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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा चुनाव के परिणामों में शानदार जीत के बाद अब पीएम मोदी अपनी मां से मिलने गुजरात जाएंगे। मां से आशीर्वाद लेने के बाद वह काशी जाकर जनता का भी धन्यवाद करेंगे। पीएम मोदी ने खुद ट्वीट करके इस बात की जानकारी दी है।प्रधानमंत्री ने अपने ट्वीट में लिखा, 'कल शाम मैं अपनी मां से आशीर्वाद लेने के लिए गुजरात जाऊंगा। उसके बाद परसौं मैं काशी की जनता से मिलूंगा और मुझ पर विश्वास करने के लिए धन्यवाद कहूंगा।'बता दें कि भारतीय जनता पार्टी इस बार लोकसभा चुनाव 2019 कोे नतीजों में 300 का आंकड़ा पार कर गई है। पार्टी ने इस बार 2014 के आम चुनावों से भी बढ़कर प्रदर्शन किया है। जहां इस बार राजनीतिक जानकारों का कहना था कि पार्टी पिछले आम चुनावों की तुलना में कुछ खास नहीं कर पाएगी, लेकिन 2019 के नतीजों ने साबित कर दिया कि मोदी मैजिक बरकरार है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाराणसी में 674664 वोटों से विजय मिली है। वहीं सपा-बसपा गठबंधन की उम्मीदवार शालिनी यादव 195159 वोट तो कांग्रेस उम्‍मीदवार अजय राय को 152548 वोट मिले हैं।

घुमारवीं/कुठेड़ा। पुलिस थाना घुमारवीं के तहत हवाण क्षेत्र में एक महिला से युवक ने सब्जी के पैसे के लेन देन पर बदतमीजी की। उसने महिला को कंधे से पकड़ा। इस दौरान महिला का पति वहां पहुंचा तो युवक ने उसे धक्का देकर हलवाई की दुकान में रखी गर्म तेल की कड़ाही में फेंक दिया। इससे वह झुलस गया। उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। महिला ने पुलिस थाना घुमारवीं में शिकायत दर्ज करवा दी है। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।मंडी जिले में पड़ते बडौन गांव की निवासी महिला ने पुलिस को दी तहरीर में बताया त्रिफालघाट में वीरवार को छिंज मेले का आयोजन हुआ था। इस दौरान उन्होंने हवाण क्षेत्र में सब्जी की दुकान लगाई थी। रात करीब आठ बजे नवाणी गांव का रहने वाला चंद्रशेखर दुकान पर आया और सौ रुपये की सब्जी ली। उसने युवक से पैसे मांगे तो वह 50 रुपये देकर जाने लगा। महिला ने कहा सौ रुपये बनते हैं। उसने सौ रुपये का नोट दिया। इसके बाद उसने उसे युवक को 50 रुपये लौटा दिया। युवक तैश में आ गया और उसे कंधे से पकड़कर अभद्र व्यवहार करने लगा। महिला के शोर मचाने पर हलवाई की दुकान में खड़ा उसका पति मौके पर पहुंचा और युवक को रोकने लगा।आरोपित ने उसे भी धक्का दे दिया। इससे वह खौलते तेल की कड़ाही में गिर गया और बुरी तरह झुलस गया। पीड़ित महिला व उसके पति ने पुलिस ने आरोपित केखिलाफ सख्त कार्रवाई करने की गुहार लगाई है। पुलिस अधीक्षक अशोक शर्मा ने कहा पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। उन्होंने कहा जांच के बाद युवक दोषी पाया गया उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

