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नई दिल्‍ली। गर्मियों की तुलना में सर्दियों के मौसम में दिल का दौरा पड़ने के मामले लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ जाते हैं। हृदय रोगों से प्रभावित लोगों के लिए ठंड अत्यंत नुकसानदेह साबित हो सकती है। सर्दियों के मौसम में हृदय धमनी रोग (कोरोनरी आर्टरी डिजीज) के कारण दिल का दौरा पड़ने के मामले कहीं ज्यादा बढ़ जाते हैं, जिन्हें कुछ सजगताएं बरतकर काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके अलावा सर्दियों में हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों को भी सावधानी बरतने की जरूरत है। इसलिए इस मौसम में दिल के मरीजों को कुछ अतिरिक्त सावधानियां बरतनी चाहिए...
सीएडी और हार्ट अटैक:-हृदय धमनियों में अवरोध (ब्लॉकेज) होने की स्थिति को कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) कहा जाता है। हृदय की धमनियों में विभिन्न कारणों से अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं। जैसे अत्यधिक वसायुक्त खाद्य पदार्र्थों के खाने से रक्त में कोलेस्ट्रॉल के स्तर का बढ़ना, जिसके कारण हृदय धमनियों में वसा संचित हो जाती है। इसी तरह हृदय धमनियों में कैल्शियम भी जमा हो सकता है। इस स्थिति में दिल को पर्याप्त मात्रा में रक्त की आपूर्ति नहींहो पाती। इस कारण दिल का दौरा (हार्ट अटैक) पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित लोगों में भी दिल का दौरा पड़ने का खतरा काफी बढ़ जाता है।
कारणों पर नजर:-अत्यधिक ठंड के कारण हृदय के अलावा मस्तिष्क और शरीर के अन्य अंगों की धमनियां सिकुड़ती हैं। इससे रक्त प्रवाह में रुकावट आती है और रक्त के थक्के (ब्लड क्लॉट) बनने की आशंका अधिक हो जाती है। ऐसी स्थिति में दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। अक्सर लोग अत्यधिक सर्दियों के कारण रजाई या कंबल के साथ आराम करने को वरीयता देते हैं। सर्दियों के प्रभाव से अनेक लोग आलस्य के कारण नियमित रूप से व्यायाम नहींकरते। सर्दियों में खानपान में भी लोग चिकनाईयुक्त खाद्य पदार्थ कहींज्यादा खाते हैं।सर्दी के मौसम में ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ता है। इन कारणों के अलावा सर्दियों में लोग देर से उठते हैं। इस दौरान लोग सुबह की सैर भी नहीं करते। सर्दियों में नमकीन और चटपटी चीजें खाने का ज्यादा मन करता है। अधिक नमक ब्लड प्रेशर बढ़ाता है। सर्दी के कारण लोग चाय भी ज्यादा पीते हैं। इसके अलावा सर्दियों में मादक पदार्थों का सेवन भी बढ़ जाता है यानी सर्दियों में हम वे सब काम करते हैं जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है। ये कारण सर्दियों में दिल की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
इन बातों पर दें ध्यान:-अगर आप हृदय से संबंधित किसी समस्या से पीड़ित हैं तो सर्दियों में सुबह की सैर और व्यायाम के दौरान खास ख्याल रखने की जरूरत है। इस मौसम में व्यायाम या सैर के दौरान धमनियां सिकुड़ सकती हैं और खून गाढ़ा हो जाता है। इस वजह से ब्लड क्लॉट बनने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में हार्ट अटैक होने की प्रबल आशंका होती है। ठंड के मौसम में अपने आप को पूरा ढककर सैर करने जाना चाहिए तथा जो हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हैं, वे अपनी दवाएं लगातार लें तथा जो हार्ट के मरीज हैं, उन्हें अपनी ब्लड थिनर(रक्त को पतला करने वाली दवाएं) अवश्य लेनी चाहिए।
ठंड के मौसम में योगासन करना वरदान:-साबित हो सकता है। इसी तरह प्राणायाम करना भी लाभप्रद है। सर्दी के दिनों में अमूमन लोग कम पानी पीते हैं, जबकि यह सेहत के लिए ठीक नहीं है। कम पानी पीने की वजह से सर्दियों में नसें सिकुड़ने लगती हैं, जिसका सबसे ज्यादा नुकसान हृदय रोगियों को होता है और हार्ट अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
ऐसे करें बचाव
-दिल की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए और दिल से संबंधित किसी समस्या से बचने के लिए ब्लड प्रेशर की नियमित रूप से जांच करें या करवाएं।
-डॉक्टर की सलाह से दवाओं का सेवन करते रहें। शाम को दवा लेकर सुबह होने वाले खतरे को कम किया जा सकता है।
-शरीर को ऊनी कपड़ों के जरिए गर्म रखें। अधिक समय तक ठंड के संपर्क में रहने से बचें।
-व्यायाम नियमित रूप से करें। ठंड ज्यादा होने पर घर के अंदर ही व्यायाम करें।
-शरीर की सक्रियता को बनाए रखें यानी अपने शरीर का वजन न बढ़ने दें।
-तनाव को दिमाग पर हावी न होने दें। दोस्तों, जीवनसाथी और परिवार के सदस्यों के साथ समय बिताएं।
-मौसमी फलों और हरी सब्जियां भरपूर मात्रा में खाएं। पानी का सेवन पर्याप्त मात्रा में करें।
-गुनगुनी धूप का आनंद लें लेकिन सिर पर अधिक देर तक धूप न लें।
-अगर कोई असुविधा महसूस होती है, तो डॉक्टर से परामर्श लें।
सुबह रहें सजग:-सर्दियों में हृदय रोगियों को सबसे अधिक सुबह के वक्त सजगता बरतने की जरूरत है। ऐसा इसलिए, क्योंकि विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि सर्दियों में दिल का दौरा पड़ने के लगभग 53 प्रतिशत मामले सुबह के समय ही होते हैं। सर्दियों की सुबह के तीन घंटे दिल और हाई ब्लड प्रेशर के मरीजों के लिए भारी पड़ते हैं। इस दौरान ब्लड प्रेशर काफी बढ़ सकता है। ऐसे में जरा-सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है। सर्दियों की सुबह बढ़ता ब्लड प्रेशर केवल बुजुर्गों या बढ़ती उम्र के लोगों को ही परेशान नहीं करता, बल्कि युवा वर्ग भी इसकी चपेट में आ सकता है।गर्मियों की तुलना में सर्दियों में ब्लड प्रेशर न केवल तेजी से बढ़ता है बल्कि तेजी से गिरता भी है। खासकर सर्दियों की सुबह में ब्लड प्रेशर बहुत तेजी से बढ़ता है। इस दौरान दिल की धड़कन और नब्ज भी बहुत तेजी से बढ़ती है। हाई ब्लड प्रेशर और दिल के मरीजों के लिए सुबह के पहले तीन घंटे बेहद अहम होते हैं। दुनियाभर में सर्दियों के दौरान ही सबसे ज्यादा दिल का दौरा पड़ने के मामले सामने आते हैं। भारत में भी दिल का दौरा पड़ने से सबसे ज्यादा मौतें सर्दियों में ही होती हैं। सर्दियों में ही हाई ब्लड प्रेशर बढ़ने के सबसे ज्यादा मामले सामने आते हैं

