नई दिल्ली। चीन के वुहान शहर से दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस (COVID-19)का कहर जारी है। वायरस के प्रकोप का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके आगे अमेरिका जैसे महाशक्तिशाली देश जूझ रहे हैं। ऐसे में पूरे विश्व की निगाहें इसके टीके (Coronavirus Vaccine) पर टिकी हैं। कौन नहीं चाहता कि इसका टीका जल्द से जल्द आए और लोगों की जिंदगी समान्य हो जाए, लेकिन यह इतना जल्दी होता नहीं दिख रहा है।कोरोना की वैक्सीन बनाने का प्रयास दुनिया के कई देशों में जारी है। इन सब के बीच यह सवाल सबके जेहन में कौंध रहा है कि वैक्सीन बनने में कितना समय लगेगा? क्या यह बन भी पाएगा? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर वैक्सीन बन गया, तो यह सभी के लिए कितनी जल्दी उपलब्ध होगा? इस सवाल का जवाब है कि जितना मुश्किल टीका बनाना है, उससे भी ज्यादा मुश्किल इसे लोगों तक पहुंचाना होगा। इस राह में कई रोड़े हैं, जिनसे पार पाना बहुत कठिन है।
आइये- जानते हैं कौन सी हैं वो चुनौतियां।
ऐसा वैक्सीन जो वायरस के खिलाफ काम करे:-विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) ने हाल ही में जानकारी दी थी कि दुनियाभर में कुल 8 वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल किया जा रहा है। इसके अलावा पूरी दुनिया में कोरोना वायरस की 110 अन्य वैक्सीन का अलग-अलग स्टेज पर ट्रायल चल रहा है। न्यूयॉर्क टाइम्स (NYT) की एक रिपोर्ट के अनुसार सार्वजनिक स्वास्थ्य, वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति पर व्यापक प्रभाव के साथ मेडिकल रिसर्च में इससे पहले किसी वैक्सीन को लेकर इतनी तेजी नहीं देखी गई है। दवा निर्माता और शोधकर्ता बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन वैक्सीन के प्रभावी साबित होने के अलावा विश्वभर में अरबों लोगों तक इसे पहुंचाने को लेकर अनिश्चितता बरकरार है। सवाल तो यह भी है कि 10 साल के काम को 10 महीने में पूरा करने की कोशिश कहीं सुरक्षा से समझौता साबित न हो जाए। महामारी से निपटने के लिए डब्लूएचओ (WHO) ने इसी वजह से सुरक्षित और प्रभावी टीकों के मानक तय किए हैं। कोरोना वायरस को हराने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि एक ऐसी वैक्सीन इजात हो जो वायरस के खिलाफ काम करे। ऐसे ही सवालों के कारण डब्लूएचओ ने कहा था कि ये वायरस एचआइवी (HIV) की तरह, हमेशा के लिए इंसानी दुनिया का हिस्सा बनकर रह सकता है। हालांकि, दोनों बीमारियों में काफी अंतर है।
क्या वैक्सीन सभी को मिल जाएगी?:-यदि आज एक प्रभावी और सुरक्षित कोरोना वायरस वैक्सीन उपलब्ध हो जाए, तो क्या यह महामारी को रोकने के लिए पर्याप्त होगी? यह इस बात पर निर्भर करेगा कि यह हर उस व्यक्ति तक पहुंच पाएगा या नहीं, जिसे इसकी आवश्यकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार यह वैक्सीन महामारी को तब तक रोकने में असफल होगा, जब तक यह विश्व के हर देश तक पहुंच न जाए। फिलहाल ऐसा नहीं लगता कि यह वैक्सीन हर किसी के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। 2009 में सामने आया स्वाइन फ्लू (H1N1) लगभग पूरे विश्व में फैला था, लेकिन इसकी वैक्सीन केवल अमीर देशों तक सीमित रह गयी। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार टीका बनाने वाले देश कुछ ऐसी नीति लागू करते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यापक उपलब्धता सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है। किसी भी देश के लिए पहली प्राथमिकता अपने नागरिकों की रक्षा करना है, लेकिन जब पूरी दुनिया ऐसी संक्रामक बीमारी का सामना करे तो देशों को विश्वस्तर पर सोचना चाहिए। सौभाग्य से स्वाइन फ्लू महामारी, सामान्य फ्लू के मौसम की तुलना में बहुत अधिक गंभीर नहीं थी। अगर कोरोना की वैक्सीन के साथ कुछ ऐसा हुआ तो यह महामारी फैलती रहेगी और लोगों को मारती रहेगी।
