-राज शेखर भट्ट
जमाना बहुत आगे बढ़ चुका है। अब वो प्यार नहीं रहा, जो हीर-रांझा ने किया था। आज के आशिक मुहब्बत की वैसी पूजा नहीं करते हैं, जो सोहनी-महिवाल ने की थी। अब वो इश्क़ की इबादत न बची, जो मजनू ने न की थीं। कोई ऐसा जुल्म नहीं था, जिसके निशान लैला के जिस्म पर न थे। वर्तमान में तो लव का वो रोमांस भी समाप्त हो चुका है, जो रोमियो-जूलियट ने किया था। आज के दौर में बचीं हैं तो सिर्फ इच्छायें, ख्वाहिशें, शारीरिक प्यार और अपेक्षायें। एक जमाना था, जब पत्रों के माध्यम से प्रेम करने वाले एक-दूसरे का हाल जाना करते थे। क्योंकि इस बात का पता नहीं था कि मुलाकात कब होगी। कब आमने-सामने रहकर बातें करेंगे और एक-दूसरे के देखेंगे। लेकिन आज के दौर में पत्र का तो नामो-निशां तक नहीं है। रही बात मिलने-जुलने की तो वो एक दिन में न जाने कितनी बार मुलाकात होती है, इसका भी पता नहीं। क्योंकि दौर बदल चुका है और सुविधायें भी मिल चुकी हैं। लेकिन बदलते दौर के साथ युवा-युवतियों का इतना बदलना वीभत्स हो चुका है।
बात अगर मुहब्बत की करें तो मुहब्बत एक पाक शब्द है, जिसकी कोई सीमा नहीं है। लेकिन आज की मुहब्बत की सीमा अधिकांशतः दो ही जगह तक सीमित हो चुकी है। लड़के की तरफ से शरीर तक सिमटे रहना और उस पर अधिकार रखना। जैसे कि मालिकाना हक हो, लेकिन प्रेम तो स्वतंत्र है। जहां बंधन है, वहां प्रेम हो ही नहीं सकता। इसको तो इच्छाओं का पिटारा ही कहा जा सकता है। या यूं कहें कि प्यार में आजकल लड़की एक मशीन हो। जिस तरफ घुमाओ, घूम जाय। इसे प्यार कैसे कहा जा सकता है, यह तो तानाशाही सा लगता है। आगे आने वाले समय में ऐसा न हो जाय कि लड़की सांस भी ले तो लड़के से पूछकर ले। इसे तो गुलाम वंश का गुलामी प्यार कहा जा सकता है।
इसी प्रकार, अगर देखा जाय तो लड़की के प्यार की करवटें भी बदल सी गयीं हैं। बहरहाल, लड़कों में प्यार का भड़काव भी तो लड़की से ही पैदा होता है। क्योंकि लड़कों की सोचानुसार, फीमेल के पास तो मुहब्बत का खजाना है। अब खजाना चाहिए तो जीएसटी तो भरना पड़ेगा ही। अब वो जीएसटी 10 प्रतिशत हो प्रतिशत, 50 हो या 100 प्रतिशत हो, देना तो है ही। क्योंकि ताली एक हाथ से नहीं बजती और अपेक्षायें भी दोनों तरफ हैं। वर्तमान मुहब्बतानुसार, जानू मेरा रिचार्ज करा दो, बैलेंस खतम हो गया है। साल में बर्थ-डे आयेगा, प्यार शुरू होने का दिन, नया साल, प्रेम पर्व के सात, और भी बहुत कुछ। अब लड़के को गिफ्ट तो देना ही है, रेस्टोरेंट में डिनर और पार्कों का सैर-सपाट भी कराना है। जितने भी इंपोर्टेंट काम हैं, कपड़े हैं और जितने भी इंपोर्टेंट कपड़े, वो भी देने ही हैं। ये चाहिए-वो चाहिए, यहां जाना है-वहां जाना है, यह तो लड़की बोलेगी ही। क्योंकि जब लड़के की अपेक्षायें पूरी हो रही हैं तो लड़की भी पूरी होना लाजिमी है।
खैर, छोटी सी उम्र में एक-दूसरे पर निर्भर रहना, अपेक्षा का लक्षण है। लड़की के चक्कर मारपीट और गाली-गलौच करना मालिकाना हक है। मुहब्बत के रिश्ते में अश्लीलता, वीभत्स से प्यार है। ये चाहिए-वो चाहिए, इसके बिन जिन्दगी अधूरी है, ये इच्छाओं का पिटारा है। बातों-बातों में एक-दूसरे का प्रयोग केवल मानसिक और शारीरिक तौर पर करना तानाशाही है।

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