर उनसे सार्वजनिक रुप से माफी मांगने के लिए कहा है, लेकिन सवाल यह भी है कि जब सिखों को जलाया जा रहा था, तो उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी कुछ इसी प्रकार की बात कही थी। राजीव गांधी ने कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। राजीव गांधी का यह बयान भी जो हुआ सो हुआ जैसा ही कहा जा सकता है, जिसमें न तो पीडि़तों के प्रति कोई सहानुभूति थी और न ही उन्हें रोकने जैसी कोई भाषा ही थी। प्रश्न इस बात है कि राजीव गांधी उस समय कांग्रेस के मुखिया भी थे तो कांग्रेस की ओर से आज माफी कौन मांगेगा?
सेम पित्रोदा ने जो हुआ सो हुआ कहकर एक बार फिर पीडि़तों के घाव पर नमक ही छिड़का है। क्योंकि दिल्ली, पंजाब सहित पूरे देश में हुए सिख विरोधी दंगों में जिस प्रकार से नरसंहार किया गया, वह हृदय दहलाने वाला ही कहा जा सकता है। कांग्रेस नेता ने उन घावों को फिर से कुरेदने जैसा कृत्य किया है। कांगे्रस आज कितनी भी सफाई दे, परंतु दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के बाद इस बात की गुंजाइश बिलकुल भी नहीं बची है कि कांग्रेस के आरोपी नेता इस मामले में निर्दोष हैं। एक समय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंच से यह घोषणा की थी कि सिख नरसंहार में कांग्रेस का किसी भी प्रकार का हाथ नहीं है। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि किसी के कहने भर मात्र से कांग्रेस के नेता दोषी हो जाएं, यह संभव ही नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निचले न्यायालय क निर्णय बदलते हुए कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इससे पूर्व केन्द्र में संप्रग की सरकार के समय निचली अदालत ने सज्जन कुमार को 2013 में बरी कर दिया था। सीबीआई ने इस मामले में पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को बरी किए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी। उच्च न्यायालय के निर्णय में सज्जन कुमार को आपराधिक षडयंत्र रचने, हिंसा कराने और दंगा भड़काने का दोषी पाया गया। इसमें पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर, कैप्टन भागमल, गिरधारी लाल और दो अन्य लोग शामिल थे।
यह सही है कि सिखों का नरसंहार केवल इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न हालातों का परिणाम था, यह प्रतिक्रिया किसने की, यह एक अलग सवाल है, लेकिन बिना किसी संलिप्तता के इतना बड़ा हादसा हो ही नहीं सकता। इसलिए भारतीय जनता इस मामले में कांग्रेस को सदैव कठघरे में खड़ा करती रही है। हत्याकांड के बाद कांग्रेस के नामचीन नेताओं के नाम भी सामने आए थे, इन नेताओं को कांग्रेस ने बचाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि वे हमेशा पार्टी और सत्ता के उच्च पदों पर भी विराजमान रहे। इसे क्या कहा जाएगा?
देशभर में सिखों के घरों और उनकी दुकानों को लगातार हिंसा का निशाना बनाया गया। तीन दिन तक सिखों का नरसंहार चलता रहा। नरसंहार करने वालों को कौन हवा दे रहा था, यह 34 साल बाद भी साफ नहीं हो पाया है, लेकिन जिन कांग्रेस नेताओं पर इन दंगों में शामिल होने के आरोप लगे थे, कांग्रेस ने उनके विरोध में किसी भी प्रकार की कार्रवाई भी नहीं की। सबसे विचारणीय बात तो यह है कि सिखों जिन्दा जलाने वाले लोगों को ऐसा करने के लिए संकेत कौन दे रहा था। इसमें परदे के पीछे किसकी भूमिका थी। क्या इससे यह संकेत नहीं मिलता कि सिखों के नरसंहार मामले में कांग्रेस सीधे तौर पर जिम्मेदार रही है?
हम जानते हैं कि सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सरेआम सिख दंगों के लिए कांग्रेस की ओर से आम जनता से माफी मांगी थी। क्या कांग्रेस के प्रमुख नेताओं द्वारा माफी मांगने का यह कृत्य यह संकेत नहीं करता कि सिख दंगों में कांगे्रस का ही हाथ था। वास्तव में माफी वही मांगता है, जिसने गलती की हो, तो क्या सिख दंगा कांग्रेस द्वारा की गई गलती ही थी। सिख दंगा इतना हृदय विदारक था कि इसमें माफी भी नहीं दी जा सकती। क्योंकि आज उस दृश्य को याद करके हृदय छलनी हो जाता है। रेलवे स्टेशनों के दृश्य याद करके आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सिख समुदाय के लोग भी कांग्रेस के नेताओं को दोषी मानते रहे हैं।


