Editor

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-प्रकाश दर्पे
चौधरी जी नितांत सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्ति थे।अक्सर एक ही लिबास में रहते गोया उनके पास एक मात्र यही एक कपड़े की जोड़ी हो। बिना शेविंग के कई दिन गुज़ार देते । थोड़ा पैसा बचाने के चक्कर में दिनभर दौड़ धूप करते नज़र आते। सस्ता राशन व साग सब्ज़ी के लिए दूर दूर तक भटकना उनकी दिनचर्या में शामिल था। एक निहायत पुराने मकान में परिवार के साथ जीवन यापन करते । हालाँकि उनका एक फ़्लैट और भी था जिसे उन्होंने किराए पर दे रखा था । उनकी जीवन शैली मित्र वर्ग में अक्सर चर्चा का विषय बनी रहती।
कभी उनके मित्र गण किसी यात्रा पर जाने का प्रोग्राम बनाते तो वे आर्थिक तंगी का हवाला देकर कन्नी काट लेते। उनको दयनीय व फटेहाल स्थिति में देख सभी उनके बहू बेटे को कोसते । एक अनाम सी सहानुभूति उनके प्रति उपजने लगती। आर्थिक अभाव में रहकर भी बच्चों को पढ़ाया लिखाया । अब वे अपने पाँव पर खड़े है। अब तो उन्हें अपने जीवन के बचे शेष दिन सूखचैन से गुजारना चाहिए। सब उन्हें यही सलाह देते पर वे अनसुना कर देते। एक दिन उन्हें उनके मित्रों ने एक प्रॉपर्टी ब्रोकर के ऑफ़िस से उतरते देख लिया। चौधरी ने बताया कि उन्होंने यहाँ एक फ़्लैट बुक किया है। एक साथी ने पूछा ,” किसलिए?
'बच्चों के लिए थोड़ा इन्वेस्टमेंट कर रहा हूँ। उनके स्वर में अहंकार झलक रहा था।
सुनकर सब दंग रह गए। उनके बारे में एक भ्रम सा था जो टूट गया। वे स्वयं ही जीवन का उत्तरार्ध सुख चैन से जीने के बजाय अपनी भावी पीढ़ी के लिए पैसा जुटाने में लगे थे । शायद जीवन का सुख उन्होंने इसी में तलाश लिया होगा।

ए १०५, गनेशंभंगन
रायकरनगर, धायरि, पुणे ४१
मोब 9922730092, E-mail : pdarpe@gmail.com


-अब्दुल रशीद
गरीब किसान के अमीर नेता जब सुबह अपने मखमली बिस्तर पर बैठकर रेशमी चादर ओढ़े गर्म चाय की चुश्की ले रहे होते हैं तब किसान अपने खेतों में फसलों की रोपाई निराई कर रहा होता है ताकि गन्ने की मिठास से चाय मीठी हो सके, दूध जिसमें चायपत्ती डाल कर उबाली गई है। उस दूध को देने वाली गाय के चारे का इंतजाम हो या फिर चाय की पत्ती का स्वाद जो नेता जी के मूड को फ्रेश करता है उसके लिए भी हाड़तोड़ मेहनत और पसीना किसान ही बहाता है। जिस नर्म बिस्तर पर आप बैठे हैं उसके लिए भी किसान ही अपना हांथ खुरदुरा करता है। सुबह से शाम तक लजीज़ व्यंजन बनाने में लगने वाली सभी सामग्री अनवरत मिलती रहे और उसकी पौष्टिकता से नेता जी सेहतमंद रहें इन सभी चीजों का इंतज़ाम करते करते किसान पूरे परिवार के साथ आधे पेट खेतों में जुटा रहता है।

किसान यह सब इस उम्मीद से करता है कि मैं जब अपना कर्तव्य पूरी निष्ठां और इमानदारी से निभाऊंगा तो मेरा देश विकास करेगा।विकास की गुलाबी धूप हम पर भी पड़ेगी,तब भर पेट भोजन कर पाऊंगा,अपने बच्चों का भविष्य संवार सकूंगा,बेटी की डोली ख़ुशी के आंसू संग विदा कर सकूंगा।

यह सब तभी होगा जब किसानों के प्यासे खेत को पानी मिले,लेकिन जीने के आधुनिक तौर तरीकों और आरामपसंद उद्देश्य की पूर्ति के लिए पर्यावरण का वो हाल कर दिया गया है कि मौसम का मिजाज़ ठीक ही नहीं रहता,ना बारिश समय पर होती है ना ही गर्मी आपे में रहती है,अब तो मेढक मेढकी के ब्याह रचाने से भी कुछ नहीं होता। अच्छी तकनीक,अच्छा बीज बेहतर पैदावार के लिए जरुरी है, लेकिन बगैर पैसे यह संभव नहीं,कर्ज लिया और मौसम का मिज़ाज ठीक नहीं रहा,और फसल बर्बाद हो गई तब.............? सोंच के ही मन घबराने लगता है। देश के गरीब किसान को अमीरों की तरह मुंह छुपा के भागना और नेताओं की तरह गोबर से कोहिनूर निकालना थोड़े ही आता है? आता होता तो आत्महत्या और सीने पर गोली खाकर आकाल मौत थोड़े ही मरते।

बहरहाल चुनावी मौसम है और पांच साल बाद नेता जी किसानों के पास जा कर वोट के लिए लुभावने वायदे और क्षणिक प्रेम का दिखावा करते, हाथ जोड़े मिन्नत करते हुए अपनी सफेदी के चमकार से अपने काले कारनामे झूठे वायदे छुपाने का असफल प्रयास के साथ जब किसानों के चौखट पर खड़े दिखते हैं,तब किसान की पथराई आँखों को देखकर मानों ऐसा लगता है की नेता जी से कह रहे हों, आप ख़्वाब दिखाकर वोट मांगने आए हैं,आपसे विनम्र निवेदन है मेरे लिए विशेष कुछ मत कीजिए,झूठे वायदे मत किजिए, मेरी भावनाओं से मत खेलिए बस एक अर्जी मान लीजिए,जिस तरह मैं निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूं और अनाज पैदा कर रहा हूं, बिना यह सोंचे हुए के इस अन्न से जिसका पेट भरेगा वह अमीर है या गरीब,हिन्दू है या मुसलमान,अगड़ा है या पिछड़ा आप भी बस इतना ही मान लीजिए, देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा।


सिंगरौली मध्यप्रदेश
7805875468
aawazehind@gmail.com


-डॉ प्रदीप उपाध्याय


त्यौहारों का मौसम हो या फिर चुनाव का,आदमी चकरघिन्नी हो जाता है।कभी-कभी लगता है कि ये त्यौहार आते ही क्यूँ हैं!या फिर यह भी कि ये चुनाव करवाये ही क्यूँ जाते हैं।त्यौहार की अपनी आचार संहिता है तो चुनाव की अपनी।और फिर इनमें निषेधात्मक आज्ञाओं को लेकर मैं भी परेशान सा हो जाता हूँ। पटाखे फोडऩे की भी समय सीमा है।समय कब शुरू होता है और कब खत्म किसी को पता ही नहीं है।रास्ते भी बन्द है लेकिन राहगीर को पता ही नहीं चलता कि कब कौन सा रास्ता बन्द है और कौन सा चालू।पैदल चलकर भी कितना रास्ता तय कर पायेंगे।खैर, त्यौहार की अपनी मार है,उसपर चर्चा फिर कभी।अभी तो चुनावी जंजाल की ही बात कर लें क्योंकि ये कभी भी सिर उठाये चले आते हैं,न तीज देखते हैं न त्यौहार, न काम देखते हैं न काज! चुनावों में भी चुनाव चिन्ह की बातें मुझे बहुत ही डराती हैं।लोग कहते हैं कि डरना मना है लेकिन इनमें कई बातों की मनाही कहती हैं कि जरा डरना,मना है!यानी मना है।
चुनावों में गीदड़ भी शेर बन जाते हैं।शेर की खाल ओढ़ने का मौका सदैव नहीं मिलता।अब जब मिला है तो सार्वजनिक स्थानों पर विराजमान हाथी और कमल तो ढंके ही जायेंगे।खुले में बैठे निर्जीव हाथी और शोभायमान कमल से चुनाव नतीजों को प्रभावित करने की आशंका उत्पन्न होती है!इन्हें अदृष्य करने वालों को आशंका थी कि सार्वजनिक स्थान पर हाथी की प्रतिमा देखकर कोई आपत्ति दर्ज न करवा दे!उनकी आशंकाओं ने मुझे भी कई मामलों में सशंकित कर दिया।
एक मतदान केंद्र के सौ मीटर के दायरे में ही मैंने एक छोटा तालाब देखा जिसमें बहुत खुबसूरत कमल के फूल खिल रहे हैं।अब कमल का फूल तो एक पार्टी का चुनाव चिन्ह है।ऐसे में कहीं आपत्ति के मद्देनज़र तालाब को फूल विहीन कर देने का विचार तो नहीं होगा!या फिर पूरे तालाब को ढक देने का विचार।ऐसे कारनामे करने के लिए वे ख्यात भी हैं।यह तो फूल की बात हुई परन्तु बेचारे उन हाथों का क्या होगा जो चुनाव कार्य में संलग्न है।चाहे निर्जीव हाथ हो या सजीव,यदि आपत्ति दर्ज हो गई तो कहीं हाथ के पंजों को दस्तानों में न छुपाना पड़ जाए।और फिर झाडू का क्या करेंगे, स्वच्छता अभियान को छोड़ स्वच्छता से भी हाल फिलहाल की तौबा!घड़ी तो सभी के हाथों में और सार्वजनिक स्थानों पर रहती है,और फिर टेलीफोन या मोबाइल!इनके बिना तो व्यक्ति पूर्णरूपेण दिव्यांग ही हो जाएगा।झोपड़ी पर आपत्ति में क्या झोपड़ियाँ ही ढंक दी जाएगी!क्या हैट पहनकर आने पर प्रवेश निषेध होगा,जग में पानी भरकर रखने नहीं दिया जाएगा, केटली भरकर चाय नहीं रखी जा सकेगी!पर्स रखकर किसी विदुषी को नहीं आने देंगे, फ्राक पहनकर कोई सुनयना मतदान केंद्र के आसपास फटक नहीं सकेगी।इलेक्ट्रिक पोल सामने होंगे तब!गुब्बारे बच्चों से क्या छीन लेंगे।सब्जी वाला क्या फूल गोभी बेच सकेगा ।डोली तो रोकी जा सकेगी लेकिन अच्छा है कि अर्थी चुनाव चिन्ह में शामिल नहीं है।और फिर खिड़की का क्या कीजै!
हाथी पर बैठकर बाबाजी के निकलने पर आपत्ति हो सकती है।हँसिया-बाली या हँसिया-हथोड़ा किसान-मजदूर के हाथ में कैसे रह सकेंगे।बाबू यह चुनाव है!बेट्समैन बल्ला लेकर आसपास क्रिकेट कैसे खेल सकेगा।चुड़ियाँ पहने महिला और पुरूष भी रोक दिये जायेंगे।केला खाने पर भी आपत्ति!और भी कई बातें हैं जिन्होंने मुझे डरा दिया है।क्या पता कब किसका दिमाग सटक जाए और वह अपने वाली पर आ जाए ।डरना तो पड़ेगा ही जब कई बातों की मनाही है या मनाही हो जाएगी।