नई दिल्‍ली।लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee) की बैठक हुई। बैठक में राहुल गांधी ने अध्‍यक्ष पद से इस्‍तीफे की पेशकश। पार्टी के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता रणदीप सुरजेवाला ने बताया कि अध्‍यक्ष ने अपने इस्‍तीफे की पेशकश की मगर सदस्‍यों ने सर्वसम्‍मति से इस मांग को खारिज कर दिया है। उन्होंने आगे कहा कि पार्टी में जल्द बड़े बदलाव की उम्मीद है, स्थिति को सुधारने किए खाका तैयार किया जाएगा।सुरजेवाला ने कहा कि पार्टी हार को स्‍वीकार करती है। उन सभी लोगों का धन्‍यवाद करती है जिन्‍होंने हमें वोट दिया। हम जिम्‍मेदार विपक्ष की भूमिका में रहेंगे। कांग्रेस कार्यसमिति ने उन सभी पार्टियों का भी धन्‍यवाद दिया जिन्‍होंने वैचारिक लड़ाई में हमारा साथ दिया। हम अपनी कमियों को स्‍वीकार करते हैं जिनके कारण हम उम्‍मीद के अनुरूप परिणाम नहीं मिला है। कांग्रेस पार्टी ने चुनाव हारा है, लेकिन पार्टी नफरत और विभाजन के लिए लोहा लेने के लिए प्रतिबद्ध है।
आगे होगी विस्‍तार से चर्चा:-सुरजेवाला के बाद पार्टी के वरिष्‍ठ नेता एके एंटनी भी पार्टी की करारी हार पर बचाव करते नजर आए। उन्‍होंने कहा कि मैं यह नहीं मानता हूं की यह बहुत बुरा प्रदर्शन है, हालांकि उन्‍होंने कहा कि यह सही है हमलोगों ने उम्‍मीद के अनुरूप प्रदर्शन नहीं किया है। आज जो बैठक हुई उसमें पार्टी ने सामान्‍य तौर पर इस बात पर चर्चा हुई आगे इस बात पर विस्‍तार से पार्टी चर्चा करेगी।इससे पहले सीब्‍यूसी की बैठक में यूपीए अध्‍यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, राहुल, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, केसी वेणुगोपाल, पूर्व केंद्रीय वित्‍त मंत्री पी. चिदंबरम, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, पंजाब के मुख्‍यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कर्नाटक के पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने हिस्‍सा लिया।इससे पहले बैठक के बीच में भी ऐसी खबर आई कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) सदस्‍यों के बीच अपने इस्तीफे की पेशकश की जिसे सदस्‍यों ने ठुकरा दिया। सूत्रों के हवाले से यह भी सूचना आई कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राहुल को समझाया कि इस्‍तीफे की जरूरत नहीं है, हार जीत तो लगी रहती है।बैठक में मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री कमलनाथ नहीं पहुंचे जिससे अटकलों का बाजार गर्म हो गया। बैठक में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी, राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत, कांग्रेस नेता आरपीएन सिंह, पीएल पुनिया और मोतीलाल वोरा मौजूद थे। सूत्रों ने बताया कि बैठक में मध्‍य प्रदेश और कर्नाटक में पार्टी की एकजुटता को बनाए रखने पर चर्चा हुई।वहीं सूत्रों ने बताया बैठक में हार के कारणों पर चर्चा हुई। यह भी चर्चा हुई कि पार्टी को किस तरह से मजबूत किया जा सकता है। सबसे अंत में राहुल ने बैठक को संबोधित किया जिसमें उन्‍होंने पार्टी के लिए काम करते रहने की प्रतिबद्धता जताई। बैठक में शामिल होने के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा अपने भाई राहुल गांधी के साथ पहुंचीं। ऐसा लग रहा था मानो संदेश देना चाहती हैं कि वह हर मुश्किल परिस्थिति में राहुल के साथ हैं।फिलहाल, कर्नाटक कांग्रेस प्रचार समिति (Karnataka Congress Campaign Committee) के अध्‍यक्ष एचके पाटिल (HK Patil) ने पार्टी अध्‍यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) को पत्र लिखकर कहा है कि यह हम सभी के लिए आत्मनिरीक्षण करने का वक्‍त है। मुझे लगता है कि इस हार की जिम्‍मेदारी लेना हमारा नैतिक कर्तव्‍य है, इसलिए मैं पद से अपना इस्तीफा देता हूं।