102 शुभदीप अपार्टमेंट
कमानी पुल के पास, लक्ष्मीगंज
लश्कर ग्वालियर मध्यप्रदेश
मोबाइल-9770015780


-सलीम रज़ा


सियासत भी अजीबो-गरीब चीज है, ये जितने रंग बदलती है उसे देखकर शायद गिरगिट को भी अपने ऊपर शर्म आने लगे। खैर ये जो सियासत में तेजी के साथ घटनाक्रम घट रहा है वो दरअसल सियासत के मुख पृष्ठ की आवरण कथा जैसा है। अब आप खुद देखिये इस चुनाव में जिस तरह से अन्तहीन और दिशाहीन मुद्दे उछाले गये हैं जिनका न तो लोकतंत्र से कोई सरोकार है और न ही मतदाता को इससे कोई फायदा होने वाला है। कहते हैं किसी भी चीज की अति महत्वाकांक्षा इंसान को प्रगति के रास्ते से उतार देती है। आज जो कुछ भी चुनाव में इस्तेमाल किया जा रहा है वो सच में बेहद शर्मनाक है। सियासी मंचों पर जिस तरह से एक दूसरे के चरित्र का बखान किया जा रहा है उसे देखकर ऐसा लगता है सियासत के रोल माडल कहलाने वाले लोग खुद निम्न स्तर की सियासत के दलदल में फंस चुके हैं।

चुनावी मंचों पर एक दूसरे के चरित्र की पोल पट्टी खोली जा रही है अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल खुलेआम किया जा रहा है। चुनावी समर में अहंकार में डूबे सियासत के रण्नीतिकार जो आने वाले समय में इतिहास के पन्नों पर किसी तारे की तरह शोभायमान हो जायेंगे वर्तमान में महिलाओं का वाक्ययुद्ध से चीरहरण करने पर उतारू है। ये सियासत की कुर्सी पर शोभायमान होने का एक नायाब तरीका नजर आया इस चुनावी संग्राम में जिसके अन्दर मुद्दे गौण हो गये । जिसकी काफी लानत-मलानत भी की जा रही है ,लेकिन इससे उन्हें कोई भी फर्क पड़ने वाला नहीं है। खैर अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल इस चुनाव में किया जा रहा है ये नया नहीं है इससे पहले भी कई मर्तबा अमर्यादित और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया जा चुका है लेकिन इस बार हद कुछ ज्यादा ही पार कर चुकी है। मुख्य मुद्दे की बात की जाये तो इस बार चुनाव में मुख्य मुद्दा तो कोई नहीं है हां हिन्दु-मुस्लिम एक ऐसा मुद्दा बन गया जो वर्तमान दौर की सियासत में खूब फल-फूल रहा है। अमूमन देखा जा रहा है कि मौजूदा सरकार ने इस मुद्दे को जमकर कैश करा है खासतौर से मुस्लिम महिलाओं के लिए लाया गया तीन तलाक बिल। इस बिल के पारित होने के बाद मुस्लिम महिलाओं ने मोदी के समर्थन में अपनी उपस्थिित दर्ज कराई थी,भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी तादाद में मुस्लिम महिलाओं के मिल रहे समर्थन को चुनावी जनसभाओं में जमकर कैश किया था।


