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भारत में कोरोना महामारी से बचने के लिए सुरक्षात्मक उपाय पहली बार जनवरी में लागू किए गए थे जब सरकार ने चीन से आने वाले सभी यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग करने के लिए अपने प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों को निर्देश जारी किया था। इसके बाद ही सरकार ने विदेश से आने वाले सभी यात्रियों को इसके दायरे में रखकर समझदारी भरा कदम उठाया। 19 मार्च को अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने 22 मार्च की सुबह 7 बजे से रात्रि 9 बजे तक सभी नागरिकों को ‘जनता कर्फ्यू ’ (लोगों के कर्फ्यू) का पालन करने के लिए कहा। उसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री द्वारा यह घोषणा हुई कि 23 मार्च, 2020 की सुबह 6 बजे से दिल्ली को 31 मार्च तक बंद रखा जाएगा। 24 मार्च को प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के लिए देशव्यापी बंद का आदेश दिया।जब देश के नागरिक अपने घरों में रहकर ईश्वर से कोरोना वायरस से बचने के लिए प्रार्थना कर रहे थे, तभी देश की राजधानी नई दिल्ली से एक खबर सामने आई कि मार्च के शुरू में दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी जमात में 13 मार्च को इंडोनेशिया, मलेशिया और अन्य देशों के नागरिकों के साथ 3,000 से अधिक लोगों का एक कार्यक्रम हुआ। देश भर से इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने वाले कई लोगों में कोविड-19 के लक्षण पाए जा रहे हैं चाहे वे तमिलनाडु से हों या कश्मीर से। आज इस कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों में से लगभग 10 लोग कोविड-19 के कारण मर भी चुके हैं, जिनमें जमात के कश्मीर प्रमुख भी शामिल हैं। आलम ये हो गया है कि देश के कुल कोरोना वायरस संक्रमितों में एक चौथाई संख्या उन लोगों की है जिनका दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी मरकज से प्रत्यक्ष या परोक्ष नाता रहा है।हम पूछना चाहते हैं कि जमात ने इस महामारी के चलते अपने कार्यक्रम को रद्द करने के लिए दूरदर्शिता क्यों नहीं दिखाई? जमात एक विश्वव्यापी संगठन है और इसे दुनिया भर में मौजूद बड़े इस्लामी संगठनों में से एक गिना जाता है। अपने विशाल नेटवर्क के बावजूद वे ये मापने में विफल कैसे रहे कि विदेशी नागरिकों को ऐसे समय में इतनी बड़ी संख्या में लाकर देश में रह रहे अनेकों के लिए ख़तरा बन सकते हैं। उनका कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी उनके यहां एक बड़ी संख्या में लोग एक-साथ वहीं रुके रहे जिनमें से कुछ में कोविड-19 के लक्षण नज़र आने लगे थे।जमात एक लंबे समय से मुसलमानों के भीतर इस्लाम का प्रचार करने और उन्हें धर्म के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में बताने का काम करता आया है। लेकिन वे स्वयं हजरत मुहम्मद साहब का संदेश कैसे भूल गए जहां उन्होंने बताया था कि ऐसी महामारी के समय किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए? मैं यहां पैगंबर साहब के जीवन के दो उद्धरणों को पेश करना चाहता हूं। जब उन्होंने एक बार अपने एक साथी से कहा था कि स्वस्थ के साथ बीमार को मत बैठाओ। यह इस्लाम के पैगंबर का एक स्पष्ट संदेश था ऐसे समय के लिए जब आपके बीच कोई ऐसा बीमार व्यक्ति हो जिसे संक्रामक बीमारी हो।