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नई दिल्ली - भारत और वेस्टइंडीज के बीच पहले वनडे में मेहमान टीम को अच्छी शुरुआत मिली। ओपनर कायरन पावेल ने तूफानी अर्धशतक जड़ भारतीय गेंदबाजों को मुश्किल में भी डाला लेकिन इसके बाद भारतीय गेंदबाजों ने वापसी की जल्दी जल्दी तीन विकेट लिए। अब वेस्टइंडीज का स्कोर 4 विकेट पर 114 रन था। इसके बाद क्रीज पर एंट्री हुई शिमरोन हेयमायर की।
वेस्टइंडीज के इस तूफानी बल्लेबाज ने आते ही बड़े शॉट खेलने शुरू कर दिए। गेंदबाज कोई भी हो उन्होंने किसी को नहीं बक्शा और लगातार चौको और छक्कों की बरसात की। कमेंटरी कर रहे एक्सपर्ट भी थोड़े हैरान थे क्योंकि उनका मानना था कि उन्हें पारी को संवारने की जरुरत थी लेकिन इस बल्लेबाज का तो सोचना कुछ और ही था।
हेटमायर ने केवल 74 गेंद पर अपने वनडे करियर का तीसरा शतक ठोका। इस दौरान उन्होंनो अपनी पारी में 6 चौके और 6 छक्के लगाए। 41 गेंद पर अपनी फिफ्टी पूरी करने के बाद हेटमायर और खतरनाक हो गए। उनकी इस पारी की बदौलत वेस्टइंडीज ने 38 ओवर में ही 240 रन का आंकड़ा पार कर लिया।
इस बल्लेबाज ने सबसे ज्यादा रन रवींद्र जडेजा की गेंद पर बनाए, उन्होंने जड्डू की गेंद पर 37 रन बटोरे। वहीं शमी की गेंद पर उन्होंने 23 और चहल की गेंद पर 17 रन बटोरे।
इस बल्लेबाज ने अब तक 13 वनडे में 550 से ज्यादा रन बनाए है। इस दौरान उनके नाम 3 शतक और 1 अर्धशतक दर्ज है। वनडे में इस बल्लेबाज का प्रदर्शन वैसे भी अच्छा रहा है। अब तक उन्होंने अपने वनडे करियर में 45 से ज्यादा की औसत से रन बनाए है।
हेटमायर ने केवल 13वें मैच में अपना तीसरा शतक लगाया, इससे पहले किसी भी वेस्टइंडीज के बल्लेबाज ने इतने कम मैचों में अपने पहले तीन शतक लगाए थे। हेटमायर से पहले जॉनसन चार्ल्स ने 13 मैच में 2 शतक लगाए थे। वहीं विवियन रिचर्ड्स को अपने पहले तीन शतक लगाने के लिए 16 वनडे लगे थे, वहीं महान बल्लेबाज ब्रायन लारा ने तो इसके लिए 45 वनडे खेले थे।


नई दिल्ली - भारत और वेस्टइंडीज के बीच पहले वनडे में तो आपने शिमरोन हेटमायर के तूफानी शतक का दीदार कर लिया होगा लेकिन जब वेस्टइंडीज की पारी का लुत्फ ले रहे थे तो दूसरी तरफ बांग्लादेश के ओपनर इमरुल केयस ने भी जिम्बाब्वे के खिलाफ पहले वनडे में शतक ठोक अपनी टीम को सम्मानजनक स्कोर तक पहुंचाया।
एक समय बांग्लादेश का स्कोर 139 रन पर 6 विकेट था लेकिन इस बल्लेबाज ने ना केवल एक जुझारु पारी खेली बल्कि अपनी टीम को वह स्कोर भी दिया, जिसके बाद उसके गेंदबाज थोड़ा संघर्ष कर पाए। अपनी इस पारी के दौरान उन्होंने मोहम्मद सहफुदीन के साथ शतकीय साझेदारी की।
इस दौरान केयस ने 118 गेंद पर अपना शतक पूरा किया, अपनी इस शतकीय पारी में उन्होंने 8 चौके और 3 छक्के भी लगाए। यह केयस के वनडे करियर का तीसरा शतक है। बांग्लादेश का ये बल्लेबाज अब तक अपने वनडे करियर में 74 वनडे में करीब 30 की औसत से 2100 से ज्यादा रन बना चुका है।
हाल ही में एशिया कप में वापसी करने वाले केयस इस समय अच्छी फॉर्म में चल रहे हैं जो कि बांग्लादेश के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि टीम के 2 महत्वपूर्ण स्तंभ तमीम इकबाल और शाकिब अल हसन चोट की वजह से बाहर चल रहे हैं।