नई दिल्‍ली। जब देश के सबसे पिछड़े जिलों की बात आती है, तो हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का नाम जरूर आता है, लेकिन प्रकृति की गोद में बसे इस जिले में कई ऐसे पर्यटन स्थल हैं, जो उसे देश-दुनिया के नक्शे पर अलग पहचान दिलाते हैं। इन्हीं में एक नाम है डलहौजी का। ब्रिटिश शासनकाल में अस्तित्व में आए इस शहर के दीदार के लिए हर साल हजारों सैलानी आते हैं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के बावजूद यहां के लोगों का हौसला फौलाद की तरह मजबूत है।देवदार और चीड़ के हरे-भरे पेड़ों से इस शहर की सुंदरता और बढ़ जाती है। पर्यटन के साथ- साथ यहां देश के बेहतरीन बोर्डिंग स्कूल भी हैं। चाहे सर्दी का मौसम हो या गर्मी का, हर मौसम में कुदरत मेहरबान है इस शहर पर। यहां आकर छुट्टियां बिताना यादगार बन जाता है। इन दिनों ठंड के साथ इस इलाके में बर्फबारी की शुरुआत भी हो चुकी है। चीड़ और देवदार के पेड़ों, झीलों और झरनों वाले हिमाचल प्रदेश के डलहौजी शहर को कभी अंग्रेजों ने बसाया था। यदि आप छुट्टियां बिताने और बर्फबारी का आनंद लेने की योजना बना रहे हैं तो चले आइए इस खूबसूरत शहर में। चलते हैं डलहौजी के सफर पर...
लॉर्ड डलहौजी कभी नहीं आए:-ब्रिटिश काल में अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड डलहौजी ने पर्यटन नगरी डलहौजी को एक सेनेटोरियम (स्वास्थ्यवर्धक स्थान) के रूप में बसाया था, लेकिन यह बात भी इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि डलहौजी शहर को बसाने वाले और जिनके नाम पर इस स्थान का नाम पड़ा है, वह अंग्रेज अधिकारी लॉर्ड डलहौजी कभी यहां आये ही नहीं। वर्ष 1850 में शहर को बसाने के लिए चंबा के तत्कालीन राजा व ब्रिटिश सरकार के बीच एक लीज पर हस्ताक्षर हुआ था, जिसके तहत वर्ष 1854 में पांच पहाड़ियों काठगोल, पोट्रेयन, टिहरी, बकरोटा और बेलम पर डलहौजी शहर को बसाया गया। उन दिनों अंग्रेज अधिकारी गर्मियों में यहां छुट्टियां बिताने आते थे। उसी दौरान सुभाष चौक, गांधी चौक व बैलून कैंट में कई चर्च भी बनाए गए थे।
अतीत की इबारत;-यहां अंग्रेज अधिकारी पूरे रौब के साथ रहते थे। सड़कों पर अंग्रेज अधिकारियों के गुजरने पर भारतीय लोगों को दुकानों व घरों के अंदर छिपना पड़ता था। यह भी कहा जाता है कि अंग्रेजी हुकूमत के दौरान डलहौजी की सड़कों पर भारतीय लोगों को घोड़े पर सवार होकर गुजरने पर भी पाबंदी थी। शहर के सबसे पुराने रिहायशी इलाके बाजार में कई पुरानी इमारतों पर अतीत की इबारत पढ़ी जा सकती है। सदर बाजार में लाला अमीर चंद द्वारा वर्ष 1930 में स्थापित किया गया जनरल स्टोर आज भी मौजूद है। वहीं सुभाष चौक में 1939 में मास्टर मोहनलाल खोसला की हलवाई की दुकान, जो खोसला स्वीट्स के नाम से मशहूर थी, अब फ्रेंडस शेर-ए-पंजाब फूड कॉर्नर का रूप ले चुकी है।हालांकि आधुनिकता के बीच बेशक यहां नए भवनों ने जगह ले ली है लेकिन अतीत की गूंज आज भी सुनी जा सकती है। इस शहर के साथ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद भगत सिंह के चाचा देशभक्त सरदार अजीत सिंह सहित महान लेखक व कवि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के नाम भी जुड़े हैं, जिन्होंने नैसर्गिक सौंदर्य से लबरेज डलहौजी में काफी समय बिताया था। कहा जाता है कि युवावस्था में डलहौजी प्रवास के बाद बंगाल जाने पर उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी थी।
कमी नहीं नजारों की:-डलहौजी से करीब सात किलोमीटर दूर बनीखेत के ईको पार्क में लगे रंग-बिरंगे फाउंटेन व झूले भी पर्यटकों को अपनी ओर बरबस आकर्षित करते हैं। बकरोटा हिल्स के समीप डलहौजी पब्लिक स्कूल के निदेशक कैप्टन जीएस ढिल्लो द्वारा अपनी माता की स्मृति में स्थापित किया गया बिजी पार्क भी पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य केंद्र है जो कि सभी माताओं को समर्पित है।
नजारे और भी है
पंजपुला;-डलहौजी के गांधी चौक से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित पंजपुला में स्थित देशभक्त सरदार अजीत सिंह की समाधि है। यहीं आप साहसिक पर्यटन का भी आनंद ले सकते हैं। रिवर क्रॉसिंग, हाइकिंग, ट्रैकिंग के साथ-साथ बच्चों के लिए झूलों की भी व्यवस्था है। पंजपुला का नजारा बेहद हसीन है। यहां आसपास कई सुंदर रिजॉर्ट हैं जहां ठहरकर डलहौजी की खूबसरती को आप तसल्ली से निहार सकते हैं।
सुभाष बावड़ी;-गांधी चौक से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर सुभाष बावड़ी है। कहते हैं इस बावड़ी का जल पीने से नेताजी सुभाष चंद्र बोस को स्वास्थ्य लाभ हुआ था, जिसके चलते बावड़ी का नाम सुभाष बावड़ी रखा गया। शहर में आने वाले सैलानी यहां आना नहीं भूलते।
डैनकुंड:-डलहौजी से करीब 12 किलोमीटर की दूरी पर डैनकुंड स्थित है। डैनकुंड के समीप ही स्थित है फ्लावर वैली। यहां खिलने वाले विभिन्न प्रकार के फूलों की प्रजाति की वजह से यह काफी विख्यात है। खज्जियार जाने वाले पर्यटक डैनकुंड व फ्लावर वैली जरूर आते हैं।