पैगंबर साहब के समय कुष्ठ रोग एक संक्रामक बीमारी थी। स्वास्थ्य विज्ञान 1450 साल पहले तक इतना विकसित नहीं हुआ था कि वह उस रोग का इलाज कर सकता। ऐसी संक्रामक बीमारी पर पैगंबर साहब ने एक बार कहा था कि इससे ऐसे दूर भागो जैसे आप एक शेर से दूर भागते हैं। उपरोक्त दो बातों से यह स्पष्ट है कि किसी व्यक्ति या समाज का व्यवहार ऐसे संक्रामक रोगों के समय कैसा होना चाहिए। यही संदेश जो डब्ल्यूएचओ और भारत सरकार द्वारा भी इतने लंबे समय से प्रचारित किया जा रहा है जिसके चलते आज देशव्यापी बंद किया गया। लेकिन इन सबके बावजूद भी कुछ दिनों पहले तक मरकज में 1000 से अधिक लोग एकत्रित रहे जिनमें से कुछ कोविड-19 से संक्रमित थे। मीडिया के माध्यम से यह भी सामने आया है के जमात के संक्रमित लोग जिन्हें क्वारंटाइन किया गया है, वे उन डॉक्टरों से इलाज कराने से इंकार कर रहे हैं जो मुस्लिम नहीं हैं। मैं ऐसे लोगों को याद दिलाना चाहता हूँ कि मदीना के लोगों को पढ़ाने वाले शिक्षकों का पहला जत्था गैर-मुस्लिम था। समाज और सरकार एक पहिए के दो दांते की तरह हैं और ये दोनों दांते मिलकर किसी राष्ट्र के पहिए को आगे बढ़ाते हैं।आज जब सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए इतना बड़ा बलिदान कर रही है जहां उसने देश बंद करने का निर्णय लिया, जो आज अमेरिका जैसा देश भी नहीं ले पा रहा है तो देश के प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह सरकार के साथ सहयोग करे। वे सभी लोग जो जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए थे और जिनके संक्रमित होने की आशंका है उन्हें अपने यहां के स्वास्थ्य अधिकारियों से संपर्क करना चाहिए और उनके दिशानिर्देश का पालन करना चाहिए, ताकि ये बीमारी दूसरों को फैलने से रोकी जा सके। इस तरह न केवल वे अपने परिवार और दोस्तों की रक्षा करेंगे बल्कि हदीस का पालन करते हुए एक जिम्मेदार मुस्लिम की भूमिका निभाएंगे और साथ राष्ट्र की सुरक्षा में भी योगदान देंगे।

नई दिल्ली। मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा है कि सरकार देश में कोरोना वायरस की स्थिति का जायजा लेने के बाद यह निर्णय लेगी कि 14 अप्रैल के बाद स्कूल और कॉलेज खोले जाएंगे यह नहीं। उन्होंने कहा कि छात्रों और अध्यापकों की सुरक्षा हमारी पहली जिम्मेदारी है।रविवार को पीटीआइ को दिए अपने इंटरव्यू में निशंक ने कहा कि हमारे लिए छात्रों और अध्यापकों की सुरक्षा सबसे पहले है इसके साथ ही हम इस बात का भी पूरा ख्याल रखेंगे कि छात्रों की पढ़ाई का नुकसान ना हो।मानव संसाधन विकास मंत्री पोखरियाल ने कहा कि इस समय कोई भी निर्णय लेना बहुत कठिन है 14 अप्रैल को स्थिति को देखते हुए यह फैसला किया जाएगा कि स्कूल और कॉलेज खोले जाने चाहिए या कुछ और समय तक इन्हें बंद रखा जाए।उन्होंने आगे यह भी कहा कि हमारे देश में छात्रों की संख्या 34 करोड़ है जो अमेरिका की जनसंख्या से भी ज्यादा है। छात्र हमारे देश का सबसे बड़ा खजाना है इसलिए छात्रों और अध्यापकों की सुरक्षा सरकार के लिए महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। बता दें कि देशभर में लागू लॉकडाउन 21 अप्रैल को समाप्त कर दिया जाएगा वहीं ऐसा लग रहा है कि सरकार लॉकडाउन को और आगे नहीं बढ़ाने वाली है। हालांकि स्कूलों और कॉलेजों में लॉकडाउन से पहले ही परीक्षाएं स्थगित करने की घोषणा कर दी गई थी।इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे स्वयं पर क्लासेज आयोजित करवा रही है। यदि 14 अप्रैल के बाद भी स्कूल और कॉलेज ना खुल सके तो हमने इस बात की पूरी तैयारी की हुई है कि छात्रों की पढ़ाई का नुकसान ना हो। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मैं स्कूलों और कॉलेजों से लॉकडाउन की स्थिति का लगातार जायजा ले रहा हुं। इसके अलावा पेंडिंग परीक्षाओं के आयोजन को लेकर भी पूरी तैयारी की जा चुकी है।

नई दिल्ली। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने रविवार को कहा कि देश में कोरोना वायरस संकट पर स्थिति की 14 अप्रैल को समीक्षा करने के बाद सरकार स्कूल, कॉलेज फिर से खोलने पर कोई निर्णय लेगी। 'निशंक' ने प्रेट्र से एक साक्षात्कार में कहा कि छात्रों और अध्यापकों की सुरक्षा सरकार के लिए सबसे ऊपर है। उनका मंत्रालय यह सुनिश्चित करने में लगा है कि यदि स्कूल, कॉलेज को 14 अप्रैल के बाद भी बंद रखने की जरूरत पड़ी, तो छात्रों को पढ़ाई-लिखाई का कोई नुकसान नहीं हो।