लेकिन अभी हाल ही में श्रीलंका में ईस्टर के दिन हुये सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद श्रीलंका सरकार ने जिस तरह से मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पर पतिबंध लगाने का फरमान जारी किया तो जाहिर सी बात है इसका असर एशिया महाद्वीप के दूसरे बड़े देश भारत पर तो पड़ना ही था। इसलिए वो राजनीतिक पार्टियां जो हिन्दुत्व का चोला ओढ़े है उन्होंने इस मुद्दे को उछालने की कोशिश भी करी लेकिन भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर बैकफुट पर ही दिखी ऐसा क्यों ? पानी पी-पीकर इस्लाम को निशाना बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी इस बुर्के जैसी उनकी नजर में कुप्रथा से किनारा क्यों कर गई ? क्या ये मुस्लिमों के हितैषी होने का संकेत है मेरी समझ से शायद नहीं। भारतीय जनता पार्टी की इस मुद्दे से किनारा करने की बजह है और वो बजह है बहुसंख्यकों में सदियों से चली आ रही घुघट प्रथा दोनों ही प्रथाये ऐसी है जिसके अन्दर रहने वाले का चेहरा दिखाई नहीं देता है , इस लिहाज से दोनो ही बातों पर बहस और चर्चा होनी चाहिए। लेकिन चुनावी धमाचैकड़ी के बीच भारतीय जनता पार्टी और उसके कारिन्दे इस पूरे मामले को दबाने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। इन नेताओं को मालूम है कि अगर इस मामले को जरा सी भी हवा दे दी तो बेशक उनकी हवा निकल सकती है।

वो यूं कि हमारे देश में संस्कृति और सभ्यता का बोलबाला है , भले ही आज पाश्चात्य सभ्यता ने अपने पांव पसार लिए हों लेकिन फिर भी हिन्दुस्तान के लोग अपनी संस्कृति और सभ्यता की पूरे विश्व में मिसाल बने हुये हैं। कितना दुःखद है कि जब भी कोई आतंकी कायराना हरकत देश या देश से बाहर होती है तभी समूचे विश्व के रडार पर इस्लाम ही होता है, ऐसे माहौल में वो मुसलमान प्रभावित होता हैे जिसका इससे दूर-दूर तक वास्ता नहीं होता लेकिन फिर भी मुस्लिम ही दोषी है क्यों ? बहरहाल जब बात बुर्के की चली है तो ये भी बता देना जरूरी है कि बुर्का और पर्दा दोनो ही वह पहलू हैं जिस पर बहस होनी चाहिए क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में दोनों ही प्रभावित करते हैं फिर बुर्के पर ही जोर क्यों?। क्या ये सियासी अवधारणा मुस्लिमों को छिन्न-भिन्न करने की तो नहीं या समूचे हिन्दू राष्ट्र का अघोषित संकेत ?।

