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रांची। लालू की परेशानियां तो जैसे कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं। एक पर एक वे लगातार समस्‍याओं से घिरे रह रहे हैं। रांची के रिम्‍स में इलाजरत चारा घोटाले के चार मामलों में सजा काट रहे राजद सुप्रीमो और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद एक तरफ कई गंभीर बीमारियों से जंग लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ रेलवे घोटाले में दिल्‍ली की पटियाला कोर्ट ने उनको वीडियो कां‍फ्रे‍ंसिंग के जरिये हाजिर होने का अादेश दिया है।पहले बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की अपनी पत्‍नी ऐश्‍वर्या राय से तलाक लेेने की जिद पर अड़े रहने को लेकर वे लगातार तनाव में थे। तो अब उनकी बीमारी क्रॉनिक किडनी दिन ब दिन स्‍टेज थ्री से स्‍टेज फोर की ओर बढ़ रही है। शुगर लेवल में लगातार उतार-चढ़ाव हो रहा है। क्रिटनीन का लेवल भी खतरनाक स्‍तर पर है।जबकि इंफेक्‍शन भी बढ़ता जा रहा है। इधर रेलवे घोटाले में अदालत में पेश नहीं होने के कारण सोमवार को सीबीआइ को कड़ी फटकार लगी है। ऐसे में 20 दिसंबर को तय अगली पेशी की तारीख पर लालू प्रसाद यादव को हर हाल में सुनवाई के लिए उपलब्‍ध कराना अब सीबीआइ की प्राथमिकता हो गई है।बता दें कि आइआरसीटीसी से जुड़े घोटाले में सीबीआइ ने लालू प्रसाद यादव को आरोपित बनाया है। कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्रीय जांच एजेंसी को आदेश दिया गया कि वह रांची के रिम्‍स के पेइंग वार्ड में रहकर इलाज करा रहे लालू को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित कराने के लिए समुचित व्यवस्था करे।इधर बिरसा मुंडा जेल होटवार के जेल अधीक्षक ने इस बारे में कहा कि लालू की पेशी का आदेश मिलते ही उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था कराई जाएगी। वहीं दूसरी ओर रिम्‍स के डॉक्‍टरों का कहना है कि लालू की हालत पर नजदीकी नजर रखी जा रही है। उनकी सेहत में सुधार हो रहा है। 20 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई तक अगर लालू यादव स्‍वस्‍थ रहेंगे तो वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये कोर्ट में पेश होंगे।
लालू का मटन, चिकन बंद : रिम्‍स में भर्ती लालू प्रसाद की सेहत पर चिकित्‍सकों का पूरा ध्‍यान है। उनकी खराब तबीयत को देखते हुए डायबिटीज पर नियंत्रण की खातिर खान-पान का विशेष ख्याल रखने का निर्देश दिया गया है। उनके भोजन की सूची भी बदली गई है। नए डायट चार्ट के मुताबिक मटन, चिकन बंद कर दिया गया है। थोड़ी मात्रा में मछली और एक अंडा खाने की अनुमति लालू को दी गई है।

 

जालंधर।अमृतसर में हुए धमाकों के तार कहीं कुख्यात कश्मीरी आतंकी जाकिर मूसा और जालंधर के मकसूदां थाने में हुए धमाकों से तो नहीं जुड़ें हैं। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां जांच के इस एंगल को नजरअंदाज नहीं कर सकती हैं क्योंकि मूसा ने पंजाब में आतंक फैलाने के लिए 24 हैंड ग्रेनेड भेजे हैं। इसका खुलासा मकसूदां मामले में जालंधर से गिरफ्तार कश्मीरी स्टूडेंट्स शाहिद कयूम और फैजल बशीर से पूछताछ में हुआ था। मकसूदां थाने में चार हैंड ग्रेनेड फेंके गए थे। बाकी 20 हैंड ग्रेनेड कहां हैं, यह अब भी पुलिस के लिए रहस्य है। ऐसे में इस आशंका से इनकार नहीं कर सकते कि कहीं इसी खेप के ग्रेनेडों का इस्तेमाल अमृतसर में तो नहीं हुआ है।
मकसूदां ब्लास्ट;-मकसूदां ब्लास्ट से जुड़े कश्मीरी आतंकवादियों की जानकारी जुटाने के लिए जालंधर का दौरा कर चुके जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने दावा किया है कि जो ग्रेनेड मकसूदां में इस्तेमाल किए गए थे, उन्हें आतंकी छोटा ग्रेनेड कहते हैं। आतंकी इनका छोटा धमाका कर बड़ी सुर्खियां बटोरने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं। ये ग्रेनेड इकट्ठे 24 की चाइनीज पैकिंग में आते हैं। इसलिए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अमृतसर में फेंके गए हैंड ग्रेनेड मूसा के भेजे बचे 20 ग्रेनेड में से हों।
कयूम और फैजल को पता है राज!:-कयूम और फैजल को गिरफ्तार करने के बाद से जालंधर पुलिस लगातार उनसे पूछताछ कर रही है कि बाकी ग्रेनेड आखिर कहां गए। पुलिस फिलहाल दोनों से कुछ भी उगलवा पाने में नाकाम रही है। रविवार को भी दोनों आरोपितों से जालंधर पुलिस की पूछताछ जारी रही। पुलिस ने दोनों आरोपितों से मूसा और ग्रेनेड से संबंधित दो दर्जन से अधिक सवाल के जवाब एक दूसरे से अलग अलग बिठा कर हासिल किए। जवाब में दोनों ने अलग अलग कहानियां सुनाई फिर उन्हीं सवालों को दोनों आरोपितो को आमने-सामने बिठा कर दोबारा पूछा गया। पुलिस को यकीन है कि दोनों शातिर कुछ न कुछ तो ऐसा छिपा रहे हैं, जिनका संबंध बाकी ग्रेनेड से है।
एनआईए भी कर चुकी है पूछताछ;-इससे पहले राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनआइए) भी दिल्ली से जालंधर आकर दोनों आरोपितों से पूछताछ कर चुकी है। एजेंसी अब जालंधर पुलिस की पूछताछ पर पल-पल की नजर रखे हुए है। पुलिस को उम्मीद है कि दोनों आरोपितों से बाकी ग्रेनेड के बारे में कोई न कोई सुराग जरूर हासिल होगा।
गिरफ्तार किए गए थे दो छात्र:-4 सितंबर को मकसूदां थाने में ब्लास्ट के मामले में पुलिस ने जालंधर के सेंट सोल्जर कालेज में सिविल इंजीनियरिंग कर रहे दो छात्रों 22 वर्षीय शाहिद कयूम और 23 वर्षीय फाजिल बशीर को गिरफ्तार किया था। उनके दो साथी रउफ अहमद उर्फ रउफ और मीर उमर रमजान उर्फ गाजी फरार हैं। जांच में सामने आया था कि कयूम और बशीर करीब दो साल से जालंधर में पढ़ रहे थे। मकसूदां में ही दोनों एक पीजी में रहते थे। दोनों आंतकी संगठन अंसार-गजावत-उल-हिंद के सरगना जाकिर रशीद भट्ट उर्फ जाकिर मूसा के साथी हैं। मूसा और उसके राइट हैंड आमिर ने ही दोनों को कश्मीर में आतंकी ट्रेनिंग दी थी। वहीं रउफ और मीर कश्मीर में रहते हैं और फरार हैं।