एचआरडी मंत्री 14 अप्रैल को स्थिति की करेंगे समीक्षा;-देश में 21 दिनों के लिए लागू लॉकडाउन समाप्त होने पर उनके मंत्रालय की योजना के बारे में पूछे जाने पर 'निशंक' ने कहा कि इस वक्त कोई फैसला लेना मुश्किल है। हम 14 अप्रैल को स्थिति की समीक्षा करेंगे। परिस्थितियों के मुताबिक इस बारे में फैसला लिया जाएगा कि स्कूल, कॉलेज फिर से खोले जा सकते हैं या उन्हें कुछ और समय के लिए बंद रखना होगा। मंत्री ने कहा कि देश में 34 करोड़ छात्र हैं, जो अमेरिका की आबादी से अधिक है। वे हमारी सबसे बड़ी संपत्ति हैं। छात्रों एवं अध्यापकों की सुरक्षा सरकार के लिए सर्वोपरि है।
लॉकडाउन को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा;-उल्लेखनीय है कि 21 दिनों का राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन 14 अप्रैल को समाप्त होने वाला है। सरकार से संकेत मिला है कि लॉकडाउन को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा। हालांकि, स्कूल, कॉलेजों में कक्षाएं लॉकडाउन की घोषणा किए जाने से पहले से ही स्थगित हैं।
विभिन्न सरकारी प्लेटफॉर्मो के जरिये कक्षाएं ऑनलाइन संचालित की जा रही हैं;-मंत्री ने कहा कि फिलहाल, विभिन्न सरकारी प्लेटफॉर्मो का उपयोग करते हुए कक्षाएं ऑनलाइन संचालित की जा रही हैं। 'निशंक' ने कहा कि मैं लॉकडाउन के दौरान स्कूल, कॉलेज द्वारा अनुपालन की जा रही कार्य योजना की नियमित रूप से समीक्षा कर रहा हूं। स्थिति में सुधार आने पर और लॉकडाउन खत्म होने पर लंबित परीक्षाएं संचालित करने तथा (उत्तर पुस्तिकाओं का) मूल्यांकन करने के लिए पहले से ही एक योजना तैयार है।

नई दिल्‍ली। कई मुल्‍क इन दिनों दुनिया के दूसरे हिस्‍सों में फंसे अपने नागरिकों को निकालने की जद्दोजहद कर रहे हैं। इस बीच समाचार एजेंसी पीटीआइ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया भर में 40 हजार भारतीय समुद्री नाविक, चालक दल के सदस्य विभिन्‍न जहाजों में फंसे हुए हैं। इन भारतीयों को अपने वतन वापसी का इंतजार है। वहीं सरकार ने लॉकडाउन हटने के बाद उन्हें हर संभव मदद का भरोसा दिया है।समुद्री सेवाओं से संबद्ध विभिन्न संगठनों जैसे एनयूएसआई (National Union of Seafarers of India), एमयूआई (Maritime Union of India) और एमएससए (Maritime Association of Shipowners, Shipmanagers and Agents) जैसे समुद्री संगठनों ने बताया है कि करीब 15 हजार समुद्री नाविक मालवक जहाजों पर जबकि 25,000 यात्री जहाजों पर मौजूद हैं। इन संगठनों ने जहाजरानी मंत्रालय (Shipping Ministry) के साथ इस मसले को उठाया है।एनयूएसआई (National Union of Seafarers of India) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी कैप्टन शिव हाल्बे ने कहा कि ऐसा अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 40 हजार भारतीय समुद्री नाविक मलवाहक जहाजों और यात्री जहाजों पर फंसे हैं। वे सभी वतन वापसी के लिए बेताब हैं। उनका रोजगार अनुबंध भी समाप्‍त हो चुका है। इस मसले पर जहाजरानी मंत्री मनसुख लाल मांडविया ने लॉकडाउन हटने के बाद सभी की सुरक्षित वापसी का भरोसा दिया है।हालांकि केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा कि इन सभी नाविकों की पहले जांच की जाएगी और बाद में उन्हें कुछ दिन बिल्कुल क्‍वारंटाइन रखा जाएगा। इन संगठनों के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय मंत्री (Mansukh Lal Manadaviya) के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बैठक की। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि इन नाविकों को जरूरी सेवा देने वाले कर्मचारियों की श्रेणी में रखने और बंदरगाहों पर सुगम राहत सुविधा मुहैया कराने की जरूरत है।

