-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के जानकार)


चुनाव आयोग के द्वारा 2019 के लोकसभा चुनावों की तारीखों के साथ ही "आदर्श चुनाव आचार संहिता अर्थात मॉडल कॉड ऑफ कंडक्ट" तत्काल प्रभाव से लागू हो चुकी है।स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र के आधार हैं,इसमें मतदाताओं के बीच अपनी नीतियों तथा कार्यक्रमों को रखने के लिए सभी उम्मीदवारों तथा सभी राजनीतिक दलों को समान अवसर प्रदान किया जाता है।इस संदर्भ में मॉडल कॉड ऑफ कंडक्ट अर्थात एमसीसी का उद्देश्य सभी राजनीतिक दलों के लिए बराबरी का समान स्तर उपलब्ध कराना है।इसके अतिरिक्त आदर्श चुनाव संहिता प्रचार अभियान को निष्पक्ष तथा स्वस्थ रखने तथा दलों के बीच झगड़ों तथा विवादों को निपटाना तथा टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।इसका उद्देश्य केंद्र या राज्य की सत्ताधारी पार्टी को आम चुनाव में अनुचित लाभ लेने से सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग रोकना है।आदर्श आचार संहिता लोकतंत्र के लिए भारतीय निर्वाचन प्रणाली का विशिष्ट योगदान है।

आदर्श चुनाव आचार संहिता का प्रभाव---
चुनाव आचार संहिता लागू होते ही शासन और प्रशासन में कई अहम बदलाव आ जाते हैं।राज्य और केंद्र सरकार में कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव आयोग के कर्मचारी के तरह काम करते हैं।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदर्श आचार संहिता लागू होते ही देश भर में केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारें अब कोई भी नीतिगत निर्णय नहीं ले सकती है और न ही सरकारी संशाधनों का इस्तेमाल चुनावी कार्य के लिए कर सकती है।

आदर्श चुनाव आचार संहिता(एमसीसी) का विकास------
आदर्श चुनाव आचार संहिता राजनीतिक दलों तथा विशेषकर उम्मीदवारों के लिए आचरण और व्यवहार का मानक है।इसकी विशेषता यह है कि यह दस्तावेज राजनीतिक दलों के सहमति से अस्तित्व में आया और विकसित हुआ। 1960 में केरल विधानसभा में प्रथमतः इसे लागू किया गया।इसमें यह बताया गया कि राजनीति दल क्या करें और क्या नहीं करें। 1962 में लोकसभा चुनाव में आयोग ने इस संहिता को सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों में वितरित किया तथा व्यापक पैमाने पर इसका पालन हुआ। 1967 में इसका पालन लोकसभा तथा राज्य विधान सभा चुनावों में हुआ। 1968 में निर्वाचन आयोग ने राज्य स्तर पर सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठकें की तथा स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए व्यवहार के न्यूनतम मानक के रूप में इस संहिता का वितरण किया। 1974में आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि जिला स्तर पर जिलाधिकारी के नेतृत्व में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल कर समिति गठित की जाए,ताकि आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों पर विचार हो सके। 1979 में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों से विचार विमर्श कर आचार संहिता का दायरा बढ़ाते हुए एक नया भाग जोड़ा,जिसमें "सत्तारूढ़ दल "पर प्रतिबंध लगाने का प्रावधान हुआ,ताकि सत्ताधारी दल अन्य पार्टियों तथा उम्मीदवारों की अपेक्षा अधिक लाभ उठाने के लिए शक्ति का दुरुपयोग नहीं करें। 1991 में मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषण ने आदर्श आचार संहिता को और भी मजबूती प्रदान की।वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को 'चुनाव घोषणापत्र' संबंधी संहिताओं को आदर्श आचार संहिता में जोड़ने का आदेश दिया।सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुनाव आयोग ने इन प्रावधानों को आदर्श आचार संहिता में वर्ष 2014 में जोड़ा।

आदर्श चुनाव आचार संहिता के क्रियान्वयन तिथि पर विवाद और सुप्रीम कोर्ट के आदेश----
आदर्श आचार संहिता को देश में शीर्ष न्यायालय से न्यायिक मान्यता मिली है।आदर्श आचार संहिता के प्रभाव में आने की तिथि को लेकर उत्पन्न विवाद में भारत संघ बनाम हरवंश सिंह जलाल मामले में 26 अप्रैल 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया।इस आदेश में कहा गया कि चुनाव तिथियों की घोषणा संबंधी निर्वाचन आयोग की प्रेस विज्ञप्ति जारी होने की तिथि से चुनाव आचार संहिता लागू हो जाएगी।प्रेस विज्ञप्ति जारी होने के दो सप्ताह बाद अधिसूचना जारी की जाती है।इस तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद आदर्श चुनाव आचार संहिता लागू होने की तिथि से जुड़ा विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया।इस तरह आदर्श चुनाव आचार संहिता चुनाव घोषणा तिथि रविवार ,10 मार्च की तिथि से चुनाव होने तक संपूर्ण देश में प्रभावी हो गई है।