बता दें कि अमेठी लोकसभा सीट से भाजपा की स्‍मृति इरानी ने भारी अंतर से राहुल को शिकस्‍त दी है। राहुल को 4,13,394 मत जबकि स्‍मृति ईरानी को 4,68,514 मत मिले। हालांकि राहुल ने केरल की वायनाड सीट पर भारी मतों से जीत दर्ज की। इन नतीजों के बाद अमेठी जिला कांग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष योगेंद्र मिश्रा ने भी अपने पद से इस्‍तीफा दे दिया है। योगेंद्र ने इस हार की जिम्‍मेदारी खुद पर ली है। इसके अलावा ओडिशा अध्यक्ष निरंजन पटनायक और कर्नाटक चुनाव प्रभारी एसके पाटिल भी इस्तीफा दे चुके हैं।उल्‍लेखनीय है कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 सीटें हासिल करके एकबार फिर इतिहास रच दिया है। पीएम नरेंद्र मोदी की चुनावी सुनामी विपक्षी किला ध्‍वस्‍त हो गया है। इस 'मोदी सुनामी' का ही नतीजा है कि तीन राज्‍यों को छोड़कर पूरा देश मोदीमय हो गया है। इस सुनामी में कांग्रेस अध्यक्ष के साथ साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को भी हार का सामना करना पड़ा है। साल 1971 के बाद यह दूसरा मौका होगा जब किसी प्रधानमंत्री के नेतृत्‍व में उनकी पार्टी केंद्र में लगातार दूसरी बार सरकार बनाएगी।

नोएडा। समाजवादी पार्टी के साथ उत्तर प्रदेश में गठबंधन करके 38 में से 10 सीटें जीतने वाली बहुजन समाज पार्टी मुखिया मायावती को अपने ही गृह जिले गौतमबुद्ध नगर में एक बार फिर झटका लगा है। गौतमबुद्धनगर लोकसभा सीट पर इस बार गठबंधन के कमजोर प्रत्याशी ने हरा दिया। बावजूद इसके ढाई दशक बाद बसपा-सपा गठबंधन होने के बाद से ही जिले के सपा-बसपा के पुराने दिग्गजों में टिकट को लेकर कसरत तेज कर दी थी। इनमें कई नेता तो ऐसे भी थे, जो दल बदल कर टिकट पाने की हसरत पाल बैठे थे, लेकिन इन सभी के बीच अंतर्विरोध को देखते हुए पार्टी ने अपेक्षाकृत कम अनुभवी व एक नए चेहरे सतवीर नागर पर दांव लगाया। लेकिन कम अनुभव व जमीन पर मजबूत पकड़ न होने के कारण गठबंधन के बावजूद बसपा-सपा प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा।दोनों ही दलों के पुराने नेता गठबंधन के बाद जीत को लेकर काफी आश्वस्त थे। यही वजह है कि टिकट को लेकर अंत तक नेताओं में रस्साकसी जारी रही और सभी पुराने खिलाड़ी अपने-अपने छत्रपों से संपर्क कर टिकट की जुगत में लगे रहे। बसपा सुप्रीमो मायावती का गृह जनपद होने के कारण अपेक्षानुरूप गौतमबुद्ध नगर सीट बसपा के खाते में गई, लेकिन टिकट को लेकर अंत तक संशय बना रहा। राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर, जेवर के पूर्व विधायक वेदराम भाटी, दादरी के पूर्व विधायक नरेंद्र भाटी, दादरी के ही पूर्व विधायक सतवीर गुर्जर, करतार नागर, सतीश अवाना समेत दोनों ही दलों में लगभग आधा दर्जन नेता टिकट के लिए अपनी दावेदारी कर रहे थे। यह अलग बात है कि वेदराम भाटी व नरेंद्र भाटी का परिवार भाजपा में शामिल हो गए।