कालाटोप;-डलहौजी से करीब आठ किलोमीटर की दूरी पर कालाटोप वन्यप्राणी संरक्षण क्षेत्र स्थित है। यहां पर्यटकों के ठहराव के लिए वन निगम का गेस्ट हाउस व निजी कैंपिंग साइट्स मौजूद हैं। देवदार के घने वन क्षेत्र के बीचोबीच स्थित कालाटोप में कुछ समय व्यतीत करना काफी सुकून भरा अनुभव होता है। यहां पर्यटक वन्य प्राणियों को भी करीब से निहार सकते हैं, लेकिन वन विभाग की अनुमति के बिना आप यहां नहीं जा सकते। यह अनुमति कालाटोप से पहले लक्कड़मंडी में स्थित वन विभाग के कार्यालय से यहां जाने से पहले ली जा सकती है।
यहीं है ‘मिनी स्विट्जरलैंड;-डलहौजी से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर विश्वविख्यात पर्यटन स्थल खजियार है। यह ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ के नाम से भी जाना जाता है। दरअसल, स्विट्जरलैंड की खूबसूरत पहाडिय़ां, चारों तरफ हरियाली, नदियां और झीलें दुनिया भर में मशहूर हैं। खुद स्विट्जरलैंड के तत्कालीन राजदूत ने यहां की खूबसूरती से आकर्षित होकर सात जुलाई, 1992 को इस जगह को हिमाचल प्रदेश के ‘मिनी स्विट्जरलैंड’ का नाम दिया था। यहां का मौसम, चीड़ और देवदार के ऊंचे-लंबे पेड़, हरियाली, पहाड़ और वादियां स्विट्जरलैंड का एहसास कराती हैं। हजारों साल पुराने इस हिल स्टेशन को, खज्जी नागा मंदिर के लिए भी जाना जाता है। यहां नागदेव की पूजा होती है।खजियार का आकर्षण चीड़ व देवदार के वृक्षों से ढकी झील भी है। झील के चारों ओर हरी-भरी मुलायम और आकर्षक घास इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। झील के बीच में टापूनुमा दो स्थान हैं। वैसे तो खजियार में तरह-तरह के रोमांचक खेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन गोल्फ के शौकीनों के लिए यह स्थान अधिक अनुकूल है।
तलेरू बोटिंग प्वाइंट:-डलहौजी से करीब 32 किलोमीटर की दूरी पर तलेरू बोटिंग प्वाइंट है, जहां जलक्रीड़ा की गतिविधियों का आयोजन होता है। बोटिंग प्वाइंट पर पर्यटक स्पीड बोट, क्रूज आदि की सवारी का आनंद ले सकते हैं। पर्यटक यहां विशाल तलेरू झील पर बोटिंग करते हुए नैसर्गिक नजारों का आनंद लेते हैं।
गर्म सड़क:-नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आदमकद प्रतिमा के बिल्कुल साथ में ही गर्म सड़क स्थित है। यह सड़क गांधी चौक तक जाती है। चूंकि इस सड़क पर सूरज की पहली किरण पड़ती है और देर शाम तक यहां धूप रहती है, इसलिए इस सड़क का नाम गर्म सड़क पड़ा है। इस सड़क के कुछ स्थानों पर बौद्ध धर्म के लोगों द्वारा बौद्ध धर्म से संबंधित भित्ति चित्र भी बनाए गए हैं। जाहिर है यह काफी खूबसूरत नजर आता है।
ठंडी सड़क:-सुभाष चौक की गर्म सड़क की पहाड़ी की दूसरी ओर ठंडी सड़क है। यहां सूर्य की रोशनी की किरण बहुत देर बाद पहुंचती हैं और शाम को अंधेरा भी जल्दी हो जाता है। सर्दियों के दिनों में इस सड़क पर जमी बर्फ कई दिनों तक नहीं पिघलती।
शॉपिंग भी है खास:-डलहौजी आने वाले पर्यटक यहां गर्म कपड़े, चंबा चप्पल, चंबा जरीस (एक तरह की मिठाई), चंबा चुख (लाल व हरी मिर्च से तैयार मिश्रण), आर्टीफिशियल ज्वेलरी, चंबा शॉल, पीतल व तांबे से निर्मित कलाकृतियां खरीद सकते हैं।
तिब्बती मार्केट में करें खरीदारी :-गांधी चौक के समीप तिब्बती मार्केट में आप हर तरह के उत्पाद खरीद सकते हैं। इस संकरे, मगर लंबे मार्केट में दोनों ओर कई दुकानें स्थित हैं, जहां पर्यटकों की भीड़ रहती है। रेडीमेड कपड़े, जूते, आर्टिफिशियल ज्वेलरी, लकड़ी के उत्पाद आदि की खरीदारी यहां से की जा सकती है। इसी तरह एक और तिब्बती मार्केट डलहौजी बस स्टैंड के समीप भी है। बस स्टैंड के करीब ही होटल माउंट व्यू परिसर में आप एंटीक शॉप में पीतल व तांबे से बनी विभिन्न प्रकार की प्रतिमाएं खरीद सकते हैं। यहीं पेंटिंग्स व लोकल हैंडमेड चॉकलेट भी उपलब्ध हैं।
चंबियाली धाम का गजब स्वाद:-डलहौजी चूंकि पहाड़ी इलाका है, लिहाजा यहां के खास व्यंजन भी पहाड़ी ही हैं। उनमें चंबियाली धाम में शामिल होने वाला व्यंजन मदरा पर्यटकों को खूब पसंद आता है जबकि चंबियाली धाम में बनने वाले अन्य व्यंजन कढ़ी, मकई के लड्डू और खट्टे को भी पर्यटक चाव से खाते हैं। पर्यटकों के लिए विशेष रूप से चंबियाली धाम परोसने के लिए डलहौजी के सुभाष चौक में हरीश महाजन द्वारा चंबियाली रेस्तरां (हिमाचली फूड नाम से) भी शुरू किया गया है। हालांकि यहां चाइनीज फूड कॉर्नर भी काफी संख्या में हैं, जिनमें से बस स्टैंड के समीप तिब्बती युवक येशी के मोमोज, चाउमिन इत्यादि पर्यटकों व स्थानीय लोगों को खूब पसंद आते हैं। पंजपुला में रेहड़ी पर मिलने वाली फ्रूट चाट व न्यूट्री कुलचा का स्वाद भी खूब लुभाता है।
कैसे पहुंचें?:-दिल्ली, जम्मू, अमृतसर, पठानकोट व गगल (धर्मशाला) तक हवाई मार्ग और उससे आगे बस या टैक्सी के माध्यम से पहुंचा जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए पठानकोट तक ट्रेन से आ सकते हैं। दिल्ली से डलहौजी 564 किमी., चंडीगढ़ से 325 किमी., पठानकोट से 82 किमी. तथा कांगड़ा एयरपोर्ट से 120 किमी. की दूरी पर है।
कहां ठहरें?;-ठहरने के लिए सरकारी विश्राम गृह उपलब्ध हैं। पर्यटकों की सुविधा के अच्छे व मध्यम दर्जे के कई होटल व लॉज भी हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार की होम स्टे योजना के तहत डलहौजी शहर व इसके आसपास के क्षेत्रों में अब कई होम स्टे भी खुल चुके हैं।
कब आएं डलहौजी घूमने?:-वैसे तो वर्ष भर में कभी भी यहां घूमने आया जा सकता है, परंतु बर्फ देखने की इच्छा हो तो जनवरी में आ सकते हैं। आमतौर पर अप्रैल से दिसंबर तक डलहौजी आना बेहतर है।

