समानांतर सिनेमा के अग्रदूत थे मृणाल सेन

- योगेश कुमार गोयल*
भारत के प्रतिष्ठित दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात फिल्म निर्देशक मृणाल सेन 30 दिसम्बर को अंतिम सांस लेते हुए 95 वर्ष की आयु में चिरनिद्रा में लीन हो गए। वे विगत कई वर्षों से कई गंभीर बीमारियों से पीडि़त थे और बीमारी के ही चलते पिछले 16 वर्षों से फिल्म निर्माण से भी दूर थे। वर्ष 2002 में उनकी अंतिम फिल्म ‘आमार भुवन’ आई थी। बांग्ला तथा हिन्दी की कई बेहतरीन फिल्में देने वाले मृणाल सेन भारतीय फिल्मों के जाने-माने निर्माता-निर्देशक थे। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि उनके समय का हर दिग्गज अभिनेता उनके साथ काम करने को इच्छुक रहता था। हालांकि उनकी अधिकांश फिल्में बांग्ला भाषा में ही रही। 1955 में उनकी पहली फीचर फिल्म ‘रातभोर’ रिलीज हुई थी और लेकिन उन्हें स्थानीय स्तर पर पहचान मिली उनकी 1959 में आई अगली फिल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ से जबकि 1960 में रिलीज हुई तीसरी फिल्म ‘बाइशे श्रावण’ से तो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में सफलता मिल गई थी।
उसके बाद उन्होंने पांच और फिल्में बनाई और फिर भारत सरकार से मिली छोटी सी सहायता राशि से उन्होंने ‘भुवन शोम’ नामक एक ऐसी फिल्म बनाई, जिसके लिए उन्हें पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और इसी फिल्म ने उन्हें देश के बड़े फिल्मकारों की श्रेणी में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस फिल्म के बाद भारतीय सिनेमा जगत में ऐसी क्रांति की शुरूआत हुई कि छोटे बजट की यथार्थपरक फिल्मों का नया दौर शुरू हो गया। यही वजह है कि मृणाल सेन को समानांतर सिनेमा का अग्रदूत भी कहा जाता है। वैश्विक मंचों पर उन्हें बंगाली समानांतर सिनेमा के सबसे बड़े राजदूतों में से एक माना जाता रहा है। हालांकि ‘भुवन शोम’ के उपरांत उन्होंने जितनी भी फिल्में बनाई, सभी राजनीति से प्रेरित मानी जाती रही, जिसके चलते उन्हें मार्क्सवादी कलाकार के रूप में जाना जाता रहा। फिल्मों के अलावा वह राजनीति में भी सक्रिय रहे। 1998 से 2003 तक वे कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से राज्यसभा सदस्य के रूप में नामित किए गए।
1977 में मृणाल सेन ने बॉलीवुड के सुप्रसिद्ध अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती को फिल्म जगत में अपनी फिल्म ‘मृगया’ के जरिये पहचान दिलाई, जो मिथुन दा की पहली फिल्म मानी जाती है। उससे पहले मिथुन गौरांग चक्रवर्ती के नाम से जाने जाते थे, उन्हें मृणाल ने ही मिथुन नाम दिया। उस फिल्म में अभिनय के लिए मिथुन चक्रवर्ती को ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ का राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इसी प्रकार मृणाल सेन ने रेडियो की एक स्वर परीक्षा में आवाज को खराब बताते हुए खारिज कर दिए गए अमिताभ बच्चन की प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें भी अपनी पहली हिन्दी फिल्म ‘भुवन शोम’ में अवसर दिया, जिसमें अमिताभ मुख्य सूत्रधार थे और फिल्म में पहली बार उनकी आवाज का इस्तेमाल हुआ था। उस फिल्म के बाद अमिताभ के अभिनय और आवाज का जादू सिने दर्शकों पर ऐसा सिर चढ़कर बोला कि रेडियो स्वर परीक्षण में आवाज की क्वालिटी को लेकर खारिज कर दिए गए अमिताभ सदी के महानायक बन गए। निसंदेह इसका बहुत बड़ा श्रेय मृणाल सेन को जाता है। बिग बी ने उनके निधन के पश्चात् दुख व्यक्त करते हुए कहा भी कि उन्होंने पहली बार मृणाल की ही फिल्म ‘भुवन सोम’ में अपनी आवाज दी थी, जो सर्वाधिक मिलनसार, प्रतिष्ठित, रचनात्मक सिनेमाई शख्स थे, सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक के समकालीन। दरअसल 1950-60 के दशक में विशेषकर बांग्ला फिल्म जगत में मृणाल सेन, सत्यजीत रे और ऋत्विक घटक का ही वर्चस्व था।
