क्या हो जब आप खिड़की से बाहर झांकें और सामने हो चमकता हिमालय! कुदरत ने मुनस्यारी को कुछ ऐसा ही वरदान बख्शा है। यदि आप कुदरत प्रेमी होने के साथ ट्रेकिंग के शौकीन भी हैं तो उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले में स्थित यह हिल स्टेशन कर रहा है आपका इंतजार।कुमाऊं में एक बहुत पुरानी कहावत प्रचलित है-आधा संसार, एक मुनस्यार यानी हिमालय की तलहटी में बसे और बेपनाह खूबसूरती को समेटे मुनस्यारी की तुलना आधे संसार से कर देने का मतलब है इस क्षेत्र को कुदरत ने जन्नत की तरह सजाया है। सामने पंचाचुली यानी हिमालय की पांच विहंगम चोटियों के दर्शन होते हैं तो जैसे पर्यटकों की मुंहमांगी मुरादें पूरी हो जाती हैं। सुबह-शाम अलौकिक छटा बिखेरने की वजह से इस क्षेत्र को हिमनगरी भी कहा जाता है। बर्फ से ढकी चोटियां सिर्फ यहां की शान ही नहीं, जीवन भी हैं। हिमालय ने मुनस्यारी को जीना भी सिखाया है और जीवट भी बनाया है।
मजूमदार बाबू और मार्केल ने कराया परिचय : मुनस्यारी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का श्रेय कोलकाता के सदानंद बाबू मजूमदार और न्यूजीलैंड की मार्केल क्लार्क को दिया जाता है। सदानंद बाबू वर्ष 1981 में यहां मुनस्यारी तक सड़क बनने के बाद नैनीताल शहर में होटल चलाने पहुंचे थे। उस समय हिमाच्छादित यह इलाका पर्यटन के तौर पर विकसित नहीं था। मुनस्यारी में जनजातीय लोग अधिक रहते हैं। सौ से अधिक उपजातियां यहां निवास करती हैं। सदानंद बाबू ने मुनस्यारी की अलौकिक सुंदरता से अभिभूत होकर इसके बारे में लोगों को बताया और इसका खूब प्रचार भी किया। इसका फल यह हुआ कि कोलकाता से निकलने वाली ‘भ्रमण’ नामक पत्रिका की टीम मुनस्यारी आई। इस पत्रिका के माध्यम से मुनस्यारी की खूबसूरती का इतना प्रचार किया गया कि इसके बाद बड़ी संख्या में बंगाली पर्यटक यहां का रुख करने लगे। 1985 के आसपास न्यूजीलैंड की महिला पर्यटक मार्केल क्लार्क मुनस्यारी आईं। उन्होंने हिमालय के सौंदर्य का प्रचार- प्रसार दुनिया भर में किया। क्लार्क और मजूमदार की इस पहल के बाद ही मुनस्यारी दुनिया के फलक पर छाया।
ट्रेकिंग के जरिए पहुंचिए खलिया टॉप: समुद्री सतह से करीब साढ़े दस हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित खलिया टॉप मुनस्यारी की बेहद खास जगह है। मुख्य शहर से यहां तक पहुंचने के लिए गाड़ी का रास्ता भी है और पैदल का भी, लेकिन खलिया टॉप को छूने के लिए ज्यादातर लोग ट्रेकिंग चुनते हैं। मुनस्यारी से खड़ी चढ़ाई में पैदल सफर शुरू करने के बाद न सिर्फ शहर के अद्भुत दीदार होते हैं, बल्कि रोमांच से भरा खुशनुमा अनुभव भी मिलता है। यह ट्रेक करीब पांच किलोमीटर का है। ट्रेकिंग के अलावा फरवरी से मार्च तक जब बर्फ के फाहे खलिया टॉप पर चादर बनकर बिछे होते हैं तो यहां यानी मुनस्यारी में आप स्कीइंग भी कर सकते हैं।