 

 

 

डिब्रूगढ़। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन के मौके पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बने देश के सबसे लंबे और एशिया के दूसरे सबसे लंबे रेल-सड़क पुल बोगीबील ब्रिज का उद्घाटन करेंगे। यह पुल ब्रह्मपुत्र नदी के उत्तर तथा दक्षिणी तटों को जोड़ता है। वाजयेपी के जन्मदिवस 25 दिसंबर को मनाये जाने वाले सुशासन दिवस के दिन देशवासियों को इसकी सौगात मिलेगी।इस पुल की आधारशिला 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा ने रखी थीं, लेकिन इसका निर्माण अप्रैल 2002 में शुरू हो पाया था। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने रेलमंत्री नीतीश कुमार के साथ इसका शिलान्यास किया था।पूर्वोत्तर के राज्य असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस बोगीबील पुल की लंबाई 4.94 किलोमीटर है। यह पुल नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित डिब्रूगढ़ जिले को अरुणाचल प्रदेश की सीमा से लगते धेमाजी जिले के सीलापथार को जोड़ता है। पुल के बनने के बाद अरुणाचल प्रदेश से चीन की सीमा तक पहुंचना आसान हो जाएगा।
5800 करोड़ रुपये आएगी लागत:-चीफ इंजीनियर मोहिंदर सिंह ने बताया कि डिब्रूगढ़ शहर से 17 किलोमीटर दूरी पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बने बोगीबील पुल की अनुमानित लागत 5800 करोड़ रुपये है। इस पुल का निर्माण अत्याधुनिक तकनीक से किया गया है। इसके बन जाने से ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी और उत्तरी किनारों पर मौजूद रेलवे लाइने आपस में जुड़ जाएंगी। पुल के साथ ब्रह्मपुत्र के दक्षिणी किनारे पर मौजूद धमाल गांव और तंगनी रेलवे स्टेशन भी तैयार हो चुके हैं।
कई अड़चनों के बाद पूरा हुआ पुल:-पिछले 21 वर्षों में इस पुल के निर्माण को पूरा करने के लिये कई बार समय-सीमा तय की गई। लेकिन अपर्याप्त फंड, तकनीकी अड़चनों के कारण कार्य पूरा नहीं हो सका। कई बार विफल होने के बाद आखिरकार इस साल एक दिसंबर को पहली मालगाड़ी के इस पुल से गुजरने के साथ इसका निर्माण कार्य पूर्ण घोषित हुआ। तीन लेन की सड़क और दो रेलवे ट्रैक वाले इस पुल के निर्माण से अरुणाचल प्रदेश में चीन की लगती सीमा तक पहुंचना आसान हो जाएगा। इससे सैन्य साजो सामान पहुंचाने में भी सहूलियत होगी।
रेल, रोड की दूरी होगी कम:-इस पुल के बनने से डिब्रूगढ़ और अरुणाचल प्रदेश के बीच रेल की 500 किलोमीटर की दूरी घटकर 400 किलोमीटर रह जाएगी। जबकि ईटानगर के लिए रोड की दूरी 150 किमी घटेगी। इस पुल के साथ कई संपर्क सड़कों तथा लिंक लाइनों का निर्माण भी किया गया है। इनमें ब्रह्मपुत्र के उत्तरी तट पर ट्रांस अरुणाचल हाईवे तथा मुख्य नदी और इसकी सहायक नदियों जैसे दिबांग, लोहित, सुबनसिरी और कामेंग पर नई सड़कों तथा रेल लिंक का निर्माण भी शामिल है।
दिल्ली से बढ़ेगी रेल कनेक्टिविटी;-तिनसुकिया के मंडल वाणिज्य प्रबंधक शुभम कुमार के अनुसार इस पुल के बनने से दिल्ली से डिब्रूगढ़ की रेल से दूरी तीन घंटे कम हो जाएगी। अब ट्रेन डिब्रूगढ़ से गुवाहाटी होते हुए नाहरलगुन (अरुणाचल) पहुंचाएगी। ज्यादा ट्रेने चल पाएंगी। अभी दिल्ली से नाहरलगुन वीकली ट्रेन चलती है।25 दिसंबर को प्रधानमंत्री तिनसुकिया-नाहरलगुन (15907-15908 ) इंटरसिटी ट्रेन का भी उद्घाटन करेंगे । ये 14 कोच की ट्रैन साढ़े पांच घन्टे लेगी। इससे असम के धीमाजी, लखीमपुर के अलावा अरुणाचल के लोगों को भी फायदा होगा। आगे एक राजधानी बोगीबील से धीमाजी होते हुए दिल्ली के लिए चलाई जा सकती है।
पंजाब, हरयाणा से बढ़ेगी अनाज की ढुलाई:-अभी असम से कोयला, उर्वरक और स्टोन चिप्स की रेल से सप्लाई उत्तर व शेष भारत को होती है। जबकि पंजाब, हरयाणा से अनाज यहां आता है। इस पुल के बनने से इनमें बढ़ोतरी के साथ रेलवे की आमदनी बढ़ने की संभावना है।
नई तकनीक, उपस्करों का इस्तेमाल
-पुल के निर्माण में 80 हजार टन स्टील प्लेट्स का इस्तेमाल हुआ।
-देश का पहला फुल्ली वेल्डेड पुल जिसमें यूरोपियन मानकों का पालन हुआ है।
-हिंदुस्तान कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन ने मैग्नेटिक पार्टिकल टेस्टिंग, ड्राई पेनिट्रेशन टेस्टिंग तथा अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग जैसी आधुनिकतम तकनीकों का इस्तेमाल किया।
-बीम बनाने के लिए इटली से विशेष मशीन मंगाई गई।
-बीम को पिलर पर चढ़ाने के लिए 1000 टन के हाइड्रॉलिक और स्ट्रैंड जैक का इस्तेमाल किया गया।
-पुल के 120 साल चलने की आशा है।