14 मई 1923 को तत्कालीन बांग्ला देश के फरीदपुर शहर में जन्मे मृणाल सेन को भारतीय सिनेमा जगत में उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए जीवन पर्यन्त अनेक सम्मान प्राप्त हुए। भारत सरकार द्वारा 1981 में उन्हें कला के क्षेत्र में ‘पद्म भूषण’, 2005 में ‘पद्म विभूषण’ तथा उसी वर्ष ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2000 में उन्हें रूसी सरकार की ओर से राष्ट्रपति ब्लादिमिर पुतिन ने ‘ऑर्डर ऑफ फ्रैंडशिप’ सम्मान से सम्मानित किया जबकि फ्रांस सरकार द्वारा उन्हें ‘कमांडर ऑफ द आर्ट ऑफ आर्ट एंडलेटर्स’ उपाधि से विभूषित किया गया था। वे भारतीय फिल्म जगत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाने वाले देश के सबसे प्रशंसित फिल्मकारों में से एक माने जाते रहे। कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म प्रतिस्पर्धाओं में उन्होंने ज्यूरी की महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई।
अपने 47 वर्ष लंबे फिल्म कैरियर में मृणाल सेन ने अनेक फिल्में बनाई, जिनमें कुछ प्रमुख रही ‘रातभोर’, ‘नील आकाशेर’, नीचे’, ‘बाइशे श्रावण’, ‘पुनश्च’, ‘अवशेष’, ‘प्रतिनिधि’, ‘अकाश कुसुम’, ‘मतीरा मनीषा’, ‘भुवन शोम’, ‘इच्छा पुराण’, ‘इंटरव्यू’, ‘एक अधूरी कहानी’, ‘कलकत्ता 1971’, ‘बड़ारिक’, ‘कोरस’, ‘मृगया’, ‘ओका उरी कथा’, ‘परसुराम’, ‘एक दिन प्रतिदिन’, ‘आकालेर सन्धाने’, ‘चलचित्र’, ‘खारिज’, ‘खंडहर’, ‘जेंनसिस’, ‘एक दिन अचानक’, ‘सिटी लाईफ-कलकत्ता भाई एल-डराडो’, ‘महापृथ्वी’, ‘अन्तरीन’, ‘100 ईयर्स ऑफ सिनेमा’, ‘आमार भुवन’ इत्यादि। अपने लंबे कैरियर में उन्होंने 1977 में एक तेलुगू फिल्म ‘ओका ओरि कथा’ का निर्माण भी किया।
अपनी फिल्मों के लिए उन्हें देश-विदेश से अनेक सम्मान प्राप्त हुए। वे कितने महान फिलमकार रहे, इसका अनुमान इसी से हो जाता है कि उनकी करीब 30 फिल्मों को 18 राष्ट्रीय तथा 25 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। 1969 में ‘भुवन शोमे’, 1979 में ‘एक दिन प्रतिदिन’, 1980 में ‘अकालेर संधाने’, 1984 में ‘खंडहर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, आलोचना की श्रेणी में 1976 में उनकी फिल्म ‘मृगया’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, 1974 में ‘पदातिक’, 1983 में ‘अकालेर संधाने’ तथा 1984 में ‘खंडहर’ व ‘खारिज’ को सर्वश्रेष्ठ स्क्रीनप्ले, मास्को फिल्म समारोह में 1975 तथा 1979 में उनकी फिल्मों ‘सहगान’ तथा ‘परशुराम’ को रजत पुरस्कार, कार्लोवी वैरी फिल्म फेस्टिवल में 1977 में ‘ओका ओरी कथा’ को ‘विशेष ज्यूरी पुरस्कार’, बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में 1979 तथा 1981 में परशुराम तथा ‘अकालेर संधाने’ के लिए ‘इंटरफिल्म अवार्ड’, बर्लिन फिल्म महोत्सव में 1981 में ‘अकालेर संधाने’ के लिए ‘ग्रैंड ज्यूरी पुरस्कार’, कांस फिल्म फेस्टिवल में 1983 में फिल्म ‘खारिज’ के लिए ‘ज्यूरी प्राइज’, इसी फिल्म के लिए उसी वर्ष वैलाडोलिड फिल्म फेस्टिवल में ‘गोल्डन स्पाइक’, 1984 में शिकागो फिल्म फेस्टिवल में ‘खानधार’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म, उसी फिल्म को 1984 में मांन्ट्रियल फिल्म फेस्टिवल में ‘विशेष ज्यूरी पुरस्कार’, 1989 में वेनिस फिल्म फेस्टिवल में ‘एक दिन अचानक’ को ‘माननीय मेंशन’ तथा काहिरा फिल्म समारोह में उनकी आखिरी ‘आमार भुवन’ के लिए उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ निर्देशक सहित अनेक सम्मान प्राप्त हुए। बांग्ला सिनेमा के साथ-साथ हिन्दी सिनेमा को भी साफ-सुथरी बेहतरीन फिल्मों से समृद्ध करने वाले मृणाल सेन का दुनिया से यूं चले जाना भारतीय सिनेमा के लिए ऐसी अपूरणीय क्षति है, जो कभी पूरी नहीं हो सकती।

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)
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