16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
Mob. : 9425030009(m)
pradeepru21@gmail.com


-इं. ललित शौर्य
नरेंद्र, राघव और ओजस तीनों में गहरी दोस्ती थी। तीनों ही कक्षा आठ के विद्यार्थी थे। ये तीनों पढ़ने में बहुत होशियार थे। स्कूल की हर गतिविधि में तीनों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती थी। चाहे पन्द्रह अगस्त हो, स्कूल का स्थापना दिवस हो या फिर छब्बीस जनवरी के कार्यक्रम नरेंद्र, राघव और ओजस की तिकड़ी ही सबकुछ संभालती थी। तीनों में अच्छी मित्रता के बावजूद, उनके बीच एक आदर्श प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिलती थी। कक्षा में कभी ओजस प्रथम आता तो कभी नरेंद्र और कभी राघव बाजी मार लेता था। इस सबके बाद भी ये तीनों कभी एक दूसरे से इर्ष्या नहीं करते थे। उनके भीतर इर्ष्या का भाव दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता था।
हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी नवम्बर आते ही बच्चों के अन्दर अजब सा उत्साह उमड़ने लगा। सभी को चौदह नवम्बर बाल दिवस का बड़ा इंतज़ार होने लगा। सभी बच्चे इस दिन खूब धमाचोकड़ी मचाते हैं। खेलते –कूदते और नाचते –गाते हैं। सभी बच्चों को इस दिन अपना हुनर दिखाने का मौक़ा मिलता है। कोई अगर अच्छा गीत गाता है तो, वो सोलो सिंगिंग के लिए नाम लिखवाता है, कोई डांस के लिए अपना नाम लिखवाता है। कई बच्चे कविता पाठ के लिए भी अपना नाम लिखवाते हैं। देखते ही देखते तेरह नवम्बर का दिन आ गया। बच्चों में उत्साह कई गुना बड गया था।
इंटरवल के बाद सोनी मैडम कक्षा आठ में पहुंची। और सारे बच्चों को बाल दिवस की तैयारियों के बारे में बताने लगी। सबसे पहले तो उन्होंने बच्चों को बाल दिवस क्यों मनाया जाता है इसके बारे में विस्तार से बताया। सोनी मैडम ने कहा , “ जवाहर लाल नेहरु जिन्हें “चाचा नेहरू” के नाम से भी जाना जाता है, उन्हीं के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। चाचा नेहरु का जन्म १४ नवम्बर १८८९ को इलाहाबाद में हुवा था। इनके पिता का नाम मोतीलाल नेहरु और माताजी का नाम स्वरुप रानी था। चाचा नेहरु हमारे देश के पहले प्रधानमन्त्री थे। भारत की आजादी में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।” सोनी मैडम बच्चों को चाचा नेहरु के बारे में बताये जा रही थी, सभी बच्चे बड़ी ध्यान से मैडम की बात को सुन रहे थे। अचानक ओजस ने अपनी जगह पर उठकर प्रश्न किया, “ मैम चाचा नेहरु के जन्मदिन को ही बाल दिवस के रूप में क्यों मनाते हैं। ” सोनी मैडम मुस्कुराई और बोली, “ वैरी गुड ओजस, तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। हम चाचा नेहरु का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में इसलिए मनाते हैं क्योंकि चाचा नेहरु बच्चों से बहुत प्यार करते थे। उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था। वो जब प्रधानमंत्री बने उसके बाद भी बच्चों से निरंतर संवाद करते थे। उनकी जिज्ञासाओं का समाधान करते थे। वो कहा करते थे कि, बच्चे देश का भविष्य होते हैं। इसीलिए हम चाचा नेहरु का जन्मदिन बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। ” इसके बाद सोनी मैम ने सभी बच्चों को कल की तैयारी के बारे में पूछा। सभी बच्चों ने उन्हें अपनी तैयारियों के बारे में बताया। मैम ने नरेंद्र, राघव और ओजस से विशेष तौर पर पुरे कार्यक्रम की जानकारी ली। उन्होंने कहा कि, कल तुम तीनों को मिलकर ही पूरा कार्यक्रम सम्पन्न कराना है।
अगले दिन सभी बच्चे समय से स्कूल पहुच गए। कई बच्चे तो चाचा नेहरु के गेटप में स्कूल पहुंचे थे। इधर नरेंद्र,राघव और ओजस तीनों ही सुबह से सारी तैयारियों में जुटे थे। कार्यक्रम ठीक समय पर प्रारम्भ हो चुके थे। लेकिन अचानक राघव और नरेंद्र के बीच कहासुनी होने लगी। नौबत हाथापाई तक पहुँच गई। ओजस बीचबचाव में लगा रहा लेकिन वो दोनों नहीं माने। ओजस दौड़ कर सोनी मैम के पास पहुंचा। और उन्हें सारी बात बताई। सोनी मैम दौड़ कर आई और दोनों को अलग किया, दोनों को समझाते हुए कहने लगी, “आज बाल दिवस पर तुम दोनों आपस में लड़ रहे हो , कितने शर्म की बात है। चाचा मेहरू जहाँ कहीं भी होंगे उनकी आत्मा को कितना कष्ट पहुँच रहा होगा। नेहरु जी लड़ाई- झगड़े के बड़े विरोधी थे। उन्हें गांधी जी का अहिंसा का पाठ प्रिय था। और आज तुम दोनों आपस में लड़कर उनके बताये गए मार्ग की अवहेलना कर रहे हो। बाल दिवस केवल मौज-मस्ती के लिए नहीं है, बल्कि चाचा नेहरु की सीखों और उनके बताये गए आदर्शों को अपनाने के लिए भी है”। नरेंद्र और राघव दोनों मैम की बातों को चुपचाप सुन रहे थे। अब उनकी आँखों से पश्चाताप के आसूं बहने लगे। दोनों आपस में गले मिले और आज से कभी लड़ाई न करने का संकल्प लिया। नरेंद्र,राघव समेत सभी बच्चों को बाल दिवस पर बहुत बड़ी सीख मिल चुकी थी।


ग्राम+पोस्ट-मुवानी, जिला-पिथौरागढ़, पिन-262572
उत्तराखंड
फोन-7351467702, E-mail : mlalit982@gmail.com


