- योगेश कुमार गोयल


लोकसभा चुनाव में मतदान के पांच चरण पूरे हो चुके हैं और छठे चरण में बारी है देश की राजधानी दिल्ली की, जहां की कुल सात लोकसभा सीटों के लिए 12 मई को मतदान होना है। दिल्ली की इन सातों सीटों पर कुल 164 प्रत्याशी मैदान में हैं और सभी सीटों पर बेहद दिलचस्प चुनावी मुकाबला तय है। करीब एक करोड़ 28 लाख आबादी वाले दिल्ली शहर में 81.21 फीसदी लोग साक्षर हैं और यहां की विभिन्न सीटों से समय-समय पर अटल बिहारी वाजपेयी, डा. मनमोहन सिंह, लालकृष्णआडवाणी, राजेशखन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा जैसी शख्सियतें भी अपनी किस्मत आजमा चुकी हैं। इस बार दिल्ली की सभी सीटों पर भाजपा, आप, कांग्रेस तथा बसपा ने अपने-अपने प्रत्याशी खड़े किए हैं लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा, आप तथा कांग्रेस के बीच ही होना तय है, बसपा इन सभी दलों के समीकरण बिगाड़ने में अवश्य अहम भूमिका निभा सकती है। चुनावों की तारीखें घोषित होने के साथ ही बहुत लंबे समय तक आप और कांग्रेस के बीच गठजोड़ होने की संभवनाएंबलवती रही किन्तु इन दोनों दलों के अपने-अपने बूते पर चुनावी मैदान में उतरने से दिल्ली की सभी सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है, जिसने चुनावी तस्वीर को रोचक रंग दे दिया है। 2009 के लोकसभा चुनाव में जहां कांग्रेस दिल्ली की सातों सीटें जीतने में सफल रही थी, वहीं 2014 में मोदी लहर के चलते कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई थी और 46.43 फीसदी मतों के साथ सातों सीटें भाजपा की झोली में जा गिरी थी। तब ‘आप’ भी भले ही एक भी सीट नहीं जीत सकी थी किन्तु वह 33.08 फीसदी मत प्राप्त कर दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी थी और कांग्रेस के कुछ नामीगिरामीप्रत्याशियों की जमानत जब्त होने के साथ वह महज15.22 फीसदी मत बटोरकर तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी। इस बार स्थिति भाजपा के लिए इतनी अनुकूल प्रतीत नहीं होती।
पिछले लोकसभा चुनाव के बाद 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में 54.3 फीसदी मतों के साथ आप 70 में से 67 सीटें जीतकर करिश्माई सफलता प्राप्त करने में कामयाब रही और भाजपा 32.3 फीसदी मतों के साथ सिर्फ तीन सीटों पर सिमट गई थी जबकि कांग्रेस महज9.7 फीसदी मत प्राप्त कर अपना खाता तक खोलने में असफल रही थी। इसके दो साल बाद हुए दिल्ली नगर निगम के चुनावों में जहां भाजपा करीब पांच फीसदी मतों की बढ़त से 36.74 फीसदी मतों के साथ जीत की हैट्रिक लगाने में सफल रही, वहीं आप का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा, जिसे सिर्फ 26 फीसदी मत ही प्राप्त हुए। दूसरी ओर 2015 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 9.7 फीसदी मतों पर सिमटी कांग्रेस 21.28 फीसदी मत पाने में सफल रही। संभवतः यही वजह रही कि करीब पांच साल पूर्व कांग्रेस नेत्री शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे धकेलने की बातें करने वाले केजरीवाल उन्हीं शीला के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में उतरने को लालायित रहे और बार-बार कांग्रेस के दर पर गठबंधन की गुहार लगाते रहे किन्तु शीला शुरू से ही इस गठबंधन के खिलाफ रही क्योंकि उनका मानना है कि दिल्ली में आप को खत्म करके ही कांग्रेस को पुनर्जीवित किया जा सकता है।
