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नई दिल्ली - तूफानी क्रिकेट के चहेते फैंस को झटका लगा जब एमीरेट्स क्रिकेट बोर्ड (ईसीबी) ने अगले महीने निर्धारित यूएई टी20 लीग (UAE T20x) को रद्द कर दिया। इस लीग को आईसीसी की मंजूरी मिल चुकी थी और शाहिद अफरीदी, कुमार संगकारा, इयोन मॉर्गन, डेविड मिलर और आंद्रे रसेल जैसे दिग्गज इसमें आईकन खिलाड़ियों के रूप में इसमें हिस्सा लेने वाले थे।
यह टूर्नामेंट पांच टीमों के बीच होने वाला था, लेकिन अभी तक सिर्फ दो फ्रेंचाइजियों पर ही फैसला हो पाया था। शेष तीन टीमों की बिक्री के बारे में प्रक्रिया अंतिम दौर में थी लेकिन ईसीबी को लगा कि टीमों की बिक्री और टूर्नामेंट के प्रमोशन के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है।
आईसीसी के पूर्ण सदस्य देशों ने जुलाई में आईसीसी से फ्रेंचाइजी आधारित टी20 लीग की संख्या पर नियंत्रण लगाने को कहा था। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड यूएई में अपनी टी20 लीग (पाकिस्तान सुपर लीग) आयोजित करता है और उसे इसकी वजह से अपनी लीग पर प्रभाव पड़ने का खतरा दिख रहा था।
दक्षिण अफ्रीका की लीग शुक्रवार से
एबी डिविलिर्स दक्षिण अफ्रीका की पहली शहर आधारित टी-20 लीग का आकर्षण होंगे। मजान्सी (दक्षिण अफ्रीका) सुपर लीग के पहले मैच में डिविलियर्स शुक्रवार को केपटाउन ब्लिट्ज के खिलाफ तशवेन स्पार्टस की अगुआई करेंगे। एक महीने तक चलने वाली यह लीग आधिकारिक लांच के एक महीने के अंदर शुरू हुई है और वह भी टाइटल प्रायोजक के बिना। इस लीग में इस बार अंतरराष्ट्रीय खिलाडि़यों की संख्या भी कम है क्योंकि कुछ बड़े खिलाडि़यों की पूर्व प्रतिबद्धताएं थी।

 


नई दिल्ली - आईसीसी विमेंस टी20 वर्ल्ड कप में टीम इंडिया का प्रदर्शन अभी तक शानदार रहा है। टीम इंडिया लगातार तीन जीत दर्ज करके सेमीफाइनल में जगह पक्की कर चुकी है। गुरुवार को आयरलैंड के खिलाफ मैच से पहले मेंस टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली ने एक चैलेंज शुरू किया था। #JerseyKnowsNoGender, जिसका मतलब जर्सी पुरुष महिला में भेद नहीं करना जानती। इस चैलेंज के तहत विराट ने टेनिस स्टार सानिया मिर्जा, ऋषभ पंत और सुनील छेत्री को नॉमिनेट किया था।
अब इस चैलेंज के तहत तमाम लोग अपनी तस्वीरें शेयर कर रहे हैं। सानिया मिर्जा ने अपने जन्मदिन के मौके पर एक खास पोस्ट शेयर की और मैरीकॉम, सुशांत सिंह राजपूत और हार्दिक पांड्या को नॉमिनेट किया।
क्या है #JerseyKnowsNoGender चैलेंज
इस चैलेंज का नाम है #JerseyKnowsNoGender जिसका मतलब कि जर्सी के लिए महिला-पुरुष एक समान है। विराट ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, 'हम सेमीफाइनल में पहुंचने वाले हैं और समय आ गया है कि भारतीय टीम वर्ल्ड कप को घर लेकर आए। मैं ऋषभ पंत, सायना नेहवाल और सुनील छेत्री को नॉमिनेट करता हूं कि वो इस अभियान में मुझसे जुड़ें। अपनी जर्सी पहनिए और टीम के लिए पोज दीजिए।' इस चैलेंज के तहत आपको जर्सी पहनकर भारतीय महिला क्रिकेट टीम के लिए अपना पोज सोशल मीडिया पर शेयर करना है।

 


भुवनेश्वर - शिवम मावी के पांच और अंकित राजपूत के चार विकेट की बदौलत रणजी ट्रॉफी ग्रुप-बी के मुकाबले में उत्तर प्रदेश ने ओडिशा को चौथे दिन 10 विकेट से शिकस्त दे दी। उतर प्रदेश की यह लगातार दूसरी जीत है।
ओडिशा ने तीसरे दिन के स्कोर 180 रन पर सात विकेट से आगे खेलना शुरू किया। चौथे दिन ओडिशा की दूसरी पारी जल्द ही 221 रन पर ऑलआउट हो गई। ओडिशा के लिए संदीप पटनायक ने सबसे ज्यादा 46 रन बनाए। इससे पहले ओडिशा पहली पारी में 256 रन पर आउट हो गई थी।
जिसके बाद उत्तर प्रदेश ने कप्तान अक्शदीप नाथ की 159 रन की पारी की बदौलत 437 रन बनाए थे। यहां से उत्तर प्रदेश को 181 रन की बड़ी बढ़त मिली थी। दूसरी पारी में ओडिशा के 221 रन पर आउट होने के बाद उत्तर प्रदेश को 44 रनों का लक्ष्य मिला जो उन्होंने बिना किसी नुकसान के हासिल कर लिया।
जम्मू कश्मीर-गोवा मुकाबला ड्रॉ
गोवा और जम्मू कश्मीर के बीच खेला गया ग्रुप बी का मुकाबला चौथे दिन ड्रॉ समाप्त हुआ। गोवा ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी पारी 402 रन पर नौ विकेट पर घोषित की थी। गोवा की ओर से कौथांकर ने सबसे ज्यादा 130 रन बनाए थे।
इसके बाद जम्मू कश्मीर पहली पारी में 271 रन पर ऑल आउट हो गई और फालोऑन खेलने पर मजबूर हो गई। यहां दूसरी पारी में जम्मू कश्मीर ने दिन का खेल खत्म होने तक पांच विकेट पर 242 रन बनाए और इसी के साथ यह मुकाबला ड्रॉ हो गया।

 