- योगेश कुमार गोयल
(राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार)
भारतीय क्रिकेट जगत में ‘भगवान’ माने जाने वाले मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर जब अपने कैरियर में पूरे फॉर्म में थे, तब अक्सर सवाल उठता था कि सचिन जिस प्रकार नए-नए कीर्तिमान बनाते हुए पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर रहे हैं, सचिन के बाद क्या भारतीय क्रिकेट में कोई अन्य खिलाड़ी उनकी जगह ले पाएगा? दरअसल सचिन ने अपने दो दशक लंबे टेस्ट और वनडे कैरियर में इतना बेहतरीन प्रदर्शन किया था कि देश में खेलप्रेमियों ने उन्हें ‘क्रिकेट के भगवान’ का दर्जा दे दिया था। लंबे अरसे बाद ही सही, अब भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली ने अपने रिकॉर्डों के जरिये खुद इस सवाल का जवाब दे दिया है। 24 अक्तूबर को वेस्टइंडीज के खिलाफ एकदिवसीय सीरिज के दूसरे मैच में 48वां रन बटोरते हुए पारी में 129 गेंदों पर 13 चौके और चार छक्कों की मदद से 157 रनों की शानदार पारी खेलकर कुल 213 मैचों की 205 पारियों में 10076 रन बटोरकर विराट न केवल सचिन सहित अन्य भारतीय खिलाडि़यों के सबसे तेज दस हजार रन बनाने के रिकॉर्ड को ध्वस्त करने में सफल हुए बल्कि वे शतक, अर्द्धशतक, रन और औसत के मामले में भी सचिन से बेहतर साबित हुए हैं। सचिन 463 मैचों में 49 शतकों के साथ 18426 रन, सौरव गांगुली 311 मैचों में 22 शतक के साथ 11363 रन, राहुल द्रविड़ 344 मैचों में 12 शतकों के साथ 10889 और धोनी 329 मैचों में 10 शतकों के साथ 10143 रन बना चुके हैं किन्तु औसत की दृष्टि से सबसे तेज गति से सबसे कम मैचों में सर्वाधिक शतक और सर्वाधिक रन बनाने के मामले में विराट इन सबसे बहुत आगे निकल गए हैं।
हालांकि 27 अगस्त को वेस्टइंडीज के खिलाफ विराट की कप्तानी में खेले गए तीसरे वनडे मैच में भारत भले ही पराजित हो गया किन्तु भारत ने पांच मैचों की यह सीरिज जीतकर दिखा दिया कि टीम इंडिया में कितना दम है और इस सीरिज में लगातार तीन शतक बनाकर विराट वनडे में यह कारनामा करने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज बन गए। उनके अलावा विश्वभर में कुल दस बल्लेबाज अब तक यह कारनामा कर सके हैं, जिनमें लगातार 4 शतक बनाने का रिकॉर्ड श्रीलंका के कुमार संगकारा के नाम है। अपने कैरियर के 38वें शतक के दौरान विराट ने 119 गेंदों पर 10 चौके और एक छक्का लगाकर 107 रन बनाए और इस तरह 38 शतक के साथ कुल 214 मैचों में 10183 रन बटोरकर रन बनाने की अपनी तूफानी रफ्तार के जरिये वह सबसे तेज दस हजार रन बनाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज और एक वर्ष में सबसे तेज गति से एक हजार रन बनाने वाले खिलाड़ी बन गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि विराट ने अपने कैरियर का पहला रन धोनी की कप्तानी में बनाया और अपना दस हजारवां रन भी उन्होंने धोनी की मौजूदगी में ही बनाया।
याद करें, जब विराट कोहली के कैरियर का आगाज हुआ था, उस समय धोनी और वीरेन्द्र सहवाग की क्रिकेट में तूती बोलती थी लेकिन विराट ने कुछ ही समय में अपने प्रदर्शन से हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया किन्तु तब किसने सोचा था कि एक दिन यही विराट अपने नाम के ही अनुरूप क्रिकेट में विराट कीर्तिमान स्थापित करते हुए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का इतना बड़ा सितारा बन जाएगा और रिकॉर्डों के मामले में क्रिकेट के भगवान सचिन तेंदुलकर को भी पीछे छोड़ देगा। अंडर-19 क्रिकेट टीम हो या सीनियर टीम, विराट ने हर जगह अपने ऐसे जलवे दिखाए कि खेलप्रेमी उनके दीवाने हो गए। कहना गलत नहीं होगा कि अपने जोश, जुनून, तेज गति से रन बनाने की भूख और कड़ी मेहनत के बलबूते पर विराट आज जिस पायदान पर खड़े हैं, वहां से सचिन काफी पीछे खड़े नजर आने लगे हैं। हालांकि यहां चर्चा सचिन बनाम विराट की नहीं है लेकिन जब भी कोई खिलाड़ी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए नया कीर्तिमान स्थापित करता है तो तुलनात्मक विवेचन तो होता ही है और ऐसे में सभी खिलाडि़यों के हर एंगल से बनाए गए रनों का बारीकी से आकलन किया जाता है और इस लिहाज से विराट ने तमाम भारतीय खिलाडि़यों को पीछे छोड़ दिया है।
जहां विराट ने 205 पारियों में 10 हजार रनों का टारगेट पूरा किया, वहीं सचिन को इतने रन बनाने के लिए 259 पारियां खेलनी पड़ी थी। विराट ने यह कारनामा 10 वर्ष 68 दिन में कर दिखाया जबकि सचिन को इसमें 11 वर्ष 103 दिन और राहुल द्रविड़ को 10 वर्ष 317 दिन का समय लगा। विराट ने अपने शुरूआती दस हजार रन 24 पारियों में बनाए थे किन्तु दस हजार रन पूरे करते हुए आखिरी एक हजार रन मात्र 11 पारियों में बनाने में सफल हुए। यही नहीं, उन्होंने एक कैलेंडर वर्ष में सबसे तेज गति से एक हजार रन बनाने का दक्षिण अफ्रीका के हाशिम अमला का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है। वह अब तक 12 मैचों में 1153 रन बनाकर इस मामले में सबसे आगे निकल गए हैं। पिछले साल उन्होंने कुल 6 शतक लगाए थे और इस वर्ष अब तक वह 6 शतक लगा चुके हैं तथा सचिन के 49 शतकों की बराबरी करने के लिए उन्हें अब सिर्फ 11 शतक और लगाने की जरूरत हैं और अगर वह इसी फॉर्म में रहे तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आगामी दो वर्ष के भीतर विराट सचिन के इस रिकॉर्ड को तोड़ने में भी सफल होंगे।
5 नवम्बर 1988 को दिल्ली में जन्मे विराट का जीवन इतना आसान नहीं रहा। जिस दिन वह दिल्ली की ओर से कर्नाटक के खिलाफ रणजी मैच खेल रहे थे, उस दिन उनके पिता का देहांत हो गया था किन्तु दुखों का इतना बड़ा पहाड़ टूटने पर भी विराट ने टूटने के बजाय न केवल वह मैच पूरा किया बल्कि वह मैच अपने पिता के नाम समर्पित कर दिया था। 2008 में विराट ने एकदिवसीय मैचों में पदार्पण किया था और 2011 में उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में कदम रखा। 2011 में ही वो विश्व कप की विजेता टीम का हिस्सा भी बने और उस दौरान अपने पदार्पण मैच में ही शतक जड़कर विराट ने दिखा दिया था कि उनके हौंसले कितने बुलंद हैं। एक ओर जहां सचिन ने विराट की निरंतरता और जुनून के साथ उनकी बल्लेबाजी को बेमिसाल बताया है, वहीं वीरेन्द्र सहवाग का कहना है कि विराट ने निरंतरता को नए आयाम दिए हैं और यह ‘सॉफ्टवेयर’ हर वक्त अपडेट होता रहा है। आस्ट्रेलिया के विख्यात क्रिकेटर टॉम मूडी का तो यहां तक कहना है कि विराट इस शिखर पर अकेले हैं, जहां न पहले कोई था और न बाद में कोई होगा। बांग्लादेश के स्टार बल्लेबाज तमीम इकबाल तो विराट की तारीफ करते हुए यह तक कह गए कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय कप्तान विराट कोहली इंसान नहीं हैं क्योंकि जैसे ही वह बल्लेबाजी के लिए उतरते हैं तो ऐसा लगता है कि वह हर मैच में शतक बनाएंगे। तमीम कहते हैं कि विराट जिस तरह अपने खेल पर कार्य करते हैं, वह अविश्वसनीय है। वह कहते हैं कि पिछले 12 वर्षों में उन्होंने सभी महान खिलाडि़यों को खेलते देखा है किन्तु ऐसा व्यक्ति नहीं देखा, जिसने विराट जैसा दबदबा बनाया हो।
हालांकि विराट की इस ‘विराट’ सफलता के साथ उनके कुछ नकारात्मक पक्ष भी जुड़े हैं। मसलन, कहा जाता है कि विराट पर सफलता का नशा कुछ इस कदर छाया है कि मैच में फॉर्म सुधारने के लिए जो कार्य चयनकर्ताओं को करना चाहिए, वहां विराट पूरी तरह अपनी मनमानी करते हैं और खिलाडि़योें के चयन में उनकी इसी मनमानी के चलते टीम की कमजोरी का खामियाजा विभिन्न अवसरों पर मैच गंवाकर भारत को भुगतना भी पड़ा है। बहरहाल, विराट को लेकर क्रिकेट जगत के दिग्गजों की सकारात्मक टिप्पणियों के बाद तो खेल जगत में अब इस प्रकार के सवाल उठने लगे हैं कि कहीं अपने अद्भुत प्रदर्शन की बदौलत विराट कोहली सचिन तेंदुलकर के बाद क्रिकेट के ‘दूसरे भगवान’ तो नहीं बनने वाले हैं!