जालंधर में फैला आतंकी नेटर्वक;-पुलिस ने 10 अक्टूबर को सीटी कालेज के हॉस्टल से मूसा के भाई रफीक बट सहित चार कश्मीरी छात्रों को गिरफ्तार किया था। इनसे एक एके-56 और विस्फोटक पदार्थ बरामद हुए थे। इस मामले की जांच जारी है। इससे पहले अप्रैल में पुलिस इंटरनेट पर आतंकी संगठनों का प्रचार करने के आरोप में सेंट सोल्जर कॉलेज से दो कश्मीरी छात्रों को गिरफ्तार कर चुकी है। इन गिरफ्तारियों से स्पष्ट है कि आतंकियों केस्लीपर सेल जालंधर और पंजाब में सक्रिय हैं। अब देखना यह है कि कितनी जल्दी पुलिस और खुफिया एजेंसियों के हाथ अमृतसर में धमाका करने वाले आतंकियों के गिरेबान तक पहुंचते हैं।

जयपुर। कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को कड़ी टक्कर देने के लिए भाजपा ने टोंक विधानसभा क्षेत्र से अपने अधिकृत प्रत्याशी का टिकट बदल कर राज्य के परिवहन मंत्री युनूस खान को मैदान में उतार दिया है। सचिन पायलट ने टोंक से नामांकन भर दिया है। टोंक मुस्लिम बहुल सीट है। ऐसे में झालरापाटन में वसुंधरा राजे और मानवेंद्र सिंह के बाद टोक भी राजस्थान की हॉट सीट हो गई है, जहां कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के सामने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सबसे खास मंत्री युनूस खान मैदान में होंगे। इसके साथ ही राजस्थान भाजपा ने नामांकन के अंतिम दिन सोमवार सुबह अपने प्रत्यशियों की आखिरी सूची भी जारी कर दी।इस सूची में आठ नाम हैं। पार्टी ने टोंक में टिकट बदलने के साथ ही खेरवाड़ा सीट से भी प्रत्याशी बदला है। यहां शंकर लाल अहारी का टिकट बदल कर नानालाल अहारी को दिया गया है। इसके अलावा इस अंतिम सूची में एक और मंत्री पुत्र मोहित यादव को टिकट दिया गया है। मोहित यादव सरकार के श्रम मंत्री जवसंत यादव के बेटे है। उन्हें जवसंत यादव की जगह बहरोड से टिकट दिया गया है। पार्टी ने एक आइएएस अधिकारी ओपी सैनी को भी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दिला कर करौली से उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा केकड़ी से मौजूदा विधायक और संसदीय सचिव शत्रुघ्न गौतम का टिकट काट कर राजेंद्र विनायका को टिकट दिया गया है।
आखिरी समय हुआ युनूस के टिकट का फैसला :-राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सबसे नजदीकी मंत्रियों में गिने जाने वाले युनूस खान के टिकट का फैसला अंतिम समय में हुआ। वे राजस्थान में भाजपा के एक मात्र मुस्लिम प्रत्याशी बने हैं। यूनुस खान की परंपरागत सीट डीडवाना है, लेकिन टोंक से पायलट के मैदान में उतरने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति बदलते हुए उन्हें टोंक से उतारा है। टोंक में अल्पसंख्यक मतदाता बड़ी तादाद में है। टोंक से पार्टी पहले अजीत सिंह मेहता को अपनी पहली सूची में ही प्रत्याशी घोषित कर चुकी थी। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों में उन्हें वहां से हटाकर यूनुस खान को आगे मैदान में उतारा गया है।पार्टी सूत्रों का कहना है कांग्रेस ने वसुंधरा राजे के सामने पूर्व रक्षा मंत्री जवसंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र सिंह को नहीं उतारा होता तो शायद टोंक में प्रत्याशी नहीं बदला जाता। हालांकि खुद मुख्यमंत्री राजे युनूस को टिकट देने के लिए अड़ी हुई थीं। ऐसे में जैसे ही राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं युनूस खान के टिकट के लिए रास्ता साफ हो गया। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पायलट कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा रहे हैं। सचिन पायलट को घेरने के लिए यूनुस खान को भाजपा का ट्रंप कार्ड माना जा रहा है। खुद कांग्रेस यहां से अब तक मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट देती आई है। ऐसे में अब भाजपा की ओर से मुस्लिम प्रत्याशी आने से इस सीट का मुकाबला काफी रोचक हो गया है।
भाजपा की प्रत्याशियों की पांचवीं सूची में इन्हें मिला टिकट
कोटपूतली से मुकेश गोयल
बहरोड़ से मोहित यादव
करौली से ओपी सैनी
टोंक से यूनुस खान
केकड़ी से राजेंद्र विनायका
डीडवाना से जितेंद्र सिंह जोधा
खींवसर से रामचंद्र उत्ता
खेरवाड़ा से नानालाल अहारी
- ये हैं राजस्थान में भाजपा के 200 प्रत्याशी
1- सादुलशहर - गुरवीर सिंहह बराड
2- सूरतगढ़- रामप्रताप कासनिया
3- रायसिंह नगर अजा- बलवीर सिंह
4- हनुमानगढ- रामप्रताप
5- पीलीबंगा - धर्मेंद्र मोची
6- नोहर- अभिषेक मटोरिया
7- भादरा- संजीव कुमार
8- खाजूवाला - विश्वनाथ
9- बीकानेर पूर्व- सिद्धी कुमारी
10- कोलायत- पूनम कंवर
11- लूणकरणसर- सुमीत गोदारा
12- सादुलपुर - रामसिंह कस्वां
13- सिरोही - ओटाराम
14- आबू पिण्डवाडा- सामाराम गरासिया
15- रेवदर- जगसीराम
16- गोगुंदा अजजा- प्रतापलाल गमेती
17- झाडोल - बाबूलाल खाडी
18- खेरवाडा- नानालाल अहारी
19- उदयपुर ग्रामीण- फूल सिंह मीणा
20- उदयपुर- गुलाब चंद कटारिया
21- मावली -धर्मनारायण जोशी
22- सलूंबर - अमृत लाल
23- धरियावाद - गौतमलाल
24- डूंगरपुर - माधवलाल वराहत
25- आसपुर -गोपीचंद मीणा
26- सागवाडा -शंकर लााल डेचा
27- चोरासी - सुशील कटारा
28- घाटोल - हरेंद्र नीनामा
29- बागीदौरा- खेमराज गरासिया
30- कुशलगढ़ - भीभाभाई
31- बेगूं- सुरेश धाकड़
32- चित्तौड़- चंद्रभान सिंह आक्या
33-निम्बाहेड़ा- श्रीचंद्र कपलानी
34- बडी सादड़ी- ललित ओसतवाल
35- प्रतापगढ़ - हेमंत मीणा
36- भीम - हरिसिंह रावत
37-कुम्भलगढ़- सुरेंद्र सिंह राठौड़
38- राजसमंद - किरण माहेश्वरी
39- भरतपुर- विजय बंसल
40- नदबई- कृष्णेंद्र कौर दीपा
