... सुरेन्द्र कुमार (लेखक विचारक और शिक्षक) हिमाचल प्रदेश।


विगत कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि दुनिया में वायु प्रदूषण का दुष्प्रभाव दिन प्रति दिन अपना रौद्र रूप दिखाने को आतुर हो रहा है। परिणामस्वरूप ग्लोबल वार्मिग जैसी विकराल समस्या पनप रही है। इसलिए इस बार 05 जून को चीन के चच्यांग में मनाए गए विश्व पर्यावरण दिवस की थीम 'वायु प्रदूषण' रखी गई थी। क्योंकि हाल ही में डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि विश्व में लगभग 70 लाख लोग वायु प्रदूषण के कारण मौत की नींद सो चुके हैं। आज हमारा वायुमंडल कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड इत्यादि विशैली गैसों का भण्डार बनता जा रहा है। वैसे तो यह गंभीर समस्या समस्त दुनिया को झकझोर रही है। परंतु भारत पर इस जानलेवा समस्या का असर कुछ ज्यादा ही हो रहा है। भारतीय संदर्भ में यदि वायु प्रदूषण से संबंधित आँकड़ों पर नज़र दौडाई जाए तो देकर बड़ा ताजुब होता है। हम देख रहे हैं कि देश की राजधानी दिल्ली की आवो हवा वक्त गुजर के साथ बेहद जहरीली होती जा रही है। गत वर्ष दिवाली की रात राष्ट्रीय राजधानी के कई इलाकों में वायु गुणवत्ता का सूचकांक 900 के खतरनाक स्तर से भी ऊपर जा पहुँचा था। देश की लगभग 66 करोड़ आबादी ऐसी जगहों में जीवन बसर कर रही है, जहाँ वायु प्रदूषण का स्तर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। फलस्वरूप देश में होने वाली कुल मौतों में से एक चौथाई मौते वायु प्रदूषण से ही हो रही है। दूषित हवा में मौजूद 2.5 माईक्रोन से कम आकार के महीन कण यानी पीएम-2.5 के संपर्क में आने से देशवासी बेमौत काल का ग्रास बन रहे हैं। गत माह स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2019 की शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में वायु प्रदूषण के कारण वर्ष 2017 में करीब 12 लाख निर्दोष बेमौत काल के गाल में समा गए। विश्व में दूषित हवा की वजह से जीतनी मौते होती है, उसमें से एक चौथाई भारत में ही हो रही है। भारत की दूषित फीजाएं हर साल लाखों लोगों को अपने आगोश में लपेट रही है। आज हमारा देश दुनिया के शीर्ष पांच दूषित देशों में शामिल हो चुका है। जो हम सभी देशवासियों को झकझोर रहा है। मानवीय जरूरतों के लिए प्रकृति के पास अथाह भण्डार हैं, पर मानव की बढ़ती लालसा के समक्ष प्रकृति भी लाचार होती जा रही है। निरंतर बढ़ती जनसंख्या प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन कर रही है। परिणामस्वरूप हरियाली व वनस्पति से सराबोर हमारी धरती बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के प्रभाव से बंजर होती जा रही है। शहरों की बढ़ती आबादी प्रतिदिन आवास की समस्या को जन्म दे रही है। जो आगे देशवासियों को झुग्गियों का निर्माण करने के लिए विवश कर रहा है। झुग्गियों में उचित निकासी की व्यवस्था न होने से वहां प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है इसी तरह देश के उद्योगों का धुआँ, कृषि रसायनों का इस्तेमाल, यातायात के साधनों का बढ़ता इस्तेमाल भी हमारी प्रकृति के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है। इन साधनों से उत्पादित होने वाला धुआँ आस पास के वातावरण को उसर बना रहा है। इसके अलावा वनों का अंधाधुँध कटान, जंगलों में लगने वाली आग, नये नये परमाणु बम परीक्षण भी हमारे वायु मंडल में अथाह विशैली गैसे घोल रहा है। देश में गतिमान वायु प्रदूषण के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिए यहाँ की सरकारें करोड़ों रुपये खर्च करती रही है। परंतु जमीनी हकीकत हम सभी से छुपी नहीं है। प्रदूषण के इस हत्यारे जहर के बढ़ते कदमों को थामने के लिए पूर्व की मोदी सरकार 1.0 ने कुछ कारगर प्रयास किए थे। जिसमें प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन, स्वच्छ भारत वाहन मानक चरण-04 नयी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना प्रमुख थी। लेकिन सरकार के इन बहुमूल्य कार्यक्रमों की क्रियान्वयन दर को आमजन की भागीदारी ने धरातल पर रेंगने को मजबूर किया। यदि देश वास्तव में वायु प्रदूषण रूपी जानलेवा राक्षस को सदा के लिए भारत से भगाना चाहते हैं तो केंद्र की नई मोदी सरकार 2.0 को इसके समाधान के लिए कुछ हट कर विचारना होगा तथा जनमानस को सरकार के उन प्रावधानों में प्रशासन का कंधे से कंधा मिलाकर साथ देना होगा। प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सर्वप्रथम हमें देश की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए कुछ विशेष कदम उठाने होंगे। इसके अलावा देश में कारखानों का निर्माण नियमों के अनुरूप शहरों से दूर करना, शहरीकरण के विस्तार के संकुचन के लिए गाँवों व छोटे कस्बों में रोजगार के अवसर सृजित करना, वाहनो के बेतहाशा इस्तेमाल को कम करना, सौर उर्जा तकनीक को प्राथमिकता देना, वनो के कटान व जंगल में लगने वाली आग को रोकना, नियमित पौधा रोपन व जंगलों की देखभाल इत्यादि प्रावधानों को देशवासियों के सहयोग से कड़ाई से लागू करना होगा। इसी प्रकार वायु प्रदूषण से होने वाले नुकसानों का दूरदर्शन, रेडियो, पत्र पत्रिकाओं सहित विद्यालयी पाठ्यक्रम में भी प्रमुखता से प्रसार प्रचार करना होगा। हमारी सरकारें प्रदूषण को कम करने के लिए नियम एवं कानून तो बना सकती है परंतु उसका सफल क्रियान्वयन लोगों की सहभागिता पर ही निर्भर करता है। जब तक भारत का प्रत्येक नागरिक अपने राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक सरकारी योजनाएँ धरातल पर यूँ ही सहजता से कछुए की चाल चलती रहेगी। जब तक देश में रहते वाला प्रत्येक तबका वातावरण की सुरक्षा के प्रति सचेत नहीं होगा, तब तक हमारा आस पड़ोस यूँ ही गंदगी से सराबोर रहेगा। अतः वक्त आ गया है कि हम सभी देशवासी समझें कि पर्यावरण संरक्षण ही वह एक मात्र सुरक्षा कवच है जो हमारे जीवन और भावी पीढ़ी के जीवन को स्वर्ग बना सकता है। आओ पर्यावरण की सुरक्षा के लिए संकल्प लें कि हम सभी मिलकर दूषित वायु के जानलेवा दुस्साहस का डटकर मुकाबला करेंगे तथा अपने आस पड़ोस को पुनः स्वच्छ व साफ सुथरा बनाएँगे।

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