नई दिल्‍ली। देश में अर्थव्यवस्था से जुड़े जो भी आंकड़े सामने आ रहे हैं वह विकास की धीमी चाल की ओर साफ इशारा कर रहे हैं। हाल में औद्योगिक उत्पादन, वाहन बिक्री और वित्तीय संस्थानों के ऋण वितरण में गिरावट आर्थिक संकट की पुष्टि करते हैं। इस स्थिति में सिर्फ इस बात को लेकर खुश नहीं रहा जा सकता है कि भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति के साथ वृद्धि हासिल कर रहा है। इस मामले में हमने अपने पड़ोसी देश चीन को भले ही पछाड़ दिया है लेकिन घरेलू बाजार में मौजूदा हालात ठीक नहीं हैं। ऊंची आर्थिक वृद्धि दर का असर जमीन पर भी दिखना चाहिए जो फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।इसमें कोई दोराय नहीं कि वैश्विक स्तर पर मंदी की आहट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था करीब सात फीसद की दर से आगे बढ़ रही है जिसे संतोषजनक कहा जा सकता है। लेकिन सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने और 2024 तक अर्थव्यवस्था को पांच खरब डालर की बनाने जैसे जो लक्ष्य रखे हैं क्या उन्हें हासिल किया जा सकता है? मौजूदा स्थिति में तो यह संभव होता नहीं दिख रहा है। यदि मोदी सरकार को न्यू इंडिया का सपना पूरा करना है तो इसके लिए आर्थिक मोर्चे पर अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा। आम करदाताओं और निवेशकों पर सिर्फ टैक्स का बोझ बढ़ाने से कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) पर यह फॉर्मूला लागू करने के परिणाम जग जाहिर हैं। बजट के बाद से विदेशी निवेशक पूंजी बाजार में लगातार बिकवाली करके ज्यादा कमाई के लिए दूसरे देशों में पैसा लगा रहे हैं। शेयर बाजार में गिरावट की मार से पिछले करीब डेढ़ माह में निवेशकों की 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की मेहनत की कमाई डूब चुकी है।

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