अपने वनडे करियर में केयस अब तक 3 शतक और 15 अर्धशतक लगा चुके हैं। हालांकि स्ट्राइक रेट के मामले में वह थोड़े पिछड़ जाते हैं क्योंकि अब तक उनका स्ट्राइक रेट 68 के करीब का है।


नई दिल्ली - आइपीएल टीम सनराइजर्स हैदराबाद के ओपनर बल्लेबाज शिखर धवन अगले सीजन में किसी और टीम के साथ जुड़ सकते हैं। खबरों की मानें तो धवन इस वक्त टीम से नाराज चल रहे हैं और वो हैदराबाद को छोड़ने का मन बना रहे हैं। धवन की नाराजगी की वजह उनका कम फीस होना बताया जा रहा है। कयास ये लगाया जा रहा है कि धवन अगले आइपीएल सीजन में मुंबई इंडियंस की तरफ से खेलते नजर आ सकते हैं। अगर ये ट्रांसफर सफल होता है तो वो अपने साथी ओपनर बल्लेबाज रोहित शर्मा के साथ मुंबई की टीम के लिए खेलते नजर आ सकते हैं।
एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक धवन अपनी आइपीएल फ्रेंचाइजी सनराइजर्स हैदराबाद से खुश नहीं हैं और उन्होंने इस टीम को छोड़ने की इच्छा जाहिर की है। हैदराबाद के साथ उनका अनुबंध अगले तीन वर्ष के लिए है लेकिन वो इसे लेकर चर्चा कर रहे हैं। ऐसी भी खबर आ रही है कि धवन की किसी बात पर टीम के कोच टॉम मूडी से भी बहस हो गई थी।
शिखर धवन को आरटीएम के जरिए हैदराबाद ने 5.2 करोड़ में खरीदा था वहीं विराट कोहली (17 करोड़), रोहित शर्मा (15 करोड़), महेंद्र सिंह धोनी (15 करोड़) को अपनी-अपनी फ्रैंचाइजी से मोटी रकम मिली थी। हैदराबाद ने डेविड वार्नर को 12 करोड़ जबकि तेज गेंदबाज भुवनेश्वर कुमार को 8.5 करोड़ की रकम देकर रिटेन किया था। अभी हाल ही में धवन ने एशिया कप में भारतीय टीम के लिए शानदार बल्लेबाजी की थी और मैन ऑफ द सीरीज बने थे। वैसे धवन मुंबई इंडियंस के लिए वर्ष 2009 और 2010 में खेले थे।


नई दिल्ली - भारत और वेस्टइंडीज के बीच पहले वनडे में मेहमान टीम के मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज शिमरोन हेटमायर ने तूफानी शतक जड़ ना केवल वेस्टइंडीज का स्कोर 250 के करीब पहुंचाया। इस बल्लेबाज ने केवल 78 गेंद पर 106 रन की पारी खेली। अपनी इस पारी में उन्होंने 6 चौके और 6 छक्के जड़े।
इस बल्लेबाज की तूफानी पारी से कई क्रिकेट दिग्गज उनसे प्रभावित दिखे। हरभजन सिंह ने तो यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि अगले आइपीएल में वह करोड़ों रुपए में बिक सकते हैं। हरभजन ने ट्वीटर पर हेटमायर की तारीफ करते हुए कहा कि जबरदस्त पारी, साल 2019 में वह आइपीएल में करोड़ों कमा सकते हैं।
हरभजन सिंह के अलावा पूर्व बल्लेबाज आकाश चोपड़ा भी इस पारी से काफी संतुष्ट दिखे, उन्होंने ट्वीट करते हुए कहा कि एक शानदार पारी, उन्होंने स्पिन और तेज गेंदबाजों की खूब पिटाई की। मैं उत्सुक हूं कि आइपीएल नीलामी में उनका क्या होगा।
इस बल्लेबाज ने सबसे ज्यादा रन रवींद्र जडेजा की गेंद पर बनाए, उन्होंने जड्डू की गेंद पर 37 रन बटोरे। वहीं शमी की गेंद पर उन्होंने 23 और चहल की गेंद पर 17 रन बटोरे।