-ओम प्रकाश उनियाल
राम हमारे आराध्य हैं, आदर्श हैं। 'राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट ..... ' का संबोधन अध्यात्म के अनुसार मानव जीवन को सुधारने के लिए किया गया है। लेकिन उसका उपयोग राजनीति के लिए होने लगा। पूरी तरह हावी हो चुकी है राजनीति राम नाम पर। इसका मतलब यह हुआ कि राम शब्द कि महिमा की समझ किसी को नहीं है। बहुत ही हल्का समझा राम राजनीति करने वालों ने। जमकर भुनाते आ रहे हैं राम के नाम को। जब से राम मंदिर का मुद्दा उठा है तब से हर चुनाव में 'राम लहर' का जिक्र होता आया है। इस लहर का फायदा होता ही आ रहा है। यह लहर तब तक जारी रहेगी जब तक माननीय उच्च न्यायालय से फैसला नहीं आ जाता। यदि फैसला मंदिर निर्माण के पक्ष में आया तो स्वतः ही राम शब्द पर छाये राजनीति के बादल छंट जाएंगे। तब राम लहर अयोध्या के उस प्रांगण तक सिमट कर रह जाएगी जहां पर उनकी जीवन लीला को दर्शाने के लिए कई एकड़ जमीन में मूर्तियों की स्थापना की जाएगी। जिसकी पूरी तैयारी है। कहने का अर्थ यह है कि किसी महापुरुष या देवी-देवताओं के नाम पर राजनीति करना शोभा नहीं देता। सम्मान देने, पूजने के अनेक तरीके होते हैं। मतलब राजनीति में लहर चलाने का जो प्रयोग किया जाता है वह अनुचित है। भाजपा ने कभी 'राम लहर चलायी तो कभी 'मोदी लहर'। निकट भविष्य में जब ये लहरें शांत हो जाएंगी तो कोई अन्य तैयार हो जाएगी। संभवत: गऊ और गंगा भी लहर बन सकती है। कांग्रेस महात्मा गांधी व नेहरु जी, इंदिरा के नाम की लहर में डुबकियां लगाती रहती है। आगे राहुल लहर की संभावना है। बसपा में दलित लहर, सपा की 'नेता जी' (मुलायम) लहर, बिहार में लालू और नितीश लहर, स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह ने कभी किसान लहर चलायी थी। दक्षिण में ममता लहर। अर्थात् हरेक दल किसी न किसी लहर में हिचकोले खाता रहता है। जो लहरों से बच निकला वही विजयी। जो डूबा सो डूबा। समझ नहीं आता कि विकास की लहर, गरीबी मिटाने, देश को तोड़ने वालों के खिलाफ जैसी लहरों में डुबकी लगाने से क्यों डरते हैं राजनीति करने वाले। दूसरे की पीठ पर बंदूक चलाकर या यूं कह लीजिए दूसरे के नाम पर अपनी स्वार्थ सिद्धी की नीति क्यों अपनाते हैं रजनीतिज्ञ। राजनैतिक दलों को तो अपनी पहचान ऐसी बनानी चाहिए कि किसी का सहारा लेने की आवश्यकता ही न पड़े। कहीं लहरों के थपेड़ों में एक-एक कर गुम न हो जाएं तमाम दल।


टी-प्वाइंट, कन्हैया विहार, (नर्सरी के निकट),
कारगी ग्रांट, देहरादून-248001, उत्तराखंड,
Mob. : 9760204664
E-mail : krgddn4@gmail.com

 

-प्रभुनाथ शुक्ल [Journalist]