खैर इस्लाम में कुरान के मुताबिक महिलाओं को परदा आया है जिसमें नकाब और हिजाब है ये कोई परम्परा नहीं है। लेकिन इस बार बुर्के पर उठी आवाज पर भाजपा के सहयोगी शिव सेना के साथ खुद साध्वी प्रज्ञा ने बुर्के पर बैन लगाने का समर्थन किया था, लेकिन भाजपा इस बात को लेकर खामोश ही रही या यूं कह लें सियासी नजाकत को देखकर बीजेपी बैक फुट पर दिखी। उसके बैकफुट पर रहने के दो कारण थे एक तो देश के अन्दर लोकसभा चुनाव चल रहे थे दूसरे भाजपा को डर था कि ण्ेसे नाजुक वक्त में अगर वो बुर्का बैन करने पर अपनी आवाज बुलन्द करते हैं तो घुंघट पर भी लोग उंगली उठायेंगे। जाहिर है हिन्दंस्तान में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां आज भी बहुतायत में हिन्दू महिलायें घुंघट करती हैं, लिहाजा चुनाव प्रभावित होगा और इसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा। ये बात सही है अगर देश में चुनावी माहौल न होता तो बेशक भाजपा इस मुद्दै को लेकर श्रीलंका के साथ दोस्ताना रवैया अपनाते हुए उसकी सुर में सुर मिलाकर इसको सियासी रंग देने से नहीं चूकती। बहरहाल बुर्का हो या घंूघट ये भारतीय संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक हैं इसे लेकर सियासत होना किसी भी मायने में सही नहीं है । लेकिन देखा ये जा रहा है कि चाहे किसी भी धर्म की महिला हो वो अपने आप को बंधा हुआ देखना नहीं चाहती अमूमन देखा जा रहा है कि बहुत सी नई जनसंख्या इस प्रथा को अपने ऊपर जबरदस्ती थोपा गया धर्मिक आडम्बर समझती हैं। ये ही वजह है कि आज मुस्लिम समाज की लड़कियां भी स्कूल कालेजों में बुर्के को कम ही अपना रही है,,ं लेकिन हिजाब में रहना कोई बुरी बात भी नहीं है इससे हम अपने संस्कारों को जीवित रखकर धार्मिक पहचान बनाये रखने की कोशिश करते है।ं लिहाजा इन सारी बातों को जो धर्म और संस्कृति से जुड़ी हों उस पर सियासी रंग चढ़ाना ठीक नहीं है। कहने का मतलब साफ है कि भले ही बुर्के और घूंघट को राष्ट्रीय सुरक्षा के चश्मे से भाजपा देखने की कोशिश कर रही हो लेकिन लेकिन समय की सियासत ये ही कहती है कि अगर जिस मुद्दे पर वोट बैंक की फसल को नुकसान पहुंचता है तो उस मुद्दे से किनारा करना ही समझदारी है जैसाा की भाजपा ने किया है।

