बुद्ध पूर्णिमा (18 मई) पर विशेष

 

 

- योगेश कुमार गोयल
प्रतिवर्ष वैशाख मास की पूर्णिमा को ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के रूप में मनाया जाता है, जिसे ‘बुद्ध जयंती’ भी कहते हैं। माना गया है कि 563 ईस्वी पूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा के ही दिन लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था और वैशाख मास की पूर्णिमा को ही 35 वर्ष की आयु में 528 ई. पू. गौतम बुद्ध ने बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किया था तथा वैशाख पूर्णिमा को ही 80 वर्ष की आयु में 483 ई. पू. गौतम बुद्ध ने उत्तर प्रदेश में कुशीनगर में हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में वैशाख मास की पूर्णिमा को ‘त्रिविध पावन पर्व’ भी कहा गया है और संभवतः यही वजह है कि बौद्ध धर्म में बुद्ध पूर्णिमा को सबसे पवित्र दिन माना गया है। मान्यता है कि गौतम बुद्ध ने ही आज से करीब ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व बौद्ध धर्म की स्थापना की थी।
गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था। गौतम उनका गौत्र था किन्तु कालांतर में वह सिद्धार्थ गौतम, महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, गौतम बुद्ध, तथागत आदि विभिन्न नामों से जाने गए। शाक्य वंश से संबंध होने के कारण सिद्ध को ‘शाक्यों का संत’ भी कहा गया। सिद्धार्थ के पिता राजा शुद्धोधन थे, जो कपिलवस्तु के शाक्य वंशीय राजा थे। कपिलवस्तु हिमालय की तराई में नेपाल की सीमा पर एक काफी विशाल गणराज्य था, जो आज नेपाल में है। राजा शुद्धोधन की दो रानियां थी, जिनमें महामाया बड़ी और प्रजापति गौतमी छोटी थी। रानी महामाया जब गर्भवती हुई तो उस समय के शाक्य समाज के रीति रिवाजों के अनुसार प्रसव के लिए वह प्रजापति गौतमी के साथ अपने मायके देवदह जा रही थी किन्तु रास्ते में ही उन्हें प्रसव पीड़ा शुरू हो गई और लुम्बनी वन में ही शाल के दो वृक्षों के बीच उन्होंने एक अति सुंदर तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पुत्रजन्म के पश्चात् दोनों रानियां कपिलवस्तु वापस लौट आई। इसी बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया।
सिद्धार्थ के जन्म के कुछ ही समय पश्चात् एक बहुत पहुंचे हुए सन्यासी ने राजा शुद्धोधन को बताया कि यह बालक या तो बहुत महान् चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर यह समस्त सांसारिक मोहमाया का परित्याग कर एक महान् सन्यासी बनेगा और विश्व का महान् उद्धारक साबित होगा। बालक के सन्यासी बनने की बात सुनकर राजा शुद्धोधन बहुत चिंतित हुए और उन्होंने सिद्धार्थ को मोहमाया और सांसारिक सुखों की ओर आकर्षित करने के लिए उनके समक्ष भोग विलास तथा ऐश्वर्य के समस्त संसाधनों का ढ़ेर लगा दिया लेकिन सिद्धार्थ हमेशा शांत और ध्यानमग्न ही रहा करते। अतः यही सोचकर कि कहीं सिद्धार्थ का मन सांसारिक सुखों से उचाट होकर पूरी तरह से वैराग्य में ही न लग जाए, राजा शुद्धोधन ने कम उम्र में ही एक अतिसुंदर, सुशील, अति तेजस्वी सर्वगुणसम्पन्न राजकन्या यशोधरा के साथ उनका विवाह कर दिया। विवाह के पश्चात् सिद्धार्थ गौतम को पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई और पुत्र का नाम रखा गया राहुल।
बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ घंटों एकांत में बैठकर ध्यान किया करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने पुत्रजन्म तक सांसारिक सुखों का उपभोग किया परन्तु धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक सुखों से उचाट होता गया और एक दिन वे मन की शांति पाने के उद्देश्य से भ्रमण के लिए अपने सारथी छेदक को साथ लेकर रथ में सवार हो महल से निकल पड़े। रास्ते में उनका मनुष्य की दुःख की चार घटनाओं से साक्षात्कार हुआ। जब उन्होंने दुःख के इन कारणों को जाना तो मोहमाया और ममता का परित्याग कर पूर्ण सन्यासी बन गए।