41- वैर- रामस्वरूप कोली
42- बयाना- रितु बनावत
43- बाड़ी- जसवंत गुर्जर
44- धौलपुर- शोभारानी कुशवाहा
45- सपोटरा- गोलमा देवी
46- लालसोट- रामविलास मीणा
47- बामनवास- राजेंद्र मीणा
48- खंडार- जितेंद्र गोठवाल
49- मालपुरा- कन्हैया लाल चैधरी
50- टोंक- युनूस खान
51- देवली-उनियारा- राजेंद्र गुर्जर
52- किशनगढ़- विकास चैधरी
53- पुष्कर- सुरेश सिंह रावत
54- अजमेर उत्तर-वासुदेव देवनानी
55- अजमेर दक्षिण्ा- अनिता भदेल
56- नसीराबाद- रामस्वरूप लाम्बा
57- ब्यावर- शंकर सिंह रावत
58- मसूदा- सुशील कंवर पलाड़ा
59- लाडनूं- मनोहर सिंह
60- जायल- मंजू बाघमार
61- नागौर- मोहन राम चौधरी
62- मेडता- भंवराराम रिठारिया
63- डेगाना- अजय सिंह
64- परबतसर- मानसिंह किनसरिया
65- नावां- विजय सिंह चैधरी
66- जैतारण- अविनाश गहलोत
67- सोजत- शोभा चैहान
68- पाली- ज्ञानचंद पारख
69- मारवाड़ जंक्शन- केसाराम चैधरी
70- बाली- पुष्पेंद्र सिंह
71- फलौदी- पब्बाराम
72- लोहावट- गजेंद्र सिंह खींवसर
73- ओसियां- बेरा राम चैधरी
74- भोपालगढ- कमसा मेघवाल
75- सरदारपुरा- शंभुसिंह खेतासर
76- जोधपुर- अतुल भंसाली
77- सूरसागर- सूर्यकांता व्यास
78- लूणी- जोगराम पटेल
79- बिलाडा- अर्जुनलाल गर्ग
80- बाड़मेर- कर्नल सोनाराम
81- बायतु- कैलाश चौधरी
82- पचपदरा- अमराराम
83- सिवाना- हम्मीर सिंह भायल
84- गुढामलानी- लादूराम विश्नोई
85- आहोर- छगन सिंह राजपुरोहित
86- जालौर- जोगेश्वर गर्ग
87- भीनमाल- पूराराम चौधरी
88- सांचैर- दानाराम चौधरी
89- रानीवाड़ा- नारायण सिंह देवल
90- मांडल- कालूलाल गुर्जर
91- सहाडा- रूपलाल जाट
92- भीलवाड़ा- विटठल शंकर अवस्थी
93- शाहपुरा- कैलाश मेघवाल
94- बूंदी- अशोक डोगरा
95- सांगोद- हीरालाल नागर
96- कोटा उत्तर- प्रहलाद गुंजल
97- कोटा दक्षिण- संदीप शर्मा
98- रामगंज मंडी- मदन दिलावर
99- अंता- प्रभुलाल सैनी
100- किशनगंज- ललित मीणा
101- छबड़ा- प्रताप सिंह सिंघवी
102- झालरापाटन- वसुंधरा राजे
103- खानपुर- नरेंद्र नागर
104- मनोहर थाना- गोविंद रानीपुरिया
105- चुरू-राजेंद्र राठौड़
106- पिलानी- कैलाश मेघवाल
107- सूरजगढ़- सुभाष पूनिया
108- मंडावा- नरेंद्र कुमार
109- उदयपुरवाटी- शुभकरण चैधरी
110- खेतड़ी- धर्मपाल गुर्जर
111- धोद- गोवर्धन वर्मा
112- दातारामगढ़- हरीश चंद्र कुमावत
113- खंडेला- बंशीधर
114- नीमकाथाना- प्रेमा सिंह बाजौर
115- श्रीमधोपुर- झाबर सिंह खर्रा
116- विराटनगर- फूलचंद भिंडा
117- शाहपुरा- राव राजेंद्र सिंह
118- चैमू- रामलाल शर्मा
119- फुलेरा- निर्मल कुमावत
120- आमेर- सतीश पूनिया
121- हवामहल- सुरेंद्र पारीक
122- विद्याधर नगर- नरपत सिंह राजवी
123- सिविल लाइंस- अरूण चतुर्वेदी
124- किशनपोल- मोहनलाल गुप्ता
125- आदर्श नगर- अशोक परनामी
126- किशनगढ़बास- रामहेत सिंह यादव
127- मुंडावर- मंजीत चौधरी
128- अलवर शहर- संजय शर्मा
129- नगर- अनीता सिंह गुर्जर
130- डीग कुम्हेर- डॉ शैलेश सिंह
131- शेरगढ़- बाबूसिंह राठौड़
132- श्रीगंगानगर- विनीता आहूजा
133- अनूपगढ़- संतोष बावरी
134- संगरिया- गुरदीप सिंह शाहपीणी
135- बीकानेर पश्चिम- गोपाल जोशी
136- डूंगरगढ़- ताराचंद सारस्वत
137- नोखा- बिहारी लाल विश्नोई
138- रतनगढ़- अमिनेश महर्षि
139- सीकर- रतन जलधारी
140- दूदू- प्रेमचंद बैरवा
141- झोटवाड़ा- राजपाल सिंह शेखावत
142- मालवीय नगर- कालीचरण सराफ
143- बगरू- कैलाश वर्मा
144- बस्सी- कन्हैया लाल मीणा
145- बसेडी- छितरिया जाटव
146- चाकसू- रामोतार बैरवा
147-रामगढ़- सुखवंत सिंह
148-कठूमर- बाबूलाल मैनेजर
149-राजाखेड़ा- अशोक शर्मा
150- हिंडौन- मंजू खेरवाल
151- सिकराय- विक्रम बंशीवाल
152- जैसलमेर- सांगसिंह भाटी
153- पोकरण- प्रतापपुरी
154- शिव- खुमाण सिंह
155- चैहटन- आदूराम मेघवाल
156- गढ़ी- कैलाश मीणा
157- बांसवाड़ा- अखडू महिरा
158- कपासन- अर्जुन जीनगर
159- नाथद्वारा- महेश प्रताप सिंह
160- जहाजपुर- गोपीचंद मीणा
161- केशोराय पाटन- चंद्रकांता मेघवाल
162-डग- कालू लाल मेघवाल
163- तारानगर - राकेश जांगिड़
164- सरदारशहर - अशोक पींचा
165- सुजानगढ़ - खेमाराम मेघवाल
166- फतेहपुर - सुनीता जाखड़
167- नवलगढ़ - बनवारी लाल सैनी
168- लक्ष्मणगढ़ - दिनेश जोशी
169- सांगानेर - अशोक लाहोटी
170- अलवर ग्रामीण - राम कृष्ण मेघवाल
171- राजगढ़-लक्ष्मणगढ़ - विजय मीणा
172- कामा -जवाहर सिंह बेगम
173- टोडाभीम- रमेश मीणा
174- महुआ -राजेंद्र मीणा
175- दौसा - शंकर शर्मा
176- गंगापुर सिटी - मानसिंह गुर्जर
177- मकराना - रूपा राम जाट
178- सुमेरपुर - जोराराम कुमावत
179- वल्लभनगर - उदय लाल डांगी
180- आसींद - जबर सिंह सांखला
181- मांडलगढ़ से गोपाल खंडेलवाल
182- हिंडोली - ओमेंद्र सिंह हाडा
183- बारां अटरू - बाबूलाल वर्मा
184- लाडपुरा - कल्पना राजे
185- पीपल्दा -ममता शर्मा
186- झुंझुनूं से राजेंद्र भामू
187- कोटपूतली - मुकेश गोयल
188- बहरोड़ - मोहित यादव
189- करौली - ओपी सैनी
190- केकड़ी -राजेंद्र विनायका
191- डीडवाना -जितेंद्र सिंह जोधा
192- खींवसर -रामचंद्र उत्ता
193- करणपुर- सुरेंद्रपाल सिंह टीटी
194- थानागाजी- रोहिताश शर्मा
195- जमवारामगढ़- महेंद्रपाल मीणा
196- तिजारा- संदीप दायमा
197- बानसूर- महेंद्र यादव
198- बांदीकुई- रामकिशोर सैनी
199- सवाई माधोपुर- आशा मीणा
200- निवाई- रामसहाय।