नई दिल्ली। महिला और बाल विकास मंत्रालय 21 दिन का लॉकडाउन खत्म होने के बाद गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ ऑनलाइन जागरूकता सत्र आयोजित कर रहा है। सूत्रों ने बताया कि जागरूकता सत्रों के माध्यम से मंत्रालय दो लाख से अधिक आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तक पहुंच गया है। महिला और बाल विकास मंत्रालय ने डिजिटल प्लेटफॉर्मो का उपयोग करके आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ जागरूकता सत्रों की एक श्रृंखला शुरू की है, ताकि लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी उन्हें कोविड-19 से खुद को सुरक्षित रखने के उपायों की जानकारी रहे। सरकार इस मामले में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के संपर्क में है।सूत्रों ने कहा कि 15 अप्रैल के बाद भी गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके, इस पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। रविवार को जागरूकता सत्र के दौरान महिलाओं और बच्चों से कोरोना वायरस का परिचय और निवारक उपायों के अलावा सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर चर्चा की गई।इस बीच, घरेलू हिंसा पीड़ितों की मदद करने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने 15 से अधिक गैरसरकारी संगठनों का टास्क फोर्स बनाने का फैसला किया है। महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने हाल ही में कहा था कि लॉकडाउन के बाद से उसे महिलाओं के खिलाफ विभिन्न अपराधों से संबंधित कुल 257 शिकायतें प्राप्त हुई, जिनमें घरेलू हिंसा की 69 शिकायतें हैं।

नई दिल्ली। कोरोना संकट के दौरान चिकित्सा उपकरण और पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई) के उत्पादन को बढ़ाने के लिए नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत की अध्यक्षता में गठित अधिकार प्राप्त समूह ने आपसी संवाद का काम शुरू कर दिया है। समूह की तरफ से इस दिशा में निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स के बीच आपसी संवाद की प्रक्रिया शुरू की गई है ताकि चिकित्सा उपकरण और पीपीई के उत्पादन में तेजी के लिए आपसी सहयोग बन सके।
वेंटिलेटर से लेकर मास्क व अन्य उपकरणों की मांग को लेकर विचार-विमर्श;-स्वास्थ्य संबंधी समाधान के क्षेत्र में काम करने वाले स्टार्टअप्स के साथ वेंटिलेटर से लेकर मास्क व अन्य उपकरणों की मांग के मुताबिक आपूर्ति को लेकर भी समूह ने 8 स्टार्टअप्स, औद्योगिक संगठन सीआईआई की 12 हस्तियां, फिक्की के 6 सीईओ सदस्य और नैसकॉम से जुड़े 14 सीईओ के साथ विचार-विमर्श किया। समूह की तरफ से नए प्रकार के वेंटिलेटर डिजाइन, जांच के उपकरण और निगरानी समाधान क्षेत्रों में काम कर रहे अगमा, बायोडिजाइन इनोवेशन लैब, काईएनात, क्योर एआईड्रोन मैप, एमफाइन माइक्रोगो जैसे स्टार्टअप्स से संपर्क किया गया है ताकि उनके पैमाने और संभावित योगदान का आकलन किया जा सके।
कोविड-19 से लड़ने के लिए समन्वय स्थापित करने के लिए अधिकार प्राप्त समूह गठित;-कोविड-19 के दौरान निजी क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए कांत की अध्यक्षता में अधिकार प्राप्त समूह का गठन किया गया है। कोविड-19 से लड़ने एवं रणनीति तैयार करने के लिए यह समूह संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां, विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) से समन्वय स्थापित करने का काम कर रहा है। निजी क्षेत्रों के लिए औद्योगिक संगठन सीआईआई, फिक्की, एसोचैम व नैसकॉम से समन्वय स्थापित करेगा।एनजीओ कोरोना से प्रभावित हॉटस्पॉट की पहचान करने में सरकार की मदद करें- नीति आयोगकांत ने नीति आयोग के दर्पण पोर्टल पर पंजीकृत 92,000 से अधिक गैर सरकारी संगठनों को भी पत्र लिखकर उन्हें कोरोना से प्रभावित हॉटस्पॉट की पहचान करने में सरकार की मदद करने की अपील की है।

