-डॉ प्रदीप उपाध्याय
वे बहुत ही भोले हैं।सीधे-सादे लोगों को लोग दुनिया कुछ भी बोलती रहती है लेकिन वे बुरा नहीं मानते।प्यार की भाषा ही बोलते-समझते हैं।उनकी मम्मी भी चाहती हैं कि वे छोटे-बड़ो के बीच हिल-मिलकर रहें,दुनियादारी सीखें और खानदान का नाम रोशन करें।आखिर कोई ऊंगली पकड़कर कब तक चलाता रहेगा और इसीलिए उनपर भरोसा नहीं होने पर भी उन्हें खेलने के लिए भेज दिया और वे खेले भी अच्छा लेकिन खेल में तो हार-जीत चलती रहती है किन्तु उनका मासूम दिल इस परिणाम को स्वीकार नहीं कर पा रहा है।पहले भी वे खेले हारे भी,जीते भी लेकिन इस बार,ऐसी करारी हार!सभी ने उन्हें समझा-बुझाकर खेलने भेजा था और कहा था कि इस बार तो जीत पक्की समझो।तुम बड़े हो गए हो,समझदार हो गए हो,खेल के दांव पेंच सीख चुके हो।तुम ही जीतोगे।क्योंकि तुम्हारे सामने खेलने वाला भी कोई खिलाड़ी है।इस बीच कुछ ओर रिश्ते नातों के साथ दीदी, बुआ,भतीजे बनकर आ गए और कहने लगे कि हम भी खेलेंगे वरना खेल बिगाडेंगे।उन्हें भी लगा कि बात तो सही है,मिलकर खेलने में जीतना तय हो जाता है और फिर खेल बिगड़ने से तो अच्छा है कि इन सभी को साथ लेकर ही खेला जाए।
लेकिन कहते हैं न कि मुगालता बड़ी कुत्ती चीज है।जब बावीस खिलाड़ियों के हाथ मिल जाए तो हर कोई अपने आप को बाहुबली समझने लगता है।उन सभी को लगा कि खेल में जीत तो उन्हीं से है।हार के गम से तो हर कोई गमजदा रह ही चुका था और हारने के बाद अपने पापा-मम्मी या अभिभावकों की गोद में ही जा गिरे थे।इसके बाद भी कुछ खिलाड़ियों को यह मुगालता भी हो गया था कि घर के बड़े-बूढ़ें खेल के नये नियमों से वाकिफ नहीं हैं, अतः उन्हें डपटकर एक तरफ कर दिया किन्तु खुद खेलकर जब चारों खाने चित्त हो गए तो फिर पापा याद आने लगे।
खैर,बात उनके खेलने की हो रही है और खेल में बुरी तरह से हार के बाद उन्होंने फिर जिद पकड़ी है कि अब से वे नहीं खेलेंगे और किसी को खिलाना है तो खिलाएं।उन्हें इस बात पर भी गुस्सा आ रहा है कि कैसे उन्होंने उनपर भरोसा कर लिया जो कह रहे थे कि खेलेंगे, नहीं तो खेल बिगाडेंगे!आखिर उन्होंने खेल बिगाड़ ही दिया।इस बार पता ही नहीं चला कि कौन किसकी तरफ से खेल रहा है।जिन्हें अपना माना ,उन्होंने अपनों को ही निपटवा दिया!और खुद भी निपट गए।
सोचा था कि इस बार सामने वाला खिलाड़ी और उसकी टीम हल्की साबित होगी, लेकिन नहीं, उन्हें लगा कि वे खेल भावना से नहीं खेले और भारी पड़ गए।वे विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि खेल ईमानदारी से खेला गया है, इसलिए स्पष्ट रूप से कह दिया है कि यह भी कोई खेल है जिसमें एक ही लगातार जीतता चला जाए और दूसरों को मौका ही न मिले।अतः अब वे नहीं खेलेंगे।दूसरे किसी को खेलने भेजना हो तो भेज दें लेकिन आखिर माँ का दिल है,बच्चे को कमजोर होता कैसे देख सकती हैं, बच्चे को आगे बढ़ते हुए देखना चाहेंगी।ऐसे में भरपूर कोशिश, मान-मनौव्वल और फिर बेटा राजनीति की चौसर पर बिसात बिछाकर खेलने लगेगा क्योंकि खेल में हार-जीत तो चलती रहती है!


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