- देवेन्द्रराज सुथार
'भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ, आजकल दिल्ली में है ज़ेर-ए-बहस ये मुदद्आ।' शायर दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां हमारी समृद्धि व संपन्नता के झूठे कीर्ति स्तंभ की हकीकत बयां करती है। आजादी के इतने वर्षों बाद भी देश में भुखमरी की समस्या का अंत नहीं हो पाना हमारी शासन व्यवस्था की नाकामी को साबित करता है। यह सही है कि भुखमरी एक वैश्विक समस्या है लेकिन हमें यह भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि बहुत से देशों ने सुदृढ़ व सुव्यवस्थित नीतियां बनाकर इससे मुक्त पाई हैं। लेकिन इसके विपरीत भारत में भुखमरी की समस्या को खत्म करने को लेकर सत्ताधीशों की तरफ से कोई सकारात्मक प्रयास होते नजर नहीं आ रहे हैं। करने को दावे और वायदे तो खूब किये जा रहे हैं लेकिन जमीनी धरातल पर उन्हें पूरा करने की कोशिश रत्ती भर भी नहीं हो रही है। यहीं कारण है कि 119 देशों के वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2018 में भारत 103वें पायदान पर है। इस सूचकांक में 2017 में भारत 100वें, 2016 में 97वें व 2015 में 80वें नंबर पर था। जबकि 2014 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय भारत 55वें पायदान पर था। भारत की चिंता इसलिए और भी बढ़ जाती है कि वह इस सूचकांक में अपने पड़ोसी देश चीन 25वें, बांग्लादेश 86वें, नेपाल 72वें व श्रीलंका 67वें से भी कई पीछे है। हालांकि, इस सूचकांक में पड़ोसी देश पाकिस्तान 106वें पायदान के साथ हमसे भी पीछे है।

हमारा देश कितना और किस हद तक भूख के संकट को झेल रहा है इसका पता तो आए दिन भूख से होने वाली मौतों से ही लग जाता है। दरअसल, भूख से मौत हमारे मुल्क के लिए कोई नई बात नहीं है। लेकिन यह खबर जरा ठहर कर सोचने के लायक है। इस चमकते न्यू इंडिया में जो पकवान की थाली डाइनिंग टेबल तक पहुंचाते हैं, आखिर वे लोग ही एक निवाले के लिए क्यों तरस जाते हैं। सुनहरे विकास का दावा करने वाली और डिजिटल इंडिया का दिन-प्रतिदिन दंभ भरने वाली सरकार इन दर्दनाक मौतों पर क्यों चर्चा नहीं करती? दुर्भाग्यजनक है कि आज भी आम आदमी रोटी के अधिकार के लिए तरस रहा है या तड़प-तड़पकर अपने प्राण दे रहा है। विचारणीय है 'सबका साथ-सबका विकास' का दावा करने वाली सरकार के शासन में असमानता की खाई दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। वैश्विक असमानता सूचकांक में भारत इस वक्त दुनिया के 180 मुल्कों में 135वें स्थान पर है। यानी हमारे यहां ‘आर्थिक विकास’, ‘ग्रोथ रेट’ और तमाम तरह के कर-सुधारों का लाभ सबको नहीं मिल पा रहा है। कुछ लोग खूब तरक्की कर रहे हैं, जबकि बहुत सारे लोग बेहाल हो रहे हैं। इससे असमानता तेजी से बढ़ रही है। पता नहीं क्यों अपने देश के अमीर लोग इस स्थिति से तनिक भी विचलित नहीं नजर आते। वे क्यों नहीं सोचते कि दुनिया उन्हें ‘भुक्खड़ों और बर्बाद लोगों के महादेश’ का ‘अमीर’ मानती है? वे अपने इस निजी और राष्ट्रीय-अपमान से आहत क्यों नहीं होते?

