नई दिल्‍ली। आप फिजूलखर्च हैं या बचतकर्ता, बचतकर्ता हैं या निवेशक, निवेशक हैं या बाजीगर, यह सब इस पर निर्भर है कि आप खुद को कितना अमीर या गरीब महसूस करते हैं। ध्यान रखिए, मैंने यह नहीं कहा कि आप असल में कितने अमीर या गरीब हैं। मैंने यह कहा कि आप कैसा महसूस करते हैं। इससे भी मजेदार बात यह है कि निवेश को लेकर अमीर और गरीब के व्यवहार की हमारी जो सोच है, उनका असल व्यवहार उसके ठीक विपरीत भी हो सकता है। मसलन, जो खुद को गरीब महसूस करता है, वह ज्यादा जोखिम वाले फैसले ले सकता है। इसका किसी एक पैमाने के हिसाब से अमीरी या गरीबी से कोई सरोकार नहीं है। इसका सीधा सरोकार इस बात से है कि आप दूसरों के मुकाबले खुद को क्या और कैसा महसूस करते हैं।हाल ही में मैंने गरीबी और विषमता के मनोवैज्ञानिक पहलुओं को लेकर कुछ शोध पढ़े। उन्हें पढ़कर लगा कि बचतकर्ताओं और निवेशकों के जिन व्यवहारों का मैं बरसों से साक्षी रहा हूं, वे शोध से हासिल तथ्यों से अलग नहीं हैं। अमेरिका में कुछ अर्थशास्त्रियों ने एक परीक्षण करने का फैसला किया। उन्होंने किसी विभाग के सरकारी कर्मचारियों को दो दलों में बांट दिया। उनमें से एक दल के सरकारी कर्मचारियों को एक ऑनलाइन माध्यम से उनके सहकर्मियों का वेतन बताया, और दूसरे दल को नहीं बताया। बाद में उन्होंने दोनांे दलों पर एक अध्ययन किया।एक-दूसरे की वित्तीय स्थिति का पता चल जाने के बाद कर्मचारियों की प्रतिक्रिया क्या होगी, इसे लेकर शोध से पहले शोधकर्ताओं के सामने दो विपरीत सिद्धांत थे। शोधकर्ताओं के एक हिस्से का मानना था कि जिन्हें यह पता चलेगा कि उन्हें औरों के मुकाबले कम वेतन मिलता है, वे दुखी हो जाएंगे। दूसरा सिद्धांत यह था कि जब उन्हें पता चलेगा कि उनका वेतन औरों से कम है, तो वे इसे भविष्य में उनके जितना ही कमाने के मौके की तरह लेंगे। ऐसे में उन्हें अपने सहकर्मियों से कम कमाने का दुख नहीं होगा, बल्कि वे भविष्य में और कमाने की बात सोचकर खुश होंगे। मैं जानता हूं कि किसी भी सामान्य व्यक्ति को दूसरा विचार बेवकूफी भरा लगेगा। लेकिन क्या करें।

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