 

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-तनवीर जाफ़री
गत् 8 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी के दो वर्ष पूरे हो गए। आशा थी कि अपनी मामूली सी भी उपलब्धि का डंका बजाने में माहिर भारतीय जनता पार्टी अपनी इस तथाकथित 'महान उपलब्धि' का जश्र ज़रूर मनाएगी। यह भी उ मीद थी कि सरकार की ओर से प्रधानमंत्री अथवा देश के वित्तमंत्री प्रत्येक वर्ष नोटबंदी के दिन जनता के समक्ष आकर अपनी इस महान उपलब्धि के माध्यम से अब तक देश को होने वाले आर्थिक लाभ तथा इससे संबंधित आर्थिक सुधार व प्रगति का ब्यौरा देते रहेंगे। परंतु नोटबंदी की घोषणा के बाद तो उन सभी नेताओं को गोया सांप सूंघ गया है जो तालियां बजा-बजा कर और छाती पीट-पीट कर नोटबंदी से देश व जनता को होने वाले लाभ का बखान किया करते थे। हद तो यह है कि भाजपा के संरक्षक संगठन राष्ट्रीय स्वयं संघ ने भी कथित रूप से भाजपा के नेताओं को नोटबंदी की चर्चा जनता के मध्य करने से परहेज़ करने की सलाह दी थी। $गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने जब 8 अक्तूबर 2016 को देर रात भारतीय मुद्रा में सबसे अधिक प्रचलित एक हज़ार व पांच सौ रुपये की नोट बंद करने की घोषणा करते हुए लगभग 16.99 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा को चलन से बाहर करने का $फरमान जारी किया था उस समय प्रधानमंत्री ने इसके पीछे तीन मु य कारण बताए थे। एक तो यह कि नोटबंदी के इस $कदम से काले धन पर रोक लगेगी। दूसरा कारण जाली मुद्रा को प्रचलन से बाहर करना बताया गया था तो तीसरी वजह आतंकवाद व नक्सलवाद पर $काबू करना बताई गई थी।
देश को यह भी ब$खूबी याद होगा कि नोटबंदी की घोषणा करने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी सरकार द्वारा किस प्रकार नित्य नई गाईडलाईन जारी कर बैंक तथा जनता को रोज़ाना नए निर्देश दिए जाते थे। यह भी किसी से छुपा नहीं है कि बैंक कर्मचारियों ने किस प्रकार अपनी जान पर खेलकर इस आपात स्थिति से निपटने में अपनी अभूतपूर्व कार्यक्षमता का प्रदर्शन किया। परंतु इन सबके बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों में लगभग 150 लोग नोटबंदी में उठाई जाने वाली परेशानियों के चलते अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। कभी प्रधानमंत्री ने जनता से एक महीने का समय मांगा तो कभी स्थिति सामान्य होने में 50 दिन की मोहलत मांगी। कभी स्वयं को चौराहे पर ले जाकर अपमानित करने जैसे घटिया वाक्य भी बोलने के लिए मजबूर हुए जोकि प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप भी नहीं थे। अर्थशास्त्री इस बात को लेकर हैरान हैं कि यदि काला धन रोकने के लिए एक हज़ार व पांच सौ की नोट प्रचलन से बाहर की गई फिर आ$िखर दो हज़ार रुपये की नई नोट चलाने का उद्देश्य क्या था? नोटबंदी की पूर्ण असफलता का अंदाज़ा तो इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने जिन कारणों को बताकर नोटबंदी घोषित की थी आज सरकार उन कारणों का तो कोई जि़क्र ही नहीं करती। इसके बजाए दूसरी कथित उपलब्धियों को नोटबंदी की सफलता बताने की कोशिश की जाती है। जैसेकि इस बार भी वित्तमंत्री अरूण जेटली ने नोटबंदी की सफलता के पक्ष में यही तर्क दिया कि नोटबंदी से औपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ है और टैक्स का दायरा भी बढ़ा है। वित्तमंत्री ने यह भी बताया कि पांच सौ व एक हज़ार रुपये की नोट बंद करने के परिणामस्वरूप अधिक राजस्व प्राप्त हुआ,बुनियादी ढांचा बेहतर हुआ तथा $गरीबों के लिए अधिक संसाधन प्राप्त हुए।
वित्तमंत्री द्वारा नोटबंदी की दो वर्ष बाद गिनाई जा रही उपलिब्ध में कोई भी एक उपलब्धि ऐसी नहीं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित नोटबंदी के कारणों से मेल खाती हो। परंतु विपक्ष ने गत् दो वर्षों में नोटबंदी के कारण देश की अर्थव्यवस्था,रोज़गार तथा व्यापार को लगे ज़बरदस्त आघात की चर्चा करते हुए इसे देश के लिए अत्यंत घातक $कदम बताया है। कई प्रमुख अर्थशास्त्रियों व जि़ मेदार नेताओं का कहना है कि नोटबंदी स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा आर्थिक घोटाला है। सरकार नोटबंदी से न तो काला धन निकाल सकी न ही न$कली नोट पकड़े गए न ही आतंकवाद या नक्सलवाद पर लगाम लगाई जा सकी। इसके बजाए लाखों लोगों को अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा तथा देश की अर्थव्यवस्था को लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का नु$कसान पहुंचा। पूर्व प्रधानमंत्री डा०मनमोहन सिंह ने तो नोटबंदी की घोषणा के तुरंत बाद ही इस $फैसले को देश की अर्थव्यवस्था के लिए लिया जाने वाला एक घातक $फैसला बता दिया था। नोटबंदी की दूसरी 'बरसीÓ पर डा० मनमोहन सिंह एक बार फिर अपनी उसी बात पर $कायम दिखाई दिए। उन्होंने मोदी सरकार के इस $फैसले को $गलत $फैस्ला बताया और कहा कि इस $फैसले ने भारतीय अर्थव्यवस्था तथा भारतीय समाज को हिलाकर रख दिया है। उन्होंने यह भी कहा कि देश के प्रत्येक व्यक्ति पर तथा हर उम्र,जाति तथा प्रत्येक व्यवसायी पर नोटबंदी का दुष्प्रभाव पड़ा है। अब तो भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघु राम राजन ने भी कह दिया की नोटबंदी व जी एस टी से देश की आर्थिक तरक$की को तगड़ा झटका लगा है।
पश्चिम बंगाल की ममता बैनर्जी सरकार ने तो नोटबंदी से प्रभावित व इसके चलते बेरोज़गार होने वाले उद्यमियों की सहायता करने के उद्देश्य से एक समर्थन योजना की शुरुआत भी की है। इस योजना के तहत नोटबंदी से प्रभावित 50 हज़ार लोगों की पहचान कर राज्य सरकार 50-50 हज़ार रुपये से उनकी आर्थिक सहायता कर रही है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के अनुसार 'नोटबंदी का 'कदम मोदी सरकार द्वारा स्वयं पैदा की गई त्रासदी व आत्मघाती हमले जैसा था। इससे उनके मित्रों ने काले धन को स$फेद करने का काम किया हैÓ। यदि यहां यह मान लिया जाए कि विपक्ष अपनी जि़ मेदारियां निभाते हुए अथवा विपक्ष की नीतियों पर चलते हुए नोटबंदी की अकारण ही आलोचना कर रहा है ऐसे में यह सवाल ज़रूर उठता है कि यदि नोटबंदी सरकार की सफल नीति का एक उदाहरण थी फिर आ$िखर प्रत्येक वर्ष 8 नवंबर को सरकार अपनी इस घोषणा को जश्र व उत्सव के रूप में क्यों नहीं मनाती? पिछले दिनों तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ी एक सनसनी$खेज़ $खबर का रहस्य उद्घाटन किया गया। उन्होंने एक समाचार पत्र में प्रकाशित $खबर का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय रिज़र्व बैंक की आरक्षित राशि का 3.60 लाख करोड़ रुपया मांग रही है। यह धनराशि बैंक की 9.59 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित राशि की एक तिहाई से भी अधिक है। जबकि सरकार की ओर से इस आरोप का खंडन भी किया जा चुका है। सरकार तथा रिज़र्व बैंक की इस खींचातान के मध्य रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा है कि जो सरकारें अपने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता का स मान नहीं करतीं उन्हें देर-सवेर बाज़ारों के आक्रोश का सामना करना पड़ता है।
यदि सरकार वास्तव में रिज़र्व बैंक के ब$फर स्टॉक में से इतनी बड़ी धनराशी मांग रही है इसका सीधा अर्थ यही है कि देश की अर्थव्यवस्था सामान्य नहीं है। वैसे भी सरकार जिन जन-धन खातों को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही थी $खबरों के अनुसार उनमें से आधे से अधिक जन-धन खाते बंद हो चुके हैं। यह भी $खबर है कि नोटबंदी के बाद यही जन-धन खाते बड़े पैमाने पर काला धन को स$फेद किए जाने में सहायक हुए। उधर आतंकवाद या नक्सलवाद में से किसी पर भी नियंत्रण हासिल नहीं हुआ। न$कली नोटों का चलन भी यथावत् है यहां तक कि दो हज़ार रुपये के नए नोट भी बाज़ार में न$कली मुद्रा के रूप में पकड़े जाने लगे हैं। ऐसे में सरकार भले ही नोटबंदी का जश्र मनाने से पीछे क्यों न हटे परंतु विपक्षी दल नोटबंदी की पुण्यतिथि प्रत्येक 8 नवंबर को ज़रूर मनाते रहेंगे तथा देश की जनता को इस घोषणा से होने वाले नु$कसान से अवगत कराते रहेंगे। 2019 के चुनाव में भी नोटबंदी विपक्ष के लिए एक बड़ा हथियार साबित होगी।


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-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


