- योगेश कुमार गोयल
लोकसभा चुनाव में पिछली बार के 31 फीसदी मतों के मुकाबले इस बार 50 फीसदी से भी अधिक मत हासिल कर देश की हिन्दी पट्टी की 226 लोकसभा सीटों में से 202 पर परचम लहराते हुए भाजपा ने जिस प्रकार अपने ही बलबूते पर 303 सीटें हासिल की और पूर्ण बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार सरकार बनाने में सफल हुई, उसमें अगर किसी का सम्पूर्ण योगदान रहा तो वह थी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की करिश्माई जोड़ी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा देखा गया, जब एक प्रधानमंत्री अपने नाम पर 303 सांसदों को चुनकर संसद तक लाए, न कि इन सांसदों ने अपनी काबिलियत के दम पर निर्वाचित होकर प्रधानमंत्री का चयन किया। कहना असंगत नहीं होगा कि अगर पूरा देश इस कदर मोदीमय नहीं होता तो संभवतः अपनी शख्सियत के दम पर इनमें से आधे सांसद ही बामुश्किल चुनाव जीत पाते। भाजपा की प्रचण्ड जीत के साथ ही लगातार दूसरी बार केन्द्र में किसी गैर कांग्रेसी सरकार को सत्ता में लाने के सूत्रधार बने भाजपा के संकटमोचक अमित शाह। निश्चित रूप से इस जीत के बाद अमित शाह की स्थिति न केवल पार्टी के भीतर बल्कि देश की राजनीति में भी बेहद मजबूत हुई है और माना जाना चाहिए कि मोदी मंत्रिमंडल में ‘नंबर दो’ की हैसियत वाले शाह अब गृहमंत्री के रूप में भी एक बहुत बड़ी और दमदार भूमिका निभाने जा रहे हैं। शाह के गृहमंत्री बनने के बाद अब भाजपाध्यक्ष पद पर जो भी आसीन हो, यह तय है कि उसे मोदी-शाह द्वारा बनाई रणनीतियों के हिसाब से ही चलना होगा। प्रधानमंत्री द्वारा अमित शाह को अध्यक्ष पद से उठाकर देश का गृहमंत्री बनाए जाने के भी अपने निहितार्थ हैं। दरअसल इस कार्यकाल में मोदी के लिए चुनौतियां काफी बढ़ गई हैं। कुछ ही समय बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, असम इत्यादि राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और मोदी को इस बात को बखूबी अहसास है कि शाह को मंत्रिमंडल में शामिल बगैर वे इन चुनौतियों का मुकाबला इतनी सहजता से नहीं कर पाएंगे। यही वजह है कि उन्होंने गृहमंत्री के रूप में शाह का चयन किया।
एक समय था, जब भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्णआडवाणी की जोड़ी को लेकर सकारात्मक चर्चाएं हुआ करती थी लेकिन भाजपा कार्यकर्ताओं में असीम जोश पैदा करने और आमजन में अपने प्रति भरोसा और विश्वास जगाने के साथ-साथ भाजपा को बहुत ही कम समय में अर्श पर पहुंचाने का जो करिश्मा नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह की जोड़ी ने कर दिखाया है, वह वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी भी नहीं कर पाई। आडवाणी को पार्टी संगठन पर मजबूत पकड़, संगठन में अनुशासन बनाए रखने और उसे धार देने के लिए जाना जाता था लेकिन अमित शाह इस मामले में उनसे कई गुना आगे निकल गए हैं। भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह हारी बाजी को भी जीतने वाले योद्धा के रूप में पहचान बनाने में सफल हुए हैं और सदैव मोदी के संकटमोचक बनकर उभरे हैं। उन्होंने कई अवसरों पर यह साबित भी कर दिखाया कि उन्हें यूं ही भाजपा का चाणक्य नहीं कहा जाता। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्हें जिस भी किले में सेंध लगानी होती है, पहले उसकी पूरी केस स्टडी करते हैं और फिर अपनी चाणक्य नीतियों से या तो अपने विरोधियों को हाशिये पर लाकर खड़ा कर देते हैं या अपने पक्ष में कर लेते हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शख्सियत ऐसी है कि उनके किसी सहयोगी में भी कभी इतनी हिम्मत नहीं होती कि वो उनके रहते कभी अमित शाह पर उंगली उठा सके। दरअसल मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी ऐसे किसी व्यक्ति पर दांव नहीं लगाया, जो उनके अहितकारी साबित हो सके। अगर पिछले करीब तीन दशकों से मोदी-शाह की जोड़ी यथावत है बल्कि दिनों-दिन और मजबूत हुई है तो इसके निहितार्थ समझना कठिन नहीं है। दोनों के बीच गजब की केमिस्ट्री है और उनकी अटूट दोस्ती तथा समझदारी ऐसी है कि दोनों एक-दूसरे के फैसलों पर कभी कोई सवाल नहीं उठाते।