नई दिल्ली। कोरोना महामारी को हराने के लिए बेहद अहम माने जा रहे वेंटीलेटर की देश में कमी दूर करने के लिए रक्षा मंत्रालय से जुड़ी सरकारी कंपनियों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भारत इलेक्ट्रानिक्स लिमिटेड ने डीआरडीओ के डिजाइन किए वेंटीलेटर का देश में ही बड़ी संख्या में निर्माण शुरू कर दिया है। वेंटीलेटर बनाने की इस बड़ी पहल के आगाज के साथ ही बीइएल अगले दो महीने में ही 30,000 वेंटीलेटर बनाकर उसे स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंप देगा।
स्वास्थ्य मंत्रालय बड़ी संख्या में वेंटीलेटर का प्रबंध कर रहा;-कोरोना महामारी से प्रभावित मरीजों की संख्या में इजाफे की आशंका को देखते हुए पूर्व तैयारी करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने रक्षा मंत्रालय से जुडी पीएसयू कंपनियों से वेंटीलेटर समेत कई दूसरे चिकित्सा व बचाव उपकरणों का निर्माण करने को कहा है। आइसीयू में कोरोना प्रभावित मरीजों की जीवन रक्षा के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय बड़ी संख्या में वेंटीलेटर का प्रबंध कर रहा है।
बीइएल ने वेंटीलेटर का निर्माण शुरू कर दिया:-स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसीलिए बीइएल को यह जिम्मा दिया है जिसने डीआरडीओ द्वारा विकसित वेंटीलेटर का निर्माण अपनी इकाईयों में शुरू कर दिया है। डीआरडीओ के डिजाइन किए इस वेंटीलेटर में मैसूर की मेसर्स एसकैनरी ने कुछ सुधार किया था जिसका बीइएल के साथ गठबंधन है।
आर्डिनेंस फैक्ट्री खराब वेंटीलेटरों की मरम्मत करने में जुटा;-बीइएल जहां नये वेंटीलेटर का निर्माण कर रहा है, वहीं आर्डिनेंस फैक्ट्री मेडक कई अस्पतालों के खराब वेंटीलेटरों की मरम्मत कर उन्हें फिर से संचालन योग्य बना रहा है।
चिकित्साकर्मियों के लिए प्रोटेक्टिव पोशाक और मास्क की भारी जरूरत;-कोरोना के खिलाफ लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर तैनात चिकित्साकर्मियों और तमाम आवश्यक सेवाओं के लोगों के लिए प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट कवर ऑल पोशाक और मास्क की भी भारी जरूरत है। इसी को देखते हुए कानपुर, शाहजहांपुर, फिरोजबाद और चेन्नई की आर्डिनेंस फैक्ट्रीयां कवर आल और मास्क का विकास करने में जुटी हुई हैं। इन कंपनियों ने बेहद कम समय में ही इनका निर्माण करने के लिए स्पेशल हिट स्केलिंग मशीनों की भी व्यवस्था की है। ग्वालियर स्थित डीआरडीओ के प्रतिष्ठान ने कवरआल का डिजाइन परीक्षण कर इनके निर्माण का रास्ता साफ कर दिया है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार जल्द ही आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की कई इकाईयां पांच से छह हजार पीस कवरआल का उत्पादन शुरू कर देंगी।
आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की इकाईयों को मिला 13000 लीटर सैनिटाइजर बनाने का ऑर्डर:-कोरोना संक्रमण का फैलाव रोकने के लिए सैनिटाइजर की भारी जरूरत को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुरूप आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की इकाईयों ने बड़ी मात्रा में इनका भी निर्माण शुरू कर दिया है। केंद्र सरकार ने एचएलएल लाइफकेयर को सेंनिटाइजरों की केंद्रीय खरीद के लिए नोडल एजेंसी बनाया है। आर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड की इकाईयों को तत्काल 13000 लीटर सैनेटाइजर देने को कहा गया है और वे रोजाना 3000 लीटर सैनेटाइजर बना रही हैं। कोरोना के खिलाफ सीधी जंग में आर्डिनेंस बोर्ड ने देश भर के अपने 10 अस्पतालों को भी विशेष रुप से तैयार करते हुए 280 आइसोलेशन बेडों की व्यवस्था की है।

