-राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। कोई अन्न दान, धन का दान,वस्त्र दान,विद्या दान,भू दान,कन्यादान,रक्तदान इत्यादि करते हैं। प्राचीन काल मे लोग गौ माता का दान किया करते थे। ऋषिकाल में कामधेनु गाय का उल्लेख मिलता है। जो मनचाहा फल देती है। ऋषियों को गाय दान में दी जाती है। गाय का दान किसी की मृत्यु पर ब्राह्मणों को गौ दान दिया जाता है। दानी अमृत प्राप्त करता है। दानी दीर्घायु होता है।
कायिक ,वाचिक, मानसिक दान के तीन भेद हैं। संकल्पपूर्वक जो स्वर्ण,रजत आदि दान किया जाता है वह कायिक दान कहलाता है। अपने निकट किसी भयभीत व्यक्ति के आने पर जो अभयदान दिया जाता है वह वाचिक दान कहलाता है। जप और दजयं प्रभृति का जो अर्पण किया जाता है उसे मानसिक दान कहते हैं।
धर्म के चार चरणों मे दान का विशेष महत्व है । अध्यात्म के अनुसार साधनाकाल में दान ही श्रेष्ठ हैं।दान संसार को त्यागने की उद्धत करता है। दान में अमीर गरीब का अंतर नहीं देखा जा सकता । बड़े बड़े राजा महाराजाओं ने भी भोग विलास एवम अपने वैभव का त्याग किया।
दान आवागमन से मुक्ति की ऒर पहला कदम है। दान प्रत्येक दशा में कल्याणकारी है। जिस किसी प्रकार दान किया जाए वह कल्याण की ओर अग्रसर करता है।
बहुत से लोग दान दूसरों की भलाई के लिए करते हैं। अतिवृष्टि,प्राकृतिक प्रकोपों ,भुकम्प, अनावृष्टि,त्रासदी आदि के समय दान देना चाहिए। दान में दिखावा नहीं होना चाहिए।
आध्यात्मिक दान योगी के क्षेत्र की वस्तु। सबसे बड़ा दान विद्या दान है। विद्या वह है जो व्यक्ति को आवागमन से छुटकारा दिला दे। सा विद्या या विमुक्तये।
भगवत गीता के 17 वन अध्याय में तीन प्रकार के दान की कहा है। सात्विक,राजस व तामस।
सात्विक दान के अंतर्गत वो दान आता है जो सत्पात्र के प्राप्त होने पर, बदले में उपकार की भावना से रहित होकर दिया जाता है।
प्रत्युपकार की भावना से जो दान दिया जाता है वह राजसी दान है।
जो दान बिना सत्कार किये दिए जाता है। अयोग्य व्यक्ति को अनाधिकारी को दिया जाता है। वह दान तामस दान है।
दान जरूरतमंद को ही देना चाहिए। ईश्वर चिंतन में रत दान का सर्वोत्कृष्ट पात्र है।
इतिहास में कई दानवीर हमने पढ़े हैं जो दान देकर दानवीर कहलाए।
भगवान कृष्ण ने कर्ण को सबसे बड़ा दानी माना। क्योंकि कर्ण दान करने से पहले अपने हित की नहीं सोचता था। इसी कारण कारण दानवीर कहलाया। उसने कवच कुंडल,कुन्ती को दान में दिया वचन, कृष्ण ने दान की परीक्षा ली,यौवन दान दे दिया। कर्ण उक्त पांच बड़े दान कर बना संसार का सबसे बड़ा दानवीर।
राजा हरिश्चन्द्र बहुत बड़े दानवीर हुए। उनकी ये खास बात थी कि जब वो दान देने के लिए हाथ आगे बढ़ाते तो अपनी नजरें नीचे झुका लेते थे। ये बात जब तुलसीदास जी को पता चली तो वो बोले राजा तुम ऐसा दान कहाँ से सीखे हो ? राजा बोला देने वाला कोई और है वो दुनिया का मालिक है वो परमात्मा है वो दिन रात भेज रहा है। परन्तु लोग ये समझते हैं कि मैं दे रहा हूँ राजा दे रहा है। ये सोच कर मुझे शर्म आ जाती है और मेरी आँखें नीचे झुक जाती है।
मेवाड़ के महाराणा प्रताप के मित्र सहयोगी विश्वासपात्र सलाहकार भामाशाह बहुत बड़े दानवीर हुए। अपरिग्रह को जिन्होंने जीवन का मूलमंत्र माना। संग्रहण की प्रवृति से दूर रहे। मातृभूमि के लिए सर्वस्व अर्पण कर दिया। सब दान में दे दिया। आज भी भामाशाह योजना सरकार की उन्हीं के नाम से चल रही है। दानवीरता के लिए भामाशाह का नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित है। कुपात्र को देने से दाता नष्ट हो जाता है इसलिए अधिकारी जो है दान का जो पात्र है उसे ही दान देना चाहिए।
दान देकर गिनाना नहीं चाहिए। मैंने उस जगह इतना दान दिया। बड़ी बड़ी डींगे नहीं मारना चाहिए।

*98 पुरोहित कुटी ,श्री राम कॉलोनी,भवानीमंडी

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