इस बल्लेबाज ने अब तक 13 वनडे में 585 रन बनाए है। इस दौरान उनके नाम 3 शतक और 1 अर्धशतक दर्ज है। वनडे में इस बल्लेबाज का प्रदर्शन वैसे भी अच्छा रहा है। अब तक उन्होंने अपने वनडे करियर में 45 की औसत से रन बनाए है।
हेटमायर ने केवल 13वें मैच में अपना तीसरा शतक लगाया, इससे पहले किसी भी वेस्टइंडीज के बल्लेबाज ने इतने कम मैचों में अपने पहले तीन शतक लगाए थे। हेटमायर से पहले जॉनसन चार्ल्स ने 13 मैच में 2 शतक लगाए थे। वहीं विवियन रिचर्ड्स को अपने पहले तीन शतक लगाने के लिए 16 वनडे लगे थे, वहीं महान बल्लेबाज ब्रायन लारा ने तो इसके लिए 45 वनडे खेले थे।


नई दिल्ली - टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज इस साल कैंपस से लगभग 28 हजार स्टूडेंट्स को नौकरी देगी। कैंपस प्लेसमेंट का कंपनी का पिछले तीन सालों का यह सबसे बड़ा आंकड़ा होगा। बीते दो वर्षों में कंपनी ने हर साल लगभग 20 हजार फ्रेशर्स को नौकरी के मौके दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी के ग्लोबल ह्यूमन रिसोर्सेज के हेड और एग्जिक्यूटिव वीपी अजय मुखर्जी ने कहा कि बिजनेस और ग्रोथ के लिहाज से हमें अच्छी मांग दिख रही है। इस साल की पहली छमाही में हम 16 हजार लोग भर्ती कर चुके हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सितंबर तिमाही में कंपनी में 10,227 नए कर्मचारी जुड़े। यह पिछली 12 तिमाही में सबसे बड़ी संख्या है। इस दौरान पुराने कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर 10.9 फीसद रही। इसे लेकर कंपनी के सीईओ राजेश गोपीनाथन ने बताया कि टैलेंट को अपने साथ बनाए रखने के मामले में कंपनी का स्टैंडर्ड काफी अच्छा है। कंपनी ने बताया कि सभी क्षेत्रों में ऑनसाइट हायरिंग पॉजिटिव रही है। अजय मुखर्जी ने कहा कि हम मल्टी-लोकेशन टीम पर फोकस कर रहे हैं। टीसीएस ने लोकेशन को लेकर स्वतंत्र रणनीति अपनाई है।
कंपनी की अच्छी ग्रोथ की वजह बैंकिग, फाइनेंशियल सर्विसेज एंड इंश्योरेंस और रिटेल जैसे सेक्टरों में आए बदलाव को माना जा रहा है। कंपनी ने सितंबर तिमाही में अपने कर्मचारियों को 100 फीसद तिमाही वेरिएबल अलाउंस दिया है। बता दें कि टाटा ग्रुप की टीसीएस देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी है।
टीसीएस के खास स्किल वाले नए कर्मचारियों की सैलरी हुई दोगुनी
टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने खास स्किल वाले नए कर्मचारियों को दोगुनी सैलरी दी है। टीसीएस ने डिजिटल स्किल वाले कर्मचारियों को करीब 6.5 लाख की सैलरी ऑफर की है। बता दें कि पिछले कई सालों से आईटी कंपनियों में भारतीय इंजीनियरों की शुरुआती सैलरी सालाना करीब 3.5 लाख पर स्थिर है। कंपनी ने आधुनिक स्किल पर महारत रखने वाले 1,000 फ्रेशर को यह सैलरी ऑफर की है। ये सभी नए जमाने की डिजिटल स्किल में महारत रखते हैं। इनका चुनाव भी नए स्किल के आधार पर की गई है।


नई दिल्ली - आमतौर पर लोग आईडी या एड्रेस प्रूफ के लिए वोटर कार्ड, आधार और पैन कार्ड इस्तेमाल करते हैं। कई बार लोगों के पास इनमें से कोई डॉक्युमेंट नहीं होता है। इसलिए उन्हें अपनी पहचान या एड्रेस साबित करने में मुश्किलें आती हैं। बता दें कि इन तीनों डॉक्युमेंट्स के अलावा कई ऐसे डॉक्युमेंट्स हैं जिन्हें सरकार ने आईडी और एड्रेस प्रूफ के लिए मान्यता दे रखी है। आइए जानते हैं ये कौन से डॉक्युमेंट्स हैं।
