नई दिल्‍ली। चीन इस वक्‍त पूरी दुनिया में अलग-थलग होता जा रहा है। दुनिया के कई बड़े देश पहले से ही उसके खिलाफ लामबंद हो चुके है। अब इन देशों का ध्‍यान धीरे-धीरे उसकी आर्थिक कमर तोड़ने की तरफ लगा हुआ है। भारत की बात करें तो चीन के ऐप पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ कई और व्‍यापारिक मुद्दों पर भी चीन को करारी मात दी गई है। वहीं अमेरिका और ब्रिटेन ने उसकी बड़ी कंपनी हुआवेई पर प्रतिबंध लगाकर उसके दर्द को बढ़ाने का काम किया है। इतना ही नहीं अमेरिका ने इस कंपनी के कुछ कर्मचारियों पर भी पाबंदी लगा दी है। इसके अलावा बीते दिनों चीन के चार शीर्ष राजनेताओं को भी अमेरिका ने प्रतिबंधित किया है। कुल मिलाकर चीन के दर्द को बढ़ाने का काम पूरी तेजी के साथ दुनिया के कई देश मिलकर कर रहे हैं। चीन की इस हालत पर जानकार मानते हैं कि ड्रैगन अपने ही बनाए जाल में खुद फंसता जा रहा है।
पलट चुकी है बाजी:-ऑब्‍जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफेसर हर्ष वी पंत मानते हैं कि हुआवेई पर लगे प्रतिबंध से चीन बुरी तरह से तिलमिलाया हुआ है। इसी वर्ष जनवरी में ब्रिटेन ने इसको दूरसंचार के क्षेत्र में अनुमति दी थी। लेकिन अमेरिका के लिए गए कड़े फैसले के बाद उसने भी अपने फैसले को पलट दिया है और उस पर प्रतिबंध लगा दिया है। अमेरिका ने ब्रिटेन के इस फैसले का स्‍वागत करके न सिर्फ चीन की दुखती रग को छेड़ने का काम किया है, बल्कि उसने समान विचारधारा वाले देशों को चीन के खिलाफ आमंत्रित कर चीन की चिंता भी बढ़ा दी है। वे मानते हैं कि चीन अब तक कारोबारी और प्रौद्योगिकी रिश्‍तों को अपना हथियार बनाता रहा है, लेकिन अब बाजी पलट गई है और इस हथियार को दूसरे देश भी इस्‍तेमाल करना सीख गए हैं। ऐसे में वह अपने ही जाल में फंसता दिखाई दे रहा है।
उम्‍मीदों पर फिरा पानी:-पंत मानते हैं कि यूरोपीय संघ से अलग होने के बाद जिस तरह से ब्रिटेन अन्‍य देशों से दोबारा अपने संबंधों को मजबूत कर रहा था उससे चीन को काफी उम्‍मीदें थीं। लेकिन ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा लिए गए कड़े फैसलों ने उसकी इन उम्‍मीदों पर पानी फेरने का काम किया है। ब्रिटेन के लगाए प्रतिबंधों के बाद अब स्‍वदेशी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां हुआवेई से 5 जी उपकरण नहीं खरीद सकेंगी। हालांकि, ब्रिटेन ने अपने इस कदम पर सफाई देने में देर भी नहीं लगाई है और इसके पीछे अमेरिकी फैसले को एक बड़ी वजह बताया है।
चीन की बौखलाहट;-बीजिंग लगातार उसके खिलाफ लिए जा रहे कड़े फैसलों से पहले से ही आहत है और ऐसे में चीनी कंपनी को निशाना बनाए जाने से वो और अधिक परेशान है। चीन की तरफ से कहा गया है कि ये प्रतिबंध आधारहीन हैं। चीन की तरफ से चेतावनी भी दी गई है कि वो अपनी कंपनियों के हितों की रक्षा के लिए कड़े फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटेगा। आपको बता दें कि चीन इससे पहले अमेरिका द्वारा उठाए गए कदमों के खिलाफ जैसे को तैसा वाली नीति पर चलता आया है। दोनों ही देश अपने यहां पर स्थित एक-एक वाणिज्‍य दूतावास बंद कर चुके हैं और एक दूसरे के राजनेताओं पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। ऐसे में चीन अपनी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों के बाद क्‍या फैसला लेगा फिलहाल ये तो वक्‍त ही बताएगा।
अमेरिका की धमकी:-प्रोफेसर पंत का ये भी कहना है कि जब जनवरी में ब्रिटेन ने चीनी कंपनी हुआवेई को अपने यहां पर दूरसंचार क्षेत्र में सीमित कारोबार की इजाजत दी थी तब अमेरिका ने ब्रिटेन से संबंधों की समीक्षा करने की बात कहकर इशारों ही इशारों में धमकी भी दे डाली थी। अमेरिका द्वारा ब्रिटेन के खिलाफ लिए गए किसी भी फैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते थे। इसका असर दोनों देशों के बीच व्‍यापारिक रिश्‍तों के अलावा सुरक्षा पर भी पड़ता। लिहाजा ब्रिटेन का चीन की कंपनी को प्रतिबंधित करना अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की एक कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है। हालांकि, आपको यहां पर ये भी बताना जरूरी होगा कि हुआवेई करीब 20 वर्षों से ब्रिटेन में कारोबार कर रही है।
यूरोपीय संघ भी खफा:-ब्रिटेन और अमेरिका के ताजा फैसले से इस कंपनी का यूरोप में कारोबार काफी प्रभावित हो सकता है। प्रोफेसर पंत के मुताबिक, फ्रांस और जर्मनी भी कहीं न कहीं हुआवेई पर से निर्भरता को कम कर रहे हैं। उनके मुताबिक, यूरोप में चीन के प्रति एक नकारात्‍मक माहौल बन चुका है, जिसको देखते हुए ये कदम उठाए जा रहे हैं। कोविड-19 के मुद्दे पर यूरोपीय संघ भी चीन के खिलाफ मुखर होकर उभरा है। इसके अलावा हांगकांग भी एक बड़ा मुद्दा है जिसकी वजह से ज्‍यादातर देश चीन के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। पंत का कहना है कि बदलते माहौल और चीन के रवैये को देखते हुए भारत में भी इस कंपनी को शायद ही 5जी नेटवर्क लागू करने की इजाजत मिल सके। उनके मुताबिक, यदि ऐसा हुआ तो चीन एक बड़े बाजार से हाथ धो बैठेगा, जिससे उसको जबरदस्‍त आर्थित चपत लगेगी।

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