‘भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद बहुत सारे लोग शरणार्थी शिविरों में रह रहे थे। गांधीजी पीड़ितों से मिलने दिल्ली से हरिद्वार जा रहे थे। जब स्कूल के अध्यापकों को पता चलता कि गांधीजी इस राह से गुजरने वाले हैं, तो वे बच्चों को रास्ते में खड़े कर देते, ताकि वे भी उनके दर्शन कर सकें। इसी क्रम में मैं भी कतार में खड़ा हो गया। मैंने पाया कि बस में बैठे गांधीजी ने खिड़की से अपना सिर बाहर निकाला और लोगों से कहा कि देश अब आजाद हो गया है। इस गांधी को भूल जाइए। अब आप सभी लोग गांधी हैं। देश तथा संपूर्ण मानवता की भलाई के लिए आप लोगों को कुछ करना होगा। यह चित्र आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित है।’यह बात कहते हुए महात्मा गांधी को याद करते हैं ‘पहला गिरमिटिया’ किताब के लेखक गिरिराज किशोर। दोस्तो, वास्तव में महात्मा गांधी के जीवन के संदेशों से प्रेरणा लेकर हम सभी उनकी तरह बन सकते हैं। यहां पर हम उनके जीवन की कई छोटी-बड़ी, सुनी-अनसुनी घटनाएं जानते हैं, जिनसे सीख लेकर हम उसका अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करें, तो देश और संपूर्ण मानवता का भला कर सकते हैं।
समय के पाबंद:-बापू के लिए एक-एक क्षण की कीमत थी। उनका 24 घंटों का कार्यक्रम पहले से ही निश्चित रहता था। वे प्रत्येक काम को निश्चित समय पर शुरू कर देते और जितना समय जिस काम के लिए निश्चित करते, उतना ही समय उसमें लगाते। एक बार एक जर्मन व्यक्ति बापू से दो मिनट के लिए मिलना चाहता था। उनके सेक्रेटरी महादेव देसाई ने किसी तरह बापू को दो मिनट का समय देने के लिए राजी किया। जर्मन महोदय जब बापू से मिले, तो 1 मिनट तो शिष्टाचार में ही निकल गया और दूसरा मिनट बात की भूमिका बांधने में। 2 मिनट बाद ही बापू ने जर्मन को घड़ी दिखाई और उठ कर खड़े हो गए। वह निराश होकर बाहर चला गया। वहीं, एक बार एक व्यक्ति की घड़ी 5 मिनट तेज चल रही थी। इस पर उन्होंने उसे सलाह दी कि जो घड़ी ठीक समय न दे, उसे रखने का कोई लाभ नहीं है।
कम खर्च की सीख:-बापू पैसे ज्यादा खर्च करने के बहुत विरोधी थे। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वे छपे हुए कागज के दूसरी ओर भी लिखकर न सिर्फ पैसे बचाते थे, बल्कि पर्यावरण संरक्षण भी करते थे। अपने ऊपर नाममात्र का खर्च करने के कारण वे घुटने तक की धोती पहनते और एक खद्दर का दुपट्टा कंधे पर डाले रहते थे। साथ ही, रूमाल के स्थान पर एक खद्दर का टुकड़ा रखते थे। उनका यह टुकड़ा काफी साफ रहता था। एक बार पोती मनु गांधी को बापू ने सिर्फ इसलिए डांटा, क्योंकि उन्होंने पेंसिल छोटी होने पर फेंक दी थी।
साफ-सफाई;-दोस्तो, बापू बहुत कम कपड़े जरूर पहनते थे, लेकिन वे उन्हें बहुत साफ रखते थे। उनके खाने के बर्तन भी खूब साफ रहते थे। आदर्श सफाई पर जोर देने वाले बापू कहते थे कि रसोईघर और टॉयलेट इतने साफ होने चाहिए कि वहां एक मक्खी भी न बैठ सके। वे खुद भी घर-बाहर की साफ-सफाई किया करते।
सामान को जगह पर रखने की आदत:-बापू हर चीज को उसके स्थान पर रखते थे, ताकि अंधेरे में भी वे हाथ बढ़ाएं, तो वह वस्तु उनको मिल जाए। एक दिन उन्हें अपने स्थान पर रखी पेंसिल नहीं मिल रही थी। जब उनके साथ रहने वाले लोग भी उन्हें उसके बारे में नहीं बता सके, तो वे गंभीर हो गए। बापू ने कहा, ‘यह बात छोटी, लेकिन बहुत गंभीर है। जीवन में व्यवस्थित होने की बड़ी जरूरत है। सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी सभी नियमों का पालन कर रहे हैं, तो फिर हम क्यों इस नियम का पालन नहीं करते हैं?