मोदी-शाह की करिश्माई जोड़ी ने लोकसभा चुनाव में तो वो कारनामा कर दिखाया, जिसकी कम से कम भारतीय राजनीति में तो कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। क्या कभी किसी ने सोचा था कि एक प्रधानमंत्री के नाम भर से ही बहुत सारे संसदीय क्षेत्रों से अधिकांश भाजपा प्रत्याशी दूसरे दलों के कद्दावर नेताओं को बुरी तरह पटखनी देते हुए इस प्रकार लाखों मतों के अंतर से विजयी हो जाएंगे और कई ऐसे राज्यों में भी पार्टी का एकछत्र प्रतिनिधित्व होगा, जहां कभी कोई भाजपा का नामलेवा तक न था। लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने के लिए शाह ने 312 लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करते हुए 162 रैलियां और 18 रोड शो किए तथा करीब 1.58 लाख किलोमीटर यात्रा की। मार्च 2017 तक ही उन्होंने प्रतिदिन औसतन 524 किलोमीटर का सफर करते हुए 32 माह में 5 लाख 7 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी यात्राएं की थी। दरअसल उन्हें इस बात का भली-भांति अनुमान था कि पार्टी के लिए पिछली 282सीटों को बचाए रख पाना इतना आसान नहीं होगा। इसीलिए उन्होंने न केवल उन राज्यों की यात्राएं की, जहां भाजपा की सरकारें हैं बल्कि उन राज्यों पर और भी ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया, जहां भाजपा पिछले चुनावों में काफी पिछड़ी हुई थी। चुनावी गणित के महारथी शाह पांच साल लगातार जरूरत के मुताबिक अपनी रणनीतियों में अपेक्षित बदलाव कर ऐसे राज्यों को भी भाजपा के साथ जोड़ने की कवायद में जुटे रहे, जहां भाजपा का कोई जनाधार नहीं था। अगर ऐसे राज्यों में भी भाजपा परचम लहराने मेें सफल हुई तो इसका श्रेय पूरी तरह शाह की चाणक्य नीतियों और मोदी की करिश्माई शख्सियत को ही जाता है। उन्होंने उन राज्यों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया, जहां 2014 में पार्टी बहुत कमजोर थी। उनकी रणनीति यही थी कि पार्टी अगर अपनी पिछली जीती कुछ सीटों पर पिछड़ भी जाती है तो ये नए राज्य उसके लिए संजीवनी की भूमिका निभा सकें। आंध्र प्रदेश, केरल, उड़ीसा, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल जैसे पारम्परिक रूप से कमजोर राज्यों में भी भगवा फहराये जाने के मंसूबों के साथ शाह ने अनेक यात्राएं की और पार्टी का जमीनी ढ़ांचा मजबूत करने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहे। अगर पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के अलावा दक्षित भारत में भी भाजपा शानदार प्रदर्शन कर सकी तो शाह की चाणक्य नीतियांे की ही बदौलत।
अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि उनके जैसी माइक्रोमैनेजमेंट तथा बूथ मैनेजमेंट की क्षमता न ही भाजपा और न ही किसी अन्य दल के नेता में है। अपनी यात्राओं में वे संगठन को चुनौतियों से उबारने का मंत्र बताने के साथ-साथ संगठन तथा राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा सरकारों के बीच व्याप्त आपसी नाराजगी को दूर करने का प्रयास करते रहे और इन्हीं प्रयासों का नतीजा लोकसभा चुनाव के परिणामों में स्पष्ट रूप से दिखाई भी दिया। अगस्त 2014 में भाजपाध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के साथ 10 करोड़ लोगों को जोड़कर उसे सदस्य संख्या के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाने का खिताब दिलाने के साथ-साथ इतनी विशाल सदस्य संख्या, बूथ से लेकर चुनावी मैदान तक प्रबंधन तथा प्रचार की बेहद सधी बिसात बिछाने की बदौलत ही वे राजनीति के मंझे हुए खिलाडि़यों को भी आसानी से मात देते हुए देश के ऐसे हिस्सों को भी भगवामय करने में सफल हुए, जहां भाजपा काफी पिछड़ी हुई थी। शाह के पास भाजपा के बूथ लेवल तक के हर कार्यकर्ता का पूरा डाटाबेस रहता है और उनमें ऐसी कमाल की संगठन क्षमता है कि वो जब चाहें, किसी भी बूथ के कार्यकर्ता से सीधे सम्पर्क कर सकते हैं। यही सब बातें उन्हें राजनीति का चाणक्य साबित करती हैं।