आबोहवा के बाद अब हरी और पत्तेदार सब्जियां भी मानव स्वास्थ्य के लिए जानलेवा साबित हो रही है। बच्चे से बुजर्ग तक विभिन्न बीमारियों के दौरान चिकित्सक हरी और पत्तेदार सब्जियों को जीवनदायी बता कर सेवन करने की सलाह देते है मगर यही सब्जियां अब हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी बनती जा रही है। मिर्च मसाले, दालें, अनाज और खाने पीने की वस्तुएं तो पहले ही मिलावटी मिल रही थी। वायु प्रदूषण से हमारा सांस लेना जहर हो गया है। अब रही सही कसर प्रदूषित और खतरनाक रसायनों से युक्त हरी सब्जियों ने पूरी करदी है।
हरी सब्जियों का हमारे भोजन और पोषण में बहुत महत्व है। हरी सब्जियां विटामिन, प्रोटीन और मिनरल से भरपूर होती हैं। यह शरीर की प्रतिरोधी क्षमता को मजबूत करती हैं। शरीर के उचित विकास के लिए पत्तेदार हरी शाक-सब्जियां लाभदायक होती है। स्वास्थ्य के लिए अमृत कही जाने वाली हरी सब्जियां भी अब जहरीली हो गयी हैं।
स्वस्थ व सेहतमंद रहने, बीमारियों से बचने और वजन घटाने में हरी सब्जियों का प्रयोग किया जाता है। बाजारों में बिक रही सब्जियों व फलों में बड़े पैमाने पर कीटनाशक का प्रयोग किया जा रहा है। जिसका मानव शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। आज हर कोई हर दिन बाजार से कीटनाशक के छिड़काव वाली जहरीली सब्जियां खरीदता है। हम अपने खाने में हर दिन किसी न किसी रूप में जहर खा रहे हैं। शुद्ध हरी सब्जियों का मिलना आज मुश्किल हो गया है। खेती में बढ़ते उर्वरकों के प्रयोग से सब्जियां दूषित हो रही हैं। स्वास्थ्य सुधार के लिए हरी सब्जियों का सेवन कर रहे नागरिकों के स्वास्थ्य पर यह सब्जियां प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग ने सब्जियों का स्वाद बिगाड़ दिया है। लौकी, तुरई, पालक, फूलगोभी, पत्तागोभी आदि सब्जियों में तरह तरह की रायायनिक खाद के साथ ही जहरीले कीटनाशक मिला कर खुलेआम बेचा जा रहा है। हम न चाहते हुए भी जहरीली सब्जियां खाने को मजबूर हैं । बाजारों ,सड़क किनारों और ठेलों पर हमें हरी सब्जियां देखने को मिल जाती है मगर हम में से अधिकांश को यह पत्ता नहीं है की ये सब्जियां जहरीली है। जो सब्जियां हम खा रहे हैं वे प्रदूषित है क्योंकि आलू, बैंगन, अरवी, लाल साग, मूली, भिंडी और फूल गोभी के भीतर छिपा बैठा है जानलेवा जहर। इन सब्जियों के सेवन से कैंसर, पेट दर्द एवं कई बीमारियां फैल रही हैं। रसायनयुक्त सब्जियों को खाने से फेफड़ों में इंफेक्शन, अल्सर, कैंसर और एलर्जी जैसी घातक बीमारियां हो सकती हैं।
एक सर्वे बताता है कि देश के करोड़ों लोग ऐसे फल व सब्जियां खा रहे हैं, जो किसी भी लिहाज से हमारे शरीर में जाने के योग्य नहीं हैं। ये फल व सब्जियां कीटनाशकों (पेस्टिसाइड) का प्रयोग कर विकसित की जा रही हैं। दुकानदार परवल, तुरई, लौकी, भिंडी,अदरख आदि को ताजा बनाए रखने के लिए इन्हें रसायन युक्त पानी से धोते हैं। इससे सब्जी दिखने में अधिक ताजी और हरी-भरी दिखाई देती है। तालाब एवं गंदे पानी में सिंघाड़ों की खेती के लिए भी खतरनाक रसायन व दवाएं पानी में डाली जाती हैं। भिंडी, करेला, परवल, मटर आदि रंगों व रसायन के प्रयोग के बिना इतने चमकदार नहीं दिख सकते, इसलिए ज्यादातर कारोबारी कैल्शियम कार्बाइड को पुडियों में डाल कर फलों के ढेर के बीच में रख देते हैं। केले एवं पपीते को रसायन में डुबो कर पकाया जाता है जो जहर बनकर सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है।
खेतों में पैदा की जा रही रसायनयुक्त सब्जियों के अलावा देश के अधिकांश नगरीय क्षेत्रों में गंदे पानी से सब्जियां उगाई जा रही है। शासन प्रशासन के रोकथाम के प्रयास सिरे नहीं चढ़ रहे है। आम आदमी इस सम्बन्ध में जागरूक नहीं है। चमकीली सब्जियां देखते ही हम लेने के लिए ललचाते है और यह नहीं देखते कि ये सब्जियां हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। मगर हमारे पास लेने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं है। आम आदमी आज ताजा सब्जियों की चाह में बीमारी और मौत खरीद रहा है। असल में बहुत से रसायनों के कारण कई सब्जियां अपना रंग ज्यादा गहरा कर लेती हैं और बाद में इनके सेवन से आपके पेट में अल्सर या गैस जैसी समस्या पैदा हो जाती है। यह धीमा जहर है जो सब्जियों के रास्ते हमारे शरीर में पहुंचकर विभिन्न बीमारियों से हमें जोड़ता है। सब्जियों में छिड़के जाने वाले ये केमिकल जब शरीर में प्रवेश करते हैं तो हायपरटेंशन, डिप्रेशन, माइग्रेन, अस्थमा और त्वचा संबंधी कई बीमारियों को जन्म देते हैं। यह भी सच है भागदौड़ भरी लाइफस्टाइल में हमें यह देखने और सोचने की फुर्सत नहीं है कि हमें क्या खाना है और क्या नहीं।

 

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
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-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशील होना आवश्यक है। सहनशीलता व्यक्ति को मजबूत बनाती है, जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है। सहनशीलता का शब्दिक अर्थ है शरीर और मन की अनुकूलता और प्रतिकूलता को सहन करना। मानव व्यक्तित्व के विकास और उन्नयन का मुख्य आधार तत्व सहिष्णुता है। स्वयं के विरूद्ध किसी भी आलोचना को स्वीकार नहीं करना मोटे रूप में असहिष्णुता है। सहिष्णुता मनुष्य को दयालु और सहनशील बनाती है वहीं असहिष्णुता मनुष्य को अहंकारी बनाती है। अहंकार अंधकार का मार्ग है जो मनुष्य और समाज का सर्वनाश कर देती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व सहनशीलता दिवस हर साल 16 नवम्बर को मनाया जाता है। सहनशीलता का जिंदगी में बहुत महत्त्व है। जिसने जीवन में सहन करना सीख लिया वह जिंदगी की हर जंग जीत सकता है। सहिष्णुता जीवन शक्ति का पर्याय है। विश्व के देशों में सहनशीलता का निरंतर क्षरण हो रहा है। शासक एक दूसरे के विरुद्ध ऐसे बयान जारी कर रहे है जिससे विश्व में कटुता और असहिष्णुता का बाजार गर्म हो रहा है। विश्व सहनशीलता दिवस मनाने के पीछे यह तर्क दिया जारहा है कि विश्व समुदाय एक दूसरे का सम्मान करें और अपने नागरिकों में उन भावनाओं को पुष्ट करें जिससे किसी भी स्थिति में सहिष्णुता को हानि नहीं पहुंचे।
सहनशीलता भारतीय जनजीवन का मूल मंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहनशीलता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। सहिष्णुता को लेकर इस समय देश की सियासत गरमाई हुई है। नेताओं के जहरीले बयानों और भाषणों से वातावरण विषाक्त हो रहा है। इससे हमारी लोकतांत्रिक परम्परायें कमजोर और क्षतिग्रस्त हुई हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर विराजमान व्यक्तियों सहित देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए जिस प्रकार की शब्दावली का उपयोग और प्रयोग हो रहा है वह हम सब के लिए बेहद चिंता और निराशाजनक है। सोशल मीडिया इसमें सबसे आगे है जहाँ ऐसे ऐसे शब्दों को देखा जा रहा है जिनकों इस आलेख में लिखा जाना कतई मुनासिब नहीं है। इसके लिए कोई एक पक्ष दोषी नहीं है। इस मैली गंगा में सभी अपना हाथ धो रहे है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर हो रही बहस घृणास्पद और निम्नस्तरीय है।
भारत में प्राचीन काल में वैदिक परम्परा का बहुत अधिक प्रभाव था। मध्यकाल आते-आते समाज में वर्ण व्यवस्था हावी हो गई। इसके साथ ही सम्पूर्ण समाज जातियों और वर्गों में विभाजित हो गया। अंधविश्वास, सामाजिक कुरीति, जात-पांत, छुआछूत, ऊँच-नीच के साथ महिला और पुरूष के मध्य भेदभाव का बोलबाला हो गया। समाज और राष्ट्र रूढ़िवादिता में फंस गया। चैदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी को समाज सुधार की दिशा में अग्रणी माना गया है। इस अवधि में समाज सुधार आंदोलन फैला और सामाजिक बुराइयों को चुनौती मिली। समाज सुधार के इस आंदोलन का नेतृत्व संतों और समाज सुधारकों ने किया। इन सन्तों ने जाति प्रथा, धार्मिक कट्टरता और अंध विश्वास के विरूद्ध लोगों में चेतना के बीज बोये। संतों ने समाज में बराबरी, समता, भाईचारे और प्रेम का सन्देश फैलाया। आपसी कटुता और बैरभाव के विरूद्ध लोगों को चेताया। संत कबीरदास से लेकर गुरूनानक, रैदास और सुन्दरलाल आदि संतों में समाज में सहिष्णुता का भाव उत्पन्न कर सामाजिक समरसता को जन जन तक पहुंचाया। इससे समाज में सही अर्थों में सहिष्णुता की भावना बलवती हुई। संत कबीर हिन्दु-मुस्लिम एकता के प्रतीक थे। उन्होंने राम-रहीम को एक माना और कहा ईश्वर एक है भले ही उसके नाम अलग-अलग क्यों न हों।
सहनशीलता हमारे जीवन का मूल मंत्र है। सहिष्णुता ही लोकतंत्र का प्राण है। मनुष्य को सहनशील और संस्कारी बनाने के लिए प्रारम्भ से ही सहिष्णुता की शिक्षा दी जानी चाहिये ताकि वे बड़े होकर चरित्रवान और संस्कारी बने। हम बड़ी बड़ी बातें सहनशीलता की अवश्य करते है मगर उस पर अमल नहीं करते। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कथनी और करनी के भेद को मिटाकर सही मायनों में सहिष्णुता को अपनाएं तभी देश और समाज को आगे बढ़ा पाएंगे।