फिलहाल दिल्ली में तीन राष्ट्रीय दलों भाजपा, कांग्रेस तथा बसपा के अलावा एक प्रादेशिक दल ‘आप’ सहित कुल 98 राजनीतिक दल चुनावी रण में किस्मत आजमा रहे हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश दल ऐसे हैं, जो सिर्फ चुनाव के समय ही नजर आते हैं और उनका प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों से दूर-दूर तक कोई मुकाबला नजर नहीं आता। कुल सात लोकसभा सीटों के लिए हालांकि 439 उम्मीदवारों ने नामांकन दाखिल किए थे, जिनमें से लगभग 60 फीसदी नामांकन रद्द होने के बाद केवल 173 आवेदन ही रह गए थे। उनमें से भी 9 लोगों द्वारा अपना नामांकन वापस ले लिए जाने के बाद 164 प्रत्याशी मैदान में हैं। इनमें से 82 प्रत्याशी अर्थात् पूरे 50 फीसदी युवा हैं, जिनकी उम्र 45 वर्ष तक ही है जबकि शेष 50 फीसदी प्रत्याशी 45 वर्ष से अधिक आयु के हैं। पिछले कुछ चुनावों के मुकाबले देखें तो इस बार चुनावी महासमर में निर्दलीयों की संख्या हर बार से कम है। इस बार जहां कुल 44 निर्दलीय प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं, वहीं 1991 में 399, 1996 में 379, 1999 में 52, 2004 में 70, 2009 में 72 तथा 2014 में 58निर्दलीयों ने चुनाव लड़ा था लेकिन हर बार हकीकत यही सामने आई है कि दिल्ली के मतदाताओं ने निर्दलीय उम्मीदवारों पर कभी भरोसा नहीं जताया। सभी सीटों पर मुकाबला कितना दिलचस्प है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उत्तर-पश्चिमी सीट को छोड़कर बाकी सभी सीटों से करीब दो-दो दर्जन उम्मीदवार चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं और यही कारण है कि इन सभी सीटों पर ईवीएम में दो-दो बैलेट यूनिट लगाई जाएंगी क्योंकि एक बैलेट यूनिट में ज्यादा से ज्यादा 16 उम्मीदवारों के ही नाम लगाए जा सकते हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो चुनावी मुकाबला पूरी तरह से भाजपा, कांग्रेस तथा आप के बीच होना तय है। बसपा भले ही किसी भी सीट पर जीतने की स्थिति में नहीं है लेकिन सातों सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारकर उसने ऐसा खेल खेला है, जो इन सभी दलों के लिए समस्या उत्पन्न कर सकता है। सभी सातों सीटों का सिलसिलेवार विवेचन करें तो उत्तर-पश्चिमी दिल्ली सीट से सबसे कम 11 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनमें भाजपा से विख्यात पंजाबी गायक हंसराज हंस, कांग्रेस से राजेशलिलोठिया तथा आप से गुग्गन सिंह आमने-सामने हैं। 2014 के चुनाव में यहां से भाजपा को 46.44, आप को 38.56 तथा कांग्रेस को 11.61 फीसदी मत मिले थे। यह दिल्ली की एकमात्र आरक्षित सीट है, जहां 2371636 मतदाता 11 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। इस सीट से मौजूदा सांसद उदित राज हैं किन्तु भाजपा द्वारा टिकट न दिए जाने पर वे बागी होकर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। हंसराज हंस ने हाल ही में भाजपा का दामन थामा था, जो मैट्रिक पास हैं जबकि गुग्गन सिंह आठवीं तक पढ़े हैं और राजेशलिलोठिया ने प्राकृतिक आपदा में एमएससी की उपाधि प्राप्त की हुई है। हंसराज हंस के लिए राजेशलिलोठिया इस सीट से कड़ी चुनौती बन सकते हैं।
चांदनी चौक सीट से 26 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं, जिनकी किस्मत का फैसला यहां 1653351 मतदाता करेंगे। मुख्य मुकाबला भाजपा के मौजूदा सांसद डा. हर्षवर्धन, कांग्रेस के दिग्गज जे पी अग्रवाल तथा आप के पंकज गुप्ता के बीच होना तय है। 2014 में यहां से भाजपा को 44.58, आप को 30.71 तथा कांग्रेस को 17.94 फीसदी मत मिले थे। यह दिल्ली की सबसे पुरानी लोकसभा सीटों में से एक है, जहां व्यापारी और मुस्लिम वर्ग के मतदाता किसी भी उम्मीदवार की हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं। तीनों ही उम्मीदवार उच्च शिक्षित हैं। सादगी के लिए विख्यात और यहां की जनता के बीच लोकप्रिय डा. हर्षवर्धन कान, नाक व गले में मास्टर ऑफ सर्जरी कर चुके हैं तो जे पी अग्रवाल दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं, वहीं पंकज गुप्ता इलैक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। जे पी अग्रवाल दो बार चांदनी चौक से सांसद रह चुके हैं। इसलिए माना जा रहा है कि उनके तथा डा. हर्षवर्धन के बीच कड़ा मुकाबला होगा। उत्तरी-पूर्वी दिल्ली से 24 प्रत्याशी मैदान में हैं, जिनका भाग्य निर्धारण यहां 2228014 मतदाता करेंगे। पिछली बार यहां से भाजपा को 45.23, आप