आईवीएफ यानी इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन तकनीक विज्ञान का एक चमत्कार ही है, जिसने पिछले कुछ दशकों में ही अनगिनत नि:संतान महिलाओं को मातृत्व का तोहफ़ा दिया है। आज के आधुनिक दौर में महिलाएं आईवीएफ के महत्त्व को समझ रही हैं और अपना रही हैं। आईवीएफ तकनीक से जन्म लेने वाली संतानों को ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ भी कहा जाता है। कई महिलाएं प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर पातीं ऐसे में आईवीएफ तकनीक के ज़रिये महिलाओं के शरीर से अंडाणु को निकाला जाता है और लैब में इसका मिलन पुरुष के शुक्राणुओं से कराया जाता है, जिससे निषेचन की प्रक्रिया पूरी होती है और भ्रूण बनता है जिसे बाद में महिला के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया जाता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक गर्भधारण से अलग है क्योंकि इसमें भ्रूण बनने का काम शरीर के बाहर लैब में होता है, लेकिन इसके बाद सारी प्रक्रिया प्राकृतिक गर्भधारण जैसी ही है लेकिन आईवीएफ तकनीक अपनाने वाले दंपत्तियों के मन में कई बार यह संशय रहता है कि क्या उनकी संतान सामान्य बच्चों की तरह ही स्वस्थ रहेगी? आइये ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब जानते हैं :
अध्ययनों के अनुसार, आईवीएफ से जन्मी संताने होती हैं सामान्य:-इन्दिरा आईवीएफ अहमदाबाद की फर्टिलिटी विशेषज्ञ डॉ. मेखला गोयल बताती हैं कि आईवीएफ तकनीक पर देश-विदेश में कई तरह की रिसर्च की गईं है। कुछ रिसर्च आईवीएफ की सफलता पर की गई जबकि कुछ रिसर्च इससे पैदा हुई संतानों पर की गयी। आईवीएफ की सफलता पर चल रही रिसर्च से हमेशा से ही सकारात्मक नतीजे सामने आते रहे हैं। हालांकि, समय-समय पर हुए अध्ययनों से आईवीएफ की तकनीक में कई बड़े नवाचार भी किए गए हैं। आईवीएफ से जन्म लेने वाली संतानों पर चलने वाली रिसर्च में भी ये स्पष्ट तौर पर प्रमाणित हो चुका है कि आईवीएफ तकनीक से जन्म लेने वाली संतानें मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और सामान्य होती हैं। इनका विकास भी प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने वाली महिलाओ की संतान की तरह ही होता है और आईवीएफ संतानों की शारीरिक और मानसिक क्षमता भी सामान्य संतानों के बराबर ही होती है। देश-विदेश के ऐसे कई आईवीएफ संस्थान हैं जहां सालाना कई संतानें इस तकनीक से जन्म ले रही हैं, लेकिन इन संस्थानों में जन्म लेने वाली संतानों में किसी भी तरह की असामान्यता नहीं देखी गई। देश का ऐसा ही एक प्रख्यात आईवीएफ संस्थान है ‘’इंदिरा आईवीएफ’’। जहां पिछले साढ़े सात सालों में लगभग 35 हज़ार महिलाओं को संतान सुख मिला है लेकिन अब तक जन्मी संतानों में किसी भी तरह की परेशानी दर्ज नहीं की गई। ऐसे में ये कहा जा सकता है कि नि:संतान दंपत्तियों के लिए संतान सुख पाने का सबसे कारगर तरीका आईवीएफ ही है और इस तकनीक से गुज़रने वाले दंपत्तियों को पूरी तरह बेफिक्र हो जाना चाहिए। इन्दिरा आईवीएफ जयपुर की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. उर्मिला शर्मा का कहना है कि कुछ समय पहले आस्ट्रेलिया के मडरेक चिल्ड्रंस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमसीआरआई) ने अपने अध्ययन में कहा था कि आईवीएफ से जन्मी संताने स्कूल जाने की आयु तक अन्य संतानों की तरह ही शारीरिक, मानसिक और भावात्मक रूप से स्वस्थ होती हैं और उसके बाद भी वो सामान्य संतानों की तरह ही विकास करती हैं। मुख्य शोधार्थी डेविड एमॉर ने कहा था कि यह अध्ययन आईवीएफ संतानों के माता-पिता को सुकून प्रदान करने वाला है।

नई दिल्ली। दारा सिंह रंधावा का जन्म 19 नवंबर 1928 को पंजाब में अमृतसर के धरमूचक गांव में बलवंत कौर और सूरत सिंह रंधावा के घर हुआ था। अखाड़े से फिल्मी दुनिया तक का सफर दारा सिंह के लिए काफी चुनौती भरा रहा। बात चाहे कुश्ती की हो, फिल्मी दुनिया या रामायण की या फिर राजनीति की। जब बात दारा सिंह की होती है तो लोगों का ठहराव लाजिमी है। दारा सिंह वो शख्स थे, जिन्होंने कुश्ती के 500 मुकाबलों में अपराजित रहकर दुनिया को अपनी ताकत का लोहा मनवाया था। अपने छत्तीस साल के कुश्ती के करियर में कोई ऐसा पहलवान नहीं था, जिसे दारा सिंह ने अखाड़े में धूल न चटाई हो।
17 वर्ष की आयु में बने पिता:-दारा सिंह ने अपनी जीवन के शुरुआती दौर में ही काफी मुश्किलें देखी थी। अपनी किशोर अवस्था में दारा सिंह दूध व मक्खन के साथ 100 बादाम रोज खाकर कई घंटे कसरत व व्यायाम में गुजारा करते थे। बचपन में ही उनके माता-पिता ने उनकी शादी कर दी थी, जिसके बाद 17 साल की नाबालिग उम्र में वह पिता बन गए।
बलवान का पर्याय थे दारा सिंह:-दारा सिंह का पूरा नाम था दारा सिंह रंधावा। उन्हें बचपन से ही कुश्ती का काफी शौक था। मजबूत कद काठी के दारा सिंह ने कुश्ती की दुनिया में न सिर्फ भारत का नाम ऊंचा किया, बल्कि उनके बारे में सबसे दिलचस्प बात ये है कि 50 के दशक में एक मुकाबले में दारा सिंह ने अपने से कहीं ज्यादा वजनी ऑस्ट्रेलिया के किंग कांग को पहले तो रिंग में पटखनी दी और फिर उन्हें उठाकर रिंग के बाहर ही फेंक दिया। उस वक्त दारा सिंह का वजन 130 किलो था जबकि किंग कांग 200 किलो के थे। 1983 में उन्होंने अपने जीवन का अन्तिम मुकाबला जीता और भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के हाथों अपराजेय पहलवान का खिताब अपने पास बरकरार रखते हुए कुश्ती से सम्मानपूर्वक संन्यास ले लिया।
दुनियाभर के पहलवानों को कुछ यू चटाई धूल:-दारा सिंह जब भी अखाड़े में होते थे, सामने वाला पहलवान चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, दारा से उसका कोई मुकाबला नहीं होता था। 1947 में दारा सिंह ने 'भारतीय स्टाइल' की कुश्ती में मलेशियाई चैंपियन त्रिलोक सिंह को हराकर कुआलालंपुर में मलेशियाई कुश्ती चैम्पियनशिप जीती। पांच साल तक फ्री स्टाइल रेसलिंग में दुनियाभर के पहलवानों को चित्त करने के बाद दारा सिंह भारत आकर 1954 में भारतीय कुश्ती चैंपियन बने।
भारतीय कुश्ती को दिलाई पहचान;-दारा सिंह और उनके छोटे भाई सरदारा सिंह ने मिलकर पहलवानी शुरू कर दी और धीरे-धीरे गांव के दंगलों से लेकर शहरों में कुश्तियां जीतकर अपने गांव का नाम रोशन करना शुरू कर दिया और भारत में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश में जुट गए थे।