कुछ माह बाद 2019 में लोकसभा के आम चुनाव होने हैं। लिहाजा देश का मूड चुनावी है। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में हो रहे आम चुनाव गुलाबी ठंड में भी तपिस बढ़ा दी है। कर्नाटक में हुए उपचुनाव और उसके बाद आए परिणाम ने इस सरगर्मी को और बढ़ा दिया है। गैर भाजपाई दल राज्य विधानसभा चुनाओं को जहां भाजपा और मोदी के लिए प्री-पालटिक्स टेस्ट मान रहे हैं। वहीं कर्नाटक की जीत को महागठबंधन के लिए सरकारात्मक बताया जा रहा है। लेकिन 2019 का फाइनल टेस्ट चार राज्यों के विधानसभा परिणाम को बताया जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश के बगैर देश की राजनीतिक अधूरी है। भाजपा और मोदी की निगाह इस वक्त सिर्फ उत्तर प्रदेश पर टिकी है। क्योंकि दिल्ली का रास्ता वाया लखनउ से होकर गुजरता है। उसमें भी पूर्वांचल का हिस्सा किसी भी राजनीतिक दल के लिए बेहद अहम है।
वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी का दौरा देश की राजनीतिक सरगर्मी को और बढ़ा दिया है। भाजपा चुनावी खेल को फं्रट पर आकर खेल रही है जबकि कांग्रेस और दूसरे दल अभी काफी पीछे दिखते हैं। पीएम मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी यानी काशी में तोहफांे की जो बारिश किया उससे यह साबित हो गया है 2019 में मोदी का चुनावी रण काशी ही होगा और वाराणसी से वह दूसरी बार उम्मीदवार होंगे। भाजपा पूर्वांचल को पालटिक्स पावर सेंटर बनाना चाहती है। जिसकी वजह है प्रधानमंत्री ने विकास का पीटारा खोलकर पूर्वांचल को साधने की कोशिश की है। हांलाकि 2019 में यह कितना कामयाब होगा यह वक्त बताएगा। क्योंकि अगर सपा-बसपा एक साथ आए तो भाजपा के लिए पूर्वांचल बड़ी चुनौती होगा। उसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा विकास की आड़ में अपना राजनैतिक खेल अभी से शुरु कर दिया है। चुनावी तैयारियों की जहां तक बात करें तो अभी भारतीय जनता पार्टी और टीम अमितशाह सबसे आगे दिखती है। क्योंकि लोगों को साधने के लिए भाजपा के पास अच्छा मौका है। जब तक चुनावी आचार संहिता नहीं लागू होती है तब तक विकास की आड़ में चुनावी तोहफों की झमाझम बारिश की जा सकती है। इसकी वजह है केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार। लिहाजा वह विकास की आड़ में चुनावी खेल खेलने में कोेई भूल नहीं करना चाहती है। जबकि विपक्ष के पास आरोप-प्रत्यारोप के अलावा कुछ हाथ नहीं लगा है। अब 2019 में काशी की जनता मोदी को कितना पसंद करती है यह कहना जल्दबाजी होगी। क्योंकि भाजपा की पूरी कोशिश है कि 2014 में पूर्वांचल में पार्टी को जो सफलता मिली है उस पर कब्जा बरकरार रखा जाए जिसकी वजह है पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी को पूर्वांचल के पालटिक्स पावर सेंटर के रुप में स्थापित किया जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबका साथ सबका विकास के मूलमंत्र को आगे बढ़ाते हुए एक बार काशी से पूरे देश को यह संदेश दिया है कि वह विकास की बात करते हैं जबकि विपक्ष राफेल, जीएसटी और नोटबंदी की बात करता है। वाराणसी दौरे में इस बात को उन्होंने उल्लेख भी किया है। पीएम मोदी ने वाराणसी को 2400 करोड़ की विकास योजनाओं की सौगात दी है। निश्चित रुप से यह अपने आप में अहम है। उन्होंने आतंरिक जलमार्गों के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि जोड़ी है। सीधे कोलकाता यानी हल्दिया से वाराणसी को जोड़ा है। 200 करोड़ की लागत से बने देश के पहले मल्टी माडल टर्मिनल का लोकार्पण कर विकास का नया इतिहास लिखा है। मोदी ने अपने संबोधन में इस बात का उल्लेख भी किया कि जो काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था वह अब हो रहा है। जलमार्ग के जरिए पूरे पूर्वांचल को जोड़ने की एक नयी सोच विकास में कितना खरी उतरेगी यह तो वक्त बताएगा। लेकिन मोदी ने इसके जरिए पूर्वांचल की जनता का दिल जीत लिया है। इस दौरान गडकरी ने कहा कि पहली बार गंगा के जरिए 16 कंटेनर यहां पहुंचे हैं। गंगा के जरिए भविष्य में 270 लाख टन का परिवहन होगा। हालांकि गर्मियों मंे जब गंगा में पानी की कम होगा तब यह दावा कितना सफल होता है यह देखना होगा। इसके अलावा बावतपुर एयरपोर्ट से सीधे फोरलेन के जरिए वाराणसी को जोड़ा गया है। 16 किमी रिंग रोड़ का निर्माण किया गया है। काशी को केंद्र मान कर इसके चारों तरफ सड़कों को जाल बिछाया गया है। यह सब बातें बेहद अच्छी हैं। पीएम मोदी की वजह से वाराणसी का विकास हुआ इसमें कोई शक भी नहीं है। लेकिन चुनावी मौसम में यह कितना धरातलीय होगा यह देखना होगा।
गंगा की सफाई मोदी सरकार की प्राथमिकता थी, लेकिन पांच साल बाद भी गंगा कितनी साफ हुई यह कहने की बात नहीं है। काशी को क्वेटो बनाने की मुहिम अभी तक परवान नहीं चढ़ी हैं। जिसकी वजह से सरकार की की कथनी और करनी में काफी अंतर दिखता है। विकास के नाम पर गंगा के घाटों और गलियों के मूल स्वरुप को नुकसान पहुंचाया गया है। जिसकी वजह से काशी के वासिंदे बहोत खुश नहीं हैं। गंगा से सीधे बाबा विश्वनाथ मंदिर मार्ग का चैड़ीकरण वहां के लोगों के गुस्से का कारण बना है। क्योंकि इसकी वजह से काफी लोग बेघर हो जाएंगे और काशी के मूल स्वरुप को नुकसान होगा। हांलाकि गंगा की सफाई मोदी सरकार की प्राथमिकता है, लेकिन उसकी गति बेहद धीमी रही है। दूसरी तरह पूर्वांचल की चीनी मिलें, साड़ी उद्योग, कालीन उद्योग दमतोड़ चुका है। वाराणसी में आज भी गंगा घाटों की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। स्वच्छता को अभियान तो एक दिवा स्वप्न भर दिखता है। केंद्रीयमंत्री नीतिन गड़करी ने कहा है कि अगले साल मार्च तक गंगा 80 फीसदी साफ हो जाएंगी। सरकार गंगा सफाई के लिए 10 हजार करोड़ की परियोजना लायी है। यह अपने आप में कितना सच होगा फिलहाल अभी कुछ कहना मुश्किल है।
भाजपा वाराणसी को पूर्वांचल का पालटिक्स पावर सेंटर बनाकर यहां से पूर्वांचल की 22 संसदीय सीटों पर नजर रखना चाहती है। वह काशी प्रांत पर अपनी पकड़ ढ़िली नहीं होने देना चाहती है। वाराणसी से सटे बिहार के राजनीतिक हल्कों पर भी पूरी पकड़ मजबूत रखना चाहती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास पीटारे ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा किसी भी कीमत पर पूर्वांचल को खोना नहीं चाहती है। वह 2014 की तरह 2019 में भी अपना प्रदर्शन दोहराना चाहती है। वाराणसी देश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी है। देश और दुनिया में इसकी अलग पहचान है। कांगे्रस के दौर में भी वाराणसी राजनीतिक का केंद्र रहा था। मोदी युग में यह सोच और आगे बढ़ी है। दूसरी सबसे अहम बात यह है कि राज्य और पूर्वांचल की पिछड़ी जातियों पर भाजपा की पूरी निगाह है। यूपी में 32 फीसदी पिछड़ी जाति के लोग हैं। जबकि पीएम मोदी भी पिछड़ी जाति से आते हैं। दूसरी बात पूर्वांचल सबसे पिछड़ा क्षेत्र रहा है। इसके अलावा यहां से बिहार की बक्सर, आरा और गया करीब है। जबकि छत्तीसगढ़ की पलामू सीट में नजदीक है। जिसकी वजह से पीएम मोदी के काशी से दोबारा चुनाव लड़ने पर इसका पूरे पूर्वांचल के साथ बिहार और छत्तीसगढ़ पर भी असर दिखेगा। जिसकी वजह से भाजपा एक रणनीति के तहत मोदी को यहां से दोबारा चुनाव मैदान में उतारना चाहती है। अब देखना यह होगा कि 2019 में बदलते राजनीतिक समीकरण में भाजपा कितना कामयाब होगी।

