-बाल मुकुंद ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)
मशहूर शायर बशीर बद्र ने कहा था -दुश्मनी जम के करो पर इतनी गुंजाईश रहे, कल जो हम दोस्त बन जाये तो शर्मिंदा न हो। केंद्र की राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले कर हालत इस कद्र बिगाड़ लिए की दोनों एक दूसरे को फूटी आँखे नहीं सुहाते, बोलचाल तो दूर की बात है। यही हालत राजस्थान की सियासत की है जो विशेष रूप से काबिलेगौर है। इस प्रदेश ने सदा सर्वदा त्याग, बलिदान, प्रेम और महोब्बत का पैगाम दिया था मगर बदलते जमाने ने इसे अदावत में बदल दिया। कभी प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे सुखाड़िया और विरोधी नेता शेखावत के संबंधों की चर्चा सुर्खियों में होती थी। राजस्थान विधानसभा में आरोप प्रत्यारोपों के बाद सुखाड़िया और शेखावत यूँ मिलते थे जैसे कुछ हुआ ही नहीं। दोनों के दिल बड़े थे।
प्रदेश की सियासत में पहली बार अदावत तब देखने को मिली जब भाजपा के दो नेताओं के आपसी सम्बन्ध शत्रुता में बदले। बताते है भैरोंसिंह शेखावत की कृपा से वसुंधरा के पैर राजस्थान की राजनीति में टिके। शेखावत के उपराष्ट्रपति के पद से सेवानिवृति के बाद राज्य की सियासत में बदलाव देखने को मिला। वसुंधरा से तल्ख रिश्तों के चलते शेखावत ने जयपुर से लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। तब तक सियासत में बहुत कुछ बदल चुका था। शेखावत की अंगुली पकड़ कर राजनीति का ककहरा सीखने वाले शेखावत का साथ छोड़ चुके थे। यहीं से राजस्थान की सियासत में दोस्त और दुश्मन का उबाल देखने को मिला। बशीर बद्र के शेर को उन दिनों खूब याद किया गया। उसी दौरान अशोक गहलोत सियासत के सिरमौर बने और उन्होंने दुश्मनी को दोस्ती में बदलने का प्रयास किया। हालाँकि परसराम मदेरणा से उनके संबंधों में कुछ समय के लिए तल्खी भी आयी। इसके बावजूद कुछ दिनों तक प्रदेश की सियासत ठीक ठाक चली मगर शीघ्र अपने असली रंग में आगई। तब तक भैरोंसिंह शेखावत का निधन हो चुका था और राजस्थान की सियासत अदावत के मार्ग पर चल निकली थी। दोस्ताना संबंधों पर शत्रुता सर्वत्र देखने को मिल रही थी। पुरानी पीढ़ी के नेता परस राम मदेरणा, खेत सिंह और गुलाब सिंह शक्तावत दुनियां छोड़ चुके थे। भाजपा नेता भंवर लाल शर्मा और भाभड़ा सरीखे नेता वृदावस्था के कारण राजनीति से सन्यास ले चुके थे। अब गहलोत और वसुंधरा ही आमने सामने थे। पांच पांच साल की सत्ता का खेल चलने लगा था और सियासत में भारी कड़वाहट आ गयी थी। हालत ये हो गई की व्यक्तिगत आरोपों की बौछाड़ होने लगी। एक दूसरे का आमना सामना और बोलचाल भी बंद हो गई। अब लोगों को एक बार फिर बशीर बद्र का यह शेर फिर याद आने लगा की दुश्मनी जम के करो पर इतनी गुंजाईश रहे, कल जो हम दोस्त बन जाये तो शर्मिंदा न हो।


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