नई दिल्‍ली। दोस्तो, क्या आपको भी मैथ्स यानी गणित से डर लगता है? गणित के सवालों को हल करने से बचना चाहते हैं? किसी तरह इसमें पास हो पाते हैं? कम नंबर आने पर स्कूल और घर में अक्सर डांट खाने को मिलती है? जाहिर है, बहुत से बच्चों-किशोरों का उत्तर हां में ही होगा। आज हम गणित को जीने वाले महान गणितज्ञ के जीवन की कुछ झलकियों के जरिए जानेंगे कि कैसे गणित बोरिंग और डराने वाला बिल्कुल नहीं है। अगर इसमें थोड़ी-सी रुचि ली जाए और थोड़ा अभ्यास करें तो डर को दूर कर इसे अपनी ताकत बनाकर टीचर-पैरेंट्स के साथ दोस्तों को भी चौंकाया जा सकता है।
चारों ओर है नंबर का चक्कर:-हमारी दिनचर्या में संख्याएं कई बार आती रहती हैं। चाहे क्रिकेट के खेल में बनने वाले रन हों या फिर बस, ट्रेन या कैब का किराया, सबके साथ संख्याएं जुड़ी हैं। इसरो जब कोई सैटेलाइट छोड़ता है, तो वहां उलटी गिनती की जाती है। जिन्हें लिखना-पढ़ना बिल्कुल भी नहीं आता, वे भी बड़ी खूबी से रुपये-पैसे गिन लेते हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि गणित उनकी रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा है, जिसे वे रुचि लेकर करते हैं।
तकनीक के लिए जरूरी टूल:-आज आप गूगल मैप के जरिए सिर्फ अपने देश का ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का चक्कर लगा सकते हैं। आपके चेहरे से आपको जिस तरह फेसबुक पर टैग कर दिया जाता है, वह गणित की क्रिप्टोग्राफी का कमाल है। गेमिंग में वेक्टर और थ्री डायमेंशन ज्यामिति का इस्तेमाल करके आपके पसंदीदा गेम्स बनाए जाते हैं। बैंकिंग में क्रेडिट कार्ड या डेबिट कार्ड से पैसे का कहीं भी लेनदेन करना, ये सब गणित की वजह से ही संभव हो पाता है। लेजर रे से ऑपरेशन करना हो या डिजिटल तकनीक से संदेश भेजने हों, गणित के बिना संभव नहीं है। गूगल, फेसबुक जैसी कंपनियां डाटा एनालिसिस के लिए गणित के जानकार लोगों को अपने यहां रखती हैं। जीपीएस, रिमोट सेंसिंग, ऑपरेशन रिसर्च, इमेजिंग, एक्चुरियल साइंस जैसे क्षेत्रों में गणित के जानकारों की जबर्दस्त मांग है।
बचपन से ही गणित की दीवानगी:-देश के प्रख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन बचपन से ही गणित के दीवाने थे। एक बार तमिलनाडु के कुंभकोणम के सरकारी स्कूल में कक्षा 3 में शिक्षक पढ़ा रहे थे कि किसी संख्या को उसी संख्या से भाग देने पर भागफल हमेशा 1 ही आता है। तभी बालक रामानुजन ने तपाक से सवाल किया कि सर अगर शून्य को शून्य से भाग दिया जाए तो क्या तब भी भागफल 1 ही आएगा? यही बालक श्रीनिवास रामानुजन आगे चलकर गणितज्ञ के रूप में दुनियाभर में मशहूर हुआ। उनकी जीवनी हमें अपने जीवन में जिज्ञासु होने की प्रेरणा देती है और यह सिखाती है कि आप गणित से प्रेम तभी कर सकते हैं, जब मन में हरदम कुछ नया सीखने की लालसा हो।
अभाव में भी निखरी चमक:-22 दिसंबर, 1887 को तमिलनाडु के एक छोटे से गांव इरोड में जन्मे रामानुजन का परिवार बेहद गरीब था। पिता दुकान में नौकरी करते थे और मां मंदिर में भजन गाती थीं, जहां मिले प्रसाद से घर के एक समय का भोजन चलता था। आमदनी के लिए घर के दो कमरों में से एक को किराये पर छात्रों को दे दिया गया था। गणित से गहरा लगाव होने के कारण चौथी कक्षा में पढ़ते समय ही रामानुजन अपने घर रहने वाले 10वीं के छात्रों की किताब पढ़ते, उनसे लाइब्रेरी से नई-नई किताबें मंगवाते। कुछ ही समय में वह अपनी से ऊंची कक्षा के उन छात्रों को त्रिकोणमिति जैसा दुरुह विषय पढ़ाने लगे। कक्षा 10 में आने पर उन्हें जीएस कार की किताब पढ़ने को मिली, जिसमें लिखे 6 हजार प्रमेय को उन्होंने हल कर दिखाया। उनकी प्रतिभा देख, उनके शिक्षक ने लिखा कि अब मेरे पास ऐसा कोई ज्ञान नहीं, जो मैं इसे दे सकूं और अगर मुझे 100 अंक के पेपर में 1000 अंक देने की छूट हो, तो ये अंक मैं रामानुजन को देना चाहूंगा।
फेल होने पर छोड़ा घर:-कक्षा 10 तक प्रथम आने वाले रामानुजन जब 11वीं कक्षा में आए, तो उन्हें गणित को छोड़कर अन्य सभी विषयों में शून्य अंक मिले। इस असफलता से हताश होकर वह घर से भाग गए और आत्महत्या तक का प्रयास किया। इसके बाद बिना 12वीं किए मद्रास पोर्ट पर क्लर्क की नौकरी कर ली, पर खाली समय में गणित पर शोध जारी रखा।
हार्डी ने पहचानी प्रतिभा :-वर्ष 1913 में महज 23 साल की उम्र में रामानुजन ने अपने 20 प्रमेय को ब्रिटेन के मशहूर गणितज्ञ जीएच हार्डी (1877-1947) को भेजा। हार्डी ने इस छिपे हीरे को पहचान लिया और उन्होंने रामानुजन को आगे पढ़ने और तराशने के लिए कैंब्रिज बुला लिया। वहां हार्डी और अन्य उच्च स्तरीय गणितज्ञों के साथ पार्टीशन नंबर, हाइपरजियोमेट्रिक सीरीज, जीटा फंक्शन, मोक थीटा फंक्शन आदि पर शोध किया। वहां रहते हुए उन्होंने 3900 से अधिक प्रमेय की खोज की, जिनके लिए आज भी पूरे विश्व को उन पर नाज है। उनके खोजे इन प्रमेयों पर आज भी दुनिया के लाखों अध्येता शोध कर रहे हैं।
क्या है रामानुजन-हार्डी संख्या:-इंग्लैंड प्रवास के दौरान रामानुजन की तबीयत अक्सर खराब रहती थी। एक बार जब वह अस्पताल में भर्ती थे, तो उन्हें देखने प्रोफेसर हार्डी आए और मजाक में उनसे कहा कि वह जिस टैक्सी में उनसे मिलने आए, उसका नंबर 1729 बड़ा ही नीरस है। इस पर बीमार अवस्था में भी रामानुजन ने अपनी गणितीय प्रतिभा दिखाते हुए कहा कि यह ऐसी सबसे छोटी संख्या है, जिसे दो अलग-अलग संख्याओं के घन के रूप में व्यक्त किया जा सकता है (1729=1³+12³=9³+10³)। बाद में 1729 को रामानुजन-हार्डी संख्या के नाम से प्रसिद्धि मिली।
संख्याओं से प्यार:-रामानुजन को संख्याओं से बेहद प्यार था। वे उन्हें अपना दोस्त मानते थे। उन्होंने अपने जीवन में सिर्फ तीन कॉपी लिखी, जिसमें करीब 4000 प्रमेय का संग्रह है। बाद में इन्हें अमेरिकी गणितज्ञ ब्रूस बर्न और जॉर्ज एंड्रयू ने हल किया और इस किताब का नाम रखा 'लास्ट नोटबुक ऑफ रामानुजन'। आज उनका घर म्यूजियम बन चुका है, जिसे देखने बच्चे-किशोर-युवा सभी आते हैं।
राष्ट्रीय गणित दिवस (22 दिसंबर):-22 दिसंबर, 2012 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश के प्रमुख गणितज्ञ रहे श्रीनिवास रामानुजन के जन्मदिन 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस और उस वर्ष (2012) को राष्ट्रीय गणित वर्ष मनाने की घोषणा की थी। मात्र 32 वर्ष की अल्पायु (1887-1920) में गणित के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले रामानुजन का पूरा विश्व ऋणी हैं।
गेम्स के पीछे भी तो मैथ्स होता है- डॉ डीके सिन्हा:-जागरण पब्लिक स्कूल, नोएडा के प्रधानाचार्य डॉ डीके सिन्हा के अनुसार आप सभी को गेम खेलने में बहुत मजा आता है न। पर क्या आपको भी गणित का भय सताता है? क्यों भाई? गेम्स के पीछे भी तो मैथ्स का ही हाथ है। आज गूगल मैप से लेकर जीपीस और गेमिंग से लेकर रिमोट सेंसिंग और एक्चुरियल साइंस व डाटा एनालिस्ट तक के तमाम काम गणित के बिना नहीं हो सकते। सबसे बड़ी बात कि हमें रोज रुपये-पैसे का हिसाब करने के लिए भी तो इसी की जरूरत पड़ती है। फिर गणित से डरना कैसा?
रुचि से भागेगा मैथ्स का डर- डॉ चंद्रमौलि जोशी:-ऑल इंडिया रामानुजन मैथ्स क्लब, राजकोट, गुजरात के प्रख्यात गणितज्ञ एवं चेयरमैन डॉ चंद्रमौलि जोशी कहते हैं कि देश के सभी बच्चों से मेरा यही अनुरोध है कि वे गणित से डरें नहीं। प्रतिदिन अभ्यास द्वारा समस्याओं को हल करें। मैं मानता हूं कि बच्चों के मन में व्याप्त मैथ्स फोबिया को दूर कर उनकी इस विषय में रुचि उत्पन्न करना आवश्यक है। इसे सरल शिक्षण विधियों एवं वर्किंग मॉडल्स द्वारा पढ़ाया जाए। इन शिक्षण विधियों का विकास श्रेष्ठ गणितज्ञों से परामर्श कर किया जा रहा है। ऑल इंडिया रामनुजन क्लब में देश की 19 भाषाओं में गणित अध्यापन प्रशिक्षण हेतु प्रशिक्षक हैं। इन्हें कार्यशालाओं में बुलाकर गणित की शार्ट ट्रिक्स को सीखा जा सकता है। वैदिक गणित के जरिए भी शॉर्ट ट्रिक से सीखा जा सकता है। इस क्षेत्र में इंजीनियरिंग, आइआइटी सहित बहुत सारे विकल्प उपलब्ध हैं।
ये भी हैं मैथ्स के धुरंधर
अगनिजो बनर्जी- कोलकाता में जन्मे भारतीय मूल के स्कॉटिश छात्र 17 वर्षीय अगनिजो बनर्जी को गणित से इतना लगाव है कि इन्होंने डेविड डार्लिंग के साथ मिलकर वियर्ड मैथ्स नाम से एक किताब ही लिख डाली है। इसमें गणित को बेहद सरल तरीके से समझाया गया है। इसी वर्ष इंटरनेशनल मैथ्स ओलंपियाड में परफेक्ट 42 स्कोर करने वाले अगनिजो एंटी बुलिंग क्रूसेडर भी हैं। इन्हें स्पोट्र्स बिल्कुल भी पसंद नहीं। वे ट्रिनिटी कॉलेज से प्योर मैथमेटिक्स की पढ़ाई कर रहे हैं।
प्रो. ऋताब्रत मुंशी- कोलकाता स्थित इंडियन स्टैस्टिकल इंस्टीट्यूट के प्रो. ऋ ताब्रत मुंशी को द इंटरनेशनल सेंटर फॉर थ्योरिटिकल फिजिक्स ने 2018 के रामानुजन प्राइज फॉर यंग मैथमेटिशियन अवॉर्ड से नवाजा है। प्रो. मुंशी को नंबर थ्योरी में उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए यह सम्मान दिया गया। इससे पहले 2015 में इन्हें शांति स्वरूप भटनागर सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। 2016 में इनका चयन इंडियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के फेलो के तौर पर हुआ।
अक्षय वेंकटेश- दिल्ली में जन्मे और ऑस्ट्रेलिया में बसे अक्षय को गणित में उनके योगदान के लिए फील्ड्स मेडल से नवाजा जा चुका है। इसे गणित का नोबल प्राइज भी कहा जाता है। अक्षय को बचपन से ही गणित एवं भौतिक विज्ञान में गहरी रुचि रही है। 13 वर्ष की उम्र में इन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली थी। 16 वर्ष की उम्र में ये गणित में फस्र्ट क्लास ऑनर्स कर चुके थे और 20 वर्ष की आयु में पीएचडी।

