चौधरी जी को रात को दिल का दौरा पड़ा तो उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। दोपहर तक उनका बेटा मुम्बई से आ गया था। बेटे के आने की खबर सुनते ही रिश्तेदारों का अस्पताल में आने का सिलसिला शुरू हो गया। अभी तक माँ नितांत अकेली थी। पर बेटे के आने के बाद सारा नजारा ही बदल गया। उससे मिलने वाला हर व्यक्ति उससे उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी लेता, किसी भी तरह की मदद के बारे में पूछता और उसे निश्चिन्त रहने को कहता। वह उनकी संवेदनशीलता देख बहुत प्रभावित हुआ। एक राहतसी महसूस करने लगा। लेकिन रात को अपने पड़ौसी शर्माजी तबीयत देखने आए तो बेटे ने माँ से व्यंग्यात्मक लहजे में कहा , " लो शर्माजी को अब फ़ुर्सत मिली है।
" नहीं बेटा , ये नही होते तो बहुत मुश्किल हो जाती। इन्होंने ही तुम्हारे पापा को अस्पताल में भर्ती करवाया था। सारी व्यवस्था करने के बाद ही वे ड्यूटी पर गए थे।
सुनकर ही बेटे की आंखे नम हो गई। आजकल आदमी को पहचानने में कैसे भूल हो जाती है यह सोचकर वह व्यथित हो गया।

प्रकाश दर्पे
A 105, गणेषणभंगन
रायकर नगर, धायरी
पुणे 41
मोब 9922730092

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