अमेरिका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को हरा बने चैम्पियन:-दारा ने साल 1959 में पूर्व विश्व चैम्पियन जार्ज गारडियान्का को पराजित करके कामनवेल्थ की विश्व चैम्पियनशिप जीती थी। 1968 में वे अमेरिका के विश्व चैम्पियन लाऊ थेज को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गए। उन्होंने 55 वर्ष की आयु तक पहलवानी की और पांच सौ मुकाबलों में से किसी एक में भी पराजय का मुंह नहीं देखा।
अपराजेय रहे दारा:-उसके बाद उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों का दौरा किया और विश्व चैम्पियन किंगकाग को परास्त कर दिया था। दारा सिंह ने उन सभी देशों का एक-एक करके दौरा किया जहां फ्रीस्टाइल कुश्तियां लड़ी जाती थीं। आखिरकार अमेरिका के विश्व चैंपियन लाऊ थेज को 29 मई 1968 को पराजित कर फ्रीस्टाइल कुश्ती के विश्व चैम्पियन बन गए। 1983 में उन्होंने अपराजेय पहलवान के रूप में कुश्ती से संन्यास ले लिया।
फिल्मी दुनिया में कुछ यूं हुई एंट्री:-दारा सिंह के बारे में ऐसा कहा जाता है कि कुश्ती के दिनों से ही उन्हें फिल्मों में काम मिलना शुरू हो गया था। उनके बारे में तो ये भी कहा जाता है कि परदे पर कमीज उतारने वाले वो पहले हीरो थे। सिकंदर-ए-आजम और डाकू मंगल सिंह जैसी फिल्मों से करियर शुरू करने वाले दारा सिंह आखिरी बार इम्तियाज अली की 2007 में रिलीज फिल्म 'जब वी मेट' में करीना कपूर के दादा के रोल में नजर आए थे। गुजरे जमाने में अभिनेत्री मुमताज के साथ उनकी जोड़ी बड़ी हिट मानी जाती थी। दारा की फिल्म 'जग्गा' के लिए भारत सरकार से उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी दिया गया था। बाद में उन्होंने टेलीवीजन सीरियलों में भी काम किया। दारा सिंह ने हिट धारावाहिक रामायण में हनुमान का किरदार निभाया था।
राज्यसभा सदस्य रहे दारा सिंह:-अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के वक्त भारतीय जनता पार्टी ने साल 2003 में उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया था। वह पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिसे राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। आज भी रामानंद सागर की रामायण में उनकी भूमिका हनुमान के किरदार की खूब चर्चा होती है। बीआर चोपड़ा के टीवी धारावाहिक महाभारत में भी उन्होंने हनुमान के किरदार को एक बार फिर जिया था।

नई दिल्ली। भारत के करनाल, पंजाब (अब हरियाणा) में मध्यम वर्गीय हिंदू परिवार में 17 मार्च 1962 को जन्मी ‘मोंटू’ ने महज 35 साल की उम्र में पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं कर देश ही नहीं दुनिया को चौंका दिया। उन्होंने दुनिया को बताया कि ‘कल्पना’ केवल की नहीं जाती, बल्कि उनको जीना पड़ता है। मोंटू इससे भी एक कदम आगे बढ़ गईं और वह अपनी कल्पनाओं के साथ ही मरकर अमर हो गईं। मोंटू, पूरी दुनिया के लिए आदर्श हैं।यहां, हम बात कर रहे हैं भारती की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला की। अंतरिक्ष यात्रा पर जाने वाली वह दूसरी भारतीय थीं। उनसे पहले राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत अंतरिक्ष यान में एक उड़ान भरी थी। कल्पना के परिवार वाले प्यार से उन्हें मोंटू बुलाते थे। वह चार भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। कल्पना के बारे में एक खास बात यह भी है कि उन्होंने 8वीं कक्षा में ही अपने पिता से इंजीनियर बनने की इच्छा जाहिर कर दी थी। हालांकि उनके पिता चाहते थे कि कल्पना एक डॉक्टर या टीचर बनें।कल्पना चावला ने आज ही के दिन 19 नवंबर 1997 को अपना पहला अंतरिक्ष मिशन शुरू किया था। तब उनकी उम्र महज 35 साल थी। उन्होंने 6 अंतरिक्ष यात्रियों के साथ स्पेस शटल कोलंबिया STS-87 से उड़ान भरी। अपने पहले मिशन के दौरान कल्पना ने 1.04 करोड़ मील सफर तय करते हुए करीब 372 घंटे अंतरिक्ष में बिताए और इस दौरान धरती के कुल 252 चक्कर भी लगाए।
करनाल से की थी ‘कल्पना’:-कल्पना चावला की शुरुआती पढ़ाई करनाल के टैगोर बाल निकेतन में हुई थी। हरियाणा के पारंपरिक समाज में कल्पना जैसी लड़की के ख्वाब अकल्पनीय थे। अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई पूरी की। तब तक भारत अंतरिक्ष में काफी पीछे थे, लिहाजा सपनों को पूरा करने के लिए उनका नासा जाना जरूरी था। इसी उद्देश्य से वह साल 1982 में अमेरिका चली गईं। उन्होंने यहां टैक्सस यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में एम.टेक किया। फिर यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।
1988 में पहुंची थीं नासा:-साल 1988 में कल्पना चावला ने नासा ज्वॉइन किया। यहां उनकी नियुक्ति नासा के रिसर्च सेंटर में हुई थी। इसके बाद मार्च 1995 में वह नासा के अंतरिक्ष यात्री कोर में शामिल हुईं थीं। करीब आठ महीनों के कड़े प्रशिक्षण के बाद उन्होंने 19 नवंबर 1997 को अपना पहला अंतरिक्ष मिशन शुरू किया तो केवल नासा ही नहीं, भारत समेत पूरी दुनिया ने तालियां बजाकर और शुभकामनाएं देकर उनके दल को इस यात्रा पर रवाना किया था।
...और अमेरिकी नागरिक बन गई कल्पना:-एम.टेक की पढ़ाई के दौरान ही कल्पना को जीन-पियरे हैरिसन से प्यार हो गया था। बाद में दोनों ने शादी भी कर ली। इसी दौरान उन्हें 1991 में अमेरिका की नागरिकता भी मिल गई। इस तरह भारत की बेटी अमेरिका की होकर रह गई, लेकिन उनका भारत से संबंध हमेशा बना रहा।