 


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-जावेद अनीस


मध्यप्रदेश की राजनीति में मालवा इलाके को सत्ता की कुंजी माना जाता है. कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियां बखूबी जानती हैं कि अगर मालवा पर कब्जा कर लिया तो फिर एमपी की सत्ता हासिल करने में आसानी होगी. यह क्षेत्र लंबे समय से भाजपा और  संघ का गढ़ बना हुआ है. वर्तमान में मालवा क्षेत्र की 50 सीटों में 45 सीटों पर भाजपा का कब्जा है. पिछले 15 सालों से सत्ता से दूर कांग्रेस को अगर सत्ता में वापस लौटना है तो उसे भाजपा के इस मजबूत गढ़ में सेंध लगाने की जरूरत पड़ेगी इसलिये कांग्रेस इस बार मालवा पर ज्यादा फोकस कर रही है. इस कड़ी में अक्टूबर के आखिरी दिनों में राहुल गांधी का दो दिनों का मालवा-निमाड़ दौरा काफी चर्चित रहा. उनके इस दौरे ने मध्यप्रदेश में चुनावी हलचल को तेज कर दिया है. अपने पूर्व के दौरों के मुकाबले मालवा-निमाड़ में राहुल गांधी पूरी तरह से अपने स्वाभाविक मिजाज में नजर आये. इस दौरान वे एक सधे हुये नेता के तौर पर सहज और आक्रामक दोनों थे, जनता और मीडिया के साथ उनका कनेक्शन देखते ही बनता था. हालांकि यहां उनका कनफ्यूजन सामने आया लेकिन उन्होंने इसे बखूबी हैंडल भी कर लिया. अपने इस दौरे से उन्होंने मालवा-निमाड़ में काफी हद तक कांग्रेस के लिये चुनाव का माहौल बना दिया है. राहुल के दौरे के दौरान उनके लिए स्वाभाविक रूप से उमड़े जनसैलाब से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं में जबरदस्त उत्साह है. अब देखना है कि क्या कांग्रेस राहुल के इस दौरे से बने माहौल को प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी भुना पायेगी?


कनफ्यूजन और सलयूशन
मध्यप्रदेश में कांग्रेस अमूमन अपने प्रादेशिक क्षत्रपों को सामने रख कर मैदान में उतरती रही है लेकिन इस बार ऐसा लगता है कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद को फ्रंट पर रखते हुये मैदान में हैं, हालांकि इस बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने शिवराज के खिलाफ पार्टी की तरफ से करीब आधा दर्जन चेहरों को कमलनाथ और सिंधिया के रूप में दो चेहरों में सीमित कर दिया है, यहां तक कि दिग्विजय सिंह जैसे नेता को नेपथ्य में भेज दिया गया है. लेकिन इससे कांग्रेस के लिए यह सवाल पूरी तरह से हल नहीं हो सका है कि शिवराज के सामने कांग्रेस की तरफ से किसका चेहरा होगा? ऐसे में राहुल गांधी कमलनाथ और सिंधिया दोनों को साथ में रखते हुये खुद फ्रंट पर दिखाई दे रहे हैं.
मध्यप्रदेश में अपने इसी भूमिका को निभाते हुये आजकल राहुल गाँधी कुछ अलग ही अंदाज में दिखाई दे रहे हैं जिसे देखकर लगता है कि एक नेता के तौर पर उनकी लंबी और उबाऊ ट्रेनिंग खत्म हो चुकी है, एक नेता के तौर पर अब उनका खुद पर बेहतर नियंत्रण दिखाई पड़ रहा है साथ ही उनके हमले विरोधियों को इस कदर परेशान करने लगे हैं कि वे मानहानि का केस कर रहे हैं.
हालांकि वे अपनी पुरानी समस्याओं से अभी तक उबर नहीं पाये हैं लेकिन अब वे इनका हल भी पेश करने लगे हैं. मालवा में अपने अभियान के दौरान राहुल गलती से कह गये कि पनामा पेपर में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पुत्र का नाम है जिसने भाजपा और शिवराज को उन पर हमला करने का मौका दे दिया. इस पर  शिवराजसिंह का कहना था कि ‘राहुल कंफ्यूज आदमी हैं जो मामा को पनामा कह गए.’ उन्होंने राहुल पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देते हुये कहा कि ‘वे राहुल गांधी के खिलाफ उनके परिवार पर कीचड़ उछालने के आरोप में मानहानि का मुकदमा करेंगे.’
बाद में राहुल गाँधी इस पर सफाई पेश करते हुये नजर आये हालांकि उनके इस सफाई का अंदाज भी दिलचस्प और चिढ़ाने वाला था. अपने बयान पर सफाई पेश करते हुये राहुल ने कहा कि ‘भाजपा शासित राज्यों में इतने घोटाले हुए हैं कि मैं कन्फ्यूज हो गया, पनामा पेपर लीक तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के बेटे का मामला है, मप्र के सीएम ने तो ई-टेंडरिंग और व्यापमं घोटाला किया है.’
इसके बाद शिवराज के बेटे कार्तिकेय द्वारा राहुल गांधी के खिलाफ भोपाल कोर्ट में मानहानि का परिवाद पेश कर दिया गया जिस पर खरगोन के एक रैली के दौरान पलटवार करते राहुल गांधी ने कहा कि ‘वे मानहानि मुकदमों से नहीं डरते और जनता के हित में सच्चाई बयान करते रहेंगे और शिवराज चौहान भी मानहानि का मुकदमा लगाते हैं तो लगा दें.’ उन्होंने एक बार फिर शिवराजसिंह और उनके परिवार को निशाना बनाते हुये कहा कि ‘यह सर्वविदित है कि चौहान तथा उनका परिवार व्यापम घोटाले में खुले तौर पर शामिल रहा है जिसमें 50 लोगों की हत्या भी हुई है और  इसके चलते प्रदेश के लाखों युवा बेरोजगारों को नौकरी से वंचित रहना पड़ा और उनका भविष्य समाप्त हो गया.’

शिवभक्त “भोले” राहुल का नया अवतार
गुजरात विधानसभा चुनाव ने राहुल गांधी और उनकी पार्टी को एक नयी दिशा दी है, इसे भाजपा और संघ के खिलाफ काउंटर नैरेटिव तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इसने राहुल और उनकी पार्टी को मुकाबले में वापस आने में मदद जरूर मिली है. खुद राहुल गांधी में सियासी रूप से लगातर परिपक्वता आयी है और वे लोगों के कनेक्ट होने की कलां को भी तेजी से सीखे हैं, आज वे मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की सबसे बुलंद आवाज बन चुके हैं. वे अपने तीखे तेवरों से नरेंद्र मोदी की “मजबूत” सरकार को बैकफुट पर लाने में कामयाब हो रहे हैं रफेल का मामला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें मोदी सरकार बुरी तरह से घिरी नजर आ रही है.
मध्यप्रदेश में भी पिछले कुछ महीनों के अपने चुनावी अभियान के दौरान वे ध्यान खीचने कामयाब रहे हैं जिसमें प्रदेश की जनता के अलावा प्रदेश के कई सीनियर पत्रकार भी शामिल हैं. मध्यप्रदेश के अपने पिछले दौरों में राहुल गांधी का भाषण मुख्य रूप राष्ट्रीय मुद्दों और मोदी सरकार को निशाना बनाने पर ही फोकस रहता था स्थानीय मूदों के नाम पर वे स्थान के हिसाब से मेड इन भोपाल , मेड इन चित्रकूट, मेड इन मंदसौर मोबाइल जोड़ देते थे. जिसकी वजह से उनके भाषण स्थानीय लोगों को कनेक्ट नहीं कर पाते थे. लेकिन अपने मालवा दौरे में राहुल लोकल मुद्दों पर ज्यादा जोर देते हुये नजर आये, इंदौर में होटलों और सावर्जनिक स्थानों पर वे बहुत ही सहजता और औपचारिकता के साथ लोगों से घुलते मिलते नजर आये. यहां भी राहुल अपनी हिन्दू पहचान के प्रदर्शन को जारी रखते हुये महाकाल मंदिर गये.
इंदौर में राहुल गाँधी प्रदेश के चुनिन्दा संपादकों/पत्रकारों से मिले थे जिसमें शामिल होने के बाद वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि “इंदौर में राहुल गांधी से मिलकर लगा कि वे कुटिल भले ही नहीं हो, लेकिन परिपक्व तो हो ही गए हैं.आक्रामक!बेबाक और बेलौस स्वीकारोक्तियां,जुबान से डंक मारने की कला सीखने के विद्यार्थी लेकिन संवेदनशील. राहुल गाँधी को लेकर कुछ इस तरह का इम्प्रैशन प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक एल एन स्टार के संपादक प्रकाश भटनागर का भी है जिनका कहना है कि “अतीत के तमाम प्रहसनों को पीछे छोड़कर गांधी ने अब वाकई किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जैसे तेवर हासिल कर लिए हैं”.
वरिष्ठ पत्रकार रिज़वान अहमद सिद्दीक़ी कहते हैं कि राहुल गाँधी के बारे में जिस तरह के दुष्प्रचार होते रहे हैं उनसे रूबरू हुये ज़्यादातर सम्पादकों के अनुभव उससे बिलकुल विपरीत रहे
संपादकों की मुलाक़ात उनसे सीधे सवाल पूछे गये जिसका उन्होंने सधे हुये तरीके से के साथ जवाब दिया जबकि सवाल फिक्स नहीं थे. इस दौरान वे खुद को और अपनी राजनीति को भी खोलते नजर आये हिन्दू, और हिन्दुत्व के बीच मोटी लकीर खीचते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू, हिन्दूवादी और हिन्दुत्व अलग अलग हैं, मै हिंदुत्व नही हिंदूवाद का पक्षधर हूँ , हिंदूवाद एक महान परंपरा है जो सबको लेकर चलता है है ,सबकी सुननाता और सबका आदर करता है मैं हिन्दू हूँ लेकिन सभी धर्म का आदर करता हूँ, , मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा आदि सभी जगह जाता हूँ. मैं ‘हिंदूवादी नेता' नहीं, बल्कि हर धर्म और हर वर्ग के नेता हूँ.
इस दौरान जब राहुल गांधी से एक पत्रकार ने पूछा कि आपको भाजपा वाले पप्पू क्यों कहते हैं राहुल गांधी का जवाब था कि मैं शिवभक्त हूँ शंकर जी का दूसरा नाम भोले नाथ है और मै भला और भोला हूँ.
कांग्रेस की उम्मीदें
2013 के विधानसभा चुनाव के दौरान मालवा-निमाड़ की करीब 86 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस केवल 10 सीटें ही जीत सकी थी. लेकिन इस बार बदली परस्थितियों के चलते कांग्रेस को माहौल अपने अनुरूप लग रहा है, मंदसौर में किसान आंदोलन की राखें अभी बुझी नहीं है,सवर्ण आन्दोलन का भी विपरीत असर पड़ सकता है. किसानों के आक्रोश और सवर्ण जातीय की नाराजगी में कांग्रेस अपनी वापसी का रास्ता देख रही है. बसपा से गठबंधन का न हो पाने को भी कांग्रेस अपने लिये प्लस पॉइंट के रूप में देख रही है कांग्रेस को लगता है कि इससे स्वर्ण मतदाता उसकी तरफ वापसी कर सकते हैं