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-राजीव डोगरा


बाल दिवस हर वर्ष 14 नवंबर को मनाया जाता है। यह दिवस नन्हें मुन्नों का दिवस हैं।नेहरु जी के जन्मदिन पर मनाया जाने वाला बाल दिवस, नेहरु जी का बच्चों के प्रति प्रेम को दर्शाता है।इस दिन स्कूलों और कॉलेजों में कई तरह के कार्यक्रम किए जाते हैं।और साथ ही नेहरू जी को याद कर उनको श्रद्धांजलि दी जाती है।नेहरू जी को बच्चों से बड़ा प्रेम था बच्चों के साथ समय बिताना उनको बड़ा अच्छा लगता था।बच्चें भी प्यार से उनको चाचा जी कह के भूलते थे। मगर एक बात मैं कहना चाहता हूं जिस तरह का आज का समय है इस समय में बच्चे भी एक लड़की की तरह आज असुरक्षित है बहुत सारे दरिंदे बच्चों के साथ भी गलत कर जाते हैं। इसके कारण चाइल्ड हैरेसमेंट जैसी समस्या हमारे समाज में आज गंभीर रूप ले चुकी है।देश में प्रतिदिन 55 बच्चियों के साथ दुष्कर्म होता है। बाल दिवस जब तक सार्थक नहीं माना जा सकता जब तक बालक और बालिकाओं के साथ हो रहे अपराधों पर हम रोक नहीं लगा देते । बच्चों के साथ यौन शोषण के मामले दिन पर दिन घटने के स्थान पर बढ़ रहे हैं हमें इन मामलों से निपटने के साथ-साथ बच्चों को ऐसी जानकारियां भी देनी चाहिए जिससे वह यौन शोषण से बच सकें।बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है। भारत में बाल यौन शोषण के बहुत से मामलों को दर्ज नहीं किया जाता क्योंकि ऐसे मामलों को सार्वजनिक करने पर परिवार खुद को असहज महसूस करता है।वो सोचते है इस से समाज में उनके परिवार का नाम ख़राब होगा। एक समाचार रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष लगभग 135,000 बच्चों की तस्करी होने का अनुमान लगाया गया है। तस्करी वाले बच्चों को गुलामी, घरेलू नौकरी करने, भीख माँगने के लिए मजबूर किया जाता है या सेक्स उद्योग में बेच दिया जाता है। अक्सर दूरदराज के गाँवों और अधिकतर गरीब परिवारों के बच्चों का अपहरण होता है। एक तरफ हम बाल दिवस मना रहे हैं दूसरी तरफ हम से जुड़े हुए कुछ लोग बच्चों का शारीरिक और मानसिक शोषण कर रहे हैं उन्हें बहला-फुसलाकर उनके साथ शोषण कर रहे है।
अगर वास्तव में हम बाल दिवस को सार्थक बाल दिवस बनाना चाहते हैं तो हमें इस दिन बच्चों को अच्छी और ऐसी जानकारियां देनी चाहिए जिससे वह अपने आप को सुरक्षित रख सकें और बच्चों को अपने अधिकारों के प्रति जागृत करना चाहिए और उनको उनके कर्तव्यों को भी निभाने के लिए हमें प्रेरित करना चाहिए।यूनाइटेड नेशन द्वारा जारी चाइल्ड राइट्स कंवेनशन पर सभी देशों ने हस्ताक्षर किए हैं, भारत भी उनमें से एक है। इसके अलावा भारतीय संविधान और राइट टू एजुकेशन जैसे अधिकारों ने बच्चों के हितों और हकों की हिफाजत के लिए बहुत-से दिशा-निदेर्श जारी किए हैं।जैसे:-
-14 वर्ष से कम आयु के किसी भी बच्चे की फैक्ट्री, माइंस और अन्य किसी भी खतरनाक काम में सेवाएं नहीं ली जा सकती हैं।
-सरकार का दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि उन्हें कोई अगवा न कर सके। इस स्थिति में सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहिए।
-सभी बच्चों को 14 वर्ष की उम्र तक प्राथमिक शिक्षा मुफ्त उपलब्ध हो।
-स्कूलों में बच्चों के शारीरिक व बौद्धिक विकास करने के साथ-साथ ऐसा कुछ न किया जाए जिससे उनकी गरिमा को ठेस पहुंचे।
अंत में मैं सिर्फ यही कहूंगा कि हम बाल दिवस मनाए और साथ ही पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को भी याद कर उनको श्रद्धांजलि दें।मगर साथ ही हम बच्चों के अधिकारों के प्रति खुद भी जागृत हो और बच्चों को भी जागृत करें तो जो किसी भी तरह के शोषण से बच्चों को बचाया जा सके क्योंकि जब भी किसी तरह का शोषण किसी बच्चे के साथ होता है तो वह उसके मन पर एक अमिट छाप छोड़ जाता है।जो उसको पूरे जीवन भर प्रभावित करता रहता है।और जीवन भर मानसिक तौर पर परेशान और हताश रहता है। जै माँ काली जै माँ काली

कांगड़ा,हिमाचल प्रदेश
rajivdogra1@gmail.com


-अभिषेक राज शर्मा

राजनीति पर चर्चा हो रही हो तभी जेहन में विचारो की धारा बहने लगती हैं,
मानो जैसे विचार विमर्श के बिना राजनीति सूना सा लगता है।
विचारधारा राजनीति का फैशन बन गया जो बडे़ पोस्टर और प्रलाप द्वारा दिखाई देता है, जब विचारधारा की सत्ता हो तब परवाह नही होती लेकिन जब आप सत्ता से बाहर हो तब विचारधारा उमड़कर शरीर को तोड़मरोड़ करती है।
विचारधारा से समझ आता कि पार्टी के विकास का रास्ता जो बडंल भरके बोरी में भर जाये।
विचारधारा का रास्ता बेहद सकरा होता मगर देखो नेताओ ने हाईवे बनाकर रख दिया, जब चाहा विचारधारा को दौडा़कर हालत पतली कर लेते है।
विचारधारा की मोटी किताब धूल से खुद को बचाने की जंग लड़ रही है मानो कह रही हो "हे मनुष्य तेरे भला के लिये मैं अपनी हाड़-मांस सब कुर्बान कर रही हूं।
फिर क्या कुर्बानी का नाम सुनकर बडे़ लोग टूट पड़ते है!
विचारधारा नेताओ का आभूषण है जो उनका अंलकार करती है, तगमा देता कि फला विचारधारा के सुरछाकर्मी है मानो इनके गोंद में विचारधारा सुरछित आराम कर रही है।
कोई विचारधारा को तेल लेने भेजता है,कोई विचारधारा को ठोकर मारता है।
कल उस पार्टी में विचारधारा को ढो रहे थे,
लडा़ई लड़ रहे मानो ये जनता की हर समस्या को चुटकी में समाप्त कर देगें।मगर किसी बात को लेकर बात बिगड़ गई,
फिर जिस विचारधारा से करोडो़ की कमाई किया हो उसी विचारधारा से आपकी दम घुटने लगता है।
एक नेता मित्र ने अपने पार्टी कार्यालय पर आंमत्रित किया,
उनके विचारधारा के गुरू का जन्मदिन पर हमला करना था कि सत्ता वाले गुरू के नाम को हड़पना चाहते है,
पार्टी पर मेरे स्वागत की कोई तैयारी नही थी बस दस कुर्सी और कुछ बुजुर्ग नेता अपनी धौंस दिखा रहे कि वे विचारधारा को जिदां रखने के लिये क्या नही किया।कार्यालय पर मोटे किताब बडे़ तस्वीर लगी लगाई गई थी जो मानो आज ही साफ करके लगाई गई हो।
जब नेता जी भाषण देने बैठे मोटे आंसू बहाने लगे
उन्हे हर पल गरीबो और किसानो की चिंता खाये जा रही है।
वो पत्रकार बंधु से हाथ जोड़कर बोले आप सभी खाना खाकर जायें और मेरे समाचार को ध्यान में रखकर प्रकाशित करवाये।
वो मेरे पास आये मुझे लिफाफा दिया
मैं बोला" अरे भाई आप लोगो विचारधारा की क्या जरूरत आप ईमानदारी से काम करें
आपको जनता हमेशा चुनेगी।

जौनपुर उप्र०
E-mail : indabhi22@gmail.com
Mob. : 8115130965


-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)