को 34.3 तथा कांग्रेस को 16.3 फीसदी मत मिले थे। यहां मैदान में भाजपा की ओर से मौजूदा सांसद मनोज तिवारी, कांग्रेस की ओर तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित तथा आप की ओर से दिलीप मंडल जैसे महारथी मैदान में उतारे गए हैं। तीनों ही उम्मीदवार उच्च शिक्षित हैं। यहां मुकाबला काफी दिलचस्प है। एक ओर जहां शीला दीक्षित लगातार 15 वर्षों तक दिल्ली की सबसे चहेती मुख्यमंत्री रही हैं, वहीं मनोज तिवारी भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष हैं और काफी समय से इस क्षेत्र के लोगों से जुड़े रहे हैं।
पश्चिमी दिल्ली से 2359915 मतदाता कुल 23 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला करेंगे। यहां भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री स्व. साहिब सिंह वर्मा के पुत्र मौजूदा सांसद प्रवेश वर्मा, कांग्रेस के दिग्गज नेता महाबलमिश्रा तथा आप की ओर से बलवीर सिंह जाखड़ एक-दूसरे के खिलाफ ताल ठांेक रहे हैं। पिछले चुनाव में यहां से भाजपा को 48.30, आप को 28.38 तथा कांग्रेस को 14.33 फीसदी मत मिले थे। इस संसदीय क्षेत्र में जहां सिख, पंजाबी तथा पूर्वांचली समुदाय की बहुतायत है, वहीं ग्रामीण इलाकों में जाट समुदाय भी काफी प्रभाव रखता है। तीनों ही उम्मीदवार पढ़े-लिखे हैं और यहां मुख्य मुकाबला प्रवेश वर्मा तथा महाबलमिश्रा के बीच रहने के आसार हैं। नई दिल्ली संसदीय सीट दिल्ली की सर्वाधिक हाई प्रोफाइल सीट मानी जाती है क्योंकि इसी क्षेत्र में कनॉटप्लेस से लेकर संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और सुप्रीम कोर्ट तक आते हैं। यहां से भाजपा की वर्तमान सांसद मीनाक्षीलेखी, कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व केन्द्रीय मंत्री अजय माकन और आप के बृजेशगोयल किस्मत आजमा रहे हैं। 2014 में यहां से भाजपा को 46.73, आप को 29.96 तथा कांग्रेस को 18.85 फीसदी मत मिले थे। यहां 1610864 मतदाता कुल 27प्रत्याशियों की किस्मत का निर्धारण करने में अहम भूमिका निभाएंगे।
पूर्वी दिल्ली से हाल ही में भाजपा में शामिल हुए क्रिकेटर गौतम गंभीर के खिलाफ कांग्रेस के अरविंदर सिंह लवली तथा आप की ओर से ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमएससी कर चुकी आतिशी मैदान में हैं। 2014 में यहां से भाजपा को 47.81, आप को 31.90 तथा कांग्रेस को 16.98 फीसदी मत मिले थे। यहां उत्तराखण्ड और पूर्वांचली मतदाताओं की काफी तादाद है। गौतम गंभीर बार-बार किसी न किसी तरह के विवादों में फंसते रहे हैं, जिसका खामियाजा उन्हें चुनाव में भुगतना भी पड़ सकता है, वहीं लवली कांग्रेस का दिल्ली के लिए जाना-पहचाना चेहरा है जबकि आतिशी को लोग बेबाक और बहुत तेजतर्रारनेत्री के रूप में जानते हैं। इस सीट पर इन तीनों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। इस संसदीय क्षेत्र से 26 उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे हैं, जिनकी किस्मत का फैसला 2031921 मतदाता करेंगे। दक्षिणी दिल्ली से भाजपा के मौजूदा सांसद रमेश बिधूड़ी को कड़ी टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने विख्यात मुक्केबाज विजेन्दर सिंह को मैदान में उतारा है जबकि आप की ओर से युवाओं के बीच लोकप्रिय राघव चड्ढ़ा चुनौती दे रहे हैं। 2014 में यहां से भाजपा को 45.15, आप को 35.45 तथा कांग्रेस को 11.35 फीसदी मत मिले थे। इस सीट पर जाट मतदाताओं के अलावा पूर्वाचली मतदाता भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यहां 27 उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला 2060159 मतदाता करेंगे। बहरहाल, दिल्ली की सभी सातों सीटों पर कड़े मुकाबले के बीच अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली के दंगल में कौन बाजी मारता है।

*(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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