चुनाव आचार संहिता के महत्वपूर्ण प्रावधान----
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचनों का निरीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण करने के लिए चुनाव आयोग की स्थापना की गई है।उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति में निर्वाचन आयोग "चुनाव आचार संहिता" का प्रयोग एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में करती है।इसका मुख्य मकसद राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों से चुनावी संहिता का पालन कराना होता है।चुनावी संहिता या कोड में सामान्य आचरण,बैठकों,जूलुस,मतदान दिवस,मतदान केंद्र,पर्यवेक्षक, सत्ता में पार्टी और चुनाव घोषणा पत्र सहित कुल 8 प्रावधान हैं।प्रथम,सामान्य आचार संहिता के अंतर्गत राजनीतिक पार्टियों को अपने प्रतिद्वंद्वी पार्टियों की उनके पिछले रिकॉर्ड के आधार पर ही आलोचना करनी होगी।वोटरों को लुभाने के लिए जातीय और सांप्रदायिक लाभ उठाने से बचना होगा।वोटरों को किसी भी प्रकार का रिश्वत नहीं देना होगा।इसके साथ ही झूठी जानकारी के आधार पर भी उम्मीदवारों की आलोचना नहीं होनी चाहिए।द्वितीय 'मीटिंग' के अंतर्गत पार्टियों को अगर कोई बैठक या सभा करनी होगी,तो उन्हें उस इलाके के स्थानीय पुलिस को पूरी जानकारी देनी होगी,जिससे पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम संभव हो सके।आदर्श चुनाव आचार संहिता का तीसरा महत्वपूर्ण प्रावधान 'चुनाव प्रचार 'के अंतर्गत अगर दो या दो से अधिक पार्टियां एक ही रुट में चुनाव प्रचार के लिए निकली है,तो आयोजन कर्ताओं को आपस में संपर्क कर यह तय करना होगा कि वे आपसी संघर्ष नहीं करेंगे।एक दूसरे के विरोध में हिंसा का प्रयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है।चतुर्थ, 'पोलिंग डे' के अंतर्गत सभी पार्टियों के कार्यकर्ताओं को एक पहचान पत्र रखना होगा।इसमें किसी पार्टी का नाम नहीं होगा और न ही चुनाव चिह्न और न ही किसी उम्मीदवार का नाम होगा।पंचम 'पोलिंग बूथ' के अंतर्गत केवल मतदाता जिनके पास चुनाव आयोग के मान्य पहचान पत्र हैं,वे ही पोलिंग बूथ के अंदर जा सकेंगे।छठें प्रावधान मेें 'निरीक्षक' शामिल है।इसके अंतर्गत चुनाव आयोग पोलिंग बूथ के बाहर एक निरीक्षक तैनात करेगा,ताकि अगर आचार संहिता का कोई उल्लंघन कर रहा है,तो उसकी शिकायत उनके पास की जा सके। आदर्श चुनाव आचार संहिता का सातवां महत्वपूर्ण प्रावधान 'सत्ताधारी पार्टी' से संबंधित है।इस दौरान सत्ताधारी पार्टियों के मंत्रियों को किसी भी तरह की आधिकारिक दौरे की मनाही होगी,जिससे सुनिश्चित किया जा सकें कि वे अपने आधिकारिक दौरे पर चुनावी प्रचार ना करें।उन्हें किसी तरह के लोक लुभावन वादे नहीं करने होंगे।इस संहिता का 8 वाँ प्रावधान 'चुनावी घोषणापत्र' है।सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसे जोड़ा गया है।इसके अनुसार चुनावी घोषणापत्र में बताएं गए वादों को पूरा करना होगा।


आदर्श चुनाव आचार संहिता क्या कानूनी रूप से बाध्यकारी है?
मॉडल कॉड ऑफ कंडक्ट कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है।इसका कोई वैधानिक आधार भी नहीं है।यदि कोई प्रत्याशी या राजनीतिक दल आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करता है,तो चुनाव आयोग नियमानुसार कार्यवाई कर सकती है।इसके साथ उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है।जरूरी होने पर आपराधिक मुकदमा भी दर्ज कराया जा सकता है।इसके उल्लंघन पर संबंधित व्यक्ति को जेल भी भेजा जा सकता है।
अब प्रश्न उठता है कि जब आदर्श चुनाव आचार संहिता पर कोई कानूनी बाध्यता नहीं है,तो चुनाव आयोग कार्यवाई कैसे करती है? इसके लिए चुनाव आयोग आईपीसी-1860,सीआरपीसी-1973 तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के धाराओं का प्रयोग करती है।उदाहरण के लिए मस्जिदों, चर्चों या अन्य पूजा स्थलों का उपयोग चुनाव प्रचार के लिए करना मूलतः जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के अंतर्गत आपराधिक कार्यवाई है।इसी तरह चुनाव में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए रिश्वत देना मूलतः जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 तथा आईपीसी की धारा-177 B के अंतर्गत प्रतिबंधित है।ऐसे में अगर कोई इसका उल्लंघन करता है,तो चुनाव आयोग उपरोक्त दोनों कानूनों का प्रयोग करती है।इसी तरह चुनाव के समय शराब वितरण के आरोपों में भी चुनाव आयोग जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 के अंतर्गत कार्यवाई करती है।