कम आय वाले देशों के साथ सबसे बड़ी चुनौती;-वैक्सीन बनने के बाद शुरुआती दौर में सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि सीमित उपलब्ध खुराक को कैसे वितरित किया जाए। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी चुनौती कम आय वाले देशों के साथ होगी, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है। ये देश वैक्सीन के लिए रकम अदा करने में भी असमर्थ हो सकते हैं। इन देशों की मदद नहीं की गई तो वायरस खत्म नहीं होगा और इसका प्रसार जारी रहेगा। सबसे बड़ी दिक्कत की बात यह है कि भविष्य में किसी आउटब्रेक से अपने नागरिकों को बचाने के लिए समृद्ध देश इसे ज्यादा से ज्यादा खरीदने की कोशिश कर सकते हैं। इसके अलावा ये देश अपनी सीमाओं के भीतर विकसित होने वाले टीकों के निर्यात पर रोक भी लगा सकते हैं।
उत्पादन और वितरण की चुनौतियां:-एक अन्य चुनौती है कि वैक्सीन सबसे पहले समृद्ध देश ही बनाएंगे। यदि केवल उनकी उत्पादन क्षमताओं पर निर्भर रहे तो वैश्विक आपूर्ति की मांग को कभी पूरा नहीं किया जा सकता। ऐसे में वैक्सीन बनाने की क्षमता में विस्तार करने की आवश्यकता होगी। इसमें टेक्नॉलॉजी ट्रांसफर से हमें मदद मिल सकती है। दुनियाभर के निर्माताओं को टेक्नॉलॉजी ट्रांसफर करने से ही वैश्विक आपूर्ति की मांग पूरी करने में सफलता मिल सकती है। इसके अलावा दुनियाभर को अगले 18 से 24 महीनों के भीतर अरबों खुराक उपलब्ध कराने के लिए वैश्विक उत्पादन के लिए धन मुहैया कराना होगा। डब्लूएचओ वैक्सीन के वितरण को लेकर कार्ययोजना बना रहा है, लेकिन यह लागू कैसे होगा यह अभी तय नहीं है।
क्या कहता है WHO?:-डब्लूएचओ के अनुसार वैक्सीन बनाने और उसे लोगों तक पहुंचाने में ढाई साल तक का वक्त लग सकता है। पिछले दिनों संगठन ने कहा था कि सुरक्षित और प्रभावी वैक्सीन बनाने में कम से कम 18 महीने का वक्त लग सकता है। इसके बाद इस वैक्सीन की मैन्युफैक्चरिंग और इसे दुनिया की 7.8 अरब की आबादी को मुहैया कराने में एक साल और लग जाएगा।
वैक्सीन को लेकर ताजा अपडेट:-वैक्सीन बनाने को लेकर दुनियाभर में शोधकर्ताओं ने दिन-रात एक कर दिया है। पिछले दिनों वैक्सीन को लेकर दो अपडेट सामने आया। ब्रिटेन में ऑक्फोर्ड द्वारा बनाई जा रही वैक्सीन का कुछ दिन पहले बंदरों पर ट्रायल किया गया था। सकारात्मक परिणाम आने पर इसका ह्यूमन ट्रायल भी शुरू हो गया, लेकिन इसी बीच बंदर कोरोना वायरस से संक्रमित हो गए। इसने अब चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, नतीजे स्पष्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि यह वैक्सीन कारगर होगी या नहीं। वहीं, दूसरी ओर 'न्यूयार्क टाइम्स' के अनुसार अमेरिकी कंपनी 'मॉडर्ना' ने दावा किया है कि 8 स्वस्थ लोगों में टीके के शुरुआती परीक्षण के परिणाम बेहद आशाजनक रहे हैं। कंपनी जल्द दूसरे चरण का परिक्षण करने वाली है। इसमें 600 लोग शामिल होंगे। तीसरा चरण जुलाई में शुरू होगा। इसमें 1000 लोग शामिल होंगे। सब कुछ ठीक रहा तो इस साल के अंत तक टीका मिल सकता है।

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