हिमालय से सामना: बिटलीधार भी स्कीइंग के लिए मशहूर और परफेक्ट स्थल माना जाता है। यह मुनस्यारी मार्ग पर सर्वाधिक ऊंचाई वाला स्थान माना जाता है। सबसे खास बात यह है कि 2748 मीटर की ऊंचाई वाले बिटलीधार से आप हिमालय की विराट शृंखलाओं के विहंगम दर्शन कर सकते हैं। आपके और हिमालय के बीच की दूरी बहुत कम होती है, इतना जैसे कि आप दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए हों। यहां चोटियों को आप नीचे से ऊपर तक साक्षात देख सकते हैं।
पातलथौड़ की गोद में थुनेर-नर्सरी: वन विभाग ने इस जगह यानी पातलथौड़ में थुनेर की नर्सरी तैयार की है। थुनेर मुख्य रूप से हिमालय क्षेत्र का औषधीय पौधा है। माना जाता है कि इस पौधे में कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से लड़ने की ताकत है। उच्च हिमालय का मौसम और जलवायु थुनेर के लिए बेहद माकूल मानी गई है। खासकर मुनस्यारी के आसपास के इलाकों में जहां तापमान न अधिक गर्म और न अधिक ठंडा है, वहां यह पौधा पाया जाता है। हालांकि पर्याप्त संरक्षण नहीं होने की वजह से इसे बड़े पैमाने पर विकसित नहीं किया जा सका है। इसीलिए अब वन विभाग ने पातलथौड़ को इसकी नर्सरी के लिए चुना है। ईको टूरिज्म के रूप में भी पातलथौड़ को विकसित किया जा रहा है।
मैसर और थामरी कुंड : मुनस्यारी के पास मैसर कुंड और थामरी कुंड हैं। इन दोनों कुंडों में अथाह पानी भरा रहता है। सबसे खास बात यह है कि इनमें पानी साल भर बना रहता है। इन कुंडों को रिचार्ज करने का स्रोत भूमिगत है। यहां आने के बाद चारों तरफ से पहाड़ के बीच स्थित इस खूबसूरत कुंड की तरफ आप बरबस आकर्षित हो जाएंगे। इन दोनों स्थानों पर स्थानीय संस्कृति के आधार पर विशेष कार्यक्रम भी होते रहते हैं। यहा आयोजित मेले में स्थानीय संस्कृति की रौनक देखते ही बनती है।
उत्तराखंड का मस्तक है यह क्षेत्र: मुनस्यारी को जोहार घाटी भी कहा जाता है। स्थानीय समाजसेवी रमेश पांगती कहते हैं, ‘पिछले 40 साल से हिमालय की गोद में बसे इस कस्बे को समृद्ध होते देखा है मैंने। पर पिछले कुछ समय से ग्लोबल वार्मिंग का असर इन क्षेत्रों पर भी पड़ा है। हालांकि यहां आने वाले अतिथियों को हम हिमालय बचाने का संदेश भी देते हैं। दरअसल, इसके लिए जरूरी है हिमालय को समझना। मुनस्यारी की संस्कृति खुद में विशिष्ट है। इसकी पहचान बनी रहे, इसका प्रयास जरूरी है। स्थानीय स्तर पर प्रयास जारी हैं, जरूरत है सरकार भी समान रूप से सहयोग करती रहे। यह कस्बा उत्तराखंड का मस्तक है।’
कुदरत के बीच सांस्कृतिक रंगों की महक: मुनस्यारी और इसके आसपास जोहारी, बरपटिया जैसे जनजातीय समुदाय की बसावट है। अगर आप स्थानीय संस्कृति में रुचि रखते हैं तो इस जगह से निश्चित रूप से प्यार कर बैठेंगे। पर्यटन के मौसम में होने वाले मेले या अन्य आयोजनों में यहां के स्थानीय समुदायों की महिलाओं द्वारा पारंपरिक वेशभूषा में किया जाने वाला ‘ढुस्का नृत्य’ का धमाल सबसे आकर्षक रहता है। यह एक सामूहिक नृत्य है। इस अवसर पर इनके द्वारा पहने जाने वाले आभूषणों का आकार इतना बड़ा होता है कि पहली बार देखने पर मन में तमाम तरह के सवाल उठते हैं, लेकिन यही तो है स्थानीय संस्कृति की खासियत, जिसे इन्होंने संभाल कर रखा है।आज से 50 साल पहले इनकी जो समृद्ध संस्कृति थी, इन्होंने आज भी उसे धरोहर की तरह संजोकर रखा है। इस तरह, विख्यात सर्वेयर पं. नैन सिंह और पं. किशन सिंह भी मुनस्यारी की धरोहर हैं। सात बार एवरेस्ट फतह करने वाले पर्वतारोही लवराज धर्मशक्तू का ताल्लुक भी यहीं से है। वह यहां के बौना गांव के रहने वाले हैं। एवरेस्ट विजेता हरीश चंद्र सिंह रावत मुनस्यारी के ही निवासी थे।