आचार संहिता को विधिक दर्जा पर बहस---
चुनाव आयोग का कहना है कि आदर्श संहिता को कानूनी दर्जा देने की कोई विशेष जरूरत नहीं है।सामान्यतः' चुनाव' कार्यक्रम घोषित होने के लगभग 45 दिनों के भीतर निपटा लिया जाता है।इसलिए इससे संबंधित शिकायतों को तेजी से निपटाने का महत्व है।समय पर इसका निपटान नहीं होने से ये महत्वहीन हो जाते हैं।कानून और विधिक मामलों की स्टैंडिंग कमिटी ने 2011 में कहा कि आदर्श आचार संहिता को मूलतः जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 का भाग बना देना चाहिए। 1990 में दिनेश गोस्वामी समिति ने भी चुनाव सुधारों के अंतर्गत आदर्श आचार संहिता को सांविधिक बनाने की माँग की।

आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन और चुनाव आयोग----
चुनाव आयोग इस तरह के उल्लंघन के मामलों में सिर्फ नोटिस या एफआईआर दर्ज करा सकता है।इसका प्रभाव यह होता है कि नोटिस की बात आम जनता तक पहुँच जाती है और नेता पर जन दबाव पड़ता है।यदि इससे संबंधित अधिकार कोर्ट को दिया जाएगा,तो लंबी अवधि में निपटारे के कारण आचार संहिता का महत्व खत्म हो जाएगा।ऐसा होने पर चुनाव आयोग के पास जो हाथी के दिखाने वाले दाँत हैं,वो भी टूट जाएँगे।
प्रायः चुनाव हो जाने के बाद आचार संहिता के संदर्भ में दर्ज मामलों पर शायद ही कोई प्रगति होती है।अगर कुछ प्रगति होती भी है,तो कमजोर कानूनों के कारण आचार संहिता तोड़ने वाले व्यक्ति जमानत पर शीघ्र रिहा हो जाता है।चुनाव के बाद मामलों को मुकाम पर पहुँचाने में आयोग बेबस है।जब आचार संहिता जारी होती है,तो संपूर्ण प्रशासन आयोग के अधीन होता है,और उसी के दिशा निर्देश का पालन करता है।परंतु इस अवधि के समाप्त होने के बाद प्रशासन प्रायः इन मामलों का समुचित फोलोअप नहीं करता है।यही कारण है कि इस समय देशभर में चुनाव आचार संहिता काफी ज्यादा मामले लंबित हैं।

निष्कर्ष---
इस संदर्भ में आवश्यक है कि चुनाव आयोग के शक्तियों में वृद्धि की जाएँ।प्रायः आचार संहिता के उल्लंघन पर निर्वाचन आयोग दंडात्मक कार्यवाई से बचता ही है।लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने दो प्रमुख नेताओं के चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी थी।आयोग ने प्रतिबंध लगाने के लिए अनुच्छेद 324 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का सहारा लिया था।नेताओं द्वारा माफी माँगने तथा आर्दश आचार संहिता के अंतर्गत कार्य करने के वादा के बाद ही इसे हटाया गया था।इस समय चुनाव सुधार के लिए नियमों के निर्माण के लिए चुनाव आयोग विधायिका पर निर्भर है।आवश्यक है कि नियमों के निर्माण तथा उसके क्रियान्वयन की शक्तियाँ चुनाव आयोग को मिलें।इसके अतिरिक्त वर्तमान में फेक न्यूज भी गंभीर चुनौती है,जिसे चुनावी अपराध घोषित करने की माँग स्वयं चुनाव आयोग ने की है।यद्यपि इस वर्ष आचार संहिता को लागू करने के लिए चुनाव आयोग ने लोगों के लिए "सी-विजिल" एप बनाया गया है,जिसपर किए गए शिकायतों पर चुनाव आयोग त्वरित रूप से सुनवाई करेगा।अंततः निष्पक्ष और स्वतंत्र निर्वाचन के लिए चुनाव आयोग के शक्तियों में और भी वृद्धि आवश्यक है।

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