नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें (Fake News) व वायरल पोस्ट (Viral Post) को नियंत्रित करने के लिए देश में लंबे समय से कवायद चल रही है, लेकिन अब तक सब नाकाम रहीं हैं। मंगलवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर सरकार को निर्देश जारी करने पड़े थे। सुप्रीम कोर्ट ने मामले में सरकार से तीन सप्ताह में शपथ पत्र दाखिल कर ये बताने को कहा है कि वह कब तक इस संबंध में दिशा-निर्देश तैयार कर लेगी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हमने आपको भारत के आईटी विशेषज्ञों की राय बताई थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि सोशल मीडिया को नियंत्रित कर पाना फिलहाल भारत में संभव नहीं है। आज हम आपको बताएंगे कि अन्य देशों में सोशल मीडिया पर फेक न्यूज को कैसे नियंत्रित किया जाता है? साथ ही आपको ये भी बताएंगे कि भारत में ये क्यों मुश्किल है?
जम्मू-कश्मीर में फेक न्यूज रोकने को संचार सेवाएं बंद:-केंद्र सरकार ने पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 व 35ए समाप्त कर विशेष राज्य का दर्जा खत्म करने से ठीक पहले मोबाइल व इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी थीं। संचार सेवाएं चालू रहने पर घाटी में फेक न्यूज और भड़काऊ मैसेज फैलने से शांति व्यवस्था को खतरा पैदा हो सकता है। करीब एक महीने तक घाटी में संचार सेवाएं पूरी तरह से ठप रहीं और फिर धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से इन्हें शुरू किया गया है। हालांकि अब भी कुछ इलाकों में संचार सेवाएं प्रभावित हैं। कश्मीर में संचार सेवाओं पर लगाई गई सरकार की रोक के खिलाफ बहुत से लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर फेक न्यूज या वायरल पोस्ट को नियंत्रित करने का मामला एक बार फिर से गरमा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने की थी सख्त टिप्पणी:-सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सरकार को निर्देश देते हुए सख्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हमें ऐसी गाइड लाइन की जरूरत है, जिससे ऑनलाइन अपराध करने वालों और सोशल मीडिया पर भ्रामक जानकारी पोस्ट करने वालों को ट्रैक किया जा सके। सरकार ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकती कि उसके पास सोशल मीडिया के दुरुपयोग को रोकने की कोई तकनीक नहीं है। मामले में जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा था कि सोशल मीडिया प्लेटफार्म और यूजर्स के लिए सख्त दिशा-निर्देशों की जरूरत है। अभी हालात ये है कि हमारी निजता तक सुरक्षित नहीं है। लोग सोशल मीडिया पर AK 47 तक खरीद सकते हैं। ऐसे में कई बार लगता है कि हमें स्मार्टफोन छोड़, फिर से फीचर फोन का इस्तेमाल शुरू कर देना चाहिए।
कैसे Fake News रोकते हैं बाकी देश
मलेशिया - मलेशिया दुनिया के उन अग्रणी देशों में से एक है, जिसने फेक न्यूज रोकने के लिए सख्त कानून (Anti-Fake News Law) बनाया है। मलेशिया में ये कानून पिछले साल ही लागू किया गया है। मलेशिया में फेक न्यूज फैलाने पर 5,00,000 मलेशियन रिंग्गित (84.57 लाख रुपये) का जुर्माना या छह साल की जेल अथवा दोनों का प्रावधान है।
ऑस्ट्रेलिया - ऑस्ट्रेलिया ने इसी वर्ष फेक न्यूज रोकने के लिए एंटी-फेक न्यूज लॉ बनाया है। इसके तहत फेक न्यूज फैलाने वाले सोशल मीडिया प्लेटफार्म से उसके सालाना टर्न ओवर का 10 फीसद जुर्माना वसूला जा सकता है। साथ ही तीन साल तक की सजा भी हो सकती है। यहां फेक न्यूज के अलावा अगर सोशल मीडिया कंपनी आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले, हत्या, दुष्कर्म और अन्य गंभीर प्रकृति के अपराधों से संबंधित पोस्ट हटाने में असफल होती है तब भी उसके खिलाफ Anti Fake News Law के तहत कार्रवाई की जा सकती है। कानून का उल्लंघन करने वाले किसी व्यक्ति पर 1,68,000 ऑस्ट्रेलियन डॉलर (80.58 लाख रुपये) और किसी निगम या संगठन पर 8,40,000 ऑस्ट्रेलियन डॉलर (4.029 करोड़ रुपये) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
फ्रांस - अक्टूबर 2018 में इस देश ने दो एंटी-फेक न्यूज कानून बनाए। फ्रांस ने ये कदम 2017 के राष्ट्रपति चुनाव में रूस के दखल का आरोप लगने के बाद उठाए थे। ये कानून उम्मीदवारों और राजनीतिक पार्टियों को फेक न्यूज के खिलाफ कोर्ट की शरण में जाने की अनुमति देते हैं। इसके अलावा फ्रांस की ब्रॉडकॉस्टिंग अथॉरिटी को ये अधिकार देते हैं कि वह फेक न्यूज फैलाने वाले किसी भी चैनल या नेटवर्क को बंद कर सकते हैं।