41 की उम्र में की दूसरी व अंतिम यात्रा:-15 साल पहले 1 फरवरी 2003 को अंतरिक्ष इतिहास के सबसे मनहूस दिनों में माना जाता है। यही वो दिन था, जिस दिन भारत की बेटी कल्पना चावला अपने 6 अन्य साथियों के साथ अंतरिक्ष से धरती पर लौट रहीं थीं। उनका अंतरिक्ष यान कोलंबिया शटल STS-107 धरती से करीब दो लाख फीट की ऊंचाई पर था और यान की रफ्तार थी करीब 20 हजार किलोमीटर प्रति घंटा। वह धरती से इतनी करीब थीं कि अगले 16 मिनट में उनका यान अमेरिका के टैक्सस शहर में उतरने वाला था। पूरी दुनिया बेसब्री से यान के धरती पर लौटने का इंतजार कर रही थी। तभी एक बुरी खबर आयी कि नासा का इस यान से संपर्क टूट गया है। इससे पहले कि लोग कुछ समझ पाते इस अंतरिक्ष यान का मलबा टैक्सस के डैलस इलाके में लगभग 160 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैल गया। इस हादसे में कल्पना चावला सहित सातों अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई। कल्पना समेत सातों अंतरिक्ष यात्रियों के सम्मान में प्रत्येक वर्ष 1 फरवरी 2003 को पूरी दुनिया में इनकी पुण्यतिथि मनायी जाती है।
तकनीकी गड़बड़ियों से हुई थी यात्रा की शुरूआत:-साल 2000 में कल्पना को दूसरे अंतरिक्ष मिशन के लिए भी चुन लिया गया था। यह अंतरिक्ष यात्रा उनकी जिंदगी का आखिरी मिशन भी साबित हुआ। उनके इस मिशन की शुरुआत ही तकनीकि गड़बड़ियों के साथ हुई थी। इसकी वजह से इस उड़ान में विलंब भी होता रहा। आखिरकार 16 जनवरी 2003 को कल्पना सहित 7 यात्रियों ने कोलंबिया STS-107 से उड़ान भरी। अंतरिक्ष में 16 दिन बिताने के बाद वह अपने 6 अन्य साथियों के साथ 3 फरवरी 2003 को धरती पर वापस लौट रही थीं। लेकिन उनकी यह यात्रा कभी खत्म ही नहीं हुई।
इसलिए हुआ था हादसा:-अंतरिक्ष यान के दुर्घटनाग्रस्त होने से भारत से लेकर इजरायल और अमेरिका तक दुख व आंसू में डूब गए थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक- जैसे ही कोलंबिया ने पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया, वैसे ही उसकी उष्मारोधी परतें फट गईं और यान का तापमान बढ़ने से यह हादसा हो गया, जिसमें सभी अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई।
पहली बार गए थे इजरायली अंतरिक्ष यात्री:-मिशन कमांडर रिक हसबैंड के नेतृत्व में दुर्घटनाग्रस्त होने वाले कोलंबिया शटल यान STS-107 ने उड़ान भरी थी। टीम में एक इजरायली वैज्ञानिक आइलन रैमन भी शामिल थे। रैमन अंतरिक्ष में जाने वाले पहले इजरायली थे। उनके अलावा इस टीम में विलियम मैकोल, लॉरेल क्लार्क, आइलन रैमन, डेविड ब्राउन और माइकल एंडरसन शामिल थे

 

 

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर बवाल थमा नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुना दिया था, लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के चलते अभी तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू नहीं हो पाया। अब देवास्वाम बोर्ड सबरीमाला मंदिर मामले पर सुप्रीम कोर्ट की शरण में जा पहुंचा है, जहां बोर्ड अपनी दाखिल की गई याचिका में कोर्ट से कहा गया है बोर्ड के पास आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी है और आप अपने फैसले को लागू करने में हमारी मदद करें। शहर भर में सुप्रीम कोर्ट लागू करने के खिलाफ लोग हिंसा और विद्रोह पर उतर आए हैं।
सुप्रीम कोर्ट सुना चुका है फैसला:-आपको बता दें कि इसके पहले 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को लेकर ये फैसला सुनाया था कि सबरीमाला मंदिर में 10 साल से लेकर 50 साल के बीच की किसी भी उम्र की महिला भी दर्शन के लिए जा सकती हैं।
केंद्रीय मंत्री ने श्रद्धालुओं की गिरफ्तारी का किया विरोध:-रविवार को थिरुवनंतपुरम स्थित मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन के आधिकारिक आवास पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जबरदस्त प्रदर्शन किया। उधर केंद्रीय मंत्री अल्फोंस जोसेफ सोमवार को सबरीमाला पहुंचे। अल्फोंस सबरीमाला मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को दी जाने वाली सुविधाओं को जानना और समझना चाहते हैं। केंद्रीय मंत्री का मंदिर दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है, जब 30 से ज्यादा श्रद्धालुओं को गिरफ्तार किया गया है।

नई दिल्ली। आज International Men’s Day (विश्व पुरुष दिवस) है, यानी मर्दों का दिन। क्या आप जानते हैं, ये दिन किस लिए मनाया जाता है। नहीं तो, इसका जवाब है कि ये दिन पुरुषों को भेदभाव, शोषण, उत्पीड़न, हिंसा और असमानता से बचाने और उन्हें उनके अधिकार दिलाने के लिए मनाया जाता है। सुनने में थोड़ा सा अजीब लग रहा होगा, लेकिन ये सच है। महिलाओं की तरह पुरुष भी असमानता का शिकार होते हैं।आपको अब भी यकीन नहीं हो रहा तो जरा इन आंकड़ों पर नजर डालें। पूरी दुनिया में होने वाली कुल आत्महत्यों में 76 फीसद पुरुष होते हैं। पूरी दुनिया में 85 फीसद बेघर लोग पुरुष हैं। इतना ही नहीं पूरी दुनिया में होने वाली हत्याओं में 70 फीसद आबादी पुरुषों की होती है। यहां तक कि घर की चारदिवारी के भीतर, यहां पुरुष प्रधान माना जाता है वहां भी घरेलू हिंसा के शिकार लोगों में 40 फीसद संख्या पुरुषों की है।InternationalmensDay.com वेबसाइट के अनुसार पूरी दुनिया में महिलाओं से तीन गुना ज्यादा पुरुष आत्महत्या करते हैं। प्रत्येक तीन में से एक पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होता है। पुरुषों की औसत आयु महिलाओं से कम है। इसलिए अमूमन महिलाओं से चार-पांच साल पहले ही पुरुषों की मौत हो जाती है। पुरुष सख्त दिल माने जाते हैं, लेकिन महिलाओं के मुकाबले दिल के मरीज पुरुषों की संख्या दोगुनी है।यहीं वजह है कि 19 नवंबर को पूरे विश्व में इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया जाता है। हर बार इसकी अलग-अलग थीम रखी जाती है। इस बार के मेन्स डे की थीम पॉजिटिव मेल रोल मॉडल्स रखी गई है। भारत में भी वर्ष 2007 से इंटरनेशनल मेन्स डे मनाया जा रहा है। भारत में इसकी शुरूआत पुरुषों के अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्था सेव इंडियन फैमिली ने की थी। इसके बाद ऑल इंडिया मेन्स वेलफेयर एसोसिएशन ने भारत सरकार के सामने मांग रखी कि देश में महिला विकास मंत्रालय की तरह ही पुरुष विकास मंत्रालय बनाया जाए, जो पुरुषों से जुड़े मुद्दों, उनकी समस्याओं और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करे।