नई दिल्‍ली। धर्म: विपत्ति पर भारी आस्था संकट के समय तिनके का सहारा भी मिल जाए तो बहुत है। बड़ी आबादी कोरोना संकट से बचाव में खुद को असहाय पा रही है। विपरीत परिस्थितियों में अरबों लोगों के लिए धर्म संबल का काम करता है। छोटे समय के लिए ही सही इस भय ने लोगों को वैश्विक स्तर पर धर्म और पारंपरिक रीति-रिवाजों की ओर खींचा है। हालांकि जो आत्मा के लिए अच्छा है वो हमेशा शरीर के लिए अच्छा नहीं हो सकता।
कठिन घड़ी;-धर्म में आस्था रखने वाले लोगों को एकत्रित होने को रोककर वायरस से मुकाबला करने की बात कही जा रही है। कई धर्मों में धार्मिक जनसमूह मुख्य सिद्धांत के रूप में शामिल है। कुछ मामलों में धार्मिक उत्साह लोगों को ऐसे इलाज की ओर ले गया, जिसका वैज्ञानिक आधार नहीं है।
धार्मिक गुरुओं की सलाह;-धार्मिक गुरुओं की सलाह ने आस्तिकों की ऊर्जा को पुननिर्देशित किया है। इजरायल के प्रमुख एश्केनाजी रब्बी डेविड लाउ ने यहूदियों से रोजाना 100 आशीर्वाद कहने का आह्वान किया है। वहीं मिस्न के एक पोप टवाड्रस द्वितीय ने इसे पश्चाताप जगाने वाली घंटी बताया। एक धर्मोपदेश ने कहा कि यह सामंजस्य का समय है।
धर्म का आश्रय;-धार्मिक गुरु जैसे-जैसे धार्मिक प्रथाओं को प्रतिबंधित करने के लिए बढ़े हैं, वैसे-वैसे इन प्रथाओं का आश्रय बहुत तेजी से बढ़ा है। 31 साल के मिस्न के फार्मासिस्ट अहमद शाबान ने पैगंबर मुहम्मद के जन्मस्थान और मकबरे की तीर्थयात्रा करने के लिए इसी महीने सऊदी अरब की यात्रा की। सऊदी सरकार ने मक्का और मदीना के सभी पवित्र स्थलों को श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया है। इस कठिनाई, भय या संकट के समय में शाबान का कहना है कि या तो आप सोचते हैं कि ईश्वर हमारे लिए यह कैसे कर सकता है? या फिर आप उनसे सुरक्षा या मार्गदर्शन के लिए कहते हैं।
वास्तविकता को अपना रही आस्था;-कई आस्थाएं नई वास्तविकता को अपना रही है। पूजा के घर बंद या खाली हैं। व्यक्तिगत बोतलों से पवित्र पानी का छिड़काव किया जा रहा है। मध्य पूर्व में शुक्रवार की प्रार्थना रद कर दी गई है। वेस्ट बैंक और कुवैत में मुअज्जिनों ने मस्जिदों में आस्था रखने वालों को अपने घरों में रहकर ही प्रार्थना करने के लिए कहा है। वहीं इटली में भीड़ रहित पांच छह सप्ताह हो चुके हैं। लेकिन पलेर्मो की सेंट रोजालिया पहाड़ी अभयारण्य खुला रहता है। ऐसे में हम आस्था को लेकर के कई बार पूर्वाग्रहों से भी भरे नजर आते हैं।
धर्म का यह पहलू भी;-न्यूयॉर्क में प्रतिबंधों के बावजूद हैसिडिक यहूदी समुदायों में कई शादियां हुई हैं। जिसके बाद वायरस पुष्टि के मामलों में बढ़ोतरी की सूचना मिली है। वहीं ईरान में पवित्र स्थल कई सप्ताह तक भीड़ के लिए खुले रहे। यह मानते हुए कि कोरोना वायरस ने देश को छोड़ दिया है। स्थिति बिगड़ी तो सख्त कदम उठाए गए।
विज्ञान की राह पर धर्म;-कोरोना वायरस को लेकर बढ़ती चिंता के बीच दुनिया में कई बदलाव हुए हैं। भीड़ भरे स्थानों पर जाने से लोग बच रहे हैं। बहुत से लोगों ने अपनी यात्राओं को स्थगित कर दिया है और बड़े लॉकडाउन के दौरान घरों में कैद है। इन असामान्य परिस्थितियों में धार्मिक क्रियाकलाप भी प्रभावित हुए हैं। मंदिर हो, मस्जिद हो या फिर चर्च या अन्य धार्मिक स्थल सभी अपने स्तर पर विज्ञान के बताए रास्ते पर वायरस के प्रसार को रोकने के लिए जुटे हैं।
ईसाई धर्म;-इटली में पोप फ्रांंसिस ने पादरियों से घरों के बाहर आने और बीमार लोगों के पास जाने के लिए कहा है। साथ ही उन्होंने स्वास्थ्यकर्मियों और स्वयंसेवकों का साथ देने के लिए कहा है। हालांकि उन्हें अन्य लोगों से कम से कम एक मीटर की दूरी रखने और शारीरिक संपर्क से बचने जैसी सावधानियां रखने की सलाह दी है। इसके साथ ही पोप ने वेटिकन में भीड़ को कम करने के लिए अपने पारंपरिक रविवार के संदेश को लाइव -स्ट्रीम करना शुरू किया है। घाना से लेकर अमेरिका और यूरोप के कैथोलिक चर्चों ने संक्रमण को रोकने के प्रयास में भीड़ को एकत्रित होने से रोकने की कोशिश की है। संक्रमण बढ़ाने वाली कई परंपराओं को फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। वहीं ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च ने अपनी परंपराओं को नहीं बदला है। उनका तर्क है कि चर्च के सदस्यों के लिए पवित्र यूचरिस्ट में भाग लेना बीमारी के संचरण का कारण नहीं हो सकता है।