आईडी प्रूफ के लिए आप ये डॉक्युमेंट इस्तेमाल कर सकते हैं
-ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, पासपोर्ट
-सरकार द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त शिक्षा संस्थानों से जारी फोटो आईडी (केवल छात्रों के लिए)
-MP या MLA या ग्रुप ए गजटेड ऑफिसर के लेटर पैड पर फोटो सहित जारी किया गया एड्रेस प्रूफ सर्टिफिकेट
-सरपंच या उसके समकक्ष अथॉरिटी द्वारा जारी फोटो किया गया आईडी सर्टिफिकेट
-डाक विभाग से जारी फोटो एड्रेस कार्ड, बैंक या डाकघर की पासबुक
-पैरामिलिट्री या सीएसडी या डिफेंस से जारी स्‍मार्ट कार्ड
-केन्‍द्र सरकार, राज्‍य सरकार या पीएसयू द्वारा जारी फोटो आईडी कार्ड
-राज्‍य सरकार द्वारा जारी किया गया जाति प्रमाण पत्र और आवास प्रमाण पत्र
-फोटो वाला पेंशनर कार्ड, फोटो वाला फ्रीडम फाइटर कार्ड
-किसान पासबुक, फोटो क्रेडिट कार्ड, हथियार का लाइसेंस
इनमें से कुछ डॉक्युमेंट्स ऐसे हैं जिन्हें आप आईडी के साथ-साथ एड्रेस प्रूफ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। उनके अलावा एड्रेस प्रूफ के लिए आप नीचे दिए गए डॉक्युमेंट्स भी इस्तेमाल कर सकते हैं-
-पिछले तीन महीनों का पानी, टेलीफोन या बिजली का बिल
-व्हीकल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट
-इनकम टैक्‍स असेसमेंट ऑर्डर
-रजिस्‍टर्ड सेल या लीज का एग्रीमेंट
-डाक विभाग से जारी फोटो एड्रेस कार्ड, बैंक या डाकघर की पासबुक
-केन्‍द्र सरकार, राज्‍य सरकार या पीएसयू द्वारा जारी एड्रेस समेत फोटो आईडी कार्ड
-तीन महीने का क्रेडिट कार्ड स्‍टेटमेंट
-सरकार द्वारा जारी जाति व आवास प्रमाण पत्र, जिसमें एड्रेस लिखा हो
-एड्रेस के साथ पेंशनर कार्ड, किसान पासबुक और फ्रीडम फाइटर कार्ड

 


बोस्टन - चंद्रमा से धरती पर गिरा एक दुर्लभ पिंड अमेरिका में एक नीलामी में छह लाख 12 हजार 500 डॉलर (करीब 4.5 करोड़ रुपये) में बिका। 5.5 किलोग्राम वजन का यह पिंड या पत्थर छह टुकड़ों से मिलकर बना है, जिन्हें किसी रहस्यमय पहेली की तरह एक-दूसरे से जोड़कर रखा गया है। 'बुआग्बा' या 'मून पजल' के नाम से चर्चित इस उल्कापिंड को वैज्ञानिकों ने एनडब्ल्यूए 11789 नाम दिया है।
इसे पिछले सा अफ्रीका के रेगिस्तान में खोजा गया था। माना जाता है कि बहुत पहले किसी उल्कापिंड की टक्कर के कारण यह चंद्रमा से अलग हो गया होगा। इसके बाद यह 3,84,400 किलोमीटर की दूरी और पृथ्वी के वायुमंडलीय घर्षण को पार करते हुए उत्तर-पश्चिमी अफ्रीका के रेगिस्तान में आ गिरा। यह खगोलीय पिंड अभी तक का सबसे बड़ा चांद का टुकड़ा है। नीलामी संस्था आरआर ऑक्सन के अनुसार, इस अद्भुत पिंड को वियतनाम के टैम चुक पैगोडा कॉम्प्लेक्स ने सबसे ज्यादा बोली लगाकर खरीदा।

 


वाशिंगटन - अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने करीब तीन दशक पहले रूस के साथ हुए परमाणु हथियार नियंत्रण समझौते को जल्द खत्म करने का एलान किया है। ट्रंप ने कहा कि इंटरमीडिएट-रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज समझौते का रूस लगातार उल्लंघन कर रहा है। ऐसे में अमेरिका अकेले इसका भार नहीं ढो सकता।