बच्चों से प्रेम:-बापू बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। उनके साथ वे उन्हीं की तरह खेला भी करते थे। जब वे दुखी होते, तो उनका मनोरंजन भी करते। बापू जब घूमने जाते, तो प्राय : दो बच्चियां उनके हाथ अपने कंधों पर रखकर चलतीं। एक दिन इनमें से एक लड़की के नहीं आने पर दूसरी ने बापू का हाथ अपने कंधों पर रख लिया। जब बापू चलने लगे तब वह देर से आने वाली लड़की भी आ गई और उसने छोटी लड़की को हटाना चाहा। इससे वह लड़की बहुत दुखी हुई। बापू रुक गए और जब तक उसे खुश नहीं कर लिया, तब तक वहां से आगे नहीं बढ़े।
निश्चय के पक्के:-बापू मिरज (महाराष्ट्र) गए। वहां से वह एक दूसरे स्थान जाने वाले थे, लेकिन लोगों की इच्छा थी कि वे मिरज में कुछ समय तक और ठहरें। बापू ने इसे पसंद नहीं किया। वे तो अपने कार्यक्रम के अनुसार अगले स्थान पर जाना चाहते थे। मोटरगाड़ी समय से नहीं आई, तो बापू ने पैदल ही चलना शुरू कर दिया। उनके पैरों में कांटे भी चुभ गए, लेकिन वे रुके नहीं। जब लोगों ने देखा कि बापू किसी प्रकार भी नहीं रुकेंगे, तो फिर झटपट उनके पास मोटरगाड़ी पहुंच गई और बापू अपने निश्चित स्थान को समय से पहुंच गए।
अवगुण की बजाय देखते थे गुण;-बापू के आश्रम के एक सज्जन बड़े क्रोधी थे। वे किसी से बिना पूछे पुस्तकालय के अखबार भी ले जाया करते थे। जब ये बातें बापू को बताई गईं, तो उन्होंने कहा, ‘वे क्रोधी तो हैं, लेकिन परिश्रमी भी गजब के हैं। वे धुन के पक्के, निडर और हिम्मती भी हैं। वह बड़ी तन्मयता के साथ दूसरों की सेवा करते हैं। यहां तक कि रुपयों को सुरक्षित रखना भी वे बखूबी जानते हैं।’ बापू का एक बहुचर्चित उद्धरण यह भी है, ‘अपराधियों की बजाय अपराध से घृणा करें।’ इस तरह वे लोगों में दोषों की अपेक्षा गुण को अधिक देखते थे।
हर रोज कुछ नया सीखने की जिद:-बापू अपने को कभी बुजुर्ग मानते ही नहीं थे। वे हर रोज कुछ न कुछ सीखना चाहते थे। चाहे वह कोई नया शब्द ही क्यों न हो। मैं अपने जीवन के प्रथम चौदह वर्ष तक उनके निकट रही। गांधीजी बचपन से ही सत्य के लिए अटल रहते। सही-गलत को लेकर उनके मन में जो उथल-पुथल मची रहती थी, उसे सही दिशा देकर ही शांत होते थे। उनसे जब कभी भूल हो जाती थी, तो उसे वह जिंदगी भर सुधारते रहते।बापू दूसरी बार दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर थे। उस समय डरबन में प्लेग फैलने का डर था। इससे बचने के लिए घरों की साफ-सफाई बहुत जरूरी थी। उस समय अफ्रीका में माना जाता था कि भारतीय लोग सफाई पसंद नहीं होते हैं। बापू ने इसे गलत साबित करने के लिए भारतीय लोगों को अपना घर तथा गुसलखाने (बाथरूम) को साफ रखने की सलाह दी। उन्होंने यह उपदेश केवल दूसरों को ही नहीं दिया, बल्कि खुद भी घर-घर जाकर सफाई करने लगे। गांधीजी को दिखावा जरा भी पसंद नहीं था।वे जो कहते, पहले स्वयं पर प्रयोग करते। एक बार जब उन्हें इंग्लैंड के राजा के साथ चाय पीने का न्योता मिला, तो उन्होंने अपनी वेशभूषा नहीं बदली। वहां के प्रेस वालों ने जब उनसे पूछा कि धोती-लंगोटी पहनकर राजा के महल में कैसे गए? ऐसा करना तो राजा के अपमान के बराबर है। गांधी जी ने कहा कि अगर उनसे मिलने के लिए मैं अपना वेश छोड़ देता और विदेशी पोशाक पहन लेता, तो वह बेईमानी होती। इससे उनका ज्यादा अपमान होता।

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