दुनिया का सर्वाधिक खुशहाल इलाका कहलाने वाले यूरोप में कौन-सा ऐसा देश होगा, जहां भारत की तरह सिर्फ 1 फीसदी लोग पूरे मुल्क की 58 फीसदी संपदा के मालिक हों और 10 फीसदी लोग देश की लगभग 80 फीसदी संपदा पर काबिज हों? इससे भारत में तेजी से बढ़ती गैर-बराबरी का अंदाजा अच्छी तरह लगाया जा सकता है, लेकिन हमारे योजनाकारों के लिये यह चिंता का सबब नहीं है। बेरोजगारी से त्रस्त युवा, हालातों से पस्त मजदूर, एंबुलेंस तक से महरूम अपने कंधे पर बेटे की लाश ढोने को मजबूर पिता, भूख से मरी बेटियों की मां, दवाई की कमी से काल के गाल में समाने वाले बच्चे की मां, सवाल नहीं कर पाती है। क्योंकि उनके आंखों में आंसू तो हैं लेकिन उनके पास शब्द नहीं है। एक ओर जहां देश भूख की गंभीर समस्या से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर देश में बड़े पैमाने पर खाने की बर्बादी हो रही है। विश्व खाद्य संगठन के अनुसार देश में हर साल पचास हजार करोड़ रुपये का भोजन बर्बाद हो जाता है, जो कि देश के उत्पादन का चालीस फीसदी है। इस अपव्यय का दुष्प्रभाव हमारे देश के प्राकृतिक संसाधानों पर पड़ रहा है। हमारा देश पानी की कमी से जूझ रहा है लेकिन अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन को पैदा करने में 230 क्यूसेक पानी व्यर्थ चला जाता है। अगर इस पानी को अपव्यय होने से बचा लिया जाये तो दस करोड़ लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। एक आकलन के मुताबिक अपव्यय से बर्बाद होने वाली धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिंदगी सवारी जा सकती है, उनका कुपोषण दूर कर उन्हें अच्छी शिक्षा दी जा सकती है। चालीस लाख लोगों को गरीबी के चंगुल से मुक्त किया जा सकता है और पांच करोड़ लोगों के लिए आहार सुरक्षा की गारंटी तय की जा सकती है। अन्न भंडार के समुचित प्रबंधन के अभाव में बारिश के समय बड़ी मात्रा में अनाज बहकर चला जाता है और पानी के संपर्क में आने के कारण अपनी गुणवत्ता खो देता है। खेतों से आने वाले अन्न के रख-रखाव को लेकर मंत्रालय ध्यानाकर्षण कर गंभीरता बरतता तो शायद लाखों लोगों को भूखे पेट सोने की नौबत नहीं आतीं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कुपोषण की अहम जड़ भुखमरी ही है। पर्याप्त कैलोरी युक्त पोषण व संतुलित आहार नहीं मिलने के कारण शरीर में विकृतियां आने लगती हैं। समय आने पर यही विकृतियां शरीर को कुपोषित कर देती है। रिपोर्ट की मानें तो अब भी भारत में दुनिया के 19 करोड़ कुपोषित लोग रहते हैं। भारतीय आबादी के सापेक्ष भूख की मौजूदगी करीब साढ़े 14 फीसदी की है। भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे सही पोषण के अभाव में जीने को विवश है, जिसका असर उनके मानसिक और शारीरिक विकास, पढ़ाई-लिखाई और बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है। ऐसे बच्चों को 'स्टन्टेड' कहा जाता है। अगर इन हालातों में सरकार को 2030 तक भारत को भूखमुक्त करने का संकल्प साकार करना है तो दीर्घकालीन योजनाएं को ओर भी सख्ती से लागू करना होगा व सुनिश्चित क्रियान्वयन के लिए एक पारदर्शी मशीनरी बनाने पर ध्यान देना होगा। गरीबों की सब्सिडी यथावत रखते हुए किसानों के लिए सस्ते और टिकाऊ संसाधन विकसित करने होंगे। साथ ही खाने की बेकारी को रोकने के लिए विज्ञापन कंपनियों को दिशा-निर्देश देकर खाने की उपयोगिता से आमजन को जागरूक करना होगा। इस दिशा में यह एक सार्थक कदम होगा कि सरकार भोजन की बर्बादी को अपराध घोषित कर जुर्माना लगाना शुरू कर दें एवं अनाज वितरण प्रणाली व प्रबंधन को लेकर सावधानी बरतें। अंततः विश्व की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी यदि प्रत्येक व्यक्ति तक अन्न नहीं पहुंच पा रहा है तो यह अव्यवस्था व कुशासन का ही प्रमाण है। हमारे नेताओं को भुखमरी का इस्तेमाल सत्ता की भूख मिटाने के लिए करने से बाज आना होगा व सच्चे मन से प्रयास करने होंगे।


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