1987 में हुआ था समझौता
दोनों देशों के बीच 1987 में हुआ यह समझौता अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। इस पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और उनके रूसी समकक्ष मिखाइल गोर्बाच्योव ने दस्तखत किए थे।
क्‍या है संधि
इस समझौते के तहत दोनों देश सतह से दागी जाने वाली 500 से 5500 किलोमीटर रेंज वाली मिसाइलों का निर्माण या परीक्षण नहीं कर सकते। लेकिन, कुछ वर्ष पहले रूस ने नोवाटर मिसाइल लांच की थी। अमेरिका का मानना है कि यह मिसाइल प्रतिबंधित रेंज वाली है।
अमेरिका ने जताया विरोध
इस मिसाइल को लेकर रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) के अधिकारियों को आगाह करते हुए कहा था कि यदि रूस नोवाटर मिसाइल वापस नहीं लेता है तो इस समझौते को बरकरार नहीं रखा जा सकेगा।
बराक ओबामा पर भी निशाना
ट्रंप ने शनिवार को यहां पत्रकारों से बातचीत में कहा, 'हम इस समझौते को खत्म करने जा रहे हैं। सभी देश हथियार बना रहे हैं तो हमें भी उस रेंज के हथियार बनाने होंगे।' ट्रंप ने समझौते के उल्लंघन पर चुप्पी साधने के लिए पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता कि बराक ने समझौता क्यों नहीं तोड़ा? यदि चीन और रूस समझदारी दिखाकर ऐसे हथियार नहीं बनाने का समझौता करें तो मुझे खुशी होगी, लेकिन जब तक इसका उल्लंघन हो रहा है अमेरिका इसका अकेले पालन नहीं करेगा।'

 


नई दिल्ली - अफगानिस्तान में निम्न सदन के लिए मतदान की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। जल्द ही इसके नतीजे भी आ जाएंगे। लेकिन अफगानिस्तान में नवोदित लोकतंत्र के लिए तालिबान हमेशा खतरों के बादल की तरह मंडराता रहा है। ऐसे में यहां सत्ता के लिए निर्वाचित सरकार बनाम तालिबान का संघर्ष चलता रहा है। हालांकि, यह दावा किया जाता रहा है कि अफगानिस्तान को तालिबान के नियंत्रण से मुक्त करा लिया गया है, लेकिन तालिबान अभी भी अफगानिस्ताान में सक्रिय है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि भारत में अफगानिस्तान की लाेकतांत्रिक सरकार और लोकतंत्र कितना उपयोगी है। यहां तालिबान हुकूमत से भारत को क्या नुकसान है। इसके साथ यह भी जानेंगे कि पाकिस्ता्न की सियासत पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा।
अफगानिस्तान के लोकतंत्र में छिपा है भारत का हित
भारत के लिए लोकतांत्रिक अफगानिस्तांन ज्यादा मुफीद है। यही वजह है कि लोकतंत्र की बहाली के बाद भारत ने यहां बड़े पैमाने पर निवेश किया है। यहां के मौजूदा राष्ट्रपति अशरफ ग़नी का भी जोरदार समर्थन किया है। दरअसल, यहां के पुनर्निमाण में भारत ने लगभग ढाई अरब डॉलर का निवेश किया है। इसलिए भारत कभी नहीं चाहेगा कि वहां पर तालिबान मज़बूत हो या वह सत्ता में आए। यही वजह है कि भारत प्रत्येक मंच से अफ़गानिस्तान में लोकतंत्र का पुरजोर हिमायत करता रहा है। भारत ने खुलकर यहां की लोकतांत्रिक सरकार का समर्थन किया है, ऐसे में यह भी आशंका प्रकट की जाती रही है कि भारत के तालिबान विरोध में वह कश्मीर को निशाना बना सकता है। लेकिन इस आशंका को भारत ने नजरअंदाज करते हुए निर्वाचित सरकार का समर्थन व उसकी मदद की है।