इस्लाम:-मक्का की पवित्र मस्जिद में आमतौर पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु होते हैं। हालांकि महामारी के कारण इसे अब बंद कर दिया गया है। वहीं मस्जिद में नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है। मदीना में भी सऊदी सरकार ने ऐसे ही उपाय किए हैं। वहीं मोरक्को से इंडोनेशिया तक दुनिया के कई देशों ने भी लोगों को एकत्रित न होने देने के लिए मस्जिदों में नमाज पर रोक लगा दी है और लोगों को घरों में रहने के आदेश दिए गए हैं। हालांकि पाकिस्तान जैसे देशों में लगातार बढ़ते आंकड़ों के बावजूद भी ज्यादा सख्त कदम नहीं उठाए गए हैं।
यहूदी:-इजरायल के मुख्य रब्बी डेविड लाउ ने लोगों को सलाह देते हुए एक बयान जारी किया है। जिसमें उन्होंने लोगों को छूने या फिर धार्मिक प्रतीक मेजुजा का चुंबन नहीं लेने की बात कही गई है। यूरोपियन रब्बियों के सम्मेलन में भी लोगों को ऐसी ही सलाह दी गई।
हिंदू;-भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की है। इसके बाद भारत के लगभग सभी बड़े मंदिरों को बंद कर दिया गया है। वैष्णोदेवी, उज्जैन महाकाल मंदिर सहित सभी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए बंद किए गए हैं। वहीं इस महामारी से लड़ने के लिए कई मंदिरों की ओर से पीएम केयर फंड में लाखों रुपये दिए गए हैं। साथ ही जरूरतमंदों की मदद के लिए भी कई हिंदू संगठन आगे आए हैं। हिंदू संस्कृति के नमस्कार को भी वैश्विक स्तर पर मान्यता मिली है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अभिवादन के परंपरागत ढंग के बजाय हिंदू संस्कृति से जुड़े नमस्कार करते देखे गए हैं।

COVID-19 को फैलने से रोकने के लिए लॉकडाउन एक मजबूत कदम के रूप में सामने आया था। संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग (शारीरिक दूरी) एकमात्र उपाय है। पिछले दिनों कुछ रिपोर्ट भी आईं थीं कि भारत जैसे देश में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ने का औसत गंभीर रूप से प्रभावित और विकसित देशों से काफी कम है। ऐसे में ये 21 दिन का तप देश को सुरक्षित रास्ते पर ले जा रहा था। लेकिन कुछ दिन पहले दिल्ली से आई तब्लीगी जमात की खबर ने एक बड़ी समस्या को खड़ा कर दिया है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित एक स्थान पर करीब दो हजार लोगों के इकट्ठा होने और उनमें से कुछ में कोरोना के पाजिटिव मरीज होने की खबर ने हड़कंप मचा दिया है। देश में एक तरफ शासन, प्रशासन व पुलिस हर तरह से लोगों को घरों में रहने के लिए अपील कर रही है। कई जगह सख्ती भी दिखाई गई। ये सभी काम कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए था।लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में आयोजित तब्लीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए सैकड़ों लोगों की जानकारी वहां की पुलिस और शासन को देर से होना बड़ा सवाल खड़ा करता है। कार्यक्रम में लोग शामिल न हो सकें इसका पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए था। ये एक बड़ी चूक है, जिसका खामियाजा देश की उस जनता को उठाना पड़ेगा जो देश के हर नागरिक की सुरक्षा के लिए अपने घरों में सीमित हैं। उधर जमात में शामिल होने वाले लोगों ने भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी न दिखाते हुए ‘समाजद्रोही’ का कार्य किया है। उनकी इस गलती का ही नतीजा है कि पिछले दो दिनों में कोरोना के पाजिटिव मरीजों की संख्या में जबरदस्त उछाल आया है। शुरुआत का एक सप्ताह काफी ठीक रहा।