नई दिल्ली। श्रीनिवास रामानुजन एक महान भारतीय गणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए अथवा भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।टीबी जैसी बीमारी का इलाज उन दिनों सही से नहीं हो पाता था, जिसके चलते रामानुजन का स्वास्थ्य दिन ब दिन गिरता जा रहा था। 1919 में उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा। अब रामानुजन वापस कुंभकोणम में थे। उनका अंतिम समय चारपाई पर ही बीता। इस दौरान भी वे पेट के बल लेटे-लेटे कागज पर तेजी से लिखते रहते थे। काफी उपचार के बावजूद उनके स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आती गई। 26 अप्रैल 1920 को महज 33 साल की उम्र में गणित की कुछ 600 परिणाम वाली नोटबुक के साथ रामानुजन ने सांसार में आखिरी सांस ली। जी हां इतनी कम उम्र में एक भारतीय मेधा ने दुनिया को अलविदा कह दिया। ये सच है कि आज वो हमारे बीच नहीं है लेकिन दुनिया के किसी भी कोने में जब गणितीय प्रमेयों का जिक्र होता है तो रामानुजन बरबस याद आते रहते हैं।
कुछ ऐसे थे रामानुजन:-रामानुजन तमिलनाडु के इरोड शहर के निवासी थे। अपनी प्रारंभिक शिक्षा के दौरान रामानुजन अपने मित्रों की गणित की उलझनों को चुटकी में समझा देते थे। सातवीं कक्षा में आते आते रामानुजन ग्रेजुएशन के छात्रो को गणित पढ़ाने लग गये थे। उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो उनके विद्यालय के हेडमास्टर ने यह तक कह दिया की विद्यालय में होने वाली परीक्षाओं के पैमाने रामानुजन के लिए लागू नहीं होते थे।1898 में रामानुजन ने जब हाईस्कूल में दाखिला लिया तब उन्हें गणितज्ञ जीएस कार की लिखी किताब ‘ए सिनोप्सिस आफ एलीमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स’ पढ़ने का मौका मिला, जिसमे पांच हजार फार्मूले दिए गये थे। रामानुजन को मिली ये किताब उनके लिए ऐसी थी जैसे हफ्तों से भूखें किसी इंसान को रोटी मिल गयी हो। उन्होंने जल्द से जल्द किताब में दिए हुए सारे फार्मूलों को हल कर दिया।
गणित में खोज करना, ईश्वर की खोज करना:-रामानुजन की रुचि गणित में इतनी गहरी थी की वे रात-दिन सुबह शाम संख्याओं के गुणधर्मों के बारे में सोचते रहते थे। अपनी इस सोंच में आये नये सूत्रों को वो कागज में लिख लेते थे। उनका मानना था की गणित से ही ईश्वर का सही स्वरुप स्पष्ट हो सकता है। गणित में खोज करना उनके लिए ईश्वर की खोज करना है।रामानुजन के दिमाग में गणित की ऐसी लत लग गयी थी की उनकी छात्रवृति बंद हो गयी जिसका कारण उनके बाकी विषयो में अच्छे अंक ना आना रहा।1905 में रामानुजन ने मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल हुए लेकिन गणित को छोड़कर बाकी विषयों में फेल हो गए।1906 और 1907 की प्रवेश परीक्षा का भी यही परिणाम रहा। लेकिन इसके बाद भी गणित के प्रति प्रेम में कमी नहीं आई।1909 में रामानुजन की शादी हो गयी जिसकी वजह से घर चलाने का पूरा जिम्मा रामानुजन के ऊपर आ पड़ा और वे नौकरी ढूंढने लगे। इसी दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए।नेल्लोर के कलेक्टर और ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उनमें से एक थे। राव के साथ उन्होंने एक साल तक काम किया। इसके लिए उन्हें 25 रुपये महीना मिलता था। इस दौरान रामानुजन इयंगर ने ‘इंडियन मैथमैटिकल सोसायटी’ के जर्नल के लिए प्रश्न और उनके हल तैयार करने का काम किया। 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से उन्हें शोहरत मिली। 1912 में उन्हें मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई।
हार्डी बने सफलता के आधार;-1913 में हार्डी के एक पत्र के आधार पर रामानुजन को मद्रास विश्वविद्यालय से छात्रवृत्ति मिलने लगी। अगले साल ही हार्डी ने रामानुजन के लिए कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज आने की व्यवस्था कर दी। रामानुजन ने गणित में जो कुछ भी किया था वह सब अपने बलबूते किया था। हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा अपने सिर पर लिया। ये बात अलग थी कि बाद में हार्डी ने कहा कि उन्होंने रामानुजन को सिखाया, उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया। 1916 में रामानुजन ने कैम्ब्रिज से बीएससी की डिग्री ली। इसी दौरान रामानुजन और हार्डी का काम गणित की दुनिया की सुर्खियां बनने लगा था। रामानुजन के लेख मशहूर पत्रिकाओं में छपने लगे थे। 1918 में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, तीनों का फेलो चुना गया।
ये हैं रामनुजन की कामायबी:-लैंडा-रामानुजन स्थिरांक, रामानुजन्-सोल्डनर स्थिरांक, रामानुजन् थीटा फलन, रॉजर्स-रामानुजन् तत्समक, रामानुजन अभाज्य, कृत्रिम थीटा फलन, रामानुजन योग जैसी प्रमेय का प्रतिपादन रामानुजन ने किया। इंग्लैंड जाने से पहले भी 1903 से 1914 के बीच रामानुजन ने गणित के 3,542 प्रमेय लिख चुके थे। मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च ने प्रकाशित किया।इलिनॉय विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रोफेसर ब्रूस सी ब्रेंड्ट ने 20 वर्षों तक शोध किया और अपने शोध पत्र को पांच खण्डों में प्रकाशित कराया। घर पर बीमार रहते हुए रामानुजन की लिखी गयी नोटबुक मद्रास विश्वविद्यालय में जमा हो गई थी। बाद में यह प्रोफेसर हार्डी के जरिए ट्रिनिटी कालेज के ग्रंथालय पहुंची। इस नोटबुक में रामानुजन ने जल्दी-जल्दी में लगभग 600 परिणाम प्रस्तुत किए थे लेकिन उनकी उपपत्ति नहीं दी थी।

