-बाल मुकुन्द ओझा (वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार)

लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही देश में परिवार और वंशवाद की राजनीति एक बार फिर जोर शोर से हिलोरे मारने लगी है। हिंदी पट्टी के तीन राज्यों में हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर थी मगर परिवारवाद की फसल दोनों ही पार्टियों में बखूबी काटी गयी। यूँ देखा जाये तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में वंशवादी राजनीति न के बराबर है जबकि कांग्रेस, सपा, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, लोकदल के नाम से विभिन्न दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी , देवेगौड़ा की पार्टी, अकाली दल जैसे दलों का संगठन और सत्ता एक परिवार विशेष के लिए समर्पित है। कई राजनीतिक विश्लेषक परिवारवाद और वंशवाद की परिभाषा अलग अलग बताते है। इन लोगों की मान्यता के अनुसार यदि संघर्ष के रास्ते कोई भाई अपनी जगह सियासत में बनाकर आता है तो उसे परिवारवाद का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वहीँ दूसरे पक्ष के विश्लेषक मानते है कि परिवार के सहारे आगे बढ़ना अनुचित है। भारत के लोकतंत्र को समझने वाले लोगो का एक दृष्टिकोण ये भी है की इस देश में वंशवाद और राजशाही को लोकतंत्र का जामा ओढ़ाया गया है। राजशाही के जमाने में और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना है कि तब राजा ही अपने बेटे को उत्तराधिकारी घोषित करता था अब वो जनता से घोषित करवाता है। बहरहाल आम जनता की नजर में परिवारवाद और वंशवाद में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह हितकारी नहीं है।

आजादी के बाद से ही परिवारवाद गैर कांग्रेसी दलों का कांग्रेस के विरुद्ध अचूक हथियार रहा है। शुरू में डॉ लोहिया ने परिवारवाद पर कांग्रेस पर हमला किया था बाद में गैर कांग्रेस दलों ने इसे हथिया लिया। अब तो लगभग सभी पार्टियों में परिवार का ही बोलबाला है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश, बिहार में तेजस्वी यादव और चिराग पासवान, कर्नाटक में कुमार स्वामी, पंजाब में बादल, हरियाणा में चैटाला, कश्मीर में अब्दुल्ला, महाराष्ट्र में ठाकरे और सुप्रिय सुले के बाद राहुल गाँधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के बाद देश में वंश और परिवारवाद की सियासत गरमा गई है। मोतीलाल नेहरू से राहुल गाँधी तक कांग्रेस नेहरू- गाँधी परिवार के कब्जे में रही है। नेहरू -गाँधी परिवार जब जब कांग्रेस पर सवार हुआ है तब तब यह पार्टी आगे बढ़ी है। नरसिंह राव, सीताराम केसरी का कार्यकाल भी लोगों ने देखा है। कहा जाता है की इन दोनों नेताओं के समय पार्टी की लुटिया डूबी जो अब तक उभर नहीं पाई है। कांग्रेस पर परिवारवाद का आरोप कोई नया नहीं है मगर यह सच है की इस पार्टी को जीवनदान यह परिवार ही दे सकता है अन्यथा स्वतंत्रता के गर्भ से निकली पार्टी को बिखरने में देर नहीं लगेगी।
भारत की राजनीति में परिवारवाद खत्म होने की बजाय वटवृक्ष की तरह फैलता जा रहा है। वर्तमान में लगभग हर पार्टी परिवारवाद के रोग से ग्रसित है। प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का हाल तो यह है,कि पार्टी का अध्यक्ष पद परिवारों की बपौती बना हुआ है। अधिकांश राजनीतिक दलों में एक ही परिवार के सदस्य कब्जा जमाये हुए है। इन दलों में वंशवाद के साथ दागी सियासत भी उफान पर है। कई दल तो लोकतंत्र का जामा पहन कर जाति ,संप्रदाय और वर्ग विशेष की राजनीति का सियासी खेल खेल रहे है। इन दलों के पास धन दौलत की कमी नहीं है। जितनी तेजी से राजनीतिक दलों में परिवारवाद पांव पसार रहा है, वह दिन दूर नहीं जब शायद कोई आम आदमी चुनाव लड़ सके।
विश्व के लोकतंत्रिक इतिहास में भारत ऐसा देश है, जहां परिवारवाद की जड़ें गहरी धंसी हुई है। अब तो देश का लोकतंत्र परिवारतंत्र में बदल गया है। एक सर्वे के मुताबिक 2009 में 29 फीसदी और 2014 में 21 फीसदी सांसद वंशवाद की राजनीति से आए थे। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के पांच जने लोकसभा में पहुंचे। इनमें पांचों के पांचों मुलायम सिंह के वंश से थे यानी सौ फीसदी वंशवाद। सोलहवीं लोकसभा में कांग्रेस के 44 प्रतिनिधि जीतकर आये। इसमें 48 प्रतिशत सांसद वंशवाद से निकलकर आए , यानी इनमें से करीब आधे, रिश्तेदारों की वजह से राजनीति में आए। इसी भांति भाजपा में 15 प्रतिशत सांसद वंशवाद का सहारा लेते हुए संसद में पहुंचे। एक आंकड़ें के मुताबिक संसद में इस समय 36 राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि मौजूद हैं जिसमें से 13 राजनैतिक दलों के प्रतिनिधि दरअसल परिवार के सदस्य ही हैं।
भारत का लोकतंत्र भी अजब निराला है। मतदाता चाह कर भी जाति और क्षेत्र की राजनीति के भंवर से आजादी के 71 वर्षों के बाद भी निकल नहीं पाए है। लोकतंत्र ने आज पूरी तरह परिवारतंत्र का जामा पहन लिया है। बड़े बड़े आदर्शों की बात करने वाले नेता परिवारमुखी होगये है। देश वंशवाद से कब मुक्त होगा यह बताने वाला कोई नहीं है। इस गंभीर और संक्रामक बीमारी का इलाज केवल देश का मतदाता ही कर सकता है।

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