अब बाकी दिनों में स्थिति को संभालने के लिए सरकार को खूफिया तंत्र के जरिए हर उस शख्स की पहचान करनी होगी जो वहां शामिल थे। कई अन्य देशों में बाहर निकलने वालों पर आर्थिक दंड व अन्य कार्रवाई होने लगी है। इसकी शुरुआत यहां भी होनी चाहिए। वहीं जो लोग जबरन बाहर निकल रहे हैं उन पर कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। लॉकडाउन का समय कम लग रहा है। इसे बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। लॉकडाउन को पूरी तरह से सफल बनाएं। देश 135 करोड़ लोगों का है, यदि बीमारी इसी तरह अपने पैर पसारने लगी तो महामारी की चपेट से रोकना काफी मुश्किल हो जाएगा। ये समय खुद के साथ और की सुरक्षा करने का जिसे सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग से ही रोका जा सकता है।

कहीं भी धार्मिक स्थल पर जुटे लोगों को वहां से हटाना बेहद संवेदनशील मामला है। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित तबलीगी मरकज पर जुटे बड़ी संख्या में जमातियों को हटाने के लिए जो कार्य अब किया गया, उसे काफी पहले किया जाना चाहिए था। इसके लिए भारी संख्या में पुलिस बल की जरूरत पड़ती, विवाद भी हो सकता था, लेकिन इन स्थितियों से निबटने के लिए ही पुलिस बल को तैयार किया जाता है। प्रशासनिक अधिकारियों को ऐसी ही स्थितियों से निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। पूरे प्रकरण में अब तक एक बात तो सामने आ चुकी है कि जो अब किया गया, वह पहले भी किया जा सकता था। प्रशासन के साथ पुलिस अधिकारियों को चाहिए था कि लोग वहां एकत्र ही न हों।मामला धार्मिक व्यवस्था से जुड़े होने के कारण भले ही संवेदनशील था, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि इस समय लोगों को कोरोना वायरस से बचाने के लिए तमाम व्यवस्थाएं की जा रही है। जो भी इन व्यवस्थाओं का उल्लंघन कर रहे हैं, उन सभी को कानून की जद में लाकर कार्रवाई करनी चाहिए। उल्लंघन एक जगह होता है, लेकिन इससे अव्यवस्था काफी दूर तक फैलती है। जब एक जगह सख्ती बरती जाती है, तो उसका संदेश भी दूर तक जाता है।ऐसा नहीं है कि प्रशासन कोई कार्रवाई करने में सक्षम नहीं है, या फिर पुलिस के पास बल की कमी है, कमी रह गई तो मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए त्वरित और प्रभावी कार्रवाई करने की। पुलिस उनके साथ बैठक करती है, लेकिन पुलिस की कार्रवाई सिर्फ बैठक तक ही सीमित रह जाती है। प्रशासन की कार्रवाई वहां का निरीक्षण करने तक सिमट जाती है।किसी भी स्तर पर ऐसा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया, जिससे वहां लोगों को एकत्र होने से रोका जा सके। जब मामला हाथ से निकलता नजर आया तो पुलिस और प्रशासन ने कार्रवाई की। अब पूरे देश में उन लोगों की तलाश की जा रही है, जो यहां एकत्र हुए थे, अगर लोगों को एकत्र होने से रोक दिया जाता, या समय रहते सभी लोगों को क्वारंटाइन कर दिया जाता, तो शायद स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती। पुलिस को वहां के प्रबंधन से बात करनी चाहिए थी। पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि लोग एकत्र ही न हो।धारा-188 और महामारी अधिनियम के तहत तत्काल कार्रवाई की जानी चाहिए थी। जब सड़क पर धारा-188 का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जा रही है, तो फिर इस कानून को सभी के लिए समान रूप से लागू किया जाना चाहिए था। कानून तो सभी के लिए एक समान है। जब कानून एक समान है तो फिर कार्रवाई भी एक समान होनी चाहिए। पुलिस और प्रशासन ने जब कानून लागू किया है, तो उसके तहत कार्रवाई भी उन्हें ही करनी है।

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