है आदर्श हिल स्टेशन:-कुदरत ने इस क्षेत्र को वह सब कुछ दिया है जो एक आदर्श पर्यटन स्थल को चाहिए, पर ट्रेकिंग के दीवानों के लिए यह किसी जन्नत से कम नहीं है। हालांकि अभी तक यहां के सभी ट्रेकिंग रूटों का विस्तार नहीं हो सका है। यहां के पर्यटन विशेषज्ञ वीरेंद्र सिंह बृजवाल कहते हैं, यदि सभी ट्रेक रूटों को विकसित कर लिया जाए तो यह स्थान विश्व पर्यटन मानचित्र में अपना खास स्थान बनाने में सक्षम है। यहां मिलम चले जाएं या रालम ग्लेशियर, रास्ते की खूबसूरती को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में यहां पर्यटन का सुनहरा दौर आरंभ होगा।
खलिया पर्वत पर है यह जन्नत:-मुनस्यार दो शब्दों ‘मुन’और ‘स्यार’ से मिलकर बना है। मुन का अर्थ है बर्फ (हिमकण जिसे स्थानीय भाषा में ‘मुण’ भी कहा जाता है) और स्यार का अर्थ है कीचड़। मतलब इस बर्फीले इलाके में बर्फ व कीचड़ के घालमेल की वजह से ही इस शब्द की उत्पत्ति हुई। जिस पर्वत पर यह इलाका बसा है, उसे खलिया पर्वत कहा जाता है।
सबसे ऊंचा झरना बिर्थी;-मुनस्यारी से करीब 38 किलोमीटर पहले थल-मुनस्यारी मार्ग पर बिर्थी झरना उत्तराखंड का सबसे ऊंचाई से गिरने वाला झरना है। यह खलिया टॉप की तरफ से 126 मीटर नीचे गिरता है। इस दर्शनीय झरने का सभी दीदार करते हैं। खास बात यह है कि बिर्थी फॉल सदाबहार है। बारिश हो, गर्मी या फिर सर्दी का मौसम। झरने का पानी पूरे वेग से चट्टानी जमीन से टकराता है। कभी यहां पानी कम नहीं हुआ। मुनस्यारी का यह सबसे खूबसूरत स्थान माना जाता है।
बढ़ रहा है बर्ड-वॉचिंग का ट्रेंड:-मुनस्यारी की एक अन्य बड़ी विशेषता यहां पर हर सीजन में नजर आने वाले पक्षी हैं। शीतकाल में उच्च हिमालय में प्रवास करने वाला सबसे सुंदर पक्षी ‘मोनाल’ ग्रीष्म ऋतु के आते ही हिमालय की तलहटी की ओर निकल आता है। मोनाल उत्तराखंड का राजकीय पक्षी भी है। ऐसे कई और दुर्लभ पक्षी हैं, जिनका बसेरा हिमालय है। इन पक्षियों की चहचहाहट से मुनस्यारी भी खिलखिलाता है। इसीलिए अब यहां बर्ड वॉचिंग का ट्रेंड भी बढ़ने लगा है।
गाइड की व्यवस्था:-यह हिमनगरी पर्यटन नगरी के रूप में तेजी से विकसित हो रही है। स्थानीय होटलों और टूर एवं ट्रेकिंग एजेंसियों की ओर से ऑनलाइन बुकिंग की जाती है। ट्रेकिंग पर जाने वाले पर्यटकों के लिए स्थानीय होटल वाले गाइड की व्यवस्था भी कराते हैं। हालांकि मुनस्यारी के नजदीकी क्षेत्रों में ट्रेकिंग के लिए पर्यटकों को गाइड की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती है।