बार-बार टिकट बदलने से बनी भ्रमित हुए मतदाता:-बसपा द्वारा बार-बार टिकट बदलने से भी उसको चुनावों में काफी नुकसान उठाना पड़ा। जब तक मतदाताओं के बीच किसी प्रत्याशी के बीच रुझान बनता तभी आलाकमान से टिकट बदलने का फरमान जारी हो जाता। बसपा ने सबसे पहले वीरेंद्र डाढ़ा को टिकट देने की घोषणा की बाद में उनका टिकट काटकर चीती निवासी संजय भाटी को टिकट दे दिया गया। बाद में बाइक बोट फर्जीवाड़े में एफआइआर दर्ज होने के कारण उनका भी टिकट काटकर आनन-फानन में सतवीर नागर पर दांव लगाया। प्रचार के लिए कम समय मिलने व चुनावों का ज्यादा अनुभव न होने के कारण सतवीर नागर पार्टी के कोर मतदाता तक भी नहीं पहुंच सके। वहीं, पार्टी के ही नेताओं के बीच अंतर्विरोध होने के कारण बसपा के पुराने नेताओं का भी सतवीर को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल सका।
टिकट न मिलने से बड़े नेताओं ने बना ली थी दूरी;-टिकट की आस में बैठे नेताओं को निराशा हाथ लगने पर नेताओं ने भी चुनाव प्रचार से दूरी बना रखी थी। सतवीर गुर्जर व गजराज नागर तो चुनाव प्रचार में नजर आए, लेकिन बाकी दिग्गजों ने अप्रत्यक्ष रूप से बसपा-सपा प्रत्याशी के चुनाव प्रचार से दूरी बना रखी थी। बमुश्किल एक-दो सभाओं में ही दोनों दलों के नेता नजर आए।कभी मायावती का गढ़ कहे जाने वाले गौतमबुद्ध नगर लोकसभा सीट पर 2019 में शहर से लेकर देहात तक भाजपा का डंका बजा। इसके आगे गठबंधन के सभी जातिगत समीकरण फेल हो गए। 2019 में लोकसभा सीट पर करीब ढाई लाख मतदाता बढ़े थे। इसमें सबसे अधिक मतदाता नोएडा व दादरी सीट पर बढ़े थे। जो भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ है। इनका पूरा फायदा भाजपा की झोली में गया।नोएडा विधानसभा ने भाजपा प्रत्याशी को करीब दो लाख वोट की बढ़त दिलाई, जिसकी भरपाई करना गठबंधन के लिए पूरी तरह से नामुमकिन साबित हुआ। जेवर, दादरी व सिकंद्राबाद विधानसभा ने भी गठबंधन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। बिरादरी और जातिगत समीकरण को धता बताते हुए इन विधानसभा के मतदाताओं ने भी भाजपा का साथ दिया। हालांकि जेवर विधानसभा में दोनों प्रत्याशियों में वोट का अंतर सबसे कम रहा।जेवर विधानसभा में भाजपा 7259 मतों के अंतर से गठबंधन पर भारी पड़ी। ठाकुर प्रत्याशी देने के बावजूद कांग्रेस को पांचों विधानसभा में जेवर विधानसभा पर सबसे कम 3106 वोट ही मिले। 2014 की मोदी लहर में सपा बसपा ने अलग अलग चुनाव लड़ा था।इस चुनाव के आंकड़ों के लिहाज से देखा जाए तो नोएडा व खुर्जा को छोड़कर सपा-बसपा दोनों के वोट के हिसाब गठबंधन दादरी, जेवर, सिकंद्राबाद में भाजपा पर भारी पड़ा था। लेकिन उस चुनाव में भी नोएडा ने भाजपा को अजय बढ़त दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी। करीब सवा लाख से भाजपा नोएडा में सपा-बसपा के संयुक्त वोट के अंतर से आगे थी।

सोनीपत। दिल्ली से सटे हरियाणा के सोनीपत में एक दर्दनाक हादसा सामने आया है। यहां पर देवर व भाभी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, लेकिन मौके से किसी प्रकार का सुसाइड नोट नहीं मिला है। पूरा मामला सोनीपत के गोहाना के वार्ड-1 स्थित देवी नगर का है। सुसाइड करने वाली भाभी का नाम प्रीति तो देवर का नाम विक्रम है और दोनों शादीशुदा थे।प्राथमिक जानकारी के मुताबिक, प्रीति की शादी छह साल पहले हुई थी, लेकिन उसके कोई बच्चा नहीं था। परिजनों के अनुसार, शादी के छह साल बाद भी बच्चा नहीं होने से प्रीति मानसिक तौर पर काफी परेशान चल रही थी। इसी परेशानी के चलते उसने फांसी लगा ली।