सलीम रज़ा।

स्वतंत्र पत्रकार।

देहरादून उत्तराखण्ड।


-राहुल लाल


भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।यहाँ मतदाताओं की कुल संख्या 90 करोड़ से ज्यादा है,जो यूरोपीय यूनियन के सभी देशों के आबादी से भी अधिक है।वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र धन बल का शिकार हो गया है।देश में अभी दुनिया का सबसे महंगा चुनाव जारी है।2016 के ट्रंप के चुनाव को अब तक का सबसे महंगा चुनाव माना जा रहा था,जिसमें 46 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे,लेकिन विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों और शोध समूहों का आकलन है कि इन चुनावों में 50 हजार करोड़ से 70 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं।चुनावी खर्च पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था 'कार्नेगीएंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस थिंक टैंक' के आँकड़े बताते हैं कि भारत में 2019 का चुनाव दुनिया का महंगा चुनाव साबित होगा।इस संस्था के अनुसार इस बार के चुनाव में 70 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च होने का अनुमान है।स्पष्ट है कि यह राशि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों से काफी ज्यादा है।यदि भारत और अमेरिका के चुनावी खर्च के साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि न केवल अमेरिकी अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है,बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के मुकाबले कई गुना बड़ी है।इसलिए भारत की चुनावी प्रक्रिया का अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे विकसित देश से भी महंगा हो जाना गहन चिंता का विषय है।राजनीति और चुनावों में धन के बढ़ते इस्तेमाल से निर्वाचन प्रक्रिया में गरीबों के लिए अवसर कम होते जा रहे हैं और इससे निबटने के लिए चुनाव सुधार जरूरी हो गया है।
वर्तमान परिदृश्य में भारतीय राजनीति में सामान्य लोग केवल मतदाता बनकर रह गए हैं,जबकि चुनाव लड़ने और विधायिका का सदस्य बनने का अधिकार केवल धनपतियों के पास रह गया है।जबकि वास्तविक लोकतंत्र से आशय यह है कि कोई भी व्यक्ति चुनाव लड़े और उसे समानतापूर्ण प्लेटफार्म उपलब्ध हो।एडीआर के आँकड़ों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के 85% सांसद करोड़पति थे,जबकि कांग्रेस के 80%।अगर एडीआर और इलेक्शन वाच के आँकड़ों पर पुनः ध्यान दें तो वर्ष 2019 में भी कांग्रेस और बीजेपी ने जमकर करोड़पतियों को मैदान में उतारा है।इतना ही वैकल्पिक राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के भी 50% उम्मीदवार करोड़पति ही हैं।
जहाँ तक लोकसभा चुनाव में खर्च की बात है,तो प्रति उम्मीदवार 70 लाख रुपये खर्च की सीमा निर्धारित है।लेकिन सभी राजनीतिक दल अपनी ब्रांडिंग से लेकर विज्ञापन पर जिस प्रकार भारी- भरकम धनराशि खर्च करते हैं,उससे जाहिर है कि इस तरह के नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं।हर कोई भली-भांति परिचित है कि सभी राजनीतिक दल और उम्मीदवार पैसा जुटाने तथा चुनाव में रुपये बहाने के तमाम तरह के तरीके अपनाते हुए निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं और चुनाव आयोग को इस खर्च का छोटा-सा हिस्सा कुल खर्च के रुप में थमा दिया जाता है।वैसे तो सामान्य रुप से राजनीतिक दल और उम्मीदवारों का कहना होता है कि उम्मीदवार का 70 लाख की सीमा अत्यंत कम है,परंतु एडीआर के आँकड़ों के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव में 90% से अधिक सांसदों ने अपना खर्च निर्धारित सीमा के 50% से भी कम प्रदर्शित किया।अब जाहिर है,जो करोड़ों खर्च करेगा,चुनाव जीतने के बाद उसकी भरपाई लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही कहीं न कहीं आघात पहुँचा कर ही की जा सकती है।और यहीं से घपले-घोटालों की शुरुआत होती है और आम जनता में राजनीति को लेकर ही हीन भावना का विस्तार हो रहा है।इधर कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की तत्परता के कारण प्रशासन करोड़ों की धनराशि चुनाव के वक्त जब्त कर रहा है।लेकिन चुनाव में खपने वाली भारी-भरकम धनराशि की तुलना में जब्त की जाने वाली यह राशि ऊँट के मुँह में जीरे के समान है।

धन बल के कारण वेल्लोर लोकसभा चुनाव का रद्द होना---

चुनाव में धन बल का विस्तार कितना ज्यादा हो गया है,इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अत्यधिक धन बल के कारण वेल्लोर लोकसभा चुनाव रद्द करना पड़ा।देश में पहली बार धन के अत्यधिक प्रयोग के कारण किसी लोकसभा चुनाव को रद्द किया गया है।इससे पहले अप्रैल 2017 में तमिलनाडु की आर के नगर विधानसभा का उपचुनाव भारी मात्रा में नकदी जब्त होने के बाद रद्द किया गया था।

