-राज शेखर भट्ट, देहरादून
लोकसभा के अंदर राफेल डील की बहस में सभी के द्वारा तथ्य छुपाने की कला तो बेहतरीन थी। यूं लगा कि जैसे सब्जी की ठेली वाले एक दूसरे से बहस कर रहे हों कि कल मण्डी से करेले क्या भाव लाया और क्या भाव बेचा। सभी इतने व्यस्त हैं कि करेले साथ-साथ कद्दू, गोबी और टमाटर के भाव भी बहस में ले आये। एक ठेली वाला गड़बडी के आरोप लगाता है तो बड़ी ठेली वाला इसकी जरूरत नहीं समझता और नकार देता है। जाहिर सी बात है कि यदि बहस से निकले तथ्यों पर विचार करते हुये दोनों पक्ष संतुष्ट नहीं होते हैं तो बहस करने की जरूरत ही क्या है।
एक पक्ष की तरफ से सवाल सामने आते हैं कि वायुसेना ने 126 राफेल खरीदने थे तो वो 36 हो गये। एक राफेल की कीमत 526 करोड़ थी, जो 1600 करोड़ हो गयी। हो सकता है कि खरीददारी पूरी होने तक राफेल 36 से 6 हो जायें और कीमत 1600 से 16000 करोड़ हो जाए। ये तो वही बात हो कि कल प्याज 10 रूपये किलो था और आज 80 पहुंच गया। अब वहीं दूसरा पक्ष की दलील कि यह सौदा करने के लिए 74 बैठकें की गयी और जो 2016 के सौदे के विपरीत यह राफेल पूर्ण रूप से हथियारों से लैस होंगे।
दूसरी तरफ से आवाज आती है कि पहले स्वयं को तो देख लें। बोफोर्स मामले को भी याद करें, जब जेपीसी की बात से भ्रष्टाचार सना हुआ था। प्रथम पक्ष झूठ का साथ लेना छोड़ दे तो राफेल मामले में बात करें। कुल मिलाकर तनातनी चलती रही, बहस होती रही, हंगामे बने रहे और कागज के राफेल हवा में उड़ने लगे। दायें-बायें, ऊपर-नीचे, आगे-पीछे के बयानों से लोकसभा में तीर चलते रहे। कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट भी अपना फैसला दे चुका है, जेपीसी जांच की आवश्यकता नहीं है। असली राफेल को हवा में उड़ेंगे तो नजर आयेंगे ही और सच्चाई तो भविष्य के गर्भ में है।
बहस चल ही रही थी कि निशाना साधा गया कि गोवा सरकार के वित्त मंत्री की राफेल डील से जुड़ी बातचीत संबंधी टेप चलायी जाय तो उसे नकार दिया गया। दूसरा धनुर्धर आया, तो फ्रांसीसी राष्ट्रपति के बयान का जिक्र और राष्ट्रपति द्वारा बातों का खंडन करने को ब्रह्मस्त्र की तरह छोड़ा जाने लगा। जैसे कि महाभारत चल रही हो, सामने गुरू द्रोणाचार्य बैठे हों और चिड़ियां आंख देखी जा रही हो। अंत में गुरू द्रोणाचार्य ने भी पांडव और कौरवों को चुप कराया और सदन को स्थगित किया।
एक मत कोई नहीं होता, शायद इसीलिए पक्ष-विपक्ष हैं। ढेरों बातों के तीर छोडे जाते हैं और शोर-शराबे से ध्वनि-प्रदूषण होता है। कोर्ट आॅर्डर देता है तो पुर्नविचार की याचिका लगा दी जाती है। एक पक्ष दूसरे पक्ष को गलत बताता है तो दूसरा पक्ष पहले पक्ष को गलत बताता है। बहरहाल, इतना जरूर है कि वर्ष 2018 मीटू, राम मंदिर, धारा 370 और धारा 497 में गुजर चुका है। हो सकता है कि राफेल और अन्य मामले 2019 के समाप्त होने तक बने रहें।

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