नई दिल्ली/जालंधर - दिल्ली में जब भी प्रदूषण बढ़ता है इसका पूरा दोष पड़ोसी राज्यों पंजाब व हरियाणा पर मढ़ दिया जाता है। कहा जाता है कि दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण स्तर बढ़ने की मुख्य वजह पंजाब व हरियाणा में किसानों द्वारा खेतों में पराली जलाना है। एक फिर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण चरम पर है। ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस बार जैसे ही प्रदूषण का दोष पंजाब पर मढ़ा, वहां से भी उन्हें करार जवाब मिला है।
एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के मुद्दे पर दिल्ली और पंजाब में ठन गई है। एक तरफ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल नासा द्वारा जारी तस्वीरों के आधार पर, एनसीआर में प्रदूषण के लिए पंजाब को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दूसरी तरफ पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पर्यावरण मंत्री ओपी सोनी, कृषि सचिव काहन सिंह पन्नू और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेरयमैन मरवाहा ने केजरीवाल के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत अन्य ने अरविंद केजरीवाल से पूछा है कि अगर दिल्ली में पंजाब की वजह से से प्रदूषण हो रहा है, तो पंजाब में दिल्ली से कम प्रदूषण क्यों है। दिल्ली, पंजाब से ज्यादा प्रदूषित कैसे है। इसके साथ ही कैप्टन ने तो केजरीवाल के आइआइटी ग्रेजुएट होने पर भी संदेह जता दिया और कहा कि केजरीवाल वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर बात करें।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का भी कहना है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार पंजाब का प्रदूषण आधे से भी कम रह गया है। 29 अक्टूबर को पिछले साल के मुकाबले अमृतसर में 219, लुधियाना में 152 व मंडी गोबिंदगढ़ में 123 सस्पेंडिड पार्टीकुलेट मैटर (एसपीएम) की रिकॉर्ड गिरावट दर्ज की गई है। इसी दिन दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 355 एसपीएम रहा था। जो अब 400 के पार पहुंच चुका है। बीते सोमवार को भी दिल्ली का एयर क्वालिटी इंडेक्स 426, जबकि जालंधर का 176 रहा।
पंजाब का तर्क
पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का कहना है कि केजरीवाल पंजाब को दोषी ठहरा रहे हैं। उन्हें बताना चाहिए कि दिल्ली में दिसंबर से लेकर जनवरी तक हर बार एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआइ) 300 से ज्यादा क्यों रहता है, जबकि इस दौरान तो पड़ोसी राज्यों में पराली भी नहीं जलाई जाती। वेदर रिसर्च एंड फॉरकास्टिंग मॉडल की हवा प्रदूषण के बारे में जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली-एनसीआर की हवा उत्तर-दक्षिण से पूर्व की ओर बदल चुकी हैं। इस कारण पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं का शायद ही कोई प्रभाव यहां पड़ता हो। पिछले माह की हवा की गति स्थिर थी। यह दो किलोमीटर प्रति घंटा से भी कम रही। 3 नवंबर तक पराली जलाने के 25,394 मामले सामने आए हैं, जबकि पिछले साल इस तारीख तक 30832 घटनाएं हुई थीं।
अक्टूबर में भी खराब थी दिल्ली की फिजा
पंजाब के पर्यावरण मंत्री ओपी सोनी भी कह चुके हैं कि मेहनती किसानों पर आरोप न मढ़ें। पूरे अक्टूबर में पंजाब का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआइ) औसतन 170 से पार नहीं गया, दिल्ली में पिछले महीने भी एक्यूआइ 350 था। पिछले दिनों हवा की गति 1.5 किलोमीटर प्रति घंटा रही और इसकी दिशा दक्षिण-पूर्व की तरफ से आकर उत्तर-पश्चिम की तरफ रही। ऐसे में पंजाब का प्रूदषण कैसे हरियाणा को पार करके पंजाब की हद से 250 किलोमीटर दूर दिल्ली तक पहुंच सकता है?