धन बल रोकने के सुप्रीम कोर्ट के प्रयास---


विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से अदालतों के समक्ष यह प्रश्न उठता रहा है कि राजनीतिक दल,दोस्तों एवं संबंधियों द्वारा किए गए खर्च को भी उम्मीदवार के खर्च में शामिल माना जाना चाहिए या नहीं।प्रारंभ में अदालत इसे प्रत्याशी के खर्च में शामिल करने के पक्ष में नहीं थी।रणंजय सिंह बनाम बैजनाथ सिंह से लेकर बी आर राव बनाम एनजो रंजा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने खर्च के बारे में यही रवैया अपनाया।किंतु 1975 में कंवरलाल बनाम अमरनाथ में व्यवस्था दी कि अत्यधिक संसाधन की उपलब्धता किसी उम्मीदवार को दूसरों के मुकाबले अनुचित लाभ प्रदान करती है,जो अलोकतांत्रिक है।अदालत ने एक चेतावनी भी दी,"चुनाव के पहले दिया गया चंदा चुनाव के बाद वादे के रुप में काम करेगा,जिससे आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होगा।"इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दल,दोस्तों एवं रिश्तेदारों द्वारा किए खर्च को उम्मीदवार के चुनावी खर्च का हिस्सा माना।अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए 1974 में जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 77 में संशोधन कर एक व्याख्या जोड़ दी कि ऐसे खर्च को उम्मीदवार से अलग माना जाएगा।इस तरह चुनावों में फिजूलखर्ची को वैधानिकता प्रदान की गई। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने गडक वाईके बनाम बालासेह विखे पाटिल मामले में इस व्याख्या को खत्म करने पर जोर दिया।फिर गंजन कृष्णाजी बापट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा प्राप्त एवं खर्च की गई राशि का सही हिसाब रखने के लिए नियम बनाने की जरूरत पर जोर दिया। 1996 में कॉमन कॉज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिधिनिधित्व कानून,1951 की धारा 77 की व्याख्या कंपनी अधिनियम 1956 के आलोक में की।कंपनी अधिनियम की धारा 293 ए के तहत कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देना वैध है तथा आयकर अधिनियम की धारा 13 -ए के अंतर्गत इस पर कर में छूट है,किंतु ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है,जो राजनीतिक दलों को सही खाता रखने को मजबूर करे।इसलिए अदालत ने निर्णय दिया कि जो राजनीतिक दल आयकर रिटर्न नहीं भर रहे हैं,वे आयकर कानून का उल्लंघन रहे हैं और केंद्रीय वित्त सचिव को इसकी जांच करने का निर्देश दिया।इस तरह अदालत ने लगातार स्वतंत्र चुनाव करने के लिए धनबल की भूमिका को कम करने का प्रयास किया।

इलेक्टॉरल बांड को लेकर चुनवी चंदे का उलझता मामला और सुप्रीम कोर्ट--

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टॉरल बांड के माध्यम से राजनीतिक दलों को मिलने वाली रकम पर तो कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई,लेकिन पारदर्शिता हेतु पार्टियों को निर्देश दिया कि इलेक्टॉरल बांड के जरिए 15 मई 2019 तक मिले चंदे की विस्तृत जानकारी सीलबंद लिफाफे में 30 मई तक चुनाव आयोग को सौंपे।पॉलिटकल फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने के तमाम दावों के बीच इलेक्टॉरल बांड पर भी अपारदर्शी होने का आरोप लगने लगा।राजनीतिक दलों की फंडिंग में अज्ञात स्रोतों से आने वाली आय की मात्रा बहुत ज्यादा होती है।साथ ही सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इलेक्टॉरल बांड भी इसमें ज्यादा बदलाव नहीं ला पा रहा था।सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इलेक्टॉरल बांड से यह लग रहा था कि हम एक अपारदर्शी व्यवस्था को छोड़कर एक दूसरी अपारदर्शी व्यवस्था के दायरे में आ गए हैं।इसके पूर्व की व्यवस्था में राजनीतिक दलों को 20 हजार रूपये से कम चंदे का विवरण न बताने की छूट थी।इसका भारी दुरूपयोग हो रहा था।चुनावी बांड की व्यवस्था बनने के बाद इस छूट की सीमा को 2,000 रूपये कर दी गई।इलेक्टॉरल बांड पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चुनाव सुधार की दिशा में बेहतरीन कदम माना जा रहा है।इससे उम्मीद जगी है कि जल्द ही देश में राजनीतिक दलों के चंदे से संबंधित एक ऐसा पारदर्शी ढांचा बन सकेगा,जहाँ राजनीतिक दलों के "अज्ञात स्रोत" वाले चंदे का मॉडल समाप्त हो सकता है।