तालिबान को लेकर पाकिस्तानन की दुविधा
तालिबान को लेकर पाकिस्तान हुकूमत शुरू से दुविधा में रही है। इसलिए पाकिस्तान सरकार का यहां की लोकतांत्रिक सरकार को लेकर स्टैंड बहुत साफ नहीं है। पाकिस्तान पर आरोप लगते रहे हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का समर्थन करता है। लेकिन यह सत्य है कि यदि काबुल में तालिबान मजबूत हुआ तो पाकिस्तान की मुश्किलें बढ़ेंगी। ऐसा माना जाता रहा है कि अगर यहां तालिबान मजबूत हुआ तो पाकिस्तान में स्थिरता नहीं आएगी। पाक में आतंकियों का हस्तक्षेप बढ़ेगा। पेशावर आर्मी स्कूल हमले के बाद पाकिस्तान में तालिबान को लेकर और नफरत बढ़ी है। ऐसे में नई पाकिस्तानी सरकार के सामने तालिबान से संबंधों को लेकर दुविधा बढ़ेगी।
बेअसर रही तालिबान की धमकी
तालिबान के तमाम अवरोधों, धमकियों और हिंसा के बीच अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव संपन्न हुए। चुनाव के दौरान हुई हिंसा में 28 से अधिक लोगों की मौत हुई, लेकिन हिंसा के बीच यहां की जनता ने चुनाव में बढ़-चढ़कर‍ हिस्सा लिया। करीब 30 लाख लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। मतदान प्रतिशत को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यहां तालिबानी व्यवस्था से लोगों का मोहभंग हुआ है। अफगानिस्तान की जनता की लोकतंत्र के प्रति आस्था बढ़ रही है। अफगानिस्तान में 2001 में पहली बार चुनाव हुआ और एक लोकतांत्रिक सरकार का गठन हुआ।
यहां तालिबान ने लोगों को चुनाव में भाग नहीं लेने की चेतावनी दी थी, इसके बावजूद लोगों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्साा लिया। खास बात यह है कि यहां के ऐसे प्रांतों में जहां तालिबान का दखल ज्यादा है और सुरक्षा की स्थिति बेहतर नहीं है, वहां बड़ी संख्या में लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया। उधर, संयुक्त राष्ट्र ने चुनाव में बड़ी संख्या में लोगों के वोट डालने की सराहना की है।
हिंदू और सिख के लिए सीट आरक्षित
बता दें कि अफगानिस्तान के निचले सदन की 250 सीटों के लिए हुए चुनाव में 2,566 उम्मीदवार मैदान में थे। अफगानिस्तान में सिख और हिंदू समुदाय की तादाद को देखते हुए सदन में उनको प्रतिनिधित्व देने की पहल की गई। इस चुनाव में पहली बार अफ़ग़ानिस्तान के सिख और हिंदू समुदाय के लिए भी सीट आरक्षित की गई। सिख और हिंदू समुदाय के लोगों को एक-एक सीट आरक्षित है।
महिलाओं के लिए 40 से ज़्यादा सीटें आरक्षित
राजनीतिक रूप से अफगानिस्ताान में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर हुई है। यहां के निम्न सदन में महिलाओं के लिए 40 से ज़्यादा सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा जिन महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा वोट मिलेंगे वो भी संसद के लिए चुनी जाएंगी यानी महिलाओं की संख्या 40 से ज़्यादा भी हो सकती है। इस लिहाज से अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति पाकिस्तान और कजाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा बेहतर है। इतनी महिला सांसद न तो पाकिस्तान में हैं और न ही कज़ाकिस्तान में हैं। अफ़गानिस्तान में महिलाअों की हिस्सेदारी सर्वत्र है। सरकार में कई महिलाएं मंत्री और उपमंत्री हैं व कई राजदूत हैं।