बहरहाल मध्यप्रदेश में राहुल के चुनावी अभियान के उमड़ने वाली भीड़ कितना वोट में तबदील होगी यह आने वाला वक्त ही बताएगा. लेकिन उन्होंने चुनावी माहौल में हलचल जरूर पैदा कर दिया है

मध्यप्रदेश में चुनाव अभियान से नरेंद्र मोदी की दूरी ?
ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश में में चुनाव अभियान से भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक सेफ दूरी बना कर चल रहे हैं, जहां एक तरफ राहुल गांधी मध्यप्रदेश को सबसे ज्यादा समय दे रहे हैं और यहां उनके निशाने पर शिवराज से ज्यादा मोदी और उनकी सरकार ही होती है वहीँ नरेंद्र मोदी प्रदेश के चुनावी परिदृश्य से अभी तक नरादाद हैं. राज्य में भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान में भी केंद्र की उपलब्धियां पर ना के बराबर हो फोकस किया जा रहा है.
खबरें आ रही है कि मध्यप्रदेश में नरेंद्र मोदी के चुनावी सभाओं में कमी की गयी है और अब वे मध्यप्रदेश में केवल दस जनसभायें ही करेंगें इसी तरह से राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी वे तुलनात्मक रूप से कम जनसभायें करेंगें. शायद निगेटिव बैक को देखते हुये यह निर्णय लिया गया है जिससे अगर इन राज्यों में भाजपा की हार होती है तो इसके जिम्मेदारी मौजूदा मुख्यमंत्रियों पर टाली जा सके और 2019 लोकसभा चुनाव के लिये मोदी ब्रांड को बचाये रखा जा सके .
इसी तरह से अमित शाह भी यहां बहुत ज्यादा सक्रिय दिखाई नहीं पड़ रहे हैं. पहले बताया गया था कि विधानसभा के दौरान वे मध्यप्रदेश में ही कैम्प करेंगें लेकिन अंत में ऐसा कुछ नहीं हुआ. अमित शाह का पिछला मालवा दौरा भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहा इस दौरान उन्हें सपाक्स जैसे संगठनों की तरफ से विरोध का सामना पड़ा था.

दिग्गी राजा व्यस्त है
राहुल गांधी के मालवा दौरे के दौरान भी दिग्विजय सिंह अपने आप को बैकग्राउंड में ही बनाये रखे हालांकि इंदौर उनकी जमीन मानी जाती है लेकिन फिर भी वे नरादद रहे. राहुल के मालवा दौर के दौरान दिग्विजय सिंह की जगह उनके दो ट्वीट सामने आये पहले ट्वीट में उन्होंने उन्होंने राहुल का इंदौर में स्वागत करते हुये लिखा कि 'मैं इंदौर में पैदा हुआ स्कूल व कॉलेज की शिक्षा भी इंदौर में हुई आज राहुल गॉंधी जी इंदौर पहुँच रहे हैं मैं उनका हार्दिक स्वागत करता हूँ”.जबकि अपने दुसरे ट्वीट में उन्होंने राहुल के दौरे में शमिल ना हो पाने के पीछे तर्क देते हुये लिखा कि “मुझे अध्यक्ष जी ने कुछ आवश्यक कार्य सौंपा हुआ है जिसके कारण राहुल जी के इंदौर उज्जैन कार्यक्रम में अनुपस्थित रहूँगा क्षमा करें. सभी मित्रों से राहुल जी का गर्म जोशी से स्वागत करने की अपील करता हूँ”.

गौरतलब है कि दिग्विजय सिंह लगातार राहुल गाँधी के दौरों और जनसभाओं से दूरी बनाकर चल रहे. हालांकि परदे के पीछे से वे काफी सक्रिय हैं. दरअसल दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश में पिछले करीब दो सालों से लगातर जमीन स्तर पर अपनी सक्रियता बनाये हुये हैं और प्रदेश की राजनीति में इस मामले में उनका मुकाबला केवल शिवराज ही कर सकते हैं. मध्यप्रदेश में उनकी जमीनी पकड़ का अंदाजा पिछले दिनों आजतक चैनल के कार्यक्रम में दिये गये उनके उस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि मध्य प्रदेश को थोड़ा बहुत में भी जानता हूँ मैं हर ब्लॉक के लोगों को जानता हूं, कौन कितना लोकप्रिय है, थोड़ा बहुत मुझे भी अंदाजा है, परिक्रमा करने के बाद इसे मैंने और पुख्ता कर लिया,आज 230 सीटों पर कौन उम्मीदवार हो सकता है, मैं बिना कागज देखे आपको बता सकता हूं.
जाहिर है दिग्विजय सिंह जैसे मिजाज का नेता अगर परदे के पीछे रहकर व्यस्त है तो इसके गहरे निहितार्थ हो सकते हैं.

 

 

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*पूरी दुनिया में मिसाल बन गई थी इंदिरा जी की दबंगता

- योगेश कुमार गोयल
(राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार)