नयी दिल्ली। दिल्ली समेत पूरा उत्तर भारत शीतलहर की चपेट में है। देश की राजधानी में न्यूनतम तापमान पांच डिग्री सेल्सियस से कम दर्ज किया गया जबकि कश्मीर में 40 दिन का भीषण ठंड का मौसम ‘चिल्लईं कलां’ शुरू हो गया है। राष्ट्रीय राजधानी में शुक्रवार को न्यूनतम तापमान थोड़ी वृद्धि के साथ 4.7 डिग्री सेल्सियस रहा। इससे पहले बृहस्पतिवार चार डिग्री सेल्सियस तापमान के साथ इस मौसम का सबसे सर्द दिन रहा। मौसम विभाग के अधिकारियों ने कहा कि शुक्रवार को न्यूनतम तापमान मौसम के औसत से तीन डिग्री कम रहा और सुबह साढ़े आठ बजे आर्द्रता का स्तर 89 फीसदी दर्ज किया गया। कश्मीर में स्थानीय भाषा में ‘‘चिल्लई कलां’’ कहलाने वाली, 40 दिन की सर्वाधिक भीषण ठंड शुक्रवार को शुष्क मौसम के साथ शुरू हो गयी। घाटी एवं लद्दाख क्षेत्र में शीतलहर का प्रकोप जारी है क्योंकि राज्य में न्यूनतम तापमान जमाव बिंदु से नीचे बना हुआ है।मौसम विज्ञान विभाग के अधिकारियों ने यहां बताया कि ‘चिल्लई कलां’ के दौरान सबसे भीषण ठंड पड़ती है। इस दौरान निरंतर बर्फबारी होती है और अधिकतम तापमान में लगातार गिरावट आती है। शुक्रवार से चिल्लईं कलां की शुरुआत हो गयी।‘चिल्लईं कलां’ की अवधि 31 जनवरी को खत्म होगी। लेकिन इसके बाद भी कश्मीर में शीतलहर जारी रहती है।अधिकारियों ने बताया कि समूचे कश्मीर में मौसम शुष्क बना हुआ है जबकि अधिकतम स्थानों पर रात के तापमान में जमाव बिंदू से नीचे कई डिग्री की गिरावट आयी है।उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर एकमात्र ऐसा स्थान रहा जहां बृहस्पतिवार की रात तापमान में वृद्धि देखी गयी। शहर में न्यूनतम तापमान शून्य से 4.4 डिग्री सेल्सियस नीचे दर्ज किया गया जो एक रात पहले शून्य से नीचे 4.9 डिग्री रहा।पंजाब और हरियाणा में शीतलहर का प्रकोप लगातार जारी है। शुक्रवार को दोनों राज्यों में न्यूनतम तापमान सामान्य से नीचे दर्ज किया गया। पंजाब का आदमपुर दोनों राज्यों में सबसे ठंडा इलाका रहा जहां न्यूनतम तापमान 0.9 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया।मौसम विभाग के मुताबिक फरीदाबाद और बठिंडा में भी कड़ाके की ठंड पड़ रही है। फरीदाबाद में जहां न्यूनतम तापमान 2 डिग्री सेल्सियस पहुंच गया है वहीं बठिंडा का तापमान 2.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। हरियाणा में नारनौल सबसे ठंडा इलाका रहा जहां तापमान 2.5 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया है।

बिलासपुर। करीब पांच हजार करोड़ रुपये का घोटाला कर देश से भागे मेहुल चोकसी के स्वामित्व वाले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में 36 मॉल स्थित गीतांजलि ज्वेलर्स में छापेमारी की गई। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रायपुर ने इसकी जानकारी दिल्ली भेज दी है। ईडी की टीम ने यहां जांच के दौरान एक करोड़ 25 लाख रुपये की ज्वेलरी व विदेशी घड़ियां जब्त की हैं। गौरतलब है कि चोकसी का रिश्तेदार नीरव मोदी पंजाब नेशनल बैंक (पीनएबी) महाघोटाले का मुख्य आरोपित है।छत्तीसगढ़ में अब तक मेहुल चोकसी के तीन संस्थानों में ईडी की टीम ने छापेमारी की है, जिसमें गीतांजलि शोरूम भी शामिल है। मंगलवार की देर रात यहां बंद शोरूम का ताला तोड़कर तलाशी ली गई और सामान जब्त किया गया। पिछले 10 माह से बंद इस शो रूम से इतनी बड़ी मात्रा में ज्वेलरी व घड़ियां जब्त होने के बाद ईडी की टीम भी हैरान है। जब्त सामान में हीरे के साथ ही सोने व प्लेटिनम की ज्वेलरी है।ईडी ने दो दिन पहले रायपुर के सिटी सेंटर माल में छापेमारी के दौरान करीब 55 लाख रुपये के हीरे के जेवर जब्त किए थे। इससे पहले रायपुर में ही विधानसभा रोड स्थित अंबूजा माल के शॉपर्स स्टॉप में भी कार्रवाई की थी। ईडी अफसरों का कहना है कि जब्त ज्वेलरी व घड़ियों की जानकारी दिल्ली स्थित मुख्यालय भेजी गई है। गौरतलब है कि नीरव मोदी और मेहुल चोकसी दोनों ही देश से फरार हो गए हैं। उनके खिलाफ इंटरपोल ने पूर्व में ही रेड कार्नर नोटिस जारी किया है।