प्रदूषण के लिए पराली ही नहीं आप भी हैं जिम्मेदार
राजधानी दिल्ली में एक बार फिर प्रदूषण जानलेवा स्तर पर पहुंच चुका है। दिल्ली में बृहस्पतिवार (एक नवंबर) से ग्रेडेड रिस्पॉश एक्शन प्लान (GRAP) लागू किया जा चुका है। हर साल सवाल उठता है कि इस प्रदूषण के लिए क्या पराली जलाना या निजी वाहनों ही जिम्मेदार हैं। इसका जवाब है नहीं, प्रदूषण की केवल एक-दो नहीं बल्कि 25 वजहें हैं। इसके लिए हम सब जिम्मेदार हैं।
दिल्ली खुद है मुख्य वजह
टेरी संस्था द्वारा जारी एक अध्ययन में प्रदूषण से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए गए हैं। इसके अनुसार सर्दियों से ठीक पहले राजधानी में होने वाले 36 फीसद प्रदूषण के लिए दिल्ली खुद जिम्मेदार है। इसके बाद 34 प्रतिशत हिस्सेदारी एनसीआर के शहरों की होती है। शेष 30 फीसद प्रदूषण एनसीआर से सटे इलाकों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार से आता है। टेरी ने ये अध्ययन वर्ष 2016 में किया था, जिसे इसी वर्ष अगस्त माह में जारी किया गया है।
कार से ज्यादा बाइक से प्रदूषण
टेरी के अनुसार उन्होंने अपने अध्ययन में जब पीएम 2.5 का आंकलन किया तो हैरान करने वाली वजहें सामने आयीं। प्रदूषण में सबसे कम 3 फीसद योगदान कारों का है। हल्के वाणिज्यिक वाहन (LCVs) का योगदान एक फीसद, दो पहिया वाहनों का योगदान 7 प्रतिशत है। पीएम-2.5 के अध्ययन में पता चला है कि सभी तरह के वाहनों से होने वाले प्रदूषण का कुल योगदान 28 प्रतिशत है। इसमें से सबसे ज्यादा 9 फीसद प्रदूषण ट्रकों व ट्रैक्टर जैसे भारी वाहनों की वजह से होता है। तीन पहिया वाहनों का योगदान 5 फीसद और बसों की वजह से 3 फीसद प्रदूषण हो रहा है।
धूल और उद्योग फैला रहे 48 फीसद प्रदूषण
टेरी के अनुसार पीएम 2.5 बढ़ने के पीछे धूल का 18 प्रतिशत और उद्योगों का 30 प्रतिशत योगदान है। धूल के प्रदूषण में 4 फीसद हिस्सेदारी सड़क की धूल, निर्माण कार्य से उड़ने वाली धूल 1 प्रतिशत व अन्य वजहों का योगदान 13 फीसद है। वहीं उद्योगे के 30 फीसद प्रदूषण में से पावर प्लांट का 6 प्रतिशत, ईंट का 8 प्रतिशत, स्टोन क्रशर 2 फीसद, जबकि अन्य छोटे बड़े उद्योगों से 14 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है।
घर से फैल रहा 10 फीसद प्रदूषण
हमारे घर भी प्रदूषण स्तर को बढ़ाने में 10 फीसद भूमिका निभा रहे हैं। इसमें बायोमास (जैव ईंधन) की भूमिका 9 फीसद, केरोसीन इस्तेमाल की हिस्सेदारी 1 फीसद और घरों में खाना पकाने के लिए प्रयोग होने वाली एलपीजी गैस का योगदान 0.1 फीसद है।
पराली से मात्र 4 फीसद होता है प्रदूषण
अध्ययन में दिलचस्प बात सामने आयी है कि सर्दियों के पूरे मौसम में खेतों में जलाई जाने वाली पराली और बायोमास से फैलने वाले प्रदूषण का योगदान मात्र 4 प्रतिशत है। पराली जलाने से लगभग 15 से 20 दिनों के बीच में सबसे अधिक प्रदूषण होता है। इसी बीच किसान सबसे ज्यादा पराली जलाते हैं। इसलिए दिवाली के आसपास के 15-20 दिन प्रदूषण सबसे अधिक रहता है। इन 15 से 20 दिनों में दिल्ली में 30 प्रतिशत प्रदूषण का योगदान पराली जलाने की वजह से होता है। हालांकि, सर्दियों के पूरे मौसम का आंकलन करें तो पराली जलाने से फैलने वाले प्रदूषण का योगदान मात्र 4 फीसद है।
दिल्ली में पीएम 10 के बढ़ने की वजह
टेरी ने सर्दियों के मौसम में पीएम 10 के बढ़ते स्तर पर भी अध्ययन किया है। अध्ययन के अनुसार वाहनों से फैलने वाले प्रदूषण (2.5) की भूमिका 24 प्रतिशत, धूल का योगदान 25 फीसद, उद्योग 27 प्रतिशत, पराली और बायोमास 4 फीसद है। वहीं रिहायशी इलाकों से 9 प्रतिशत प्रदूषण फैलता है। टेरी के अनुसार एनसीआर के तकरीबन 30 लाख घरों में अब भी खाना पकाने के लिए बायोमास का प्रयोग किया जाता है। इससे दिल्ली की हवा प्रदूषित होती है। सिर्फ दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के लिए वाहन, इंडस्ट्री और बायोमास बर्निंग मुख्य तौर पर जिम्मेदार है।

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