-डॉ प्रदीप उपाध्याय
उनको कितना विश्वास हो चला था।वे मानकर चल रहे थे कि इस बार तो वह दगा नहीं देगी।उनके साथ बेवफाई नहीं करेगी और सीधे बाहें फैलाकर उनके गले का हार बन जाएगी।पिछली बार जो गलती उसने की थी ,उसे न दोहराते हुए अपने पिछले व्यवहार की माफी भी मांगेगी।
मैंने उनकी बात को बीच में ही काटते हुए कहा भी था कि अभी आप पूरी तरह से परिपक्व भी नहीं हुए हो,अभी उसका भरोसा पूरी तरह से आपके ऊपर जम भी नहीं पाया है तो कैसे वह अपना सर्वस्व आपको सौंप सकती है।
मेरी बात से असहमत होते हुए उन्होंने बड़ी ही मासूमियत भरे लहजे में कहा था कि - "नहीं, मैं अब प्यार की भाषा बोलना सीख गया हूँ।मैं प्यार से गले भी मिल लेता हूँ और प्यार से अपनी आँखों को भी चला लेता हूँ।मैं नफरत की भाषा नहीं बोलता हूँ।"
मैंने कहा भी कि हाँ,यह तो अच्छी बात है।प्यार से ही नफरत को जीता जा सकता है लेकिन इतना सब होने के बाद भी यह क्या हुआ कि वह आपकी नहीं हुई और जिसे आप नफरत का सौदागर कहते आए हैं,वह धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ उसको ले उड़ा!शायद इसकी कल्पना तो उन्होंने भी नहीं की होगी।
मेरी बात सुनकर वे बहुत उदास हो गए, कहने लगे कि मैं तो खुद ही अचरज में हूँ और समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि उसने मुझे क्यूँकर ठुकरा दिया!कितनी दौड़भाग की थी,कितनी मेहनत की, उसके लिए शहर-शहर, गाँव-गाँव भटका।अपने साथ उन सभी को जोड़ा जिनकी सूरतें मुझे पसन्द थीं या ना थीं।उनकी चाही-अनचाही बातों को भी स्वीकारा क्योंकि बारात में शामिल होने वाले सभी लोगों के नाज-नखरे उठाना ही पड़ते हैं।और तो और जिनके साथ पिछली बार उसने गलबहियाँ डाल दी थी, उनका सच भी उजागर करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी थी,बावजूद इसके मेरी बात पर भरोसा नहीं किया और देखते ही देखते वह उसी की बाहों में झूल गई।कितनी तकलीफ पहुँचाई है उसने।मैंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था और इसीलिए मैं उससे पूछ भी रहा हूँ कि -"तू औरों की क्यूँ हो गई, तू हमारी थी,जान से प्यारी थी,तेरे लिए मैंने दुनिया संवारी थी।फिर भी तू औरों की क्यूँ हो गई।"
ठण्डी साँस लेते हुए वे फिर बोले कि अब तो मन करता है कि सब कुछ छोड़छाड़ कर सन्यास ले लूं।अब मुझे किसी पर कोई भरोसा भी नहीं रहा,सभी दगाबाज निकले,अब ऐसे लोगों से तो बात भी नहीं करना चाहता। हाँ,अभी तो मैं उससे ही पूछने जा रहा हूँ कि -
"तुझको आज बताना होगा,क्या थी वो मजबूरी,
साथ उमर भर का देना था,दे दी उमर भर की दूरी।"

16,अम्बिका भवन,बाबूजी की कोठी,उपाध्याय नगर,मेंढकी रोड़,देवास,म.प्र.
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