नई दिल्ली। सरकार ने विश्व बैंक के ईज ऑफ डूईंग बिजनेस इंडेक्स में पहले पचास देशों की सूची आने की कवायद तेज कर दी है। इसके लिए सरकार ने 11 ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जहां बिजनेस शुरू करने से लेकर उसके संचालन से संबंधित नियमों व प्रक्रिया को और आसान बनाया जाना आवश्यक है। सरकार का इरादा है कि साल 2019 के इंडेक्स में भारत को पहले 50 देशों में स्थान मिले।इस साल अक्टूबर में विश्व बैंक की ईज ऑफ डूईंग बिजनेस इंडेक्स में भारत को 77वां स्थान मिला था। जबकि पिछले वर्ष भारत इस सूची में 100वें स्थान पर था। सरकार मान रही है कि दो साल प्रयासों से दुनिया में भारत की स्थिति काफी मजबूत हुई है। यही वजह है कि सरकार इस साल बिजनेस शुरू और उसका संचालन करने के रास्ते में आ रही बची हुई प्रक्रियागत अड़चनों को दूर करना चाहती है।इलेक्ट्रॉनिक व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक दस्तावेज के मुताबिक ईज ऑफ डूईंग बिजनेस को सरल बनाने के लिए 11 क्षेत्रों की पहचान की गई थी। अब इन क्षेत्रों में चल रही इस कवायद को गति प्रदान करने पर जोर दिया जा रहा है। इनमें बिजनेस शुरू करना, कंस्ट्रक्शन परमिट लेना, बिजली का कनेक्शन लेना, संपत्ति का रजिस्ट्रेशन, कर्ज की सुगमता, अल्पमत निवेशकों के हितों की सुरक्षा, कर भुगतान, विदेशों में कारोबार, करारों पर अमल, विवादों का निपटारा और श्रम संबंधी नियमन शामिल हैं।इस वर्ष सरकार का जोर विवादों का निपटारे और कर्ज की प्रक्रिया को सुगम बनाने पर अधिक है। इसके अतिरिक्त श्रम संबंधी नियमों को भी सरल बनाये जाने पर सरकार का जोर है। सूचना और प्रौद्योगिकी मंत्रालय इन सभी क्षेत्रों में नीतिगत सुधारों को सूचना प्रौद्योगिकी का आधार उपलब्ध कराएगा। सूत्र बताते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने अपने मंत्रालय को उन सभी विभागों की आवश्यकता का पता लगाने का निर्देश दिया है जहां प्रक्रियागत खामियों को दूर करने के लिए टेक्नोलॉजी अपग्रेडेशन की आवश्यकता या संभावना है।सूत्र बताते हैं कि आइटी मंत्रालय ने जो कार्यसूची तैयार की है उसके तहत इन सभी 11 मानकों में शामिल सभी प्रक्रियाओं को मैन्यूअल से ऑनलाइन करना शामिल है। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य आवेदक के मंत्रालयों में टच प्वाइंट को समाप्त करना है। इसके लिए मंत्रालय ने काम तेज कर दिया है और चेकलिस्ट तैयार की जा रही है।बिजनेस शुरू करने से संबंधित प्रक्रियाओं में राज्य सरकारों की सिंगल विंडो सिस्टम के साथ एकीकरण के काम पर फिलहाल जोर है। 11 राज्यों के साथ यह किया जा चुका है। अब शेष राज्यों के साथ एकीकरण करने का काम किया जा रहा है। सूत्र बताते हैं कि इस साल इसे सभी राज्यों में पूर्ण करने का लक्ष्य है। इसी तरह जमीन के रिकार्ड को ऑनलाइन करने को भी अहम माना जा रहा है। 13 राज्यों में इसे अमल में लाया जा चुका है। शेष राज्यों में इसे जल्द से जल्द पूरा करने के प्रयास किये जा रहे हैं।विवादों को निपटाने के लिए ई कोर्ट की अवधारणा पर काम किया जा रहा है। देश के 600 जिलों में 10.55 करोड़ मामले और 7.63 करोड़ ऑर्डर या फैसले ऑनलाइन किये जा चुके हैं। इसकी गति बढ़ाने में भी सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय मदद कर रहा है।

 

 

 

नई दिल्ली। वर्ष 2018 खत्म होने को है। हम वर्ष 2019 में कदम रखने वाले हैं। ऐसे में यह बेहद जरुरी है कि हम सभी अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय निकाल कर 2018 में हुए सिक्योरिटी ब्रीच, डाटा चोरी जैसी घटनाओं पर दोबारा गौर करें। हाल ही में हुए डाटा चोरी की बात करें तो Marriott के करीब 500 मिलियन गेस्ट्स का निजी डाटा चुरा लिया गया था। वहीं, इससे पहले भी कई बड़ी कंपनियों के डाटा लीक होने की खबरें आती रही हैं। ऐसी घटनाओं के बाद कई यूजर्स ने अपने अकाउंट्स के पासवर्ड बदल लिए थे। लेकिन इन सब के वाबजूद भी वर्ष 2018 का सबसे लोकप्रिय पासवर्ड 123456 रहा। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सबसे असुरक्षित पासवर्ड है।
जानें वर्ष 2018 की 100 सबसे खराब पासवर्ड्स की लिस्ट:पावर मैनेजमेंट कंपनी SplashID ने 100 सबसे खराब पासवर्ड्स की वार्षिक लिस्ट जारी की है। इसमें सबसे टॉप पर 123456 पासवर्ड लिस्टेड है। वहीं, इस लिस्ट में दूसरे नंबर पर password लिस्टेड है। तो तीसरा नंबर 123456789 का है। यह पासवर्ड पिछले वर्ष से तीन पायदान ऊपर आ गया है। इसके अलावा qwerty और admin जैसे पासवर्ड्स भी यूजर्स द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। पिछले वर्ष के मुकाबले इनका पायदान ऊपर नीचे होता रहता है। वहीं, इस वर्ष की लिस्ट में 25 नए पासवर्ड्स की एंट्री हुई है। इसमें princess, sunshine, !@#$%^&* और Donald शामिल है।
जानें 25 सबसे खराब पासवर्ड की लिस्ट:इसमें 123456, password, 123456789, 12345678, 12345, 111111, 1234567, sunshine, qwerty, iloveyou, princess, admin, welcome, 666666, abc123, football, 123123, monkey, 654321, !@#$%^&*, Charlie, aa123456, Donald, password1 और qwerty123 शामिल हैं। अगर आप इनमें से कोई पासवर्ड इस्तेमाल कर रहे हैं तो हम सलाह देते हैं कि इन्हें तुरंत बदल लें। क्योंकि हैंकर्स इन पासवर्ड्स के जरिए आपका अकाउंट आसानी से हैक कर सकते हैं।

मुंबई। शाह रुख़ ख़ान की फ़िल्म 'ज़ीरो' हाल ही में रिलीज़ हुई है और दर्शक उसे बहुत पसंद भी कर रहे हैं। क्रिसमस की छुट्टियां, ईयर एंड की ख़ुशी, शाह रुख़ की फ़िल्म जिसमें अनुष्का और कटरीना भी हैं, फ़िल्म के ट्रेलर में इसकी आकर्षित कहानी, इसके गाने और भी कई वजह है इस फ़िल्म को पसंद करने की। और इन सबके बीच एक ख़ास वजह और भी है और वो है श्रीदेवी।आप सभी जानते होंगे कि शाह रुख़ की फ़िल्म 'ज़ीरो' में एक झलक श्रीदेवी की भी है, जिसे द्केहने के लिए उनके फैन्स दीवाने हुए जा रहे हैं। और सिर्फ आम जनता ही नहीं बॉलीवुड इंडस्ट्री भी उनकी एक झलक देखने को बेकरार है। बताते चलें कि इस फ़िल्म में अभिनेत्री करिश्मा कपूर ने भी एक ख़ास अपीयरेंस दिया है और वो श्रीदेवी के साथ स्क्रीन शेयर करते हुए। और हाल ही में करिश्मा ने अपने सोशल अकाउंट पर श्रीदेवी के साथ अपनी तस्वीर शेयर करते हुए बताया है कि वो उन्हें बहुत मिस कर रही हैं।करिश्मा इस तस्वीर में श्रीदेवी के साथ शॉट के लिए रेडी हो रही हैं। करिश्मा ब्लैक कलर की ड्रेस में हैं और श्रीदेवी ग्रीन आउटफिट में बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रही हैं। करिश्मा ने शाह रुख़ और टीम 'ज़ीरो' को श्रीदेवी के साथ काम करने का मौका देने के लिए धवाद भी कहा है।श्रीदेवी और करिश्मा के अलावा इस फ़िल्म में आलिया भट्ट, कहोल और रानी मुखर्जी भी स्पेशल अपीयरेंस में दिखाई देंगी। श्रीदेवी का निधन इसी साल फरवरी में दुबई में हुआ था। उनकी मौत ने सभी को चौंका दिया था और आज भी उनके जाने जे दुःख से उभरे नहीं है। 'चांदनी', 'लम्हें', 'मिस्टर इंडिया', 'चालबाज़', सदमा', इंग्लिश विन्ग्लिश', 'मॉम' जैसी बेहतरीन फ़िल्मों में काम करने वाली श्रीदेवी की 'ज़ीरो' आख़िरी फ़िल्म हैं।

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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