दुबई - सऊदी अरब मध्य एशिया में लंबे समय से अमेरिका का एक प्रमुख सहयोगी रहा है। इस सहयोग का बड़ा कारण सुरक्षा संबंधी चिंताएं और तेल है, लेकिन एक तथ्य यह भी है कि उनके कूटनीतिक रिश्ते इतने सहज-सरल नहीं रहे हैं। दोनों देशों ने 1940 में अपने कूटनीतिक रिश्ते कायम किए थे। यह द्वितीय विश्व युद्ध का शुरुआती दौर था। 14 फरवरी 1945 को अमेरिका और सऊदी अरब ने अपने सहयोग को एक समझौते के जरिये नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। तब सऊदी अरब के किंग अब्देल अजीज बिन सऊद और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन डी. रूजवेल्ट के बीच स्वेज नहर में क्रूजर यूएसएस क्विंसी के बोर्ड पर ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी।
अमेरिका ने दी सुरक्षा की गारंटी
उस दौरान हुए समझौते के तहत अमेरिका ने सऊदी किंगडम को सुरक्षा की गारंटी दी और इसके बदले में अमेरिका को सऊदी अरब में तेल भंडारों तक विशेष पहुंच हासिल हुई। इन विशाल तेल भंडारों की खोज पिछली सदी के तीसरे दशक में हुई थी। तभी से अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्ते स्थिर तरीके से आगे बढ़ते रहे। जब अगस्त 1990 में इराकी शासक सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर हमला किया तब रियाद ने लाखों अमेरिकी सैनिकों को सऊदी अरब में तैनात होने की इजाजत दी।
सद्दाम को सत्ता से हटाने के लिए लड़ा युद्ध
अमेरिका के नेतृत्व वाली गठबंधन सेना ने सद्दाम को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए 1991 में खाड़ी युद्ध शुरू किया तो सऊदी अरब ही साझा सेना का सैन्य बेस था। इराक युद्ध के बाद भी गठबंधन सेना ने सऊदी अरब में लड़ाकू विमानों की तैनाती जारी रखी। यह सब दक्षिणी इराक में नो फ्लाई जोन बनाए रखने के लिए किया गया। इससे सऊदी अरब के कट्टरपंथी तत्व अमेरिका से नाराज हुए। इसका नतीजा यह हुआ कि इन तत्वों ने नौवें दशक के मध्य में सऊदी अरब की धरती पर दो अमेरिका विरोधी हमले किए।
सऊदी पर चोरी-छिपे पैसे उपलब्ध कराने के आरोप
11 सितंबर 2001 की आतंकी घटना ने अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों को तगड़ा झटका दिया। इस हमले में 19 विमान अपहर्ता शामिल थे। इनमें से 15 सऊदी अरब के नागरिक थे। सऊदी अरब ने इन हमलों की निंदा की, लेकिन उस पर यह आरोप भी लगे कि वह इस्लामिक चरमपंथी तत्वों को चोरी-छिपे पैसे उपलब्ध करा रहा है। 2001 के अंतिम दिनों में रियाद ने अफगानिस्तान के खिलाफ अमेरिकी हमलों में शामिल होने से भी इन्कार कर दिया। इसके बाद उसने 2003 के इराक युद्ध में भी भाग नहीं लिया। हालांकि इसके बावजूद अमेरिका ने एक बार फिर सद्दाम के खिलाफ हवाई हमलों के लिए सऊदी अरब की धरती का इस्तेमाल किया। इराक युद्ध के बाद अमेरिका ने ज्यादातर अपने सैनिकों को सऊदी अरब से निकाल कर कतर में तैनात कर दिया। कतर ही खाड़ी में अमेरिका के एयर ऑपरेशन का मुख्यालय है। इस फैसले के बावजूद का सहयोग कायम रहा।