19 नवम्बर 1917 को जब पं. जवाहरलाल नेहरू के घर प्रियदर्शिनी नामक एक कन्या जन्मी थी तो किसे पता था कि यह कन्या आगे चलकर न केवल इस देश की बागडोर संभालेगी बल्कि इसकी दबंगता पूरी दुनिया में एक मिसाल बन जाएगी। ऑक्सफोर्ड और स्विट्जरलैंड में उच्च शिक्षा प्राप्ति के पश्चात् इन्दिरा गांधी ने भी उच्च पद पर नौकरी करने अथवा कोई अन्य कार्य करने के बजाय अपना जीवन देशसेवा में ही समर्पित करने का निश्चय किया। देशभक्ति की भावना इंदिरा जी में बचपन से कूट-कूटकर भरी थी। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आव्हान से प्रेरित होकर बचपन में ही इन्होंने अपने घर के बाहर अपने कीमती कपड़ों की होली जलाकर न केवल अपनी इसी भावना का परिचय दिया था बल्कि उसके बाद इंदिरा जी से प्रेरणा लेकर इस आन्दोलन ने पूरे देश में जोर पकड़ा था।
इंदिरा जी में बचपन से ही एक अच्छी राजनेता होने के तमाम गुण विद्यमान थे। 21 वर्ष की आयु में वह कांग्रेस में शामिल होकर सक्रिय राजनीति में कूद पड़ी। उसके बाद उन्होंने आजादी के आन्दोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1942 में उन्होंने फिरोज गांधी से प्रेम विवाह किया किन्तु कुछ वर्षों बाद 1960 में फिरोज गांधी का अकस्मात् निधन हो गया। पिता जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद देश की बागडोर संभालने की जिम्मेदारी इंदिरा के कंधों पर आई तो अपनी दृढ़ता, दबंगता, निडरता और वाकपटुता से उन्होंने दुनिया भर को अपना लोहा मानने को विवश कर दिया। अमेरिका व ब्रिटेन जैसे विकसित एवं प्रभावशाली देशों में भी उनकी तूती बोलती थी। 1966 से 1977 तक उन्होंने देश पर एकछत्र शासन किया और उनकी कार्यशैली तथा देश के प्रति उनका समर्पण भाव देखकर विरोधी भी उनकी सराहना किए बिना नहीं रह पाते थे। हालांकि लाल बहादुर शास्त्री के बाद प्रधानमंत्री बनी इंदिरा को शुरूआती दौर में ‘गूंगी गुड़यिा’ की उपाधि दी गई थी किन्तु बहुत ही कम समय में अपने साहसिक निर्णयों से इंदिरा ने कारण साबित कर दिया था कि वो एक ‘गूंगी गुडि़या’ नहीं बल्कि ‘लौह महिला’ हैं।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण तथा 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारत की शानदार जीत के बाद इंदिरा जी जनमानस की आंखों का तारा बन गई थी किन्तु 1975-77 के इमरजेंसी काल ने उनकी छवि पर ग्रहण लगाने में प्रमुख भूमिका निभाई और इस दौर ने उनकी छवि एक तानाशाह के रूप में स्थापित कर दी। यही वजह रही कि 1977 में इंदिरा को पहली बार हार का सामना करना पड़ा और सत्ता उनके हाथ से छिन गई किन्तु निराश होना तो जैसे उन्होंने सीखा ही नहीं था, इसलिए 1980 में एक बार फिर विशाल बहुमत के साथ वह सत्ता में लौटी। अपने शासनकाल में उन्होंने कभी अलगाववादी व साम्प्रदायिक आग भड़काने वाले तत्वों को नहीं पनपने दिया। ऐसे तत्वों को उन्होंने बेदर्दी से कुचलने में जरा भी देर नहीं लगाई।
1980 में पुनः देश का शासन संभालने के बाद पंजाब में अलगाववादी ताकतों ने खालिस्तान की मांग शुरू की और दूसरे मुल्कों की शह पर अपने नापाक इरादों को कामयाब बनाने के लिए सिख अलगाववादियों ने भयानक नरसंहार का दौर शुरू किया तथा पंजाब में अवैध रूप से हथियारों के जखीरे इकट्ठे करने शुरू कर दिए। देश की जांबाज, निडर एवं साहसी नेता इंदिरा को भला यह कैसे सहन होता, इसलिए जैसे ही उन्हें खबर मिली कि सिख अलगाववादियों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर जैसी पाक जगह में भी हथियारों का विशाल जखीरा इकट्ठा किया है तो उन्हें देश की एकता और अखंडता कायम रखने तथा अलगाववादियों के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए इस पवित्र धर्मस्थल के भीतर न चाहते हुए भी ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के तहत पुलिस भेजने का सख्त निर्णय लेना पड़ा। हालांकि उस वक्त स्वर्ण मंदिर के भीतर पुलिस बल भेजने के उनके फैसले की बहुत आलोचना हुई किन्तु जब स्वर्ण मंदिर से हथियारों का बहुत बड़ा जखीरा बरामद हुआ और धार्मिक स्थल की आड़ में चल रही इस राष्ट्र विरोधी साजिश का भंडाफोड़ हुआ तो उन्हीं लोगों ने इंदिरा जी की सराहना की, जो इस मामले का पर्दाफाश होने तक उनकी आलोचना कर रहे थे। उसके बाद इंदिरा ने जिस दिलेरी और दृढ़ता के साथ अलगाववादियों को रौंदा, वह एक मिसाल बन गया लेकिन अलगाववादियों के विरूद्ध चलाए गए उनके इसी ऑपरेशन की वजह से ही वह उनकी हिट लिस्ट में सबसे ऊपर आ गई और उन्होंने हर हाल में उनकी हत्या कर उन्हें अपने मार्ग से हटाने की ठान ली।
खुद इंदिरा जी को अपनी मौत का पहले ही आभास हो गया था लेकिन फिर भी वह अपने नेक इरादों से टस से मस न हुई और अलगाववादियों के खिलाफ अपना अभियान पहले से भी तेज कर दिया। 30 अक्तूबर 1984 को भुवनेश्वर की एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए इंदिरा ने अपनी हत्या का पूर्वाभास होने का स्पष्ट संकेत देते हुए कहा था, ‘‘देश की सेवा करते हुए यदि मेरी जान भी चली जाए तो मुझे गर्व होगा। मुझे भरोसा है कि मेरे खून की एक-एक बूंद देश के विकास में योगदान देगी और देश को मजबूत एवं गतिशील बनाएगी।’’
इंदिरा जी के इस भाषण के चंद घंटों बाद ही अर्थात् अगले दिन 31 अक्तूबर 1984 को सुबह करीब सवा नौ बजे उनके दो निजी अंगरक्षकों ने ही उन्हें उस वक्त गोलियों से छलनी कर दिया, जब वह अपने आवास से निकलकर विदेशी मीडिया को इंटरव्यू देने जा रही थी। इस हत्याकांड से जहां पूरे देश में शोक की लहर छा गई, वहीं दूसरी ओर इंदिरा जी का शहीदी रक्त रंग लाया और इस हत्याकांड से चूंकि समूचा सिख समुदाय कटघरे में खड़ा हो गया था, इसलिए सिख समुदाय की ओर से सिख अलगाववादियों को मदद मिलनी बंद हो गई और इंदिरा जी की शहादत के साथ ही खालिस्तान की मांग भी गहरे दफन हो गई। इंदिरा जी अक्सर कहा करती थी कि उन कायरों और बुजदिलों पर मातम करो, जो दुनिया के जुल्मों से घबराकर इस तरह आंखें बंद कर लेते हैं, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो।
बचपन की एक घटना ने तो इंदिरा जी का जीवन ही बदलकर रख दिया। एक दिन स्कूल से घर लौटते समय इंदिरा जी की नजर अपने स्कूल की नौकरानी की लड़की पर पड़ी, जो उस वक्त अपनी झोंपड़ी के दरवाजे पर खड़ी थी। उस लड़की के मैले-कुचैले कपड़े और उसके शरीर पर जमी मैल की परतें देखकर इंदिरा जी सोचने पर विवश हो गई कि यह लड़की दूसरे बच्चों से इतनी अलग क्यों है? क्या इसे साफ-सुथरा रखने वाला कोई नहीं है? क्या इसे भी हमारी तरह स्कूल में पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं है? आखिर यह कैसा अन्याय है?
यही सोचते-सोचते इंदिरा के कदम अनायास ही उस लड़की की ओर बढ़ गए। उन्होंने प्यार से उस लड़की का हाथ पकड़ा और कहा, ‘‘आइए, आज आप हमारे साथ हमारे घर चलिए।’’
लड़की इंदिरा जी के मुंह से इतनी मधुर वाणी में यह सब सुनकर आश्चर्यचकित थी क्योंकि इससे पहले कभी किसी ने उसके साथ इतने प्यार से बात नहीं की थी। लड़की चुपचाप इंदिरा जी के साथ चल दी। घर लाकर इंदिरा जी ने उसे कुर्सी पर बैठाया और फिर मल-मलकर उसे खुद अपने हाथों से नहलाया। शरीर से मैल की परतें उतरने के बाद उस लड़की का रंग निखर उठा और उसके चेहरे पर चमक आ गई। तब इंदिरा जी ने बाजार से उसके लिए नए कपड़े मंगवाए। नए कपड़ों में तो अब वह बिल्कुल गुडि़या सी लग रही थी। अब इंदिरा जी सोचने लगी कि आखिर इन बच्चों को अछूत क्यों कहा जाता है? क्यों इंसान इंसान से ही इतनी घृणा करता है?
रात को इंदिरा जी ने उस लड़की को अपने ही घर रखा और अपने साथ सुलाया। लड़की जब गहरी नींद में सो गई तो इंदिरा जी उसके भोले-भाले चेहरे को निहारते हुए सोचने लगी कि सभी बच्चे एक समान होते हैं, उनकी कोई जाति नहीं, कोई धर्म नहीं, उनके बीच कोई अमीरी-गरीबी की दीवार नहीं, वे निष्पाप और निश्छल होते हैं, फिर भी यह ऊंच-नीच क्यों? इंदिरा जी के मन में चल रहे इस अंर्तद्वंद्व ने आखिर एक तूफान का रूप धारण कर लिया।
अगले दिन उनके स्कूल में गांधी जी के आमरण अनशन को लेकर एक सभा का आयोजन था, जिसमें बच्चों को भी बोलने का मौका दिया गया था। जब इंदिरा जी ने बोलना शुरू किया तो सभागार में सन्नाटा छा गया और सभी एकटक इंदिरा को निहारने लगे कि इतनी छोटी बालिका इतनी गूढ़ बातें कैसे कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘आखिर स्वर्ण अपने ही दलित भाईयों को गिरा हुआ, छूत और निकृष्ट क्यों समझते हैं तथा उनके साथ दुवर््यवहार और अत्याचार क्यों करते हैं? अगर हमने अपनी ही सेवा करने वालों का इस तरह से निरन्तर तिरस्कार न किया होता तो आज अंग्रेजों को इस प्रकार लाभ उठाने का अवसर न मिल रहा होता और न ही बापू को इस तरह से आमरण अनशन कर अपने प्राण दांव पर लगाने पड़ते।’’ इंदिरा जी की इन गूढ़ और तर्कसम्मत बातों से सभी नतमस्तक थे और उनकी सराहना कर रहे थे।


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