मधुमेह शब्द मधु और मेह दो शब्दों से मिलकर बना है। मधुमेह शब्द में मधु का अर्थ होता है मीठा यानी शक्कर और मेह का अर्थ होता है मूत्र यानी पेशाब। मधुमेह या डाइबिटीज जिसे बोलचाल की भाषा में शुगर भी कहा जाता है आखिर है क्या जिसकी चर्चा आजकल घर घर में सुनी जा रही है। बच्चे से बुजुर्ग तक हर आयु का व्यक्ति इस बीमारी का शिकार हो रहा है। अस्पतालों और जाँच केंद्रों पर मधुमेह के रोगी बड़ी संख्या में देखे जा रहे है। भारत में हर पांचवें व्यक्ति को इस बीमारी ने घेर रखा है।
स्वस्थ व्यक्ति में खाने के पहले ब्लड में ग्लूकोस का लेवल 70 से 100 एमजी डीएल रहता है। खाने के बाद यह लेवल 120-140 एमजी डीएल हो जाता है और फिर धीरे-धीरे कम होता चला जाता है। मधुमेह हो जाने पर यह लेवल सामन्य नहीं हो पाता और बढ़ता जाता है। मधुमेह एक गंभीर मेटाबॉलिक रोग है जो अग्नाशय द्वारा इंसुलिन कम उत्पन्न करने या इंसुलिन न उत्पन्न कर पाने की स्थिति में होती है। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन को पचाने के लिए आवश्यक है। इंसुलिन का काम ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं में पहुंचाना है। पर्याप्त इंसुलिन के बिना ग्लूकोज शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश नहीं कर पाता है, जिससे रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ जाता है, इसे ही डायबिटीज या मधुमेह कहते हैं। बार-बार पेशाब लगना, ज्यादा प्यास और भूख लगना, जल्दी थकान और आखों की रोशनी कम होना, घावों का जल्दी नहीं भरना, अंगुलियों व पैर के अंगूठे में दर्द रहना, वजन कम होना, कमजोरी व अनिद्रा का शिकार होना आदि मधुमेह के प्रमुख लक्षण हैं।
मधुमेह पहले अमीरों की बीमारी मानी जाती थी, लेकिन आज इसने हर उम्र और आय वर्ग को अपनी चपेट में ले लिया है। एक दशक पहले भारत में मधुमेह होने की औसत उम्र 40 साल थी, जो अब 25-30 साल हो चुकी है। भारत में मधुमेह रोगियों की स्थिति पर नजर डाले तो आकड़े बेहद भयानक और चैकाने वाले हैं। 1991 में भारत में मधुमेह रोगियों की संख्या 2 करोड़ के आस-पास थी जो 2006 में बढ़कर 4 करोड़ 20 लाख हो गईं। भारत में 2015 में लगभग 7 करोड़ लोग इससे पीडित थे। 2018 में यह संख्या आठ करोड़ को पार कर गई । अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज फेडरेशन की रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में मधुमेह रोगियों की संख्या 2030 तक 55 करोड़ पार कर जाएगी।
भारत को मधुमेह की खान कहा जाता है। मधुमेह रोग वैश्विक और गैर. संचारी महामारी का रूप धारण कर चुका है। भारत में व्यस्त एवं भागमभाग वाली जिंदगी, खानपान की खराबी तनावपूर्ण जीवन, स्थूल जीवन शैली, शीतल पेय का सेवन, धूम्रपान, व्यायाम कम करने की आदत और जंक फुड का अधिक सेवन, मोटापा के कारण मधुमेह का प्रकोप बढ़ रहा है। बच्चों का अब खेलकूद के प्रति रूझान घटना और मोबाइल कंप्यूटर खेलों की तरफ बढ़ना टीवी से चिपके रहना और जंक फूड खाने से बच्चे भी इस रोग के शिकार हो रहे हैं।
मधुमेह रोगियों की संख्या में निरन्तर हो रही वृद्धि को देखते हुए 1991 में विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं इण्टरनेशनल डायबिटीज फेडेरेशन ने प्रति वर्ष 14 नवम्बर को विश्व मधुमेह दिवस आयोजित करने का निर्णय लिया । विश्व मधुमेह दिवस प्रतिवर्ष 14 नवंबर को सर फ्रेडरिक बैंटिंग के जन्मदिवस पर मनाया जाता है । जिन्होंने अपने सहयोगी के साथ मिलकर इंसुलिन की खोज की थी तथा जिसका पहली बार मनुष्यों के ऊपर उपयोग किया गया था। यह दिवस प्रतिवर्ष सारे विश्व में मधुमेह से प्रभावित बढ़ते रोगियों में जागरूक फैलाने के लिए मनाया जाता है।
मधुमेह एक ऐसी बीमारी है जिससे गरीब और अमीर सभी वर्गों के व्यक्ति सामान रूप से प्रभावित है। मगर इसकी मार गरीबों पर सबसे ज्यादा पड़ती है। मधुमेह को खत्म तो नहीं किया जा सकता है पर उसे नियंत्रित अवश्य किया जा सकता है। इसके लिए कई इलाज है पर प्राकृतिक इलाज सबसे बेहतर है, जिसमे योग की बड़ी महत्ता है। रोज सुबह उठकर प्राणायाम, व्यायाम व आसन करने से इस पर नियंत्रण किया जा सकता है।
मधुमेह वर्तमान में हमारी जिंदगानी का एक अहम् हिस्सा बन गयी है। यदि आपको मधुमेह है तो इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। जरूरत है तो सावधानी और सजगता की। खानपान और अपनी लाइफ स्टाइल में बदलाव की। आप डरेंगे तो यह आपको डराएंगी। मगर आप सावचेत रहे तो इसका मुकाबला आसानी से कर अपनी जिंदगी को बेहतर बना सकेंगे।

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
मो.- 9414441218, E-mail : bmojha53@gmail.com


-रमेश सर्राफ धमोरा (स्वतंत्र पत्रकार)


