रायपुर। आपने क्रिकेट की सट्टेबाजियों या घुड़दौड़ में करोड़ों रुपयों के दाव लगाए जाने की खबरों के बारे में तो सुना होगा। लेकिन छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर संभाग में मुर्गों की लड़ाइयों में करीब एक करोड़ रुपए दांव लगाए जाने की खबर सामने आई है। बस्तर संभाग के डिलमिली में मां दंतेश्वरी की डोली वापसी की खुशी में शनिवार और रविवार को दो दिवसीय वार्षिक मेले का आयोजन हुआ जिसमें लगे मुर्गा बाजार में मुर्गों की लड़ाइयों पर करीब एक करोड़ रुपये का दांव लगाया गया।
20 हजार आदिवासियों ने भाग लिया:-बताया जाता है कि इस बाजार में 20 हजार से ज्यादा आदिवासियों ने भाग लिया। मुर्गों की लड़ाइयों के लिए चर्चित इस मेले में इसके लिए 15 जगह घेरे बनाए गए थे। हर मैदान पर मुर्गों पर हजारों के दांव लगे। एक अनुमान के मुताबिक, यहां दो दिन में आदिवासियों ने एक हजार मुर्गा जोड़ों की लड़ाई पर करीब एक करोड़ रुपये दांव पर लगाए। मुर्गा लड़ाई में शामिल होने और दांव लगाने के लिए ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना से भी लोग पहुंचे थे। पुलिस सुरक्षा के बीच यह खेल रविवार की शाम तक जारी रहा।
पैरों पर धारदार काती:-बता दें कि मुर्गा लड़ाई के लिए रोस्‍टर्स की असील प्रजाति को बेहतर माना जाता है। रंगों के आधार पर मुर्गों को कबरी, चितरी, जोधरी, लाली आदि नामों से बुलाया जाता है। असील प्रजाति खासकर आंध्र प्रदेश और बस्तर के सीमावर्ती क्षेत्र में पाई जाती है। लड़ाकू मुर्गों के पैर पर तीखी धार वाले ब्लेड बांधे जाते हैं, जिन्‍हें काती कहा जाता है। इसे बांधने वाले जानकार मुर्गा काती बांधने का मेहनताना भी वसूलते हैं।
हर घेरे में सौ से ज्यादा दांव:-बता दें कि बस्तर संभाग के डिलमिली मुर्गा बाजार में करीब 15 मुर्गा रेसलिंग कोर्ट बनाए गए थे। प्रत्येक मुर्गा रेसलिंग कोर्ट में शनिवार दोपहर से रविवार शाम तक कम से कम 100 जोड़े मुर्गों की लड़ाइयां हुईं। बताया जाता है कि 15 मुर्गा रेसलिंग कोर्टों में करीब एक हजार मुर्गा जोड़ों पर दांव लगाया गया। एक मुर्गा रेसलिंग कोर्ट में एक बार में लोगों ने औसतन 10 हजार रुपये के दांव लगाकर सट्टा खेला। करीब 16 घंटे तक चले मुर्गा बाजार में लगभग एक करोड़ रुपये का दांव लगाया गया।

 

 

 

 

 

 

 

 

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