...और तिकसेन बना मुनस्यार:-वर्तमान मुनस्यारी चार ग्राम पंचायतों-सरमोली, घोरपट्टा, बुंगा व जैंती की सीमा पर बसा है। जिस स्थान पर आज मुनस्यारी कस्बा है, उसे पूर्व में तिकसेन कहते थे। यह एक स्थानीय शब्द है।1962 से पहले भारत-चीन व्यापार का यह प्रमुख केंद्र हुआ करता था। तिकसेन में व्यापारी प्रवास करते थे। धीरे-धीरे तिकसेन को मुनस्यार नाम से पुकारा जाने लगा और बाद में यही मुनस्यारी कहलाने लगा। यहां से कुछ पर्वतों को लांघने के बाद चीन की सीमा शुरू हो जाती है।
मनभावन ग्लेशियर का नजारा;-मिलम ग्लेशियर: गोरी गंगा का उद्गम स्थल मिलम ग्लेशियर विश्व के प्रसिद्ध ग्लेशियरों में शामिल है। यह मुनस्यारी से करीब 66 किमी. की दूरी पर है। मिलम ग्लेशियर से ही गोरी गंगा नदी का उद्गम होता है। हालांकि यहां तक आने के लिए आपको पैदल सफर करना पड़ेगा। ग्लेशियर से पहले रास्ते में कई पड़ाव बनाए गए हैं। अगर आप इस ग्लेशियर को ट्रेक करना चाहते हैं तो मुनस्यारी से मिलम और मिलम से वापस मुनस्यारी आने के लिए कम से कम दस दिन का समय चाहिए।
रालम ग्लेशियर: मुनस्यारी का रालम ग्लेशियर अति-दुर्गम ग्लेशियरों में गिना जाता है। यह मुनस्यारी से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर है। इस सुंदर ग्लेशियर से मिलने के लिए आपको तमाम मुश्किल भरे अनुभवों से भी गुजरना पड़ सकता है। पर यदि आप ट्रेकिंग के शौकीन रहे हैं तो आपके लिए एक रोमांचक मौका भी है। यदि इस ग्लेशियर तक जाना चाह रहे हैं तो आपको कुछ अधिक समय लेकर जाना होगा।
नंदा देवी बेस कैंप : नंदा देवी चोटी के निकट स्थित बेस कैंप तक बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। इस बेस कैंप तक जाने के लिए पैदल सफर करना पड़ता है। गर्मी का सीजन ट्रेकिंग के लिए सबसे बेहतर माना जाता है, क्योंकि बरसात के समय खतरे बढ़ जाते हैं तो सर्दियों में बर्फ गिरने की वजह से रास्ते बंद हो जाते हैं।
लुभा लेंगे यहां के होम-स्टे : मुनस्यारी में ठहरने के लिए वर्तमान में 27 होटल, लॉज और पर्यटक आवास गृह हैं। इन सबके अलावा सरमोली गांव में करीब 40 होम स्टे भी हैं, जो पर्यटकों को खूब भा रहे हैं। दरअसल, पर्यटकों को ध्यान में रखकर यहां के पारंपरिक घरों को खूबसूरती से विकसित किया गया है। यहां लोक निर्माण विभाग, वन विभाग के डाक बंगले भी हैं। इनकी बुकिंग ऑनलाइन होती है।
नंदा देवी मंदिर:-डांडाधार नामक जगह पर स्थित नंदा देवी मंदिर की विशेषता ने मुनस्यारी को एक अलग पहचान दी है। प्रकृति, संस्कृति, साहसिक और धार्मिक आयामों का यहां मिश्रण है। जो मुनस्यारी आते हैं, वे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने जरूर जाते हैं। नंदा देवी मंदिर से भी चारों ओर का अलौकिक पर्वतीय नजारा नजर आता है। नंदा देवी स्थानीय लोगों की आराध्य देवी हैं।
कालामुनि;-मुनस्यारी पहुंचने से पूर्व कालामुनि एक अलग एहसास कराता है। यहां पर काली मां का मंदिर है। मुनस्यारी आने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस मंदिर के पास रुकता है। कालामुनि एक और खासियत के लिए प्रसिद्ध है। वह यह है कि अगर मुनस्यारी में मौसम खराब हो जाए, तापमान लुढ़कने लग जाए तो बर्फ के फाहे सबसे पहले यहीं गिरते हैं। प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ यह आध्यात्मिक शांति का भी प्रमुख केंद्र है।