22 अक्तूबर 1964 को मुम्बई के एक व्यापारी परिवार में जन्मे अमित शाह 14 वर्ष की आयु में ही आरएसएस में शामिल हो गए थे। उन्होंने अहमदाबाद से बायोकेमिस्ट्री में स्नातक उपाधि ली और कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही 1982 में वे भाजपा के विद्यार्थी संगठन एबीवीपी के सचिव रहे। कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे पिता की व्यापारिक विरासत संभालने में जुट गए। 1990 के आसपास जिस समय नरेन्द्र मोदी संघ के साथ-साथ भाजपा में भी मजबूती से उभर रहे थे और अपनी एक सशक्त टीम बनाने में जुटे थे, उस वक्त संघ से जुड़े अमित शाह की मुलाकात मोदी से हुई और तभी से दोनों की ऐसी जोड़ी बनी, जो इन दिनों भारतीय राजनीति में नित नए करिश्मे कर रही है। मोदी से मुलाकात के बाद शाह ने 1991 में उस समय के भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्णआडवाणी का चुनाव प्रबंधन संभालने की इच्छा जताई, जिसके बाद भाजपा में उनकी अच्छी-खासी पहचान बन गई और वे 1995 में गुजरात राज्य वित्त निगम के चेयरमैन बने। 1997 में वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के कोषाध्यक्ष बने और उसी साल उन्होंने सरखेज विधानसभा से उपचुनाव लड़ा तथा जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसी सीट से 2012 तक वे लगातार पांच बार विजयी रहे। 1989 से लेकर इस लोकसभा चुनाव तक वे स्वयं छोटे-बड़े करीब 44 चुनाव लड़ चुके हैं और उनका यह भी एक अनोखा रिकॉर्ड है कि वे अपने जीवन में इनमें से एक भी चुनाव नहीं हारे।
2001 में जब गुजरात में केशुभाई पटेल को हटाकर नरेन्द्र मोदी ने पहली बार गुजरात की सत्ता संभाली तो गुजरात में मोदी युग की शुरूआत हुई और तब मोदी के साथ शाह भी पूरी ताकत से उभरे। 2002 के चुनाव में मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पुनः सरकार बनाई और उनकी सरकार में शाह न केवल गृहमंत्री बने बल्कि उन्हें दर्जन भर मंत्रालयों के कार्यभार के साथ-साथ अनेक कैबिनेट समितियों का सदस्य भी बनाया गया। 2013 में जब मोदी ने गुजरात से निकलकर केन्द्र की राजनीति में कदम रखा और भाजपा के राष्ट्रव्यापी प्रचार की कमान संभाली तो उत्तर प्रदेश की कमान अमित शाह को सौंप दी गई और इन दोनों की बेमिसाल जुगलबंदी ने ऐसा कमाल कर दिखाया कि भाजपा 282सीटों के साथ पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने में सफल हो गई। राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने से पहले मोदी और शाह बखूबी जानते थे कि दिल्ली का रास्ता सर्वाधिक लोकसभा सीटों वाले राज्य उत्तर प्रदेश से होकर निकलता है और इसके लिए इस राज्य को फतेह करना जरूरी है। उस वक्त यूपी में भाजपा की हालत खस्ताहाल थी और तब शाह ने ऐसा करिश्मा कर दिखाया कि भाजपा पहली बार यहां से 80 में से 73 सीटें जीतने में सफल रही। उसके कुछ समय बाद हुए विधानसभा चुनावों में भी उन्हीं की रणनीतियों की बदौलत पार्टी सपा सरकार का तख्ता पटलते हुए दो तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाने में सफल हुई। 2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद अमित शाह भाजपाध्यक्ष बने और देशभर में भाजपा के विस्तार के लिए जी-जान से जुट गए। यह अमित शाह की चाणक्य नीतियों और नरेन्द्र मोदी की करिश्माई शख्सियत का ही जादू कहा जाएगा कि जो कांग्रेस पार्टी अधिकांश भारतीय राज्यों में सत्तारूढ़ थी, उसे इस जोड़ी ने महज पांच राज्यों तक समेटकर भाजपा को देश के 19 राज्यों में सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाकर देश का राजनीतिक मानचित्र ही बदलकर रख दिया। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी ने अमित शाह को गृहमंत्री के रूप में जो महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है, उसके बाद हर किसी की यह उम्मीद जगी है कि मोदी-शाह की करिश्माई अटूट जोड़ी कुछ नया इतिहास अवश्य रचेगी।
*(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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