हजारीबाग। हजारीबाग के सीतागढ़ा पहाड़ी परिक्षेत्र में बौद्ध संस्कृति से जुड़े बड़े प्रमाण मौजूद हैं। समय-समय पर मिले अवशेषों ने इसकी पुष्टि की है। यहां अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआइ) से अनुमति मिलने के बाद पुरातत्व विभाग ने वक्त के साथ जमींदोज हो चुकीं गौरवशाली अतीत की निशानियां तलाशने की तैयारी शुरू कर दी है। ज्ञात हो कि बिहार के गया से लेकर झारखंड के चतरा जिले के इटखोरी और हजारीबाग के सीतागढ़ा समेत आसपास के इलाकों में बौद्ध संस्कृति के अवशेष बिखरे पड़े हैं।विभिन्न भाव-भंगिमाओं वाली प्राचीन मूर्तियों से लेकर मंदिर, कलाकृतियां और समय-समय पर मिले सिक्के, मृदभांड तथा अन्य सामान बौद्ध संस्कृति के इन इलाकों में उत्कर्ष काल की कहानी कहते हैं।क्षेत्र फायरिंग रेंज में आने के कारण टीम को यहां खोदाई शुरु करने के पहले बीएसएफ से अनुमति लेनी होगी। गत दिवस इस प्रक्रिया के लिए पटना से पुरातात्विक विभाग की टीम हजारीबाग के मेरू स्थित बीएसएफ कैंप पहुंची। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बहोरनपुर गांव में खोदाई की प्रक्रिया अब शीघ्र प्रारंभ हो सकती है।सीतागढ़ा पहाड़ी परिक्षेत्र में बौद्ध स्तूप व उससे जुड़े अवशेष होने के प्रमाण आज से 25- 30 साल पहले मिले थे, जब ग्रामीणों को पहाड़ी की तलहटी में बहने वाले बरसाती नाले में प्राचीन मूर्तियां मिलीं थीं। इसी दौरान पहाड़ की तलहटी में तालाब खोदने के दौरान पुरातात्विक महत्व के कई अन्य प्रमाण भी लोगों को मिले, जो आज भी गांवों में सुरक्षित रखे हैं।यहां बौद्ध संस्कृति के अवशेष पांच किलोमीटर के दायरे में बिखरे पड़े हैं। ग्रामीणों को यहां सोने-चांदी के सिक्के, घड़ा, कुआं, बावड़ी सहित कई अन्य अवशेष मिले हैं। सोने चांदी के सिक्कों को तो लोगों ने अज्ञानतावश औने-पौने दाम में बेच दिया, लेकिन पत्थर, मूर्तियों और कलाकृतियों के प्रमाण आज भी मौजूद हैं। पहाड़ की तलहटी से लेकर रानी तालाब, इटवा टीला में बौद्ध स्तूप के सुबूत छिपे हैं।सीतागढ़ा पहाड़ी की सबसे ऊपर चोटी पर तालाब होने के प्रमाण मिले हैं। कुआं वहां अभी विद्यमान है। ग्रामीणों के अनुसार ऊपर चबूतरा बना है और पत्थरों में कई बड़ी कलाकृतियां बनी हैं। यहां ग्रामीण वरुण देवता की पूजा करते हैं और उनका मानना है कि उनकी पूजा के बाद गांव में बारिश की कमी नहीं होती। दूसरी ओर तलहटी में दो बड़े तालाब व इसके अंदर कई कुआं होने के प्रमाण मिले हैं।

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