सबके लिए खास हैं अंगोरा शशक की सौगात
ये स्वाद अर्जी और गित्कू यहीं मिलेगा : मुनस्यारी में मांसाहारियों के लिए अर्जी और गित्कू बनाया जाता है। ये दोनों नाम स्थानीय हैं। अर्जी यानी बकरी की आंत में मडुए का आटा, कलेजी के टुकड़े भरकर बनाया जाने वाला यह व्यंजन लोगों को काफी भाता है। गित्कू का अर्थ सूप से है। अर्जी के साथ सूप भी परोसा जाता है, यह ठीक उसी तरह से है, जैसे मोमो के साथ सूप परोसा जाता है। अर्जी व गित्कू केवल मुनस्यारी में बनता है। आपको यहां आकर कुमाऊंनी थाली भी ट्राई करनी चाहिए।
तिमूर की चटनी केवल यहीं मिलेगी : मुनस्यारी के खानपान में तिमूर और भांग की चटनी का स्वाद निराला है। यूं तो भांग की चटनी अन्य स्थानों पर भी बनती है, लेकिन मुनस्यारी की चटनी में डाले जाने वाला नींबू इसे विशेष बना देता है। तिमूर की चटनी कुमाऊं में केवल मुनस्यारी में ही मिलती है, जो यहां का मुख्य जायका है। यह सिलबट्टे पर पीसकर तैयार की जाती है। तिमूर पहाड़ का एक औषधीय पौधा है, जिसके दानों का प्रयोग चटनी बनाने में किया जाता है।
अंगोरा शशक की सौगात;-मुनस्यारी की एक पहचान यहां के ऊनी वस्त्र हैं। इस दिशा में अभी बहुत अधिक कार्य नहीं हुआ है, लेकिन यहां आने वाले पर्यटक इन वस्त्रों को मुनस्यारी की सौगात के रूप में लेकर जाते हैं। यहां ऊनी वस्त्र सालभर बिकते हैं और इनकी यहां हर समय जरूरत रहती है। दरअसल, मुनस्यारी का तापमान हमेशा ठंडा रहता है। अंगोरा शशक के ऊन से तैयार कपड़े सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। इस ऊन से बनी टोपी, स्वेटर, मोजे, मफलर आदि आपको यहां मिल जाएंगे। स्थानीय बुनकर ही अंगोरा शशक का ऊन निकालते हैं और इनसे ऊनी कपड़े तैयार किए जाते हैं। उच्च हिमालय के गांवों में भेड़ पालन अधिक होने से ऊन आसानी से मिल जाता है। जहां तक मुनस्यारी के बाजार का सवाल है तो यहां ऊनी वस्त्रों के अलावा कालीन भी आपको मिल जाएंगे। बाजार बहुत समृद्ध नहीं है, लेकिन प्राकृतिक सुंदरता ने इस क्षेत्र को भी खास पहचान दी है।
कब और कैसे जाएं?;-मुनस्यारी जाने का आदर्श समय मार्च से जून और मध्य सितंबर से अक्टूबर तक है। यहां आने के लिए आपको काठगोदाम या हल्द्वानी से टैक्सी मिल जाएगी। रूट वाया अल्मोड़ा, सेराघाट, बेरीनाग सड़क मार्ग होते हुए है। 71 किमी. लंबी मुनस्यारी की यात्रा रोमांच और चुनौती से भरी है। करीब 15 किमी. तक रामगंगा नदी घाटी और जाकुर नदी के किनारे यात्रा होती है। बिर्थी, गिरगांव के बाद पूरा भूगोल बदल जाता है। इकलौती सड़क के एक तरफ चट्टान तो दूसरी तरफ गहरी होती जा रही खाई रोमांच से भर देती है। गिनी बैंड से आगे से लंबे घुमावदार मोड़ हैं। यहां मौसम कब बदल जाए, पता नहीं रहता है। इसलिए सावधानी जरूरी है।

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