रूस - राज्य के खिलाफ या उसकी छवि खराब करने वाली कोई भी फेक न्यूज या झूठी सूचना फैलाने वाले व्यक्ति अथवा कंपनियों के खिलाफ सख्त सजा का कानून है। मार्च 2019 में ही रूस ने फेक न्यूज को रोकने के लिए कानून लागू किया है। अगर किसी पब्लिकेशन (समाचार पत्र) द्वारा फेक न्यूज फैलायी जाती है तो उस पर 15 लाख रूबल (16.57 लाख रुपये) तक का जुर्माना लग सकता है। देश के प्रतीक चिन्हों या अथॉरिटीज की छवि खराब करने वाली फेक न्यूज फैलाने पर 3,00,000 रूबल (3.31 लाख रुपये) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। दोबारा ऐसा करने पर जुर्माने के साथ 15 दिन की जेल भी हो सकती है।
चीन - चीन ने फेक न्यूज को रोकने के लिए पहले से ही कई सोशल मीडिया साइट और इंटरनेट सेवाओं जैसे ट्वीटर, गूगल और व्हाट्सएप आदि को प्रतिबंधित कर रखा है। चीन के पास हजारों की संख्या में साइबर पुलिस कर्मी हैं, जो सोशल मीडिया पोस्ट पर नजर रखते हैं। साइबर पुलिस सोशल मीडिया पर राजनीतिक रूप से संवेदनशील, फेक न्यूज और भड़काऊ पोस्ट पर नजर रखती है। इसके अलावा यहां इंटरनेट के बहुत से कंटेंट पर सेंसरशिप भी लागू है, जैसे 1989 में हुए चीन के थियानमेन चौक पर हुए नरसंहार से संबंधित कंटेंट।
जर्मनी - यहां फेक न्यूज रोकने के लिए जर्मनी का नेटवर्क इन्फोर्समेंट एक्ट (Germany's Network Enforcement Act) या नेट्जडीजी (NetzDG) कानून लागू है। ये कानून यहां की सभी कंपनियों और दो लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड सोशल मीडिया यूजर्स पर लागू होता है। कानून के तहत कंपनियों को कंटेंट संबंधी शिकायतों का रिव्यू करना आवश्यक है। अगर रिव्यू में कंटेंट गलत या गैरकानूनी पाया जाता है तो उसे 24 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य है। फेक न्यूज फैलाने वाले किसी व्यक्ति पर 50 लाख यूरो (38.83 करोड़ रुपये) और किसी निगम अथवा संगठन पर 5 करोड़ यूरो (388.37 करोड़ रुपये) तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। ये कानून उन लोगों पर भी लागू होता है जो इंटरनेट पर नफरत भरे भाषण वायरल करते हैं। जर्मनी ने एक जनवरी 2018 को ये कानून लागू किया है।
सिंगापुर - जनता में भय फैलाने, माहौल खराब करने वाले या किसी भी तरह की फेक न्यूज फैलाने वाले के लिये यहां 10 साल जेल की सजा का प्रावधान है। फेक न्यूज रोकने में नाकाम रहने वाली सोशल मीडिया साइट्स पर 10 लाख सिंगापुर डॉलर (5.13 करोड़ रुपये) का जुर्माना लगाया जा सकता है। कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को उसका पोस्ट हटाने या संशोधित करने के निर्देश दिए जा सकते हैं। निर्देशों का पालन न करने वाले व्यक्ति पर 20 हजार सिंगापुर डॉलर (10.26 लाख रुपये) का जुर्माना लगाया जा सकता है। साथ ही एक साल तक की जेल भी हो सकती है।
यूरोपियन यूनियन - अप्रैल 2019 में यूरोपीयन संघ की परिषद ने कॉपीराइट कानून में बदलाव करने और ऑनलाइन प्लेटफार्म को उसके यूजर्स द्वारा किए जा रहे पोस्ट के प्रति जिम्मेदार बनाने वाले कानून को मंजूरी प्रदान की थी। इसका सबसे ज्यादा लाभ उन लोगों की वास्तविक कृतियों को मिला, जिनका इंटरनेट पर अक्सर दुरुपयोग होता था या उन्हें चोरी कर लिया जाता था। जैसे किसी और कि फोटो या पोस्ट को अपने प्रयोग के लिए चोरी (कॉपी-पेस्ट) कर लेना। यूरोपियन यूनियन का ये कानून सोशल मीडिया, इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों और सर्च इंजनों पर भी लागू होता है।
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भारत में क्यों मुश्किल है नियंत्रण:-साइबर लॉ के जानकारों के अनुसार भारत में भी आईटी एक्ट है, जिसके तहत इस तरह के प्रावधान हैं, लेकिन ये कानून बहुत स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा ज्यादातर राज्यों की पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों को आईटी एक्ट के बारे में बहुत कम जानकारी है। यही वजह है कि देश में अब भी साइबर क्राइम के ज्यादातर मामले आईटी एक्ट की जगह आईपीसी के तहत दर्ज किए जाते हैं। पुलिस के अलावा भारत में ज्यादातर सोशल मीडिया यूजर्स को भी आईटी एक्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में लोग बिना सोचे-समझे किसी भी वायरल पोस्ट को फारवर्ड कर देते हैं। इसके अलावा फेसबुक, व्हाट्सएप और गूगल जैसे ज्यादातर सोशल मीडिया प्लेटफार्म व सर्च इंजन का भारत में न तो सर्वर है और न ही कोई ऑफिस। इस वजह से ये सेवा प्रदाता न तो भारतीय कानूनों को मानने के लिए बाध्य हैं और न ही सरकार के निर्देशों का गंभीरता से पालन करते हैं। ऐसे बहुत से मामले सामने आ चुके हैं, जिसमें सोशल मीडिया प्लेटफार्म ने पुलिस समेत अन्य जांच एजेंसियों को गंभीर अपराध के मामलों में भी जानकारी देने से इंकार कर दिया है।

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