पहले फरवरी में मनाया जाता था मेन्स डे:-अमेरिका स्थित मिसौर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर थॉमस योस्टर के प्रयास पर पहली बार 7 फरवरी 1992 को अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों ने अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया था। धीरे-धीरे ये चलन अन्य देशों में भी फैला और फिर साल 1995 से कई देशों ने फरवरी महीने में पुरुष दिवस मनाना बंद कर दिया। इसके बाद विभिन्न देशों ने अपने-अपने हिसाब से पुरुष दिवस मनाना जारी रखा। 1998 में त्रिनिदाद एंड टोबेगो में पहली बार 19 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया गया। इसका सारा श्रेय डॉ. जीरोम तिलकसिंह को जाता है। उन्होंने इसे मनाने की पहल की और इसके लिए 19 नवंबर का दिन चुना। इसी दिन उनके देश ने पहली बार फुटबॉल विश्व कप के लिए क्वालिफाई करके देशों को जोड़ने का काम किया था। उनके इस प्रयास के बाद से ही हर साल 19 नवंबर को दुनिया भर के 60 देशों में अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाया जाता है और यूनेस्को भी उनके इस प्रयास की सराहना कर चुकी है।
#MeToo की तर्ज पर #ManToo भी:-हाल के दिनों में महिलाओं के शोषण के खिलाफ शुरू किया गया #MeToo अभियान काफी सुर्खियों में रहा। इस दौरान बहुत सी महिलाओं ने पुरुषों पर आरोप लगाए। उनके आरोप कितने सही हैं या कितने गलत, ये जांच का विषय है, लेकिन सालों बाद लगाए गए आरोपों पर की सवाल भी खड़े हुए। एक सवाल ये भी खड़ा हुआ कि क्या पूरी दुनिया में पुरुष ही महिलाओं का शोषण कर रहे हैं। इसको लेकर लोगों की अलग-अलग राय है। पूर्व में ऐसे कई मामले सामने आ चुके है, जिसमें किसी महिला द्वारा पुरुष का शोषण, उत्पीड़न, दुष्कर्म या हिंसा जैसी वारदात की गई। #MeToo के बाद इसके जवाब में अक्टूबर 2018 में बेंगलुरू के 15 पुरुषों ने #ManToo आंदोलन की शुरूआत की। इस #ManToo अभियान के तहत इन लोगों ने महिलाओं के हाथों अपने उत्पीड़न की कहानी को सोशल मीडिया पर शेयर किया।

नई दिल्ली। शायद ही आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया हो कि आपके नाखून भी बीमार हो सकते हैं। नाखून कैरटिन से बने होते हैं। यह एक तरह का पोषक तत्व है, जो बालों और त्वचा में होता है। शरीर में पोषक तत्वों की कमी या बीमारी होने पर कैरटिन की सतह प्रभावित होने लगती है। साथ ही नाखून का रंग भी बदलने लगता है। यदि नेलपॉलिश का इस्तेमाल किए बिना भी नाखूनों का रंग तेजी से बदल रहा है तो यह शरीर में पनप रहे किसी रोग का संकेत हो सकता है। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि आपको नाखूनों की बीमारी हो गई हो। ऐसे में आपको इस समस्या को अनदेखा नहीं करना चाहिए वरना समस्या गंभीर भी हो सकती है।
स्वास्थ्य का संकेत:-हमारे शरीर में नाखून पीछे वाले हिस्से में स्किन के नीचे होता है। नाखून बनने पर यह स्किन के नीचे से ऊपर की ओर निकल कर बढ़ता है। नाखून उंगली के जिस छोर पर जाकर खत्म होता है वह हिस्सा 'सी मार्जिन ऑफ नेल' कहलाता है। शरीर के इस हिस्से से हम खुजलाने का काम लेते है। यह नेल प्लेट जिस जगह पर उंगली की त्वचा से जुडी होती है वहीं स्किन का बहुत ही महीन आवरण होता है यह अंश क्यूटिकल्स कहलाता है। नाखूनों में किसी भी प्रकार का कोई परिवर्तन हो तो स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो जाना चाहिए। दुनियाभर में हुए कुछ शोधों के अनुसार यह तथ्य प्रमाणित हो चुका है कि विभिन्न बीमारियों में नाखूनों का रंग बदल जाता है। जैसे सफेद रंग के नाखून लीवर से संबंधित बीमारियों जैसे हेपेटाइटिस की खबर देते हैं। अगर हम ये कहें की नाखून आपके सेहत का हाल बयान करते हैं तो ये गलत नहीं होगा। जानिए नाखूनों से कैसे मिलता है स्वास्थ्य का संकेत।
पीले नाखून:-पीले रंग के नाखून जो आकार में मोटे हो और धीरे-धीरे बढ़ते हो, फेफड़े संबंधी बीमारियों के परिचायक होते हैं। साथ ही नाखूनों का पीलापन फंगल इन्‍फेक्‍शन और कुछ मामालों में थायरॉयड, सिरोसिस जैसी त्‍वचा की समस्‍या जैसे गंभीर रोगों का भी लक्षण हो सकता है। इसके अलावा नाखूनों का पीलापन पीलिया के लक्षण को भी बताता है।
आधे सफेद और आधे गुलाबी नाखून:-आधे सफेद और आधे गुलाबी नाखून किडनी से संबंधित बीमारियों का संकेत देते हैं। इसके अलावा यदि आपके नाखूनों की पर्त सफेद है तो यह लक्षण शरीर में खून की कमी (एनीमिया) का लक्षण होता है।
नाखूनों में सफेद धब्‍बे:-कई बार आपने देखा होगा कि आपके नाखूनों में सफेद धब्‍बे नजर आने लगते हैं। और धीरे-धीरे नाखूनों पर सफेद धब्बे बढ़ने लगते हैं, यह पीलिया या लिवर संबंधी अन्य रोगों की ओर इशारा करते हैं।
कमजोर नाखून:-कमजोर या नाजुक नाखून शरीर में कैल्शियम की कमी को दर्शाते हैं। इसके अलावा अगर ये सूखे हो या बहुत जल्दी टूट जाएं, तो यह आपके शरीर में विटामिन 'सी', फोलिक एसिड, और प्रोटीन की कमी को दर्शाता है। इसके अलावा आपको थायराइड की समस्या हो सकती है। I
हल्के पीले नाखून या फीके नाखून:-नाखूनों का रंग बहुत ज्‍यादा फीका पड़ना, उसमें हल्‍का पीलापन दिखना या नाखूनों का बहुत अधिक कमजोर होना अनीमिया या‍नी खूनी की कमी, कन्जेस्टिव हार्ट फेलियर, लिवर संबंधी रोग के लक्षण हो सकते हैं।