उम्मीदवारों पर चुनाव खर्च की सीमा लेकिन राजनीतिक दलों पर क्यों नहीं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश में उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की सीमा तय है,लेकिन राजनीतिक दलों के लिए कोई सीमा नहीं है।ऐसा क्यों? सबसे पहले तो राजनीतिक दलों के खर्चें की सीमा तय की जानी चाहिए,जो राष्ट्रीय दलों एवं क्षेत्रीय दलों के अलग-अलग हो।उम्मीदवारों की संख्या के हिसाब से दलीय खर्च की सीमा में मामूली बदलाव भी किया जा सकता है।पर कुछ न कुछ होना चाहिए।आखिर पार्टियों के चुनाव प्रचार खर्च की सीमा क्यों न तय की जाएँ?राजनीतिक दलों पर चुनाव खर्च की कोई सीमा नहीं होने के कारण चुनाव के दौरान खर्च में बेतहाशा वृद्धि जारी है।यह सब और आसान हो जाता है,क्योंकि राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार खर्च पर अंकुश या नियमन के लिए कोई प्रावधान नहीं है।निर्वाचन आयोग सिर्फ उम्मीदवारों के खर्च पर नजर रख सकता है,पार्टियों के खर्च पर नहीं।
इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग नामांकन पत्र दाखिल करने के तिथि से ही उम्मीदवारों के खर्च पर निगरानी कर पाता है।लेकिन उसके पूर्व भी उम्मीदवार काफी खर्च चुका होता है,जिसकी गणना अभी नहीं हो पाती है।ऐसे में यहाँ भी नियमों मे संशोधन की आवश्यकता है,जिससे नामांकन पत्र दाखिल करने के पूर्व भी चुनाव आयोग उम्मीदवार द्वारा खर्च का ब्यौरा ले सके।

स्टेट फंडिंग में भी समाधान नहीं---

कई बार सुझाव दिया गया कि राज्य चुनाव खर्च को वहन करे।यानि प्रत्याशियों को कोई खर्च नहीं करना होगा और केवल सरकार उनके प्रचार की व्यवस्था करेगी।लेकिन यह भी इस समस्या का समाधान नहीं है।अगर ऐसा हो भी जाता है,तो क्या जरूरी है कि सभी उम्मीदवार साधु हो जाएं।वैसे भी कुछ हद तक राज्य चुनाव खर्च वहन करता ही है।मसलन,उम्मीदवारों को रियायती दरों पर कई सुविधाएं देना और आकाशवाणी तथा दूरर्दशन पर विभिन्न दलों को प्रचार का समय दिया जाना इसमें शामिल है।

निष्कर्ष--

2014 लोकसभा चुनावों में किसी उम्मीदवार द्वारा घोषित औसत परिसंपत्ति 3.16 करोड़ रूपये थी,लेकिन निर्वाचित सांसदों की घोषित औसत परिसंपत्ति 14 करोड़ रुपये से ज्यादा थी।इसलिए जिसके पास ज्यादा धन है,उसके चुनाव जीतने की संभावना भी ज्यादा है।यही बात 2019 में भी लागू होगी।तब फिर संसद में गरीबों का प्रतिनिधित्व कैसे होगा? आवश्यकता है कि जनता और राजनीतिक दल दोनों ही इस मामले में अपने सोच को व्यापक बनाएँ।जीवन का प्रत्येक आचरण विशेषकर आर्थिक आचरण पूर्णतया पारदर्शी और मितव्ययी होना ही स्वच्छ राजनीति है।जब तक चुनावी राजनीति धनबल से मितव्ययता की ओर नहीं बढ़ेगी तब तक वह स्वच्छता नहीं प्राप्त कर सकती।

 

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