असद के खिलाफ सीरिया में विद्रोह का भी समर्थन
रियाद ने राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ सीरिया में विद्रोह का भी समर्थन किया और उस समय अपनी नाराजगी भी नहीं छिपाई जब सितंबर 2013 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा बशर की सत्ता के खिलाफ हवाई हमले के अपने संकल्प से पीछे हट गए। उसी साल अक्टूबर में सऊदी अरब ने सीरियाई संकट को लेकर अमेरिका और कुछ अन्य देशों के रुख के विरोध में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में अस्थाई सदस्यता स्वीकार करने से भी मना कर दिया। 2015 में ईरान के साथ अमेरिका ने जो नाभिकीय समझौता किया वह भी सऊदी अरब को रास नहीं आया। यह ओबामा प्रशासन में सऊदी अरब के घटते विश्वास का एक और प्रमाण था।
ईरान को लेकर भी बदला है ट्रंप का रुख
ओबामा प्रशासन के साथ रिश्तों में खटास के वातावरण को बदलने के लिए ही सऊदी अरब के नेताओं ने अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत का स्वागत किया। मई 2017 में ट्रंप ने जब सऊदी अरब का दौरा किया तो वहां के सुन्नी शासकों ने उनका जोरदार स्वागत किया। ट्रंप का रुख ईरान को लेकर भी बदला है और यह सऊदी अरब के अनुकूल है। तेहरान और इस्लामिक कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाने के लिए अमेरिका और सऊदी अरब ने एक बड़ा सैन्य समझौता भी हाल में किया है। इस सबके बीच सऊदी पत्रकार जमाल खशोगी की गुमशुदगी के मामले ने अमेरिका और सऊदी अरब के बीच तनाव को बहुत बढ़ा दिया है। हालांकि सऊदी अरब ने माना है खाशोगी की हत्‍या उनके दूतावास में ही हुई है।
पांच सऊदी अधिकारी बर्खास्त
इस बीच, सऊदी किंग सलमान ने इस घटना के सिलसिले में पांच अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है। इनमें शाही दरबार के सलाहकार और क्राउन प्रिंस के बेहद विश्वस्त माने जाने वाले सौद अल कहतनी और उप-खुफिया प्रमुख अहमद असीरी शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने खुफिया एजेंसी के पुनर्गठन के लिए प्रिंस मोहम्मद की अध्यक्षता में एक मंत्रिमंडलीय समिति भी गठित की है। इससे साफ है कि क्राउन प्रिंस के पास व्यापक अधिकार बने रहेंगे।
सहयोग के बाद भी इसको स्‍‍‍‍वीकार नहीं किया जा सकता
ऐरीजोना में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ‘सऊदी अरब अच्छा सहयोगी रहा है, लेकिन जो कुछ हुआ है वह अस्वीकार्य है।’ उन्होंने कहा कि इस संबंध में वह क्राउन प्रिंस से बात करेंगे। साथ ही उन्होंने ईरान से निपटने में और सऊदी अरब को बड़ी मात्र में हथियार बिक्री से पैदा होने वाले रोजगार को लेकर उसकी महत्ता का उल्लेख भी किया। हालांकि सऊदी घोषणा से पहले उन्होंने कहा था कि अगर खशोगी की हत्या में सऊदी अरब का हाथ हुआ तो उस पर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

 

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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