उभारयुक्त नाखून:-इस स्थिति में नाखून असाधारण ढंग से ऊपर की और उठ जाता है और उंगली के सिरों के चारों ओर मुड़ जाता है। इस तरह के नाखूनों से आपको किडनी से संबंधित बीमारी हो सकती है। ये विटामिन ए और प्रोटीन की कमी को भी दर्शाते हैं।
भूरे या काले धब्बे:-भूरे या काले धब्बे आमतौर पर नाखून के आस-पास की खाल पर फैल जाते हैं। यह एक बड़ा धब्बा या छोटे-छोटे निशान भी हो सकते हैं। इस तरह के धब्‍बे हाथ और पैर के अंगूठों पर होते हैं। यह धब्‍बे त्वचा या आंख की रसौली की ओर इशारा करते है।
नाखूनों में नीलापन:-कई बार शरीर में ऑक्‍सीजन का संचार ठीक प्रकार से नहीं होता है जिसके कारण नाखूनों का रंग नीला होने लगता है। नाखूनों को नीला होना फेफड़ों में संक्रमण, निमोनिया या दिल से संबंधित किसी रोग का लक्षण हो सकता है।यदि आप को किसी नाखून का ऊपरी सिरा फटा दिखाई पडे या नाखून में पीलापन नजर आए या कभी नाखून चम्मच जैसा दिखे, नाखून धंसा नजर आने लगे तो आपको तुंरत डॉक्टर के पास जाना चाहिए और सलाह लेना चाहिए। जरूरी नहीं कि यह नाखूनों की ही कोई बीमारी हो, बल्कि ऐसे लक्षण शरीर में बीमारी होने की संभावना का संकेत देते हैं। यह देखा गया है कि नाखूनों से पीलिया, एनीमिया का पता चलता है। यही नहीं नाखूनों से कुछ बडी बीमारीयों जैसे- फेफडों का कैंसर, दिल की बीमारी व थायराइड की गड़बड़ी आदि का भी पता चलता है।

नई दिल्ली। हजारों निवेशकों के साथ धोखाधड़ी के मामले में सुप्रीम कोर्ट आम्रपाली ग्रुप पर लगातार शिकंजा कसता जा रहा है। आम्रपाली मामले में सोमवार को भी अहम सुनवाई होगी। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (सीएमडी) अनिल शर्मा और दो निदेशकों शिव प्रिया और अजय कुमार को 19 नवंबर (सोमवार) को पेश होने का निर्देश दिया है। बताया जा रहा है कि कोर्ट अहम और बिल्डर को झटका देने वाला फैसला सुना सकता है। इससे पहले पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की जानबूझकर अवहेलना के लिए सुप्रीम कोर्ट ने रियल इस्टेट कंपनी आम्रपाली समूह के खिलाफ कठोर रुख अख्तियार किया था। सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के मल्टी स्पेशियालिटी अस्पताल, बैंक खातों, गोवा की बेनामी विला और उस इमारत को जब्त करने का आदेश दिया था, जिसमें इस कंपनी और कुछ अन्य फर्मों के कार्यालय हैं।
आदेशों की जानबूझकर अवहेलना करने पर अपनाया कठोर रुख:-जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने कहा था कि आम्रपाली समूह ने जानबूझकर उसके पूर्व के आदेशों का पालन नहीं किया और घर खरीददारों के पैसों को एक कंपनी से दूसरी कंपनी में स्थानांतरित करके 'बड़ी धोखाधड़ी' की है।पीठ ने कंपनी के ग्रेटर नोएडा स्थित 100 बिस्तरों वाले मल्टी स्पेशियालिटी अस्पताल को जब्त करने का आदेश दिया था। इसमें अल्ट्रा होम कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के पैसों का उपयोग किया गया। इसके अलावा गौरीसुता इंफ्रास्ट्रक्चर्स प्राइवेट लिमिटेड व इसके निदेशक सुनील कुमार के बैंक खातों और उनकी संपत्तियों को भी जब्त करने का आदेश दिया था।कोर्ट के आदेशों के तहत उन टावरों को भी जब्त किया जाएगा, जिनमें कंपनी के कार्यालय स्थित हैं। साथ ही गोवा स्थित एक्वा फोर्टिस विला भी जब्त की जाएगी। किसी ने भी इस विला के स्वामित्व का दावा नहीं किया है। आम्रपाली समूह पर कंपनी के कोष से खरीदी गईं 86 लक्जरी कारों और एसयूवी को किसी तीसरे पक्ष को बेचने पर भी रोक लगा दी गई है।
कंपनियों से अलग होने पर रोक:-शीर्ष अदालत ने कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी चंदर वाधवा को तीन हफ्ते के भीतर 11.69 करोड़ रुपये कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराने का आदेश दिया है। साथ ही ऑडिटर अनिल मित्तल को 47 लाख रुपये अदा करने का आदेश दिया है। अदालत ने आम्रपाली पर उन कंपनियों से अलग होने पर भी रोक लगा दी है जिनके साथ उसने लेनदेन किया था। साथ ही इन कंपनियों को अटैच करने का भी आदेश दिया है।
सहायक कंपनियों में स्थानांतरित किए 2000 करोड़;-शीर्ष अदालत द्वारा नियुक्त फोरेंसिक ऑडिटर्स पवन कुमार अग्रवाल और रवि भाटिया ने बताया कि आम्रपाली सफायर प्रोजेक्ट से घर खरीददारों के 442 करोड़ रुपये 15 कंपनियों और नौ व्यक्तियों को एडवांस के नाम पर दिए गए। अपनी रिपोर्ट में उन्होंने बताया कि आम्रपाली इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड मुख्य कंपनी है और उसने करीब 2,000 करोड़ रुपये अपनी सहायक कंपनियों में स्थानांतरित किए।
आइटी रिटर्न दाखिल करने के लिए मिले 500 करोड़:-रवि भाटिया ने पीठ को बताया कि स्टनिंग कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने तो बेहद अद्भुत काम किया। इस कंपनी ने कंपनियों, उसके निदेशकों और कुछ अन्य व्यक्तियों के आयकर (आइटी) रिटर्न दाखिल किए और इसके एवज में उसे 500 करोड़ प्राप्त हुए। इस पर अदालत ने फोरेंसिक ऑडिटर्स से कहा कि वे परियोजनाओं में आम्रपाली के निवेश और फर्जी घर खरीददारों का पता लगाएं। संभव है कि संपत्तियां बेनामी लोगों को बेची गई हों ताकि कंपनी का मूल्य बढ़ाया जा सके।
खातों से रकम निकाल रहे थे प्रमोटर
फोरेंसिक ऑडिटर्स ने बताया कि आम्रपाली ने 2010 से कई कंपनियां बनाई ताकि कंपनी अधिनियम के प्रावधानों को धता-बताकर कर एक परियोजना से दूसरी परियोजना में धन स्थानांतरित किया जा सके। पवन कुमार अग्रवाल ने बताया कि आम्रपाली समूह ने 27 अन्य डमी कंपनियों के साथ लेनदेन किया और पिछले साल से आम्रपाली के प्रमोटरों ने इन कंपनियों के बैंक खातों से धनराशि निकालनी शुरू कर दी थी।

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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