राजस्थान विधानसभा के लिये अगले माह होने वाले चुनाव में प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा व मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा तीसरा मोर्चा कितना दम दिखा पायेगा। आज यह सवाल हर मतदाता के मन में उठ रहा हैं, क्योंकि राजस्थान में हर बार बनने से पहले ही बिखर जाता है तीसरा मोर्चा। राजस्थान में अब तक कांग्रेस व भाजपा की ही सरकारे बनी है। अब तक 14 बार सम्पन्न हुये राजस्थान विधानसभा के चुनाव में 9 बार कांग्रेस व 5 बार भाजपा की सरकार बनी है। 1998 से तो लगातार एक बार कांग्रेस एक बार भाजपा की बारी-बारी से सरकार बनने का सिलसिला चलता आ रहा है।
राजस्थान में कुछ समय को छोड़ कर अधिकतर कांग्रेस व भाजपा का ही प्रभाव रहा है। 1977 में जनता पार्टी के गठन के समय भाजपा का पूर्ववर्ती दल जनसंघ सहित कांग्रेस के खिलाफ के सभी दल जनता पार्टी में शामिल होकर कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। 1980 में जनता पार्टी से टूट कर भाजपा व चौधरी चरणसिंह के नेतृत्व में लोकदल बना। 1980 में भाजपा प्रदेश विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी। 1985 के चुनाव में प्रदेश में भाजपा मजबूत बनकर उभरी।
1990 के विधानसभा चुनाव में भाजपा व नवगठित जनतादल ने प्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ गठबंधन कर सीटो का बटवारा कर चुनाव लड़ा व प्रदेश में भाजपा के भैंरोसिंह शेखावत के नेतृत्व में पहली बार भाजपा, जनतादल गठबंधन की सरकार बनायी। मगर यह सरकार ज्यादा नहीं चल पायी। बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद सरकार बर्खास्त कर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1993 में हुये विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने पर भाजपा के भैंरासिंह शेखावत ने निर्दलिय विधायको के समर्थन से पांच साल सरकार चलायी। उसके बाद कांग्रेस व भाजपा ने बदल-बदल कर शासन किया।
प्रदेश में कांग्रेस व भाजपा के अलावा कई अन्य दलो ने भी हर चुनाव में तीसरी ताकत बनने का प्रयास किया मगर सफल नहीं हो पाये। 2013 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान में बहुजन समान पार्टी, माकपा, डा.किरोड़ीलाल मीणा की नेशनल पीपुल्स पार्टी, जमींदारा पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनतादल (यूनाइटेड)ने तीसरी ताकत बनने के दावे के साथ चुनाव लड़ा था। मगर प्रदेश के मतदाताओं पर कोई असर नहीं छोड़ पाये।
पिछले विधानसभा चुनाव में डा.किरोड़ीलाल मीणा की नेशनल पीपुल्स पार्टी ने 134 सीटो पर चुनाव लड़ कर मात्र चार सीट ही जीत पायी थी। इस पार्टी को प्रदेश में कुल 13 लाख 12 हजार 402 मत मिले। जो कुल मतदान का 4.3 प्रतिशत था। बसपा ने गत विधानसभा चुनाव में 195 सीटो पर चुनाव लड़ कर मात्र 3 सीटो पर ही जीत दर्ज करवा पायी। बसपा को 10 लाख 41 हजार 241 मत मिले जो कुल मतदान का 3.4 प्रतिशत था। माकपा ने प्रदेश की 38 सीटो पर चुनाव लड़ा मगर एक सीट भी नहीं जी पायी। इतना ही नहीं इस चुनाव में माकपा ने अपनी पर्व में जीती हुयी 3 सीट भी गवा दी। माकपा को प्रदेश में कुल 2 लाख 69 हजार दो मत मिले जो कुल मतदान का 0.9 प्रतिशत था। 2013 के चुनाव में नवगठित जमीदारा पार्टी ने प्रदेश की कुल 25 सीटो पर चुनाव लड़ा व दो सीट जीतने में सफल रही। जमीदारा पार्टी को प्रदेश में कुल 3 लाख 12 हजार 653 वोट मिले जो कुल मतदान का एक प्रतिशत था। समाजवादी पार्टी को 118911 व जनतादल (यूनाइटेड) को मात्र 59673 मत मिले।
2013 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त 6 दलो ने कांग्रेस व भाजपा को हराने के लिये चुनाव लड़ा मगर प्रदेश के मतदाताओ ने उनको ही बुरी तरह हरा दिया। उस समय 6 राजनैतिक दलो ने अलग-अलग चुनाव लड़ कर कुल मतदान का 10.2 प्रतिशत वोट ले गये थे मगर एकजुट होकर नहीं लडऩे के कारण अपना असर छोडऩे में नाकाम रहे।
आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस के खिलाफ बसपा, माकपा, आप, जमीदारा पार्टी के अलावा नवगठित राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी, भारत वाहिनी पार्टी तीसरी ताकत के रूप में प्रदेश में चुनाव लडऩे जा रही है। आगामी चुनाव में बसपा व आप ने प्रदेश की सभी 200 सीटो पर अपने बूते ही चुनाव लडऩे की घोषणा कर चुके हैं। निर्दलिय जाट विधायक हनुमान बेनीवाल ने गत 29 अक्टूबर को ही अपने नये दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन किया था। भारत वाहिनी पार्टी का गठन भी कुछ माह पूर्व भाजपा के बागी विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने किया था। दोनो ही दल नये है व दोनो के नेता ने मिलकर चुनाव लडऩे की घोषणा की है।
इसके अलावा समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल, शरद यादव की पार्टी व शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के भी चुनाव लडऩे की भी सम्भावना है। हालांकि अभी इन दलो के नेता कांग्रेस से मिलकर चुनाव लडऩा चाहते हैं। मगर कांग्रेस से बात नहीं बनने पर ये दल अपने बूते चुनाव में उतरने की बात भी कह रहे हैं।
राज्य में बसपा, माकपा व आप की स्थिति वोट कटवा पार्टी की ही रहेगी। इनके अलग-अलग चुनाव लडऩे का लाभ भाजपा को ही ज्यादा रहेगा। ये सभी पार्टियां खुद को सेक्यूलर मानती है व भाजपा पर साम्प्रदायिक होने का आरोप लगाती रही है। चूंकि कांग्रेस भी खुद को सेक्यूलर बताती रही है, ऐसे में इनका भाजपा के खिलाफ वोट बैंक भी एक ही है। बसपा, माकपा, आप का निशाना दलित, मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओ पर है जिन्हे कांग्रेस अपना कोर वोट बैंक मानती है। ऐसे में बसपा, माकपा, आप को मिलने वाला वोट कांग्रेस के वोट बैंक को ही कम करेगा जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को ही उठाना पड़ेगा।
प्रदेश में वामपंथी दल 1952 से ही विधानसभा चुनाव लड़ते आ रहे हैं। 1952 व 2013 के चुनाव को छोडक़र उनका हमेशा विधानसभा में प्रतिनिधित्व रहा है। 1962 के चुनाव मे तो वामपंथियों को प्रदेश में 5.40 फीसदी वोटो के साथ पांच सीटो पर जीत मिली थी। 1972 में उन्हे चार सीट व 2008 में तीन सीटो पर विजयी हुये थे। इसके अलावा उन्हे हर बार एक या दो सीट मिलती रही थी।
बसपा भी 1990 से राजस्थान में विधानसभा के चुनाव लड़ती आ रही है। मगर बसपा को 1998 में पहली बार सफलता मिली जब पार्टी के दो विधायक चुने गये। उसके बाद 2003 में दो, 2008 में छ, 2013 में 3 विधायक जीतने में सफल रहे। 2008 में बसपा के पास प्रदेश में पांव फैलाने का अच्छा मौका था जब विधानसभा चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। उस समय बसपा के 6 विधायक जीते थे मगर कांग्रेस के अशोक गहलोत ने बसपा के समर्थन से सरकार बनाकर बसपा के सभी 6 विधायको को कांग्रेस में शामिल करवा लिया। बसपा विधायको के दलबदल से बसपा का वोट बैंक कमजोर हुआ व 2013 के विधानसभा चुनाव में उसके विधायको की संख्या व वोट घटकर आधे रह गये। कांग्रेस द्वारा दिये गये झटके से बसपा अभी तक नहीं उबर पायी है।
निर्दलिय विधायक हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का प्रदेश के जाट बहुल 15 जिलो की करीबन 50 से 60 सीटो पर प्रभाव पड़ेगा। चूंकि आगामी चुनावो में जाट मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की तरफ ज्यादा नजर आ रहा था। वैसे भी जाट मतदाता कांग्रेस समर्थक रहे हैं व एक दो बार को छोड़ कर कांग्रेस को ही वोट देते रहे हैं। ऐसे में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को मिलने वाले जाट वोटो का कांग्रेस को ही ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा। भाजपा के बागी विधायक घनश्याम तिवाड़ी खुद अपनी सांगानेर की सीट बचाने के चक्कर में लगे हैं। उनकी पार्टी का अभी तक प्रदेश के मतदाताओं पर कोई असर नजर नहीं आ रहा है। आप पार्टी का राजस्थान में कोई प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। आप ने जिस ताबड़तोड़ तरीके से उम्मीदवार खड़े किये है उससे यही लगता है कि उनका मकसद सीट जीतना कम प्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ज्यादा है।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि राजस्थान में हर बार चुनाव से पहले तीसरा मोर्चा बनाने की बाते खूब होती है मगर चुनाव नजदीक आते-आते तीसरे मोर्च की सिर्फ बाते रह जाती है। उनकी सोच धरातल पर नहीं उतर पाता है। फलस्वरूप अन्य दल प्रदेश में अपना प्रभाव जमा पाने में नाकाम ही रहते हैं।