वहीं, परिजनों ने पुलिस को यह भी बताया है कि देवर विक्रम अपनी भाभी का सबसे दुलारा था। प्रीति को फंदे पर लटका देखकर वह सदमे को बर्दास्त नहीं कर पाया और खुद भी फांसी लगा ली। पुलिस ने मौके का मुआयना कर परिजनों के बयान पर कार्रवाई करते हुए शव को पोस्टमार्टम के लिए नागरिक अस्पताल भिजवा दिया है।जानकारी के मुताबिक, शुक्रवार देर शाम को पता चला कि देवीपुरा कॉलोनी में देवर-भाभी ने घर पर फंदे लगा कर आत्महत्या कर ली। दोनों के शव अलग-अलग कमरों में फंदे पर लटकते मिले।
सगे भाइयों की सगी बहनों से हुई थी शादी:-जिला फतेहबाद में गांव बिरढाना निवासी ओमप्रकाश की बेटी प्रीति व सोनिया की शादी कर वर्ष, 2011 में गोहाना शहर में देवीपुरा कॉलोनी में सगे भाइयों से हुई थी। प्रीति की शादी सोनू और सोनिया की शादी विक्रम से हुई थी। प्रीति को संतान का सुख प्राप्त नहीं हुआ, जबकि उसकी बहन सोनिया के दो बच्चे हैं। संतान नहीं होने से प्रीति मानसिक रूप से परेशान रहने लगी।शुक्रवार देर शाम प्रीति ने घर पर भूतल पर बने कमरे में फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली। कुछ समय बाद विक्रम वहां पहुंचा तो वह उसने भाभी प्रीति को फंदे पर लटकता देखा और वह भावुक हो गया। विक्रम मकान की पहली मंजिल पर बने कमरे में गया और फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली। देवर-भाभी के शव फंदे पर लटकते देख परिजन व आसपास के लोग हैरान रह गए।सूचना मिलने पर देवीपुरा पुलिस चौकी से टीम मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया। पुलिस ने दोनों के शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए नागरिक अस्पताल भिजवाया। शनिवार को पुलिस ने प्रीति के चाचा रमेश और विक्रम के पिता देशराम के बयान दर्ज करके दोनों के शवों के पोस्टमार्टम करवाए।राजेश कुमार (इंचार्ज, देवीपुरा पुलिस चौकी) ने बताया कि मृतका प्रीति के चाचा रमेश और विक्रम के पिता देशराम के बयान दर्ज करके दोनों के शवों के पोस्टमार्टम करवाए गए। प्रीति के परिजनों ने कहा कि कि वह बच्चा नहीं होने से मानसिक रूप से परेशान थी, जबकि उसके देवर ने भावुक होकर आत्महत्या कर ली।

नई दिल्ली। आम चुनाव के नतीजों के बाद शनिवार को 16 वीं लोकसभा भंग कर दी गई और इसी से साथ नए सदन के गठन की तैयारी भी शुरू हो गई है। राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने शुक्रवार को हुई कैबिनेट की सलाह को स्वीकार करते हुए शनिवार को लोकसभा भंग करने वाले आग्रह पर हस्ताक्षर कर दिया है। राष्ट्रपति भवन द्वारा बताया गया कि राष्ट्रपति कोविंद ने संविधान के अनुच्छेद 85 के क्लॉज (2) के सब क्लॉज (B) का प्रयोग करते हुए लोकसभा भंग की है।बता दें कि कल यानी शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को इस्तीफा सौंप दिया था। राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री समेत मंत्रिपरिषद का इस्तीफा स्वीकार करते हुए नरेंद्र मोदी से नई सरकार के बनने तक पद पर बने रहने का आग्रह किया। ज्ञात हो 16वीं लोकसभा का कार्यकाल तीन जून को खत्‍म हो रहा है। इसकी पहली बैठक 4 जून 2014 को बुलाई गई थी और उस वक्‍त नवनिर्वाचित सदस्यों ने पद एवं गोपनीयता की शपथ ली थी।