सर्वप्रथम सिद्धार्थ ने रास्ते में एक रोगी व्यक्ति को देखा और सारथी से पूछा, ‘‘यह प्राणी कौन है और इसकी यह कैसी दशा है?’’
सारथी ने बताया, ‘‘हे स्वामी! यह भी एक मनुष्य है और इस समय यह बीमार है। इस दुनिया में हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी रोगी होकर दुःखों का सामना करना ही पड़ता है।’’
आगे बढ़ने पर सिद्धार्थ ने मार्ग से गुजरते एक वृद्ध, निर्बल व कृशकाय व्यक्ति और उसके बाद एक मृत व्यक्ति की अर्थी ले जाते विलाप करते लोगों को देखा तो हर बार सारथी से उसके बारे में पूछा। सारथी ने एक-एक कर उन्हें मनुष्य की इन चारों अवस्थाओं के बारे में बताया कि हर व्यक्ति को कभी न कभी बीमार होकर कष्ट झेलने पड़ते हैं। बुढ़ापे में काफी दुःख झेलने पड़ते हैं, उस अवस्था में मनुष्य दुर्बल व कृशकाय होकर चलने-फिरने में भी कठिनाई महसूस करने लगता है और आखिर में उसकी मृत्यु हो जाती है।
यह रहस्य सिद्धार्थ जानकर बहुत दुःखी हुए। आगे मार्ग में उन्हें एक साधु नजर आया, जो बिल्कुल शांतचित्त था। साधु को देख सिद्धार्थ के मन को अपार शांति मिली और उन्होंने विचार किया कि साधु जीवन से ही मानव जीवन के इन दुखों से मुक्ति संभव है। बस फिर क्या था, देखते ही देखते सिद्धार्थ सांसारिक मोहमाया के जाल से बाहर निकलकर पूर्ण वैरागी बन गए। एक दिन रात्रि के समय पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को गहरी नींद में सोता छोड़ गौतम बुद्ध ने अपने घर-परिवार का परित्याग कर दिया और सत्य तथा ज्ञान की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे। उन्होंने छह वर्षों तक जंगलों में कठिन तप व उपवास किए और सूखकर कांटा हो गए किन्तु उन्हें ज्ञान की प्राप्ति न हो सकी। अतः उन्होंने एक दिन सन्यास छोड़ दिया और उनके शिष्य भी एक-एक कर उनका साथ छोड़ गए।
उसके बाद गौतम बुद्ध ने शारीरिक स्वास्थ्य व मानसिक शक्ति प्राप्त की और फिर वे बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर गहन चिंतन में लीन हो गए तथा मन में दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस बार ज्ञान प्राप्त किए बिना वे यहां से नहीं उठेंगे। सात सप्ताह के गहन चिंतन-मनन के बाद वैशाख मास की पूर्णिमा को 528 ई. पू. सूर्योदय से कुछ पहले उनकी बोधदृष्टिजागृत हो गई और उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई। उनके चारों ओर एक अलौकिक आभा मंडल दिखाई देने लगा। उनके पांच शिष्यों ने जब यह अनुपम दृश्य देखा तो वे महात्मा बुद्ध के चरणों में गिरकर उनसे क्षमायाचना करने लगे और इन शिष्यों ने ही उन्हें पहली बार ‘तथागत’ कहकर संबोधित किया। ‘तथागत’ यानी सत्य के ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करने वाला। पीपल के जिस वृक्ष के नीचे बैठकर सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया, वह वृक्ष ‘बोधिवृक्ष’ कहलाया और वह स्थान, जहां उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया, बोध गया के नाम से विख्यात हुआ तथा बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद ही सिद्धार्थ को ‘महात्मा बुद्ध’ कहा गया।
अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में महात्मा बुद्ध ने दुनिया भर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए। ईसा पूर्व 483 को वैशाख मास की पूर्णिमा को उन्होंने कुशीनगर के पास हिरण्यवती नदी के तट पर महापरिनिर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने उन्हीं साल वृक्षों के नीचे प्राण त्यागे, जिन पर मौसम न होते हुए भी फूल आए थे। उनका अंतिम उपदेश था कि सृजित वस्तुएं अस्थायी हैं, अतः विवेकपूर्ण प्रयास करो। उनका कहना था कि मनुष्य की सबसे उच्च स्थिति वही है, जिसमें न तो बुढ़ापा है, न किसी तरह का भय, न चिन्ताएं, न जन्म, न मृत्यु और न ही किसी तरह के कष्ट और यह केवल तभी संभव है, जब शरीर के साथ-साथ मनुष्य का मन भी संयमित हो क्योंकि मन की साधना ही सबसे बड़ी साधना है।

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