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नन्दिता पाण्डेय (ऐस्ट्रोटैरोलोजर आध्यात्मिक गुरु, लाइफ़ कोच)
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मेष (22 मार्च से 21 अप्रैल)
कार्य क्षेत्र में उन्नति होगी एवं आप अपने ऑफि़स में कुछ नयी सजावट भी कर सकते हैं या फिर वर्क स्पेस की स्टाइल बदल सकते हैं। आर्थिक व्यय हो सकते हैं एवं इस तरफ़ ध्यान देने की आवश्यकता है। सेहत में सुधार रहेंगे एवं किसी पितृतुल्य व्यक्ति की सलाह आपके लिए अत्यंत लाभकारी हो सकती है। परिवार में प्रेम एवं सौहार्दय बना रहेगा एवं आप उनके सानिध्य में ख़ुश भी रहेंगे। यात्राओं द्वारा भी इस सप्ताह आपके लिए शुभ परिस्थितियाँ बनती जाएँगी एवं आपको सुकून भी दिलवाएँगी। प्रेम सम्बंध रोमांटिक रहेंगे। शुभ दिन : 18,19,21,23

वृषभ (22 अप्रैल 21 मई)
कार्य क्षेत्र में उन्नति होगी एवं जीवन में प्रगति की मार्ग प्रशस्त होंगे। कार्य क्षेत्र से समबंधित यात्राओं द्वारा सुखद अनुभव रहेगा। आर्थिक हानि हो सकती है वो भी किसी भावनात्मक कारण की वजह से कोई निर्णय आप लेंगे जो मन में इन्सिक्युरिटी भी बड़ाएगा। सेहत में की गयी नयी शुरुआत आपके लिए अत्यंत शुभ स्तिथियाँ बनती जाएँगी। परिवार में प्रेम एवं सौहार्दय बना रहेगा एवं जीवन में सुख शांति महसूस होगी। प्रेम सम्बंध में उतार चड़ाव रहेंगे लेकिन अंत में ख़ुशियाँ दस्तक देंगी। सप्ताह के अंत में कोई नयी शुरुआत कर सकते हैं। शुभ दिन : 19,21,22,24

मिथुन (22 मई से 21 जून)
कार्य क्षेत्र में इस सप्ताह से बहुत कुछ अनुकूल होता जाएगा एवं ग्रोथ अच्छी होगी। जीवन में सुख एवं शांति महसूस करेंगे। आर्थिक मामलों में हालाँकि अभी भी आपको बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। सेहत में भी सुधार रहेंगे एवं आउट्डॉर ऐक्टिविटी आपके लिए शुभ होगी। परिवार में हो सकता है की आपको इस सप्ताह उतनी तवज्जोह ना मिले जिसके आप हक़दार हैं। यात्राओं द्वारा शुभ परिणाम आएँगे एवं स्तिथियाँ सुखद रहेंगी। प्रेम सम्बंध में सुख एवं शांति रहेगी एवं काफ़ी एफ़र्ट के पश्चात आपके लिए सुंदर स्तिथियाँ बनेंगी। सप्ताह के अंत में आप किसी युवा को लेकर चिन्ताएँ अधिक कर सकते हैं। शुभ दिन : 18,19,21,23

कर्क (22 जून से 21 जुलाई)
आर्थिक उन्नति अच्छी होगी एवं जीवन में सफलता आपके द्वार दस्तक देगी। आपके मित्र एवं परिवारगण आपकी इस मामले में मदद भी कर सकते हैं। कार्य क्षेत्र में बड़े बुज़ुर्गों का सहारा मिलेगा एवं उन्नति होगी। यात्राओं में अचानक से सफलता मिल सकती है लेकिन फिर भी इन ही इस सप्ताह अवोईड करेंगे तो ज़्यादा फ़ायदा होगा। परिवार में वैसे तो सब अनुकूल है लेकिन फिर बाई दिल में एक ख़लिश सी रहेगी। सेहत को सुधारने के लिए आपको अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। प्रेम सम्बंध में जो भी कोशिश आपसे इस सप्ताह हो रही है उसका मध्रु फल आपको आने वाले सप्ताह में मिलता जाएगा। सप्ताह के अंत में किसी नएप्रोजेक्ट को लेकर मन चिंतित रह सकता है। शुभ दिन : 19,20

सिंह (22 जुलाई से 21 अगस्त)
परिवार में सुखद समय व्यतीत करेंगे एवं आपसी सौहार्दय भरपूर मिलेगा। जीवन में सुख एवं शांति बनी रहेगी। किसी नए मेहमान के आगमन के संयोग भी बन सकते हैं। कार्य क्षेत्र में बात चीत द्वारा समस्याओं का हल निकालिए तभी कुछ पोसिटिव हो पाएगा। आर्थिक व्यय की भी स्तिथियाँ बन रही हैं एवं इस तरफ़ भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सेहत में धीरे धीरे सुधार सम्भव है।यात्राओं द्वारा साधारण सफलता मिलेगी। सप्ताह के अंत में कोई ख़ुशख़बरी मिल सकती है। शुभ दिन : 22,24