16th लोकसभा के भंग होने के साथ ही 17वीं लोकसभा के गठन की तैयारी शुरू हो गई है। इसी बीच खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) आज शनिवार शाम राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद (Ram Nath Kovind) से मिलकर नई सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक शनिवार शाम 5 बजे NDA संसदीय दल की बैठक के बाद पीएम मोदी नई सरकार के गठन के लिए राष्ट्रपति भवन, राष्ट्रपति कोविंद से मिलने के लिए जाएंगे।इससे पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के नेतृत्व में चुनाव आयोग की तीन सदस्यीय टीम ने राष्ट्रपति से मुलाकात कर उनको नवनिर्वाचित 542 सांसदों की सूची सौंपी। बता दें कि 16वीं लोकसभा का कार्यकाल 3 जून को समाप्त हो रहा है।

रायपुर। झीरम हमले को शनिवार को छह साल पूरे हो गए हैं। इस हादसे ने सबको झकझोर कर रख दिया था। 25 मई 2013 की शाम को हुए इस हमले में 32 लोग अपनी जान गंवा बैठे थे। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा माओवादी हमला है। यह हमला बस्तर जिले के दरभा इलाके के झीरम घाटी में कांग्रेस के परिवर्तन यात्रा पर हुआ था। इस हमले को कांग्रेस ने सुपारी किलिंग करार दिया था। कांग्रेस कार्यालय में आज इस हमले में मारे गए कांग्रेसियों कों श्रद्धांजलि दी गई। आइए जानते हैं इस भयावह हमले की पूरी कहानी-25 मई 2013, करीब 5 बजे का समय था। भीषण गर्मी के बीच लोग अपने घरों और कार्यालयों में पंखे-कूलर की हवा के नीचे बैठे थे। इसी बीच अचानक टीवी पर एक खबर आई। छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के झीरम घाटी में करीब डेढ़ घंटे पहले एक माओवादी हमला हुआ था। यूं तो यहां आज भी रोजाना माओवादी हिंसा होती है, लेकिन यह घटना उन घटनाओं से कहीं अधिक खौफनाक और भीषण थी। प्रारंभिक खबर आने के करीब 15 मिनट बाद अपडेट खबर आई। इस खबर में बताया गया कि माओवादी हमले में बस्तर टाइगर के नाम से मशहूर कांग्रेसी नेता महेन्द्र कर्मा और नंद कुमार पटेल सहित कई लोग मारे गए हैं। विद्याचरण शुक्ल की हालत गंभीर है। इसके बाद धीरे-धीरे खबर का दायरा बढ़ने लगा। रात करीब 10 बजे जब यह जानकारी आई कि हमले में कुल 32 लोग मारे गए हैं, तो लोगों को इस खबर पर भरोसा कर पाना मुश्किल हो रहा था। एक-एक कर घटना में मारे गए लोगों के नाम सामने आने लगे। इनमें वे नाम थे जो उस वक्त छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के पहली कतार के नेता थे। यह देश के इतिहास का दूसरा सबसे बड़ा नक्सल हमला था। आज इस हमले की छठवीं बरसी मनाई जा रही है। घटना को भले ही 6 साल हो गए, लेकिन इसके जख्म आज भी पूरी तरह ताजा हैं।नवंबर 2013 में राज्य में विधानसभा चुनाव होने थे।

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव का रिजल्ट आ जाने के बाद अब मध्य प्रदेश की भोपाल सीट से कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने भाजपा की इतनी बड़ी जीत पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि अब चुनाव से पहले भाजपा की ओर से जितनी सीटें जीतने का टारगेट तय किया जाता है वो उसके आसपास या उससे अधिक सीटें जीत लेते हैं। भाजपा बीते दो चुनावों से ऐसी कौन सी गणित का इस्तेमाल कर रही है, जिससे उनको इसका पहले से ही पता चल जाता है। लगता है कि 2024 के चुनाव में वो 350 सीटें जीतने का लक्ष्य रखेंगे और जीत जाएंगे।उनका कहना है कि भाजपा के पास ऐसी कौन सी जादू की छड़ी आ गई है, जिसके जरिये वो चुनाव से पहले जो कह देते हैं वो ही हो जाता है। इससे पहले साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 280+ सीटें जीतने की बात कही थी, तो वो उस चुनाव में 282 सीटें जीतकर आए। इस बार 2019 के चुनाव में उन्होंने 300 से अधिक सीटें आने की बात कही थी, अब उन्होंने 300 से अधिक सीटें जीत ली। वो साल 2014 के चुनाव में लोकसभा में भाजपा को मिली सीटों पर भी सवाल उठा रहे हैं, जबकि उस दौरान केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। यानि चुनाव से पहले मशीनरी पूरी तरह उनके ही हाथ में थी।मालूम हो कि दिग्विजय सिंह इस बार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से चुनाव हार चुके हैं। वो 10 साल तक भोपाल के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इस वजह से ये माना जा रहा था कि उनको चुनाव हराना आसान नहीं होगा, मगर जिस तरह से पहली बार चुनाव मैदान में उतरी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने उनको चुनाव हरा दिया वो अपने आप में हैरान करने वाला रहा। इसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। मगर पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़े गए चुनाव में किसी की नहीं चली, सभी ने राष्ट्रवाद के नाम पर पीएम मोदी को वोट किया और भाजपा ने सीटें जीतने का रिकॉर्ड बनाया।राजनीतिक पंडित ये मान रहे थे कि साध्वी चुनाव हार जाएंगी, दिग्विजय सिंह का राजनीतिक जीवन काफी लंबा रहा है उनको हराना आसान नहीं होगा। मगर ऐसी सभी संभावनाएं धरी की धरी रह गईं। मतगणना हुई तो दिग्विजय सिंह हारे हुए घोषित किए गए।

सूरत। सूरत के तक्षशिला इमारत में लगी आग इतनी भीषण थी कि इसकी चपेट मेें आने से 20 बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि 20 से ज्यादा बच्चों का अस्पताल में इलाज चल रहा है। मामले में गुजरात पुलिस ने कोचिंग सेंटर चलाने वाले एक व्यक्ति समेत 3 लोगों को गिरफ्तार किया है।गुजरात पुलिस कमिश्नर सतीश शर्मा ने बताया कि मामले में अब-तक तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। एफआईर में 2 बिल्डर और कोचिंग सेंटर का संचालन करने वाले व्यक्ति का नाम शामिल है। पुलिस ने बताया कि कोचिंग क्‍लास का मालिक भार्गव बुटाणी को देर रात पकड़ लिया है, जबकि बिल्‍डर व भवन मालिक हेतुल वेरडिया, जिज्ञेश पगडालू अभी फरार हैं।वहीं, हादसे के अहमदाबाद, राजकोट शहरों में चल रहे अनाधिक्रत कोचिंग सेंटरोंं पर एहतियात के तौर पर रोक लगा दी है। इन शहरों में प्रशासन ने कलासेज में सुविधाओं व सुरक्षा उपायों की जांच भी शुरु कर दी है। केवल मान्‍यता प्राप्‍त शिक्षण संस्‍थान ही क्‍लासेज चला सकेंगे। सरकार ने कहा है कि फायर ब्रिगेड की एनओसी के बिना अब इनका संचाल‍न नहीं किया जा सकेगा। अब तक अहमदाबाद में 700 स्‍थलों की जांच की गई, जिनमें से 300 स्‍थलों पर फायर सुरक्षा की कोई सुविधा व उपकरण नहीं पाए गए।इससेे पहलेे हादसे पर दुख जताते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने गुजरात सरकार से हर संभव मदद देने को कहा है। गुजरात के सीएम विजय रूपाणी ने घटना की जांच के आदेश दिए हैं। साथ, ही मृतकों के परिजनों को चार लाख रुपये का मुआवजेेका एलान किया गया है। हादसे के बाद सीएम रूपाणी घायल लोगों से मिलने के लिए अस्पताल पहुंचे।बता दें कि गुजरात के सूरत में शुक्रवार को तक्षशिला कॉम्प्लेक्स की दूसरी मंजिल पर स्थित एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लग जाने से अफरातफरी मच गई। इस दौरान आग और धुएं से बचने के लिए कुछ छात्रों ने तीसरी और चौथी मंजिल से कूदकर जान बचाई। आग की चपेट में आने से करीब 20 छात्रों की मौत हो गई।

लखनऊ। यह भले ही आज ज्यादा मायने न रखता हो कि समाजवादी पार्टी की सत्ता मुलायम सिंह यादव की मर्जी से अखिलेश यादव के पास आई थी या अखिलेश ने जबरन हथिया ली थी लेकिन, यह जरूर खास बात थी कि पुत्र ने जब पिता की राजनीतिक विरासत संभाली तो उन नीतियों और सावधानियों को दरकिनार कर दिया, जिनकी बदौलत मुलायम ने पार्टी को खड़ा किया था। अखिलेश ने केवल पिता की जगह ही नहीं अपनायी, पिता के सियासी दुश्मनों को भी अपना लिया। नतीजा हुआ कि बेमेल गठबंधन के चक्कर में साइकिल का कबाड़ा हो गया।मुलायम ने सियासत में अलग पहचान बनाने के लिए हमेशा संघर्ष का रास्ता चुना और कभी ऐसा गठबंधन नहीं किया, जिसमें उनके सम्मान या पार्टी की पहचान पर कोई आंच आने का खतरा हो। उनकी इस दृढ़ता ने एक वक्त में उन्हें प्रदेश में यादवों और मुसलमानों का एकछत्र नेता बना दिया था। मुलायम यही नसीहत पुत्र को देना चाहते थे लेकिन, खुद ही अपना नाम रखने का दावा करने वाले अखिलेश ने पिता को अनसुना कर दिया। 2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके राहुल गांधी को दोस्त बनाया तो सरकार गंवा बैठे और अब लोकसभा चुनाव के लिए बसपा के आगे झुके तो न केवल परिवार की तीन सीटें खो दीं, बल्कि कुल सीटों की संख्या भी सात से घटकर पांच रह गई।बसपा से गठबंधन करने को उत्सुक अखिलेश को मुलायम ने तब अपने तरीके से समझाया था कि इससे हाथी जिंदा हो जाएगा और सपा को नुकसान होगा लेकिन, परिवार और पार्टी में खुद को साबित करने को बेताब अखिलेश पिता का वह संकेत समझ नहीं सके। अखिलेश ने जब गठबंधन के तहत समझौता किया, तब भी मुलायम ने यह कहकर नाराजगी जताई थी कि आधी से ज्यादा सीटें तो हम बिना लड़े ही हार गए। अखिलेश के करीबी लोगों के मुताबिक उन्हें लगता था कि पिछले चुनाव में पांच सीटों पर सिमटी सपा इस बार अकेले दम पर उतनी सीटें नहीं ला पाएगी, जितनी उसे बसपा के साथ 37 सीटों के गठबंधन से मिल जाएंगी।
दौड़ने की कोशिश में फिसले;-2017 का विधानसभा चुनाव आने से पहले अखिलेश ने न केवल पार्टी पर नियंत्रण स्थापित कर लिया, बल्कि आगे बढ़ने के लिए बड़ी और विरोधी पार्टियों से गठबंधन का वह रास्ता भी पकड़ लिया, जिससे मुलायम परहेज करते थे। यह आगे बढ़ने की अखिलेश की छटपटाहट ही थी, जिसने उन्हें पार्टी और मतदाताओं के स्वाभिमान की कीमत पर धुर विरोधी बसपा के आगे झुकने को मजबूर कर दिया। अखिलेश ने पत्नी से मायावती के पैर मंच पर छुआए और हर वो काम किया, जिससे न तो मायावती को कोई बात बुरी लगने पाए और न गठबंधन पर आंच आए।

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