कन्या (22 अगस्त से 21 सितम्बर)
सेहत में धीरे धीरे सुधार सम्भव है। यह सप्ताह आपके संयम एवं आपकी कूटनीति की परीक्षा ले सकता है। जीवन में आप जितना संयम से कार्य करेंगे उतनी हे सफलता आपको मिलती जाएगी। कार्य क्षेत्र में धीरे धीरे सुधार होगा। सेहत में भी कुछ आइसिस तरह के परिणाम रहेंगे एवं सुधार धीरे धीरे दिखाई देगा। इस सप्ताह की गयी यात्राओं द्वारा वैसे ट आपको ठीक ठाक सफलता मिलेगी फिर भी मन में एक अधूरापन रहेगा। आर्थिक हानि हो सकती है मुख्यत: किसी प्रॉपर्टी की वजह से या फिर अचानक की किसी परेशानी के सामने आने से व्यय अधिक होगा। प्रेम सम्बंध में बेचैनी बड़ सकती है। सप्ताह के अंत में किसी बदलाव को लेकर आप चिन्ताएँ कर सकते हैं। शुभ दिन : 21,23

तुला (22 सितम्बर से 21 अक्तूबर)
आर्थिक उन्नति बेहतर होगी एवं जीवन में पोसिटिव बदलाव आते जाएँगे। आपके संयम का सकरात्मक फल इस सप्ताह आपको आपके निवेश में दिखाई देगा। प्रेम सम्बंध अनुकूल रहेंगे एवं आप अपने पार्ट्नर के सानिध्य में सुकून महसूस करेंगे। कार्य क्षेत्र में अधिक मेहनत की आवश्यकता है तभी उन्नति होगी। सेहत में ज़बरदस्त सुधार आपके समक्ष आएँगे। इस सप्ताह की गयी यात्राओं द्वारा भी शुभ संयोग बनेंगे एवं युवा वर्ग का सप्पोर्ट रहेगा। परिवार में भी ख़ुशियाँ दस्तक दे रही हैं एवं जीवन में सुकून लेकर भी आ रही हैं। शुभ दिन : 18,20,21,23

वृश्चिक (22 अक्तूबर से 21 नवम्बर)
परिवार के सानिध्य में सुखद समय व्यतीत करेंगे। संतान द्वारा भी सुखद एहसास होगा। इस सप्ताह की गयी यात्राओं द्वारा आपके लिए अत्यंत शुभ स्तिथियाँ बनती जाएँगी एवं भावनात्मक तौर पर ये यात्राएँ सुखद भी रहेंगी। सेहत में भी अच्छे सुधार रहेंगे एवं हो सकता है की हेल्थ ऐक्टिविटी करते समय किसी के साथ इमोशनल बॉंडिंग सुंदर हो जाए। आर्थिक स्तिथियाँ धीरे धीरे सुधरती जाएँगी। कार्य क्षेत्र में भी धीरे धीरे सुधार होंगे। प्रेम सम्बंध रोमांटिक रहेंगे एवं बात चीत द्वारा इन्हें और भी मधुर आप बना सकते हैं। सप्ताह के अंत में कोई नयी काला सीखने कामन बनेगा। जीवन में ख़ुशियाँ दस्तक देंगी। शुभ दिन : 18,21,23,24

धनु (22 नवम्बर से 21 दिसंबर)
आर्थिक उन्नति के शुभ संयोग बनते जाएँगे एवं निवेश द्वारा शुभ परिणाम भी सामने आएँगे। कार्य क्षेत्र में ऐंज़ाइयटी बड़ सकती है। मानसिक कष्ट रहेगा एवं इन्सिक्युरिटी बड़ेगी।सेहत में अत्यधिक सुधार दिखाई पड़ेगा।बहुत समय से कष्ट में रह रहे हैं लेकिन इस सप्ताह से आपके लिए अच्छी सेहत के द्वार खुलते जाएँगे। लव लाइफ़ में ऐंज़ाइयटी बड़ सकती है। यह सप्ताह यात्राओं के लिए उपयुक्त नहीं है एवं इन्हें टाल देना ही बेहतर होगा। परिवार के साथ घूमें फिरने के प्लान अवश्य सुखद रहेंगे। परिवार में भी सुख समृद्धि बनी रहेगी। शुभ दिन : 18,21,22

मकर (22 दिसंबर से 21 जनवरी)
कार्य क्शेर में उन्नति होगी एवं आप अपने कार्य क्षेत्र में कुछ नया करने का मन भी बनाएँगे फिर वह चाहे छोटे मोटे ऑफि़स में बदलाव ही क्यों ना हो। ऑफि़स की साज सज्जा की तरफ़ भी आपका रूख रहेगा। सेहत की तरफ़ ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है। आर्थिक कष्ट अधिक रहेगा एवं निवेश कि तरफ़ ध्यान देने की आवश्यकता है। महिला वर्ग का सप्पोर्ट आपकी लव लाइफ़ में सुखद एहसास लेकर आएगा। परिवार में भी किसी बुज़ुर्ग का सप्पोर्ट आपके लिए शुभ स्तिथियाँ बना सकता है। यात्राओं द्वारा शुभ परिणाम समक्ष आएँगे। हालाँकि यात्रा करने से पहले यात्रा से समबंधित मन में कई शंकाएँ भी पाल सकते हैं। सप्ताह के अंत में आप अपनी चीज़ों को लेकर बहुत ज़्यादा पोस्सेसिव भी हो सकते हैं। शुभ दिन : 18,19,22,23

कुंभ (22 जनवरी से 21 फरवरी)
कार्य क्षेत्र में वैसे तो ठीक ठाक स्तिथियाँ रहेंगी फिर भी अधिक सफलता की कामना मन में रहेगी। आर्थिक व्यय अधिक रहेंगे। जोश में आकर किसी भी निवेश में हाथ डाल देने से हानि हो सकती है इस बात का आपको इस सप्ताह ख़ास ध्यान देना चाहिए। प्रेम सम्बंध रोमांटिक रहेंगे लेकिन अगर आपके मन माफि़क़ स्तिथियाँ नहीं बन रही हैं तो इस बात को साफ़ तौर पर अपने पार्ट्नर को ज़ाहिर भी आपको कर चाहिए तभी सम्बंधों में मधुरता बनी रहेगी। सेहत में अत्यधिक सुधार सम्भव हैं। परिवार में भी संतान समबंधित पोसिटिव ख़बर आपको मिल सकती है। यात्राओं को इस सप्ताह अवोईड करना हे बेहतर होगा। सप्ताह के अंत में पुरानी यादें ताज़ा होंगी। शुभ दिन : 21,22,24

मीन (22 फरवरी से 21 मार्च)
कार्य क्षेत्र में उन्नति होगी एवं किसी पितृतुल्य व्यक्ति की मदद आपको इस सम्बंध में मिल सकती है। आर्थिक उन्नति में साधारण स्तिथियाँ बन रही हैं। सेहत में भी सुधार अच्छे रहेंगे एवं यह आपके लिए नेट वर्किंग का एक अच्छा माध्यम भी बन सकता है। लव लाइफ़ एम ऐंज़ाइयटी अधिक रहेगी। परिवार में अपनी सोच पर अडिग रहे तभी स्तिथियाँ अनुकूल होंगी। इस सप्ताह की गयी यात्राओं द्वारा शुभ परिणाम सामने आएँगे। सप्ताह के अंत में फ़ोकस की आवश्यकता है